राम अनंत राम कथा अनंता
July 14, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

राम अनंत राम कथा अनंता

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में कही गई श्री रामकथा को अनेक स्थानीय भाषाओं में लिखा गया है। हर भाषा की रामकथा में कुछ प्रसंग भिन्न हैं या अलग ढंग से लिखे गए हैं। हर एक में श्रीरामकथा में कुछ अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग हैं।

Written byडॉ. नरेंद्र कुमार मेहताडॉ. नरेंद्र कुमार मेहता
Sep 26, 2022, 06:20 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत, धर्म-संस्कृति

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में कही गई श्री रामकथा को अनेक स्थानीय भाषाओं में लिखा गया है। हर भाषा की रामकथा में कुछ प्रसंग भिन्न हैं या अलग ढंग से लिखे गए हैं। हर एक में श्रीरामकथा में कुछ अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग हैं। विजयादशमी के अवसर पर हम पाठकों के लिए देश के विभिन्न राज्यों की विभिन्न भाषाओं में लिखित रामकथा से कुछ दुर्लभ प्रसंग प्रस्तुत कर रहे हैं। मानस शिरोमणि डॉ. नरेंद्र कुमार मेहता ने विभिन्न रामायणों से इन दुर्लभ प्रसंगों का चयन किया है

1. मैथिली रामायण
प्रसंग – रावण का श्वेत द्वीप जाना और पराजित होना
चन्द्रा झा कृत मैथिली रामायण का एक अलग ही महत्व है। प्रस्तुत प्रसंग रावण के श्वेत द्वीप जाने और पराजित होकर श्रीराम के हाथ मरने की कामना करने से जुड़ा यह अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग इस रामायण की अनेक विशेषताओं में से एक है।
श्रीराम के राज्याभिषेक के उपरान्त महर्षि अगस्त्य ने रावण के जन्म का इतिहास बताया कि एक समय की बात है कि रावण मद में चूर होकर युद्ध करने की इच्छा से देश-देश घूमने निकल पड़ा।
नारद मुनि सौ दरशन आदि। पुछलनि तनिकां तट में आदि।।
हमर समान कतय बलधाम। जत हम करब घोर संग्राम।।
मुनि कहलनि आछि श्वेतद्वीप। पुष्पक-रथ पथ सकल समीप।।
विष्णुभक्त वा तत्कर-मरण। श्वेतद्वीप तनिक हो शरण।।
(मैथिली रामायण, उत्तरकाण्ड, अध्याय 4-2 से 5)

रावण की भेंट नारद मुनि से हुई। उसने पूछा, हे मुनि बताइए कि मेरे बराबर शक्तिशाली कहां पर है, जहां जाकर मैं जमकर युद्ध करूं? नारद ने कहा- ‘श्वेतद्वीप एक ऐसा स्थान है जहां कोई विष्णु के भक्त मरते हैं या जो कोई विष्णु के हाथ से मरते हैं, यह श्वेतद्वीप उन्हीं लोगों का स्थान है। यदि आप जा सकें तो वहां जाकर लड़ाई ठानें। यह बात सुनते ही रावण श्वेतद्वीप की यात्रा पर चल पड़ा। पुष्पक विमान उस द्वीप के पास पहुंचते ही निष्क्रिय हो गया। अत: राक्षसराज रावण वहीं से उतरकर पैदल आगे चल पड़ा। वहां एक बूढ़ी औरत ने उसे पकड़ लिया और घुमा-घुमाकर उसकी बड़ी दुर्दशा कर दी। तत्पश्चात उस औरत ने कहा, तुमने यहां आकर बहुत बड़ी गलती की है। अब तुम इस दुस्साहस का फल भोगो। कुछ समय बाद रावण को ज्यों ही मौका मिला, वह चुपके से भाग निकला। बाद में भी उसके मन पर आतंक व्याप्त था। वह सोचने लगा कि अमर रहना किस काम का है? रावण व्यथा और चिन्ता में डूब गया। उसने निश्चय किया कि ‘जिससे विष्णुजी के हाथ मरण हो, अब वैसा ही काम करूंगा’।

तकरे हेतु दशानन जानि। सीताहरण कथल हठ ठानि।।
रावण ने श्रीविष्णु भगवान के हाथ मरने का एक उपाय जानकर ही हठपूर्वक सीता-हरण किया। उसने सीताजी को माता तुल्य माना। इतना कहकर मुनि अगस्त्य ने अनेक प्रकार से श्रीरामजी की स्तुति की।

 

