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फिर जीवंत हुई परम्परा

तमिलनाडु में धर्म और संस्कृति के प्रतीक जल्लीकट्टू के आयोजन पर जब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिबंध लगाया, तब हिंदू समाज ने व्यापक आंदोलन किया। अंतत: राज्य सरकार को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम में संशोधन के लिए विधेयक पारित कर ‘जल्लीकट्टू’ के आयोजन के लिए नया रास्ता निकालना पड़ा

Written byडॉ. आनंद पाटीलडॉ. आनंद पाटील
Jan 20, 2023, 11:52 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, तमिलनाडु
जल्लीकट्टू कई सहस्राब्दियों से तमिल लोक संस्कृति और विरासत का अभिन्न अंग रहा है

जल्लीकट्टू कई सहस्राब्दियों से तमिल लोक संस्कृति और विरासत का अभिन्न अंग रहा है

जब स्थानीय भाषा, संस्कृति और परंपराओं की बात आती है तो तमिलनाडु की पहचान अन्य किसी भी राज्य की तुलना में अत्यंत आक्रामक राज्य के रूप में की जाती है। यद्यपि यहां ‘अब्राहमिक रिलीजन’ अपने नाना रूपों में बहुत तेज गति से पैर पसार रहे हैं, परंतु इसे सहज ही देखा जा सकता है कि कन्वर्जन के बावजूद यहां का लोकमन तमिल संस्कृति और परंपराओं को स्वाभाविक रूप से जीने में विश्वास रखता है।

यही कारण है कि 2014 में जब भारतीय जीव-जंतु कल्याण बोर्ड ने ‘पशुओं के प्रति क्रूरता और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे’ का हवाला देते हुए ‘जल्लीकट्टू’ पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की और न्यायालय ने इस खेल में बैलों के उपयोग के साथ देशभर में ‘बैलगाड़ी दौड़’ पर प्रतिबंध लगा दिया, तब तमिल लोकमन उद्वेलित हो उठा था। इसलिए न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार के लिए तमिलनाडु सरकार को एक याचिका दायर करनी पड़ी, लेकिन 2015 में शीर्ष न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया। लिहाजा, प्रतिबंध के विरुद्ध व्यापक लोकान्दोलन को देखते हुए विधानसभा ने 2017 में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक पारित कर ‘जल्लीकट्टू’ के आयोजन के लिए एक नया रास्ता निकाला।

जल्लीकट्टू की पुरातनता
राज्य सरकार ने ‘जल्लीकट्टू’ पर प्रतिबंध को अनुचित मानते हुए इसकी प्राचीनता को रेखांकित किया। राज्य सरकार ने इस संबंध में ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा था कि जल्लीकट्टू की उत्पत्ति सिन्धु सभ्यता से हुई है। पुरातात्विक स्थल से मिलीं टेराकोटा की तख्तियों पर जल्लीकट्टू उत्सव के अंकन से इसकी प्राचीनता प्रमाणित होती है। संगम साहित्य के पांच तमिल महाकाव्यों में से एक ‘सिलप्पाटिकरम’ या ‘सिलपथिकारम’ और अन्य प्राचीन साहित्यिक रचनाओं में ‘कलिथोगई’ और ‘मलाईपादुकादाम’, जो कि तमिल साहित्य के ‘संगम युग’ से संबंधित हैं, उनमें ‘जलिकट्टू’ के आयोजन और लोकरंजन के संदर्भ उल्लिखित हैं।
‘येरुथाझुवुथल’ (वर्तमान जल्लीकट्टू) संगम युग का खेल है, जिसका अर्थ ‘बैल को गले लगाना’ है, न कि बैल पर शक्ति-प्रदर्शन करना। आज प्रचलित ‘जल्लीकट्टू’ सिंधु सभ्यता की 5000 वर्ष पुरानी मुहर पर अंकित है। शैलचित्र भी प्रमाणस्वरूप उपलब्ध हैं। ऐतिहासिक रूप से ‘जल्लीकट्टू’ का उपयोग युवतियों के लिए उपयुक्त वर चुनने के लिए भी किया जाता रहा है। यह खेल कई सहस्राब्दियों से तमिल लोक संस्कृति और विरासत का अभिन्न अंग रहा है।

‘जल्लीकट्टू’ तमिल सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, जो प्राचीन काल से प्रचलन में है। इस त्योहार का उद्देश्य बैलों को हानि पहुंचाना कदापि नहीं है, अपितु बैलों को गले लगाकर उनके प्रति प्रेम व्यक्त करना है, आभार व्यक्त करना है, क्योंकि उसके कारण ही कृषक जीवन सफल होता है। जल्लीकट्टू की उत्पत्ति सिन्धु सभ्यता से हुई है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
तमिलनाडु स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक जल्लीकट्टू विवाद और प्रतिबंध पर कहते हैं, ‘‘विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रमों में खुलेआम गोमांस (बीफ) परोसा जा रहा है। गोमांस बिक्री के लिए विज्ञापन दिए जा रहे हैं। यदि पशुओं को होने वाली हानि और कल्याण की इतनी ही चिंता है तो हर तरह के मांस की बिक्री एवं सेवन पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। जब पशुओं को खुलेआम बेचा और काटा जाता है, तब जीव दया कहां रह जाती है? यदि मजहब बकरा काटने का आधार है, तो हिंदुओं की परंपराओं का क्या कोई धार्मिक आधार नहीं है? इस पंथनिरपेक्ष देश में विशाल होती ‘अल्पसंख्यक’ आबादी की परंपराएं सही और हिंदुओं की परंपराएं गलत कैसे हो जाती हैं? सर्वोच्च न्यायालय अपनी सीमाओं को लांघकर कभी शबरीमला में हस्तक्षेप करता है, तो कभी जल्लीकट्टू में। न्यायालयों का यह हिंदू विरोधी रवैया जनमानस को आन्दोलित करने लगा है। इसीलिए तमिलनाडु के हिंदुओं ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध का खुल कर विरोध किया और परिणाम सामने है।’’

