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वीर सावरकर के पोस्टर पर आपत्ति से उपजे सवाल

स्वातंत्र्यवीर सावरकर के पोस्टर पर आपत्ति करना अथवा टीपू सुल्तान को उनके समतुल्य ठहरा कर उनका अपमान करने की चेष्टा करना एक अन्य गंभीर प्रश्न को जन्म देता है। क्या भारत में जन्मे, भारत के लोगों के एक वर्ग की मानसिकता इतनी विकृत हो सकती है कि हम अपने ही राष्ट्र नायकों का अपमान करने की चेष्टा करें?

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 22, 2022, 04:40 pm IST
in सम्पादकीय
शिवमोगा में वीर सावरकर के पोस्टर को फाड़ते कथित टीपू सुल्तान सेना के कट्टरपंथी

शिवमोगा में वीर सावरकर के पोस्टर को फाड़ते कथित टीपू सुल्तान सेना के कट्टरपंथी

आज कर्नाटक सूचना तकनीक से लेकर अंतरिक्ष, रसायन, औषधि, शोध, अनुसंधान, स्वास्थ्य रक्षा और प्रतिरक्षा के क्षेत्रों में देश के सबसे अग्रणी राज्यों में से एक है। यह एक राष्ट्रीय लब्धि और राष्ट्रीय संपदा है। वहां राष्ट्र विरोधी तत्वों की सक्रियता के सहज और निहित विदेशी पहलू अतीत में कई बार सामने आ चुके हैं। स्वयं को उदार और प्रगतिशील बताने वालों को उत्तर देना चाहिए कि क्या इन शक्तियों का देसी मोहरा बनना ही उनकी विचारधारा है।

स्वतंत्रता दिवस पर और उसके बाद के कर्नाटक के शिवमोगा के घटनाक्रम को इस देश की चली आ रही व्यथा के एक और साक्षी के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या इस देश के कथित प्रगतिशील इस बारे में विचार, मंथन या बहस करने की क्षमता रखते हैं कि आखिर वे क्या कर रहे हैं, क्या चाहते हैं, और क्या उसके परिणामों का उन्हें भान भी है? या उनकी सहज प्रवृत्ति ही हिन्दू विरोधी और भारत विरोधी है और उसमें सुधार हो ही नहीं सकता? शिवमोगा में कथित टीपू सुल्तान सेना के झंडे तले कट्टरपंथी तत्वों ने स्थानीय अमीर अहमद सर्कल पर लगा वीर सावरकर का पोस्टर फाड़ दिया।

इसके बाद वीर सावरकर के पोस्टर के स्थान पर टीपू सुल्तान का पोस्टर लगाने की चेष्टा की गई। इसे लेकर तनाव हुआ, राजस्थान से आए हुए एक युवक पर चाकुओं से वार किया गया और इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई। क्या स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों को, जिन्हें पूरे देश ने सोल्लास मनाया, पूरी तरह ठप्प करवा देना इतना सहज और इस हद तक क्षम्य होना चाहिए?

कई विचारणीय बातें हैं। पहली बात यह कि किसी को वीर सावरकर का पोस्टर लगे होने से आपत्ति क्यों होनी चाहिए? कौन हैं वे लोग जिनके पेट में सावरकर के नाम से मरोड़ उठती है! उनकी परेशानी क्या है? क्या सिर्फ इसलिए कि वे स्वतंत्रता सेनानी भी थे और हिन्दुत्व के एक नायकपुरुष भी हैं?

दूसरा प्रश्न और गंभीर है। समाज का कोई भी वर्ग वीर सावरकर के प्रति अपनी मानसिकता को तुष्ट करने के लिए टीपू सुल्तान को प्रतीक बनाकर इस्तेमाल कैसे कर सकता है? अगर किसी को भी लगता है कि टीपू सुल्तान उसका नायक हो सकता है, तो क्यों न माना जाए कि वह व्यक्ति भारत और हिन्दुओं के प्रति वैसी ही दृष्टि और वैसे ही इरादे रखता होगा, जैसे टीपू सुल्तान के थे? जैसे अगर कोई औरंगजेब को अपना नायक मानता है, तो उससे पूछा जाना चाहिए कि क्या वह भी अपने पिता के प्रति वही इरादा रखता है, जैसा औरंगजेब का था? सावरकर जैसा विराट व्यक्तित्व किसी पोस्टर के फाड़े जाने से छोटा नहीं हो सकता, लेकिन देखिए, सावरकर का पोस्टर भी उन लोगों का पर्दाफाश कर देने में समर्थ है जिनके मानस में भारत विरोध बसता है। यह स्वातंत्र्यवीर की वह वीरता है जो आज भी इस देश को दिशा देने में सक्षम है, उसकी प्रतिरक्षा के लिए करोड़ों हाथ उठाने में सक्षम है।