2. कम्ब रामायण
प्रसंग-किष्किन्धापुरी में मधुरभाषिणी तारा एवं लक्ष्मण का संवाद
कम्बन ने कम्ब रामायण की रचना की है। इस रामायण में एक अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग आता है। बालि की मोक्ष प्राप्ति के बाद तारा को सुग्रीव की पत्नी न बनाकर कम्बन ने उसे विधवा ही रहने दिया है। यह अद्भूत दुर्लभ प्रसंग अल्पज्ञात की श्रेणी में आता है।
वर्षाकाल समाप्त होने पर श्रीराम लक्ष्मण से बोले, हमने जो अवधि निर्धारित की थी, वह बीत गई। सुग्रीव ने कृतज्ञता, वचनपालन आदि धर्म भी भुला दिया है। अत: तुम जाकर उसका अभिप्राय क्या है, जान कर बताना।
नन्रि कौनररू निटपिनैनाररूत। तौन्रु मेय्म्मै शिदैत्तुरै पौय्तलुतात्।
कौनरु नीक्कुदल् कुररततुनीङगुमाल् शैन्रूमरखन् शिनदैयेत तेरहुवायु
(तमिल कम्ब रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, पटल 10-555)

 

सूर्य उदयगिरि से अस्तगिरि पर जिस रीति से जाता है, उसी रीति से स्वर्णाज्ज्वल शरीरी लक्ष्मण उन्नत उज्ज्वल एक पर्वत माल्यवान से दूसरे पर्वत की तरफ किष्किन्धा की तरफ सवेग गए। लक्ष्मण को आता देख वानरों ने अंगद को बताया। अंगद सुग्रीव के महल में गया। सुग्रीव आमोद में मग्न थे। अंगद अपनी माता के महल में गया। तारा ने कहा कि तुम कृतघ्न हो। मैंने तुमको बहुत समझाया था कि विजयी श्रीराम ने सेना-संग्रह की अवधि निर्धारित की है। यदि यह अवधि बीत जाएगी तो तुम्हारे जीवन की अवधि भी समाप्त हो जाएगी। तुम सबने कभी भी ध्यानपूर्वक नहीं सुना। अब उसका फल भोगोगे।

इधर लक्ष्मण के चरण प्रहार से नगर द्वार दस योजन तक टूट कर बिखर गए। यह देख वानर सभी दिशाओं में भाग गए। लक्ष्मणजी नगर में प्रवेश कर गए। अंगद आदि यह देख-सुन कर भयभीत होकर तारा से पूछने लगे कि अब क्या करें? तारा ने कहा कि तुम सब यहां से हट जाओ। मैं लक्ष्मण से मिलूंगी और जान लूंगी कि उनके आने का अभिप्राय क्या है? तारा अपनी सखियों के साथ आगे बढ़ी। लक्ष्मण राजमार्ग से सुग्रीव के विशाल महल में पहुंचे। तभी बीच में आकर तारा ने उनका मार्ग रोक लिया। लक्ष्मण शीश झुकाकर भूमि पर अपने लम्बे धनुष को टेककर ऐसे खड़े रहे मानो कोई जवान पुरुष सांसों के मध्य फंस गया हो। तारा ने लक्ष्मणजी से कहा- हे वीरकुमार, आप पैदल चलकर इतनी दूर आए हैं। अपने पैरों से चलकर हमारे घर में आपका आगमन हुआ, इससे हम उत्कृष्ट जीवन को प्राप्त हो गए। हमारा उद्धार हो गया। आपके एकाएक आने से वानर सेना में भय व्याप्त हो गया है। आप तो दया सागर श्रीराम के चरणों से कभी अलग होने वाले नहीं हैं। कृपया अपने आने का हेतु तथा मनोभाव प्रकट करने का कष्ट करें। तारा की यह वाणी मधुर संगीत सी थी।

लक्ष्मण का क्रोध कम हुआ। उस मधुर आवाज को समझने के लिए जब उन्होंने थोड़ा मुख उठाकर तारा का सुन्दर मुख देखा, तब उन्हें अपनी विधवा माताओं का स्मरण हो आया और वे अत्यधिक दु:खी हो गए। तारा पर अहिवात (सुहागिन) के अभिरण नहीं थे। मणियां नहीं थीं। सुवासित और शहद-भरे पुष्पों की मालाएं त्याग दी गई थीं। कुंकुम, चन्दन आदि के लेप का शृंगार नहीं था। यह देखकर दयानिधि लक्ष्मण की आंखों से आंसू बह निकले। लक्ष्मण सोचने लगे कि मेरी दोनों माताएं (कैकेयी का स्मरण नहीं हुआ) ऐसी ही दिखती होंगी। इस विचार से उनका मन दुर्बल हो गया। पुन: सोचा कि प्रश्न करने वाली को उत्तर देना चाहिए। उन्होंने कहा- ‘सूर्य-पुत्र (सुग्रीव) ने श्रीराम को वचन दिया था कि वे और उनकी सेना देवी सीता को खोजकर लाएगी। वह इस वचन को भूल गया है।’ तारा ने कहा- प्रभु! छोटे लोग कुछ गलत करें तो बड़ों को क्रोध नहीं करना चाहिए। आप शान्त हो जाइए। आप अत्यन्त ही गुणवान हैं। सुग्रीव कुछ भूले नहीं हैं। संसारभर में उन्होंने अपने दूत भेज दिए हैं। उनके आने की प्रतीक्षा में विलम्ब हो रहा है। आपने जो उपकार किया है उसका प्रत्युपकार हो भी सकता है क्या? यदि वे आपकी उपेक्षा करते हैं तो विफल हो जाएंगे।

