भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून बने और सब पर एक समान लागू हो : श्री मोहन भागवत
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भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून बने और सब पर एक समान लागू हो : श्री मोहन भागवत

- जनसंख्या में असमानता भौगोलिक सीमाओं में बदलाव लाती है। जनसंख्या नियंत्रण और धर्म आधारित जनसंख्या संतुलन ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिन्हें लंबे समय तक नजंरदाज नहीं किया जा सकता है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 5, 2022, 02:45 pm IST
inभारत, संघ @100

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री डॉ. मोहन भागवत ने बुधवार को नागपुर में आयोजित विजय दशमी कार्यक्रम में शक्ति की साधना का आह्वान किया। इस अवसर पर उन्होंने शस्त्र पूजा भी की इस दौरान उनके साथ पहली बार महिला मुख्य अतिथि संतोष यादव मौजूद रहीं। संतोष दो बार माउंट एवरेस्ट फतेह करने वाली दुनिया की एक मात्र महिला हैं। इस दौरान अपने उद्बोधन में सरसंघचालक जी ने दुनिया के उदाहरण पेश करते हुए जनसंख्या असंतुलन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भारत को जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में आर्थिक तथा विकास नीति रोजगार-उन्मुख हो यह अपेक्षा स्वाभाविक ही कही जायेगी। परन्तु रोजगार याने केवल नौकरी नहीं यह समझदारी समाज में भी बढ़नी पड़ेगी। कोई काम प्रतिष्ठा में छोटा या हल्का नहीं है, परिश्रम, पूंजी तथा बौद्धिक श्रम सभी का महत्व समान है यह मान्यता व तदनुरूप आचरण हम सबका होना पड़ेगा। उद्यमिता की ओर जानेवाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना होगा। प्रत्येक जिले में रोजगार प्रशिक्षण की विकेन्द्रित योजना बने तथा अपने जिले में ही रोजगार प्राप्त हो सकें, गाँवों में विकास के कार्यक्रम से शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात आदि सुविधाएँ सुलभ हो जायें यह अपेक्षा सरकार से तो रहती ही है। परन्तु कोरोना की आपत्ति के समय कार्यरत रहने वाले कार्यकर्ताओं ने यह भी अनुभव किया है कि समाज का संगठित बल भी बहुत कुछ कर सकता है। आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठन, लघु उद्यमी, कुछ सम्पन्न सज्जन, कलाकौशल के जानकार, प्रशिक्षक तथा स्थानीय स्वयंसेवकों ने लगभग २७५ जिलों में स्वदेशी जागरण मंच के साथ मिलकर यह प्रयोग प्रारम्भ किया है। इस प्रारम्भिक अवस्था में ही रोज़गार सृजन में उल्लेखनीय योगदान देने में वे सफल हुए हैं ऐसी जानकारी मिल रही है।

राष्ट्रजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज के सहभाग का यह विचार व आग्रह शासन को उनके दायित्व से मुक्त करने के लिए नही, बल्कि राष्ट्र के उत्थान में समाज के सहभाग को साथ लेने की आवश्यकता तथा उसके लिए अनुकूल नीति निर्धारण की ओर इंगित करता है। अपने देश की जनसंख्या विशाल है यह एक वास्तविकता है । जनसंख्या का विचार आजकल दोनों प्रकार से होता है। इस जनसंख्या के लिए उतनी मात्रा में साधन आवश्यक होंगे, वह बढ़ती चली जाय तो भारी बोझ- कदाचित असह्य बोझ – बनेगी। इसलिए उसे नियंत्रित रखने का ही पहलू विचारणीय मानकर योजना बनाई जाती है। विचार का दूसरा प्रकार भी सामने आता है, उस में जनसंख्या को एक निधि – Asset – भी माना जाता है। उसके उचित प्रशिक्षण व अधिकतम उपयोग की बात सोची जाती है। पूरे विश्व की जनसंख्या को देखते हैं तो एक बात ध्यान में आती है। केवल अपने देश को देखते हैं तो विचार बदल भी सकता है। चीन ने अपनी जनसंख्या नियंत्रित करने की नीति बदलकर अब उसकी वृद्धि के लिए प्रोत्साहन देना प्रारंभ किया है। अपने देश का हित भी जनसंख्या के विचार को प्रभावित करता है। आज हम सबसे युवा देश हैं। आगे ५० वर्षों के पश्चात आज के तरुण प्रौढ़ बनेंगे तब उनकी सम्हाल के लिए कितने तरुण आवश्यक होंगे यह गणित हमें भी करना होगा। देश का जन अपने पुरुषार्थ से देश को वैभवशाली बनाता है, साथ ही स्वयं का व समाज का जीवन निर्वाह भी सुरक्षित करता है। जनता के योगक्षेम के तथा राष्ट्रीय पहचान व सुरक्षा के अतिरिक्त और भी कुछ पहलुओं को यह विषय छूता है।