भारत विरोध सेमेटिक तालीम का हिस्सा
वास्तव में अब इस बात में कोई रहस्य नहीं रह गया है कि कम्युनिज्म सहित लगभग सारी सेमेटिक धाराएं हिन्दुत्व के विरोध की, भारत के विरोध की, भारतीय पर्वों के विरोध की, भारत के राष्ट्र चिन्हों के विरोध की मानसिकता को अपनी ‘तालीमों’ का अभिन्न हिस्सा बनाए बैठी हैं। दक्षिण भारत के कई इलाकों में मुस्लिम कट्टरपंथी गुट एसडीपीआई, पीएफआई आदि इस तरह की हिंसक-रणनीतिक बसाहटों और समीकरणों में शामिल हो चुके हैं कि उनके लिए कानून-व्यवस्था का प्रश्न पैदा कर देना सरल हो गया है। यही स्थिति केरल और पश्चिम बंगाल में आसानी से देखी जा सकती है। दोनों चीजें – रणनीतिक बसाहट और भारत विरोधी-हिन्दुत्व विरोधी तालीम मिलकर एक प्रवृत्ति की तरह उभर रहे हैं।

हाल ही में केरल में एक स्कूल शिक्षिका ने मात्र इस नाते राष्ट्रीय ध्वज के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया कि उसका मजहब इसकी अनुमति नहीं देता। जो शिक्षिका ऐसी सोच रखती है, वह अपने शिष्यों को क्या शिक्षा देती होगी? निश्चित रूप से ये स्थितियां स्वीकार्य नहीं हो सकतीं। इन प्रवृत्तियों को मात्र इस नाते पनपने का अवसर मिलता रहा है कि वे किसी विचारधारा या मजहब की आड़ में पनपाई जाती रही हैं।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात है कि भारत का कथित प्रगतिशील वर्ग जो सेक्युलरिज्म से लेकर समाजवाद तक, हर तरह की भंगिमा ओढ़े रहता है, वह इन हरकतों का बचाव भी करता है, संरक्षण भी करता है और अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण इन्हें प्रोत्साहित भी करता है। रोचक बात यह है कि स्वातंत्र्यवीरों की यह हेठी उसी स्वतंत्रता के साये में की जा रही है, जो उन्होंने अपना स्वेद, रक्त और प्राण देकर अर्जित की थी। ऐसे लोग स्वयं को समाज का सिर्फ बोझ सिद्ध करते हैं।

भारत के एक वर्ग की मानसिकता पर सवाल
स्वातंत्र्यवीर सावरकर के पोस्टर पर आपत्ति करना अथवा टीपू सुल्तान को उनके समतुल्य ठहरा कर उनका अपमान करने की चेष्टा करना एक अन्य गंभीर प्रश्न को जन्म देता है। क्या भारत में जन्मे, भारत के लोगों के एक वर्ग की मानसिकता इतनी विकृत हो सकती है कि हम अपने ही राष्ट्र नायकों का अपमान करने की चेष्टा करें? हम अपनी ही स्वतंत्रता के पर्व को कानून व्यवस्था का प्रश्न बना दें? और वह भी किसी ऐसे विचार को लेकर जिसका कोई सिर-पैर बनाए हुए कथानकों के अलावा कहीं नहीं है?

कर्नाटक के इस घटनाक्रम की अनदेखी नहीं की जा सकती। कर्नाटक भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों में से एक है। लगभग डेढ़ दशक पहले बेंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस में एके-47 से हमला करके एक बुजुर्ग प्रोफेसर की जान ले ली गई थी। आखिर क्यों? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस विश्व में भारत के लिए एक गर्व का संस्थान है।

निशाने पर कोई और राजनीतिक-मजहबी इरादा रहा हो, या न रहा हो, भारत से ईर्ष्या का भाव तो निश्चित ही था। आज कर्नाटक सूचना तकनीक से लेकर अंतरिक्ष, रसायन, औषधि, शोध, अनुसंधान, स्वास्थ्य रक्षा और प्रतिरक्षा के क्षेत्रों में देश के सबसे अग्रणी राज्यों में से एक है। यह एक राष्ट्रीय लब्धि और राष्ट्रीय संपदा है। वहां राष्ट्र विरोधी तत्वों की सक्रियता के सहज और निहित विदेशी पहलू अतीत में कई बार सामने आ चुके हैं। स्वयं को उदार और प्रगतिशील बताने वालों को उत्तर देना चाहिए कि क्या इन शक्तियों का देसी मोहरा बनना ही उनकी विचारधारा है।

@hiteshshankar

Topics: स्वातंत्र्यवीर सावरकरबेंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंसपोस्टर पर आपत्तिराष्ट्रीय लब्धि और राष्ट्रीय संपदाNational Gain and National Wealth
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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