लक्ष्मणजी को तारा पर दया आ गई। पास खड़े हनुमान जी समझ गए कि इनका क्रोध शान्त हो गया है। हनुमानजी ने लक्ष्मणजी से कहा- इस संसार में अक्षय प्रेम रखने वाली माता और पिता, गुरु, देवतुल्य ब्राह्मण, गाय, बालक, स्त्री- इनकी हत्या करना बड़ा पाप है। पर ऐसे पाप का भी प्रायश्चित हो सकता है। कृतघ्नता का परिहार कहीं एक भी है क्या? कपिकुलपति सुग्रीव भूले नहीं हैं। विजय वाहिनी को बुलाने के लिए दूत भेजे जा चुके हैं। बस उनके आने की प्रतीक्षा है। लक्ष्मणजी ने मारुति के वचन सुनकर क्रोध त्याग दिया। इसके पश्चात लक्ष्मणजी सुग्रीव के पास गए। उधर, तारा भी अपनी दासियों और सहेलियों के वृन्द के साथ लौट गई। इस कथा प्रसंग में तारा के श्रेष्ठ-पवित्र आदर्श का चित्रण हुआ।

इराक में मिले श्रीराम एवं हनुमानजी

प्रभु श्रीरामचंद्र दुनिया के विभिन्न देशों में पूजे जाते रहे हैं। इस बात के पुरातात्विक और भाषा विज्ञान से जुड़े साक्ष्य हैं। इराक के कुर्दिस्तान के सिलेमानिया प्रांत में मौजूद दरबंद-ई-बेलूला दर्रे के पास उत्खनन में भगवान राम और हनुमान जी की दुर्लभ प्रतिमाएं पाई गई हैं इन प्रतिमाओं के पाए जाने की पुष्टि खुद इराक सरकार ने की है। भारत द्वारा इस मामले पर मांगी गई जानकारी के जावब में इराक सरकार ने एक पत्र लिखकर इस बात की पुष्टि है इरान सरकार के पुरातत्व विभाग का दावा है कि ये प्रतिमाएं करीब 6 हजार साल पुरानी हैं प्रतिमाओं के मिलने के बाद भारत सरकार ने भी इन प्रतिमाओं से जुड़ी और जानकारी प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की है।
वर्ष 2019 में इराक गए अयोध्या शोध संस्थान के प्रतिनिधिमंडल का दावा है कि उन्हें इराक की दरबंद-ई-बेलूला चट्टान में भित्तिचित्र देखने को मिले। उनका दावा है कि वास्तव में यह भित्तिचित्र भगवान राम की ही छवि है। भौगोलिक लिहाज से इराक का यह इलाका होरेन शेखान क्षेत्र में एक संकरे मार्ग से गुजरता है। भित्तिचित्र में एक नंगी छाती वाले राजा को दिखाया गया है, जो धनुष पर तीर ताने हैं। इस राजा के पास एक तरकश और उसकी कमर के पट्टे में एक खंजर या छोटी तलवार भी लगी है। इस छवि में प्रार्थना के अंदाज में मुड़ी हुई हथेलियों के साथ एक दूसरी छवि भी नजर आती है, जो हनुमानजी की है।
प्राचीन इतिहास में कई संदर्भ इस ओर पुख्ता इशारा करते हैं लोअर मेसोपोटामिया पर 4500 और 1900 ईसा पूर्व के बीच सुमेरियों का शासन था। साक्ष्य बताते हैं कि वे भारत से आए थे और आनुवांशिक रूप से सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े थे। जाहिर है अगर यह कड़ियां मिल जाती हैं, तो भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर अंगुलियां उठाने वालों को करारा जवाब मिलेगा।

 

3. उडिया बैदेहीश विलास

प्रसंग 1- सीताहरण प्रसंग में श्रीराम द्वारा बगुले तथा मुर्गे को वरदान
उडिया भाषा में उपेंद्र भञ्ज रचित बैदेहीश-विलास में श्रीराम का सीताजी के बारे में वृक्षों-लताओं, बगुले तथा मुर्गे द्वारा दिया गया उत्तर (जानकारी) अन्य श्रीरामकथाओं (रामायणों) से हटकर अपनी विशेषताएं लिये है यथा-
बके बसिथिला ध्रुप उपरे। विष्णुपदकु भजिला उत्तारे।
बलक्ष पथकु अंगरे बहि। बहन सेलम नाशन बिहि।
बकता ए गिर। बिश्राम बार्ता कहिबा सुन्दर।
(उडिया बैदेहीश-विलास छन्द 31-1)

 

