उत्तराखंड की महान विभूतियां : डॉ. घनानंद पाण्डे जिन्हें 1969 में मिला पद्म विभूषण सम्मान
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उत्तराखंड की महान विभूतियां : डॉ. घनानंद पाण्डे जिन्हें 1969 में मिला पद्म विभूषण सम्मान

डा.घनानंद पाण्डे ने भारत सरकार में प्रमुख पदों पर कार्य तो किया ही था वरन युवा प्रतिभाओं के पोषण और शिक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 1, 2023, 04:38 pm IST
in उत्तराखंड

भारत के सांस्कृतिक इतिहास की विरासत को संजोकर रखने में उत्तराखंड राज्य का योगदान किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। भारत के उत्तर दिशा में स्थित सुदूर विकट भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ी राज्य का नाम हैं उत्तराखण्ड। उत्तराखण्ड राज्य में अनेकों महान विभूतियों ने जन्म लिया हैं जो आध्यात्मिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरण संरक्षण, कला, साहित्य, आर्थिक, देश की रक्षा एवं सुरक्षा जैसे अनेकों महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विश्वप्रसिद्ध हुए हैं। देश की इन्हीं महान विभूतियों की कतार में स्थान प्राप्त करने वाली सुप्रसिद्ध हस्तियों में सबसे चर्चित और विख्यात प्रतिष्ठित नाम घनानंद पाण्डे का आता हैं। डा.घनानंद पाण्डे ने भारत सरकार में प्रमुख पदों पर कार्य तो किया ही था वरन युवा प्रतिभाओं के पोषण और शिक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्हें विशिष्ट श्रेणी की उत्कृष्ट सेवाओं के कारण सन 1969 में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

जन्म – 1 जनवरी 1902 रानीखेत, अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड.

घनानंद पाण्डे का जन्म देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से शहर में रानीखेत में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा–दीक्षा अल्मोड़ा व नैनीताल में संपन्न हुई थी। इसके बाद वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने इलाहाबाद चले गए जहाँ उन्होंने सन 1922 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की थी। उन्होंने सन 1925 में तत्कालीन थॉमसन कॉलेज ऑफ़ सिविल इंजीनियरिंग, रुड़की वर्तमान आई.आई.टी. रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग उत्तीर्ण की थी। घनानंद पाण्डे सन 1925 में भारतीय रेलवे इंजीनियरिंग सेवा में नियुक्त हुए थे और इसके बाद उन्होंने सन 1947 तक विभिन्न पदों पर कार्य किया था।

विभिन्न दायित्व का निर्वहन करते हुए वह रेलवे बोर्ड में निदेशक नियुक्त किए गए। इसके बाद डा. घनानंद पाण्डे भारतीय गंगा ब्रिज परियोजना के मुख्य इंजीनियर नियुक्त किए गए। वह पूर्वोत्तर रेलवे में सन 1950 से सन 1952 तक महाप्रबन्धक रहे। वह भारतीय गंगा ब्रिज परियोजना मोकामा में महाप्रबन्धक रहे, इसके बाद वह रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और रेल मंत्रालय भारत सरकार में ​सचिव के पद पर भी रहे जहां से सन 1957 में उन्होंने अवकाश ग्रहण किया था।  सन 1958 से सन 1960 तक वह भारतीय इस्पात बोर्ड के अध्यक्ष और सन 1961 से सन 1966 तक रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे। सन 1966 से सन 1973 के मध्य उन्होंने भारत सरकार में विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया था।रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के रुप में उनके कार्यकाल के समयकाल में भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर में तीन सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात संयंत्र उनकी देखरेख में स्थापित तथा प्रारम्भ किए गए थे। उन्होंने सन 1960 सन 1961 में बेबी कार प्रोजेक्ट जैसे महत्त्वपूर्ण विचार की कल्पना कर छोटी कारों के निर्माण की सिफारिश की थी।

डा. घनानंद पाण्डे ने रुड़की विश्वविद्यालय में कुलपति के रुप में अपने कार्यकाल के समयकाल में इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, इंडिया की स्थापना की थी। महत्वाकांक्षी छात्रों की शिक्षा के प्रति उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें रुड़की विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ इंजीनियरिंग और कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था। सन 1961 में रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति रहने के बाद उनको भारत सरकार में योजना आयोग का सदस्य भी बनाया गया और वहां उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण योजनाओ को क्रियान्वित करवाने में सहायता प्रदान की थी। वह सन 1966 से सन 1973 के मध्य समय में विभिन्न तकनी​की संस्थाओं और उच्चस्तरीय इंजीनि​यरिंग के कई कमेटियों के प्रमुख रहे थे। सन 1973 में उन्हें उत्तरप्रदेश राज्य विद्युत परिषद के कार्य संचालन के लिए एक उत्कृष्ट स्तरीय जांच का कार्य सौंपा गया था। डा. घनानंद पाण्डे को विशिष्ट श्रेणी की उत्कृष्ट सेवाओं के कारण सन 1969 में भारत के  नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

Topics: Uttarakhand Newsउत्तराखंड समाचारउत्तराखंड की महान विभूतिGreat personalities of Uttarakhandडॉ. घनानंद पाण्डेय का परिचयIntroduction of Dr. Ghananand Pandey
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