एक त्योहार के अनेक पक्ष
‘जल्लीकट्टू’ या ‘जलिकट्टू’ या सल्लिकट्टू बैलों और कृषि जीवन के अन्योन्याश्रित संबंध को रेखांकित करने वाला त्योहार है, जिसे एक खेल के रूप में मनाया जाता है। इसे ‘एरुथजुवुथल’ या ‘येरुथाझुवुथल’ और ‘मन्कुविराट्टू’ के नाम से भी जाना जाता है, परंतु वर्तमान लोक में यह ‘जल्लीकट्टू’ नाम से ही प्रसिद्ध है। यह ‘मट्टू पोंगल’ या ‘माटू पोंगल’ के दिन अर्थात् चार दिवसीय पोंगल (मकर संक्रान्ति) के तीसरे दिन आयोजित किया जाने वाला खेल है। ‘मट्टू’ का अर्थ बैल होता है। यानी यह बैलों को समर्पित त्योहार (पोंगल) है। इस दिन बैलों को गाय से अधिक महत्व दिया जाता है, अन्यथा अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में गाय को ही प्राथमिकता प्राप्त है।
जल्लीकट्टू में दो शब्द हैं – ‘कल्ली’ या ‘सल्ली’ या ‘चल्ली’ और ‘कट्टू’।

जल्ली का मतलब होता है ‘सिक्के’ और कट्टू का अर्थ है- बांधना। समय के प्रवाह में यह ‘सल्ली’ या ‘चल्ली’ से ‘जल्ली’ बन गया। ‘जल्लीकट्टू’ का निहितार्थ ‘सिक्कों की गठरी बैल के सींगों से बांधना’ हुआ करता था। गठरी में बंधे हुए सिक्के पुरस्कार राशि हुआ करती थी। जो युवक बैल के सींग में बंधे सिक्कों की गठरी खोल लेता था, वह प्रतियोगिता का विजेता होता था। ऐसा करने पर उसे ‘बहादुर’ या ‘वीर’ कहा जाता था। इस प्रकार ‘वीरत्व की परीक्षा’ के लिए भी यह खेल खेला जाता था। आज ‘हार्स पावर’ का प्रचलन है, परंतु कृषक जीवन में बैलों की शक्ति के आगे कौन ठहर पाता था? कृषक समाज शिव पूजक रहा है। तमिलों की शिवभक्ति अनुपम रही है। किसानों के लिए बैल ‘नंदी’ ही रहा है। वह उस नंदी के सान्निध्य में अपने जीवन को रूप-आकार देने का प्रयास करता रहा है। यह भी कि प्राचीन समय में यह स्वयंवर के लिए एक माध्यम हुआ करता था। अर्थात् एक त्योहार में अनेक पक्ष समाहित रहे हैं।

तमिल गौरव का प्रतीक
‘जल्लीकट्टू’ तमिल के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, जो प्राचीन काल से प्रचलन में है। इस त्योहार का उद्देश्य बैलों को हानि पहुंचाना कदापि नहीं है, अपितु बैलों को गले लगाकर उनके प्रति प्रेम व्यक्त करना या आभार व्यक्त करना है, क्योंकि उसके कारण ही कृषक जीवन सुफल होता है। यह सुफल दुग्ध रूप में तथा नवीन गोवंश की प्राप्ति के रूप में प्राप्त होता है। बैलों को कृषक परिवारों का दाता (पिता) भी माना जाता है। त्योहारों में तथा गोवंश की वृद्धि के लिए प्रयुक्त बैल पुलिकुलम या कंगायम (बोस इंडिकस) जैसी देसी प्रजाति के विशेष बैल हैं। ये सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाते हैं। अत: कुछ बैलों को बीजारोपण की दृष्टि से पाला-पोसा जाता है। उनकी विशेष देखभाल की जाती है। उन्हें गोवंश वृद्धि के साथ-साथ त्योहारों के लिए तैयार किया जाता है। इसलिए बैल को प्रतीकात्मक प्राथमिकता देते हुए इस खेल का आयोजन किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि जल्लीकट्टू में जिन बैलों को उतारा जाता है, उन्हें विशेष रूप से तैयार किया जाता है। आयातित विचारधारा वाले लोग ‘जल्लीकट्टू’ को पौरुषत्व प्रधान अथवा पितृसत्ता का प्रतीक मानते हैं। यद्यपि यह चर्चा तमिल समाज में मुखर रूप में नहीं आ पाती, परंतु वर्गवादी बुद्धिवादी भीतर-भीतर कहते हैं कि यदि सभी बैल ही हैं, तो कुछ ही बैलों को विशेष अवसर और देखभाल (सुविधाएं) क्यों? समतामूलक समाज की सैद्धान्तिकी के आधार पर ऐसे बुद्धिवादी सभी बैलों के लिए समान सुविधाओं की वकालत करते हैं। वे अधिकाधिक की स्थिति सामान्य और कुछ की विशिष्ट मानते हैं। ऐसे बुद्धिजीवी ‘जल्लीकट्टू’ को ‘इलिट’ और पितृसत्तात्मकता के साथ संबद्ध कर बौद्धिक खुजलाहट से आनंद पाते हैं।

Topics: ‘चल्ली‘कट्टू’‘जल्लीकट्टू’संस्कृति और परंपराभारतीय जीव-जंतु कल्याण बोर्डतमिल के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक‘कल्ली’ या ‘सल्ली’
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