व्याकुल-चित्त श्रीरामजी वृक्षों-लताओं तथा पशु-पक्षियों से पूछते हुए सीताजी का अन्वेषण कर रहे थे। उस समय एक बगुला आकाश में उड़ने के बाद एक ठूंठ पर आ बैठा। वह श्वेत पंख धारण किए था और अपने पंखों की सफेदी से आसपास के अंधकार का नाश कर रहा था। श्रीराम को देखकर उसने ये वचन कहे, ‘हे सुन्दर! यदि आप यहीं कुछ समय के लिए विश्राम करें तो मैं आपकी प्रिया (सीताजी) का सन्देश अवश्य कहूंगा।’

जिस वधू की प्राप्ति की कामना में आप इस वन में इधर-उधर घूम रहे हैं, आपसे विरह के कारण कामदेव (कन्दर्प) उसका वध करने की चेष्टा में रहा है। अपनी प्राणप्रिया के सौन्दर्य-गुण का आप जैसा बखान करके विलाप कर रहे हैं, एसी रूपवती रमणी को रथ में बैठाये दक्षिण दिशा की ओर ले जाने वाले बीस भुजाओं वाले रावण को मैंने देखा है। उनके नयनों से आंसू की बूंदें निकल रही थीं। कविजन कहते हैं मीन मोती उगलते हैं किन्तु सीताजी के नयनों से जो अश्रु बिन्दु गिर रहे हैं उन अश्रु बिन्दुओं के सामने मोती उगलने का हृदय भी बहुत न्यून (तुच्छ) है। इस कारण मीन मारे लज्जा के पानी में छिप जाती हैं और मैं उन्हें ढूंढकर भोजन करता हूं। सीताजी के कण्ठ से जो ‘राम राम’ स्वर निकल रहा था, उसके वीणा का स्वर भी क्या मधुर हो सकता है।

श्रीराम आप कह सकते हैं, तू तो एक साधारण पक्षी है, तूने वीणा का स्वर कहां से सुना? किन्तु मैंने सुना है, वीणा सप्तस्वरों में बजती है। मेढक के धैवत स्वर, मयूर के षडज और कोयल का पंचम स्वर है। इस विधान के अनुसार और सब स्वर भी सहज हैं अर्थात् गाय के वृषभ स्वर, बकरे के गान्धार स्वर, कौञ्च के मध्यम स्वर सुने हैं और हाथी के निषाद स्वर हैं। इस तरह मैंने सारे सात स्वर सुने हैं किन्तु उस रमणी के कण्ठ स्वर की मधुरता इन्हीं सात स्वरों में से किसी एक में तो बिलकुल नहीं है, न एक साथ सात स्वर रखने वाली किसी भी वीणा में भी नहीं होती है।

बगुले से सीता का संवाद सुनकर जब कृपालु श्रीराम ने उससे वरदान मांगने को कहा तब उसने मांगा कि, ‘वर्षा ऋतु में मेरे अपने घोसले में रहते हुए भी मुझे खाना मिल जाए अर्थात् बरसात में खाना ढूंढने के लिए मुझे कहीं बाहर जाना न पड़े। बगुले की बात सुनकर ‘श्रीराम ने आज्ञा दी अच्छा ऐसा ही हो, तुम्हारी पत्नी बगुला (मादा बगुला) वर्षा ऋतु के चार महीनों तक तुम्हें खाना ला दे। बगुले ने कहा, ‘वह तो मेरी पत्नी की जूठन होगी। यह सुनकर श्रीराम ने उससे कहा, तब पत्नी की जूठन खाना तुम्हारे लिए कोई दोष भी नहीं होगा।

प्रसंग 2 – श्रीराम द्वारा मुर्गे को वरदान
बोइला कुक्कुट शुणि सेक्षणि। बतिशलक्षणी चारु ईक्षणी।
बिहायस पथे गलाणि रथे। बसाइ ने उथिला रक्षनाथे।
बिलसे के आग। बिबेक होइता कथा प्रसंग।
(उडिया बैदेहीशविलास छान्द 31-9)

जब श्रीराम विलाप करते हुए सीता अन्वेषण कर रहे थे, तब उस समय एक मुर्गे ने श्रीराम की बात सुनकर कहा, कुछ दिनों पहले राक्षसराज रावण बत्तीस लक्षणों से युक्त सुन्दर नेत्रवाली एक सुन्दरी रमणी को रथ में बैठाकर आकाश मार्ग से लिये चला जा रहा था। वह रमणी आपकी ही होगी, दोनों के वातार्लाप से ऐसा मालूम हो रहा था कि वही रमणी पहले किसी दूसरे की पत्नी थी।

मुर्गे ने कहा कि उस पुरुष के प्रति उस नारी के हृदय में जरा-सा भी अनुराग नहीं था। क्योंकि रावण के प्रति यदि उसका अनुराग होता तो उसके चक्षु मेघ उसके वक्षस्थल को इतना गीला क्यों करते? यदि आप में बल हो तो उस रावण का मस्तक छेदन कर उससे प्रतिशोध लें।

