इमामों को पारिश्रमिक देना संविधान का हनन, सुप्रीम कोर्ट का आदेश संविधान का उल्लंघन : सूचना आयुक्त
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इमामों को पारिश्रमिक देना संविधान का हनन, सुप्रीम कोर्ट का आदेश संविधान का उल्लंघन : सूचना आयुक्त

- अनुच्छेद 27 के अनुसार करदाताओं का धन किसी एक विशेष धर्म के पक्ष में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 28, 2022, 08:14 pm IST
inभारत, दिल्ली

मस्जिदों के इमामों को पारिश्रमिक देने के सुप्रीम कोर्ट के 1993 के आदेश को केंद्रीय सूचना आयोग ने संविधान का उल्लंघन बताया है। आयोग ने इसे गलत उदाहरण तय करने वाला फैसला बताते हुए कहा, इसके कारण अनावश्यक राजनीतिक रस्साकशी और सामाजिक असामंजस्य की स्थिति पैदा हुई।

आरटीआई आवेदक की सुनवाई में की टिपण्णी

सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के तहत एक आरटीआई कार्यकर्ता ने दिल्ली सरकार और दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा इमामों को दिए जाने वाले वेतन की जानकारी मांगी थी। इस आवेदन पर सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त उदय महूरकर ने टिप्पणी की कि न्यायालय का यह आदेश उन संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है, जिनमें कहा गया है कि ‘‘करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी विशेष धर्म के पक्ष में नहीं किया जाएगा।’’

न्यायालय ने 1993 में अखिल भारतीय इमाम संगठन की एक याचिका पर वक्फ बोर्ड को उसके द्वारा प्रबंधित मस्जिदों में इमामों को पारिश्रमिक देने का निर्देश दिया था।

मासिक पारिश्रमिक देने के मामले में रखी जाए समानता

सूचना आयुक्त ने निर्देश दिया कि उनके आदेश की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री को भेजी जाये और संविधान के अनुच्छेदों 25 से 28 के प्रावधानों को अक्षरश: पालन सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाए जाएं, ताकि केंद्र एवं राज्यों दोनों में सभी धर्मों के पुजारियों, पादरियों एवं अन्य धर्माचार्यों को सरकारी खजाने से मासिक पारिश्रमिक देने के मामले और अन्य मामलों में समानता रखी जा सके। उन्होंने धार्मिक समानता के अन्य मामलों में भी यह फैसला लागू करने के लिए कहा है। बता दें कि माहुरकर दिल्ली सरकार व दिल्ली वक्फ बोर्ड से इमामों को भुगतान किए गए वेतन की विस्तृत जानकारी वाले आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे।

किसी एक विशेष धर्म के पक्ष में इस्तेमाल नहीं होगा करदाताओं का धन

महूरकर ने कहा, ‘मस्जिदों में केवल इमामों और मुअज्जिनों को सरकारी खजाने से विशेष वित्तीय लाभ देने के दरवाजे खोलने वाले उच्चतम न्यायालय के अखिल भारतीय इमाम संगठन बनाम भारत सरकार के मामले में 13 मई, 1993 को सुनाए गए फैसले की बात की जाए, तो आयोग को लगता है कि देश की शीर्ष अदालत ने इस आदेश को पारित करके संविधान के प्रावधानों, खासकर अनुच्छेद 27 का उल्लंघन किया, जिसमें कहा गया है कि करदाताओं का धन किसी एक विशेष धर्म के पक्ष में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।’

देश में गलत मिसाल पेश करता है आदेश

सूचना आयुक्त ने कहा, ‘आयोग का कहना है कि उक्त आदेश देश में गलत मिसाल पेश करता है और यह अनावश्यक राजनीतिक विवाद और सामाजिक असामंजस्य का कारण बन गया है।’ उन्होंने दिल्ली वक्फ बोर्ड को निर्देश दिया कि आवेदन का जवाब हासिल करने के दौरान आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल का जो समय नष्ट हुआ और उनके संसाधनों का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई के लिए बोर्ड उन्हें 25,000 रुपये का मुआवजा दे। अग्रवाल को उनके आवेदन का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया था।

सूचना आयुक्त ने कहा कि इसलिए केवल मस्जिदों में इमामों और अन्य लोगों को पारिश्रमिक देना “न केवल हिंदू समुदाय और अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक धर्मों के सदस्यों के साथ विश्वासघात के बराबर है, बल्कि यह भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग के बीच अखिल-इस्लामी प्रवृत्ति को भी बढ़ावा देता है जो पहले से ही नजर आ रही है।”

उन्होंने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिल्ली सरकार से लगभग 62 करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता है, जबकि स्वतंत्र स्रोतों से उसकी अपनी मासिक आय लगभग 30 लाख रुपये है। महूरकर ने कहा, “दिल्ली में दिल्ली वक्फ बोर्ड मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को दिए जा रहे 18,000 रुपये और 16,000 रुपये के मासिक मानदेय दिल्ली सरकार टैक्स पेयर्स के पैसे से कर रही है, जो याचिकाकर्ता के उस उदाहरण के विपरीत है, जिसमें एक हिंदू मंदिर के पुजारी को मंदिर को नियंत्रित करने वाले बोर्ड से मात्र 2,000 रुपये प्रतिमाह मिल रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर इस तरह के कदमों को उचित ठहराया। इसपर यह सवाल उठता है कि अगर किसी विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा का अधिकार है, तो कई धर्मों वाले ऐसे देश में बहुसंख्यक समुदाय को भी सुरक्षा का अधिकार है। यहां यह जरूरी है कि अंतर-धार्मिक सद्भाव और राष्ट्र की एकता के हित में सभी धर्मों के सदस्यों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा की जाए।

इससे विखंडनवादी प्रवृत्ति को मिलता है बढ़ावा

महूरकर ने कहा, ‘जब सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को विशेष धार्मिक लाभ देने की बात आती है तो इतिहास को देखना आवश्यक है। भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग की धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन करने की मांग के कारण एक धार्मिक (इस्लामी) राष्ट्र पाकिस्तान का जन्म हुआ था। पाकिस्तान के एक धार्मिक (इस्लामी) राष्ट्र होने के बावजूद भारत ने सभी धर्मों को समान अधिकार की गांरटी देने वाला संविधान चुना।’ उन्होंने, ‘यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 1947 से पहले मुस्लिम समुदाय को विशेष लाभ देने की नीति ने मुसलमानों के एक वर्ग में अखिल-इस्लामिक (दुनिया भर में मुस्लिम लोगों को उनकी साझा इस्लामी पहचान के आधार पर एकजुट करने का आह्वान करने वाली विचारधारा) एवं विखंडनवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई, जिसके कारण देश का अंतत: विभाजन हुआ।’

बहुसंख्यक समुदाय को भी है अधिकार

उन्होंने कहा कि कुछ लोगों द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर इस तरह के कदमों को उचित ठहराए जाने से यह सवाल उठता है कि अगर किसी विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा का अधिकार है, तो कई धर्मों वाले ऐसे देश में बहुसंख्यक समुदाय को भी सुरक्षा का अधिकार है, जहां यह अनिवार्य है कि अंतर-धार्मिक सद्भाव और राष्ट्र की एकता के हित में सभी धर्मों के सदस्यों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा की जाए। महूरकर ने दिल्ली वक्फ बोर्ड और दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय को अग्रवाल के आरटीआई आवेदन पर जवाब देने का निर्देश दिया।

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