संतान संख्या का विषय माताओं के स्वास्थ्य, आर्थिक क्षमता, शिक्षा, इच्छा से जुड़ा है। प्रत्येक परिवार की आवश्यकता से भी जुड़ा है। जनसंख्या पर्यावरण को भी प्रभावित करतीं हैं। सारांश में जनसंख्या नीति ‌इतनी सारी बातों का समग्र व एकात्म विचार करके बने, सभी पर समान रूप से लागू हो, लोकप्रबोधन द्वारा इस के पूर्ण पालन की मानसिकता बनानी होगी। तभी जनसंख्या नियंत्रण के नियम परिणाम ला सकेंगे।

सन 2000 में भारत सरकार ने समग्रता से विचार कर एक जनसंख्या नीति का निर्धारण किया था। उसमें एक महत्वपूर्ण लक्ष्य 2.1 के प्रजनन दर (TFR) को प्राप्त करना था। अभी 2022 में हर पाँच वर्ष में प्रकाशित NFHS की रिपोर्ट आई है। जहाँ समाज की जागरूकता और सकारात्मक सहभागिता तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के सतत समन्वित प्रयासों के परिणामस्वरूप 2.1 से भी कम लगभग 2.0 के प्रजनन दर पर आ गई है । जहाँ जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूकता और उस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में हम निरंतर अग्रसर हैं,  वहीं दो प्रश्न और भी विचार के लिए खड़े हो रहे हैं। समाज विज्ञानी और मनोवैज्ञानिकों के मत के अनुसार बहुत छोटे परिवारों के कारण बालक-बालिकाओं के स्वस्थ समग्र विकास, परिवारों में असुरक्षा का भाव, सामाजिक तनाव, एकाकी जीवन आदि अनेक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है और हमारे समाज की संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र  “परिवार व्यवस्था” पर भी एक प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है। वहीं एक दूसरा महत्व का प्रश्न जनसांख्यिकी असंतुलन का भी है।

75 वर्ष पूर्व हमने अपने देश में इस का अनुभव किया ही है और इक्कीसवीं सदी में जिन तीन नये स्वतंत्र देशों का अस्तित्व विश्व में हुआ, ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सुडान और कोसोवा, वे इंडोनेशिया, सुडान और सर्बिया के एक भूभाग में जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने का ही परिणाम है। जब जब किसी देश में जनसांख्यिकी असंतुलन होता है तब-तब उस देश की भौगोलिक सीमाओं में भी परिवर्तन आता है। जन्मदर में असमानता के साथ साथ लोभ, लालच, जबरदस्ती से चलने वाला मतांतरण व देश में हुई घुसपैठ भी बड़े कारण है। इन सबका विचार करना पडेगा । जनसंख्या नियंत्रण के साथ साथ पांथिक आधार पर जनसंख्या संतुलन भी महत्व का विषय है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

Topics: विजयदशमीसरसंघचालक श्री डॉ. मोहन भागवतविजयदशमी पर सरसंघचालक का उद्बोधनजनसंख्या नियंत्रण कानूनVijayadashamiSarsanghchalak Shri Dr. Mohan BhagwatSarsanghchalak's speech on Vijayadashamiराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघPopulation Control ActRashtriya Swayamsevak Sanghश्री मोहन भागवतShri Mohan Bhagwat
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