मुर्गे से ऐसा सुनकर वीरों में श्रेष्ठ श्रीराम ने कहा, ‘अरे मुर्गे, तू पक्षियों में प्रसिद्ध क्षत्रिय अर्थात् राजा है। तूने मेरी प्रिया का सन्देश मुझे दिया। इसलिए मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूं। अत: तुझे यह वरदान देता हूं कि तेरा सिर सुवर्ण मुकुट से मण्डित हो किन्तु यह सुनकर कि मुर्गा तो चर्म मुकुट चाहता है, श्रीराम ने उसे अपनी इच्छानुसार वरदान दिया।

4. अध्यात्म रामायण
प्रसंग – श्रीराम की चरणपादुका
वेद व्यास रचित अध्यात्म रामायण में श्रीराम द्वारा भरत को दी गई दिव्य चरण पादुकाओं (खड़ाऊं) का रहस्यपूर्ण वर्णन है। इसमें भरतजी ने श्रीराम को अयोध्या का राज्य संभालने तथा स्वयं को 14 वर्ष वनवास के विकल्प भी निवेदित किया है, तब-
भरतस्यापि निर्बन्धं दृष्टवा रामोऽतिविस्मित:।
नेत्रान्तसंज्ञां गुरवे चकार रघुनन्दन:।।
(आनन्दरामायण अयोध्याकाण्ड सर्ग 9-41)

भरतजी का ऐसा हठ देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त विस्मित होकर गुरु वशिष्ठजी को नेत्रों से संकेत किया। यह देखकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ वशिष्ठजी ने भरत को एकान्त में ले जाकर कहा- ‘वत्स! अब मैं जो कुछ कहता हूं, यह अत्यन्त ही गुप्त रहस्य की बात ध्यानपूर्वक सुनो।]

रामौ नारायण: साक्षाद् ब्रह्मणा याचित: पुरा।
रावणस्य वधार्थाय जांतो दशरथात्मज:।।
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी।
शेषोऽपि लक्ष्मणो जातो राममन्वेति सर्वदा।।
रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति न संशय:।
कैकेया वरदानादि यद्यन्निष्ठुर भाषणम्।।
(अध्यात्मरामायण अयोध्याकाण्ड सर्ग 9-43-44-45)

भगवान् राम साक्षात् नारायण हैं। पूर्वकाल में ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर उन्होंने रावण को मारने के लिए दशरथ के यहां पुत्र रूप में जन्म लिया है। इसी प्रकार योगमाया ने जनकनन्दिनी सीता के रूप में अवतार लिया है और शेषजी लक्ष्मण के रूप से उत्पन्न होकर उनका अनुगमन कर रहे हैं। वे रावण को मारना चाहते हैं, इसलिए निस्सन्देह वन को जाएंगे। कैकेयी के जो कुछ वरदान मांगने आदि और अन्य निष्ठुर भाषण आदि कार्य हैं, वे सब देवताओं की प्रेरणा (इच्छा) से ही हुए हैं, नहीं तो कैकेयी ऐसे वचन कैसे बोल सकती थी? इसलिए हे तात् तुम राम के अध्योया लौट चलने का आग्रह त्याग दो। माताओं तथा विशाल सेना सहित अयोध्या को लौट चलो, राम भी रावण के कुल सहित उनका संहार करके शीघ्र ही आ जाएंगे।
वशिष्ठजी के ये वचन सुनकर भरत को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने आश्चर्यचकित होकर श्रीराम के समीप जाकर कहा-

पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तव पूजिते।
तयो सेवां करोम्योव यावदागमनं तव।।
इत्युक्त्वा पादुके दिव्य योजयामास पादयो:।
रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तित:।।
(अध्यात्मरामायण अयोध्याकाण्ड सर्ग 9-49-50)

हे राजेन्द्र! आप मुझे राज्य शासन के लिए जगत् पूजनीय अपनी चरण पादुकाएं दीजिए। जब तक आप लौटेंगे, तब तक मैं उन्हीं की सेवा करता रहूंगा। ऐसा कहकर भरतजी ने श्रीराम के चरणों में दो दिव्य पादुकाएं (खड़ाऊं) पहना दीं। श्रीराम ने भरत का भक्तिभाव देखकर वे पादुकाएं उन्हें दे दीं। भरतजी ने रत्नजड़ित दिव्य पादुकाएं लेकर श्रीरामजी की परिक्रमा की और उन्हें बारम्बार प्रणाम किया। तत्पश्चात् भरतजी ने कहा हे राम! यदि 14 वर्ष व्यतीत होने पर आप पहले दिन ही अयोध्या न पहुंचे तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा। श्रीराम ने कहा ठीक है तथा भरतजी को विदा कर दिया। इस प्रकार वशिष्ठजी को आने वाले 14 वर्षों की जानकारी थी तथा वे भरत को समझा-बुझाकर अयोध्या ले गए।

5. गुजराती गिरधर रामायण
प्रसंग – लक्ष्मण रेखा
रह्यो रावण गुप्त थई ने वनमां वृक्षकुंजनी माहे,
पछी मारीच बेमुखी मृग थईने तत्क्षण आण्यो त्याहें।।
सीता ए बाड़ी कराछे मृग आव्यो तेने द्वार,
कुंदन जेवी त्वचा झलके शोभा नो नहि पार।।
(गुजराती गिरधर रामायण, अरण्यकाण्ड, अध्याय 12-42-43)

रावण वृक्षों के कुंज के अन्दर छिपकर वन में बैठ गया। तदनन्तर मारीच दो मुंहवाला हिरण बनकर तत्क्षण वहां आ गया। मृग को देखकर सीता मोहित हो गई। सीताजी ने श्रीराम से कहा- हे महाराज, यह देखिये वह मृग, जिसकी त्वचा सोने की सी है। अत: हे भगवान! इस मृग का वध करके उसके चर्म की मेरे लिए कंचुकी बनवा दीजिए। सीता ने श्रीराम से कहा- हे स्वामी चौदह वर्ष में से अब थोड़े दिन शेष है। उसके पश्चात् उसकी कंचुकी को पहनकर मुझे अयोध्यापुरी में जाना है।
श्रीराम से सीता ने कहा कि यदि आप मेरा कहा हुआ न मानोगे, तो मैं अपने शरीर को त्याग दूंगी। यह सुनकर श्रीराम हाथ में धनुष-बाण लेकर तैयार हो गए तथा लक्ष्मण से कहा- सीता की किसी अन्य स्थान पर ले जाकर रक्षा करना। यहां बहुत से राक्षस विचरण करते हैं। यह कहकर श्रीराम तत्क्षण मृग के पीछे चल दिए। अन्त में श्रीराम ने उस मृग को एक आघात से मार डाला। इधर लक्ष्मणजी पंचवटी में पर्णकुटी के बाहर खड़े होकर उनकी रक्षा कर रहे थे। तब रावण ने यह देखा कि श्रीराम मृग के पीछे-पीछे चले गए हैं। इधर लक्ष्मण आश्रम में है। अत: मैं कपट करके लक्ष्मण को यहां से निकाल दूंगा तो मेरा कार्य सिद्ध हो जाएगा।पछे रामना जेवो स्वर काढ़ी ने, रावणे पाडी रीर,
हुं महासंकटमां पड्यो छु माटे, धाजो लक्ष्मण वीर।
(गुजराती गिरधर रामायण अरण्यकाण्ड अध्याय 14-15)

अनन्तर श्रीराम के स्वर जैसा स्वर उत्पन्न करके रावण चिल्ला उठा। हे भाई लक्ष्मण मैं बड़े संकट में पड़ गया हूँ। अत: दौड़कर आ जाना। सीता ने यह सुना तथा उनके मन में शोक उत्पन्न हो गया। सीताजी ने कहा- देवरजी शीघ्र जाओ। बिना भाई के युद्ध में जाकर कौन आज संकट में सहायता कर सकता है। युद्ध में बन्धु और संकट में मित्र, बुढ़ापे में स्त्री और विषमत (कठिन समय) में पुत्र पिता की निश्चय ही देखभाल एवं रक्षा करता है। अत: उनकी सहायता के लिए तुरन्त चले जाओ। तब लक्ष्मण ने कहा, हे सीताजी सुनिए। ये कुछ कपट वचन जान पड़ते हैं। श्रीराम देवों के देव हैं, उनको कोई संकट हो ही नहीं सकता। लक्ष्मण ने कहा कि श्रीराम मुझे आपकी रक्षा हेतु सौंप गए हैं। अत: मैं विवश हूं। सीताजी ने तब अत्यन्त कटु शब्द कहे तथा कहा कि आन्तरिक कपट के साथ तुम भाई का बुरा चाह रहे हो। लक्ष्मण ने सीताजी से कहा कि आप माता हैं तो मैं आपका पुत्र हूं। श्रीराम को भगवान् जानकर सेवा करता हूं। तदनन्तर उन्होंने उस समय कुटी के पीछे धनुष से रेखा खींच दी तथा वे बोले- हे जानकी, बिना हमारे (लौट) आए यदि आप बाहर निकलें तो आपको श्रीराम की शपथ है। मैं निश्चयपूर्वक यह कह रहा हूं कि बिना हमारे लौट आए जो यह रेखा लांघकर कुटी में प्रवेश करेगा, वह प्राणी जलकर भस्म हो जाएगा। तत्पश्चात् रावण ने सीताजी को लक्ष्मण रेखा को पार करने के लिए विवश किया। जटायु से उसका युद्ध हुआ तथा उसके पंख काटकर घायल कर दिया। अंत में सीताजी का हरण कर लंका ले गया।

1. सार्थ श्रीतुलसी मराठी रामायण
श्रीरामजी का 14 वर्ष वनवास सहित तिथि पत्रक

सार्थ श्रीतुलसी रामायण मराठी रचियता नारायण भास्कर जोशी द्वारा स्कंद पुराण के आधार पर तैयार किया गया तिथि पत्रक हिन्दी में (1) श्रीसीताराम विवाह- वृश्चिक राशि में सूर्य मीन लग्न। (2) मार्गशीर्ष शुक्ल 5 श्रीरामचन्द्र की उम्र 15 वर्ष। श्रीसीताजी उम्र 6 वर्ष। (3) विवाह के पश्चात अयोध्या में 12 वर्ष तक निवास किया। (4) चैत्र वदी 6 (षष्ठी) को वनवास का प्रारंभ हुआ। श्रीरामजी की आयु 27 वर्ष तथा सीताजी की आयु 18 वर्ष थी। (5) प्रथम आहार चौथे दिन शृंगवेरपुर में 5वें दिन गंगा नदी पार की। पहले चित्रकूट और उसके पश्चात पंचवटी पहुंचे। बारह वर्ष वहां निवास किया। (6) शूर्पणखा के नाक-कान काटे। वनवास का 13वां वर्ष प्रारंभ हुआ। (7) माघ मास प्रारंभ माघ शुक्ल 8 दोपहर 12 बजे बाद सीताजी का अपहरण हुआ। (8) आषाढ़ के प्रारंभ में सुग्रीव से भेंट हुई। (9) चातुर्मास में प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया। (10) कार्तिक प्रारंभ 11 हनुमान जी ने समुद्र लांघा। (11) कार्तिक 13-रात्रि में सीता माता के दर्शन। अशोक वाटिका का विध्वंस किया। (12) कार्तिक- 14- अक्षय कुमार वध, रावण का संभाषण, लंका का दहन, सीताजी से चूड़ामणि लेकर हनुमानजी वापस समुद्र किनारे आए, वहां वानर मित्रों से भेंट। (13) समुद्र लांघ कर किष्किंधा आये मार्गशीर्ष माह शु/6 प्रारंभ (14) मार्गशीर्ष शुरू 7 श्रीरामचन्द्रजी से मिले और उन्हें चूड़ामणि प्रदान की।

इस प्रकार सीता हरण से लेकर अभी तक 10 माह का समय व्यतीत हुआ। (15) मार्गशीर्ष -8 उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में लंका की ओर प्रस्थान। (16) मार्गशीर्ष चालू है। समुद्र पर तीर डाला। (17) मार्गशीर्ष -1 से 4 दिन तक समुद्र किनारे विश्राम। (18) मार्गशीर्ष 4 – विभीषण का श्रीरामजी की शरण में आना। (19) मार्गशीर्ष – 5 से 8 श्रीरामजी द्वारा समुद्र से प्रार्थना। (20) मार्गशीर्ष झ्र 9 – ब्राह्मण के रूप में समुद्र श्रीरामजी की शरण में आया। (21) मार्गशीर्ष झ्र 10 – सेतुबन्ध का प्रारंभ हुआ। (22) मार्गशीर्ष-13 से 4 दिन में सेतु बन्धन का कार्य पूर्ण। 100 योजन लम्बा और 10 योजन चौड़ा सेतु बांधा गया। (23) मार्ग शीर्ष -10 से पौष -9 – सागर पार सेना गई 18 पद्म सेनापति (24) पौष -3 से 10 तक लंका में सेना पहुंची। (25) पौष 11- शुक सारण रावण मंत्री, सभी ने सेना को देखा। (26) पौष 12- सेना के चार विभाग थे। एक ही बाण से छत्र, मुकुट आदि गिराए। (27) पौष -13 से 15 रावण की सेना युद्ध के लिए तैयार। (28) पौष कृ. – 1. अंगद की शिष्टाचार भेंट। (29) पौष माह -युद्ध शुरू। (30) पौष -3-9 रावण की सेना से युद्ध, श्रीराम नागपाश में बांधे गए। (31) पौष -10- गरुड़जी ने नाग पाश काटा और वैकुंठ को गए। (32) पौष -11-12 भीषण युद्ध हुआ और धूर्मलोचन मारा गया। (33) पौष -13-30 नील आदि दैत्य मारे गए। (34) माघ शु. 1 से 4 रावण वानर युद्ध, लंका की ओर चले। (35) माघ शु. 5 से 8 कुंभकर्ण को जगाया। (36) माघ -9 से 14 तक छह दिन कुंभकर्ण से युद्ध व उसका मारा जाना। (37) माघ -15 कुंभकर्ण वियोग में रावण के रुदन के कारण युद्ध समाप्त। (38) माघ कृ. 1 से 5 श्रीरामचन्द्रजी ने नरान्तक आदि दैत्यों का वध किया। (39) माघ – 6 से 8 भीषण संग्राम हुआ।

अनेक दैत्यों का श्रीराम सेना द्वारा वध (40) माघ -8 से 13 कुंभ निकुंश नामक दैत्यों का वध। (41) माघ व 14 से फाल्गुन माह शुरू 2-जुमक नामक दैत्य का सेना सहित वध। (42) फाल्गुन -3 से 13 लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध बाद में मेघनाद का वध। (43) फाल्गुन -14 रावण के रुदन के कारण छुट्टी। (44) फाल्गुन -15 रावण युद्ध भूमि में युद्ध के लिए आया। (45) फाल्गुन कृ -1 से 5 रावण ने दूसरों से युद्ध किया। अनेक सेनापति मारे गए। (46) फाल्गुन -9- लक्ष्मण जी मूर्च्छित हुए। हनुमानजी संजीवनी बूटी लाए। मूर्च्छा दूर हुई। (47) फाल्गुन -10 राम-रावण के मध्य घनघोर युद्ध हुआ। (48) फाल्गुन -11 मातलि रथ लेकर आए और श्रीरामजी उस पर सवार हुए। 49- फाल्गुन -12 से चैत्र शुरू। 14-18 श्रीराम रावण युद्ध शुरू। रावण मारा गया। (50) चैत्र शु. 15- रावण का दहन। (51) चैत्र कृ -1- श्रीराम की विजय का उत्साह, इन्द्र का आगमन, अमृत से वानर जीवित। (52) विभीषण को राज्य सौंपना। (53) चैत्र 3- सीता माता को बाहर लाया गया। सीता का अग्नि प्रवेश तथा शुद्धि। 14 महीने 10 दिन लंका में। (54) चैत्र – 4- पुष्पक विमान अयोध्या नगरी के पास आया। (55) चैत्र -5 विमान प्रयाग में आया। (56) चैत्र -6-14 वर्ष पूर्ण। नंदीग्राम में भरत से भेंट। (57) चैत्र 7- राम का राज्याभिषेक, श्रीराम की उम्र 41 श्रीसीता की 32 वर्ष। (58) भाद्रपद शुरू-9 श्रीसीताजी गर्भवती हुर्इं। (59) चैत्र शु. 12-7वां महीना सीताजी का त्याग (60) आषाढ़ 9- लवकुश का जन्म हुआ। श्रीरामजी का राज्य 11000 वर्ष तक।

Topics: उडिया बैदेहीश विलासअध्यात्म रामायण5. गुजराती गिरधर रामायणसार्थ श्रीतुलसी मराठी रामायणकम्ब रामायणमैथिली रामायण
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

मनमोहक छवि श्रीराम की

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या : अपने-अपने राम

रामायन सतकोटि अपारा

श्रीराम द्वारा केवट को गले लगाना सामाजिक समरसता का श्रेष्ठ उदाहरण है

समरसता का सनातन दर्शन

Load More

ताज़ा समाचार

Suvendu Adhikari derected fir against police atrocities

पश्चिम बंगाल में गुंडा दमन एक्ट: अपराधियों की संपत्ति कुर्की से लेकर 12 माह की हिरासत तक और भी बहुत कुछ

दिल्ली दंगा: ‘हिन्दू था मेरा बेटा इसलिए उसकी हत्या की’, IB अधिकारी अंकित शर्मा के परिजनों की पीड़ा

Racism with indian trucker in austrelia

“भारतीयों को मार डालो, बच्चों को डुबो दो…औरतों को गुलामी में बेंचो”– ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ हिंसक नस्लवाद

होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी ब्लॉकेड: ईरान पर तीसरी रात हमला, ट्रंप का 20% टैरिफ ऐलान; तेल की कीमतें 7.8% बढ़ी

Donald trump marco rubio cuba president

ट्रंप प्रशासन ने ICC को पूरी तरह खत्म करने की मुहिम शुरू की, मार्को रुबियो बोले- अमेरिकी संप्रभुता पर खतरा

trump Administration returns 81 billian dollor tarrifs

ट्रंप के टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध करार देने के बाद, अमेरिका को 81 अरब डॉलर वापस करने पड़े

मूर्खों की संगति, टॉक्सिक कल्चर और झूठे दोस्तों से परेशान हैं? मानसिक शांति का अचूक मंत्र है यह श्लोक

समान नागरिक संहिता के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रतिवेदन सौंपा।

MP में लिव-इन का रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य, समिति ने मुख्यमंत्री को सौंपा UCC का फाइनल प्रतिवेदन

सुधांशु त्रिवेदी, राष्ट्रीय प्रवक्ता भाजपा

मुंबई आतंकी हमले को कांग्रेस हिंदू टेरर का रंग देना चाहती थी, ISI और कांग्रेस के बीच फिक्स्ड मैच था : सुधांशु त्रिवेदी

सुधांशु त्रिवेदी और राहुल गांधी

वायनाड में आपदा और सांसद देश से गायब, घोर असंवेदनशीलता दर्शाने वाला गांधी परिवार माफी मांगे : भाजपा

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies