स्वातंत्र्य समर और स्वदेशी विज्ञान
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होम भारत

स्वातंत्र्य समर और स्वदेशी विज्ञान

1 अक्टूबर 1894 को जनजातीयों को एकत्र कर बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के विरुद्ध जल, जमीन, जंगल और वनवासी संस्कृति के लिए सशस्त्र आन्दोलन खड़ा किया था। अंतत: उनकी मौत भी कारावास में अग्रेजों की साजिश से हुई। अपने अथक संघर्ष और वनवासी हितों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने के चलते आज संपूर्ण समाज उन्हें भगवान बिरसा मुंडा के रूप में पूजता है। 10 नवंबर, 2021 को भारत सरकार ने 15 नवंबर यानी बिरसा मुंडा की जयंती को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की।

Written byजयंत सहस्रबुद्धेजयंत सहस्रबुद्धे
Aug 20, 2022, 08:26 am IST
in भारत, आजादी का अमृत महोत्सव

देश में आधुनिक विज्ञान अंग्रेजों के द्वारा अवतरित हुआ। अन्य आक्रमणकर्ताओं और अंग्रेजों के आक्रमण में एक मौलिक अंतर यह था कि अंग्रेजों के पूर्व जितने आक्रमणकर्ता थे, उनके पास विज्ञान नहीं था लेकिन अंग्रेजों के पास विज्ञान था। अंग्रेज मूलरूप से व्यापारी के रूप में भारत आये। आगे चलकर उनकी भूख बढ़ गयी और उन्होंने भारत में राज स्थापित किया।

हम जानते हैं कि देश में आधुनिक विज्ञान अंग्रेजों के द्वारा अवतरित हुआ। अन्य आक्रमणकर्ताओं और अंग्रेजों के आक्रमण में एक मौलिक अंतर यह था कि अंग्रेजों के पूर्व जितने आक्रमणकर्ता थे, उनके पास विज्ञान नहीं था लेकिन अंग्रेजों के पास विज्ञान था। अंग्रेज मूलरूप से व्यापारी के रूप में भारत आये। आगे चलकर उनकी भूख बढ़ गयी और उन्होंने भारत में राज स्थापित किया।

भारत पर नियंत्रण की चाल: अंग्रेजों की जीत का प्रारंभ जून 1757 की प्लासी की लड़ाई से माना जाता है। 1818 में पुणे में पेशवा को पराजित कर अंग्रेजों ने आज के भारतवर्ष पर नियंत्रण स्थापित किया। इस दौरान अंग्रेजों ने भारतीयों की पहचान को तोड़कर उनको अंग्रेजी पहचान देना शुरू किया। उन्होंने यह कहना शुरू किया, ‘आपका देश तो अंधकार में डूबा हुआ है। लोग तो अंधविश्वास के आधार पर ही जीते हैं। तर्क क्या होता है, भारत वालों को नहीं पता।’ वे इस प्रकार की बातें सतत अपने देश के लोगों को बताते रहे। अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने और भारत के लोगों को नीचा दिखाने के लिए उन्हें सबसे प्रभावी साधन लगा उनके यहां की औद्योगिक क्रांति, यानी उनके द्वारा निर्मित तंत्र ज्ञान। रेल लाइन, टेलीग्राफ, पोस्ट आफिस, चार पहिए की गाड़ी आदि।

अंग्रेज पश्चिम का चिकित्सा तंत्र लाये। इन सब के कारण भारतीय काफी प्रभावित हुए। उनको लगने लगा कि पश्चिमी सभ्यता ही सबसे श्रेष्ठ सभ्यता है। हम तो पिछड़े हैं। अंधकार में डूबे हुए हैं। अंग्रेजों ने आधुनिक विज्ञान को भारत में सिखाना प्रारंभ किया। किंतु यह नीति थी कि सैद्धांतिक रूप से थोड़ा-थोड़ा सिखाएंगे, लेकिन प्रयोग नहीं करने देंगे। प्रयोगशाला स्थापित नहीं करने देंगे। अपने देश में इसके विरोध में राष्ट्रीय भाव से पहली बार विज्ञान के क्षेत्र में स्वदेशी भाव का प्रकटीकरण हुआ।

डॉ. महेन्द्र लाल स्वास्थ्य विभाग के बड़े डॉक्टर थे। बंकिम चंद चटर्जी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस जैसे लोग डॉ. महेन्द्र लाल के प्रशंसक थे। भारत में उस समय होमियोपैथी जर्मन लोगों के द्वारा आ गयी थी। जर्मनी इंग्लैंड का एक बहुत बड़ा शत्रु देश था। इसलिए जर्मनों का यहां पर जो कुछ होता था अंग्रेज लोग उसका विरोध करते थे। एक जर्मन पादरी के द्वारा होमियोपैथी अपने देश में आयी। आज जैसे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन आयुर्वेद का विरोध करती है उसी प्रकार उस समय ब्रिटिश मेडिकल एसोशिएशन होमियोपैथी का विरोध करती थी। डॉक्टर महेन्द्र लाल सरकार भी होमियोपैथी का अपमान करने वालों में अग्रणी थे।

आंचलिक मोर्चे

चाकमा के आगे झुके अंग्रेज

चटगांव (बंगाल) के पहाड़ी क्षेत्र में कपास उत्पादक चाकमा जनजाति ने 1776-89 तक अंग्रेजों को बेबस कर दिया था। 1760 में अंग्रेज सौदागरों ने बंगाल के नवाब मीर कासिम से चटगांव से कर वसूली का अधिकार ले लिया। अंग्रेजों के इजारेदार तय से कई गुना अधिक कर (कपास के रूप में) वसूलते थे और शेष कपास भी चाकमाओं से मनमाने दर पर खरीद लेते थे। इससे चाकमा दबते गए और इजारेदार मालामाल होते गए। 1776 में शेर दौलत खान एवं रामू खान के नेतृत्व में चाकमा कर देना बंद कर इजारेदारों के कपास गोदामों को लूटने लगे। इजारेदारों की मदद के लिए अंग्रेजी सेना आई तो चाकमा उनके आगे टिक नहीं सके। 1782 में शेर दौलत खान के पुत्र जां बख्श खान के नेतृत्व में चाकमा फिर संगठित हुए। आलम यह था कि इजारेदार चाकमा अंचल में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे। 1789 में चाकमा ने हथियार तभी डाले, जब अंग्रेजों ने इजारेदारी प्रथा खत्म की।

आंचलिक मोर्चे

अधिकार के लिए विजयनगरम् का संघर्ष

तीसरे कर्नाटक युद्ध (1756-63) के शुरू में उत्तरी सरकार क्षेत्र पर फ्रांसीसियों का प्रभाव था। 1766 में निजाम से संधि के बाद राजामुंदरी, चिकाकोल, कोंडापल्ली के साथ विजयनगरम् अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। कंपनी ने विजयनगरम् पर सालाना तीन लाख रुपये का कर थोपा। यहां के राजा विजयराम राजे नाबालिग थे। 1790 में कंपनी ने राजस्व बढ़ाकर सालाना नौ लाख रुपये कर दिया। 1794 में विजयराम से रियासत छीन कर उन्हें 1200 रुपये मासिक पेंशन पर मुसलीपट्टम में जाने को कहा। पर विजयराम ने आदेश को ठुकरा दिया। वे विमलीपट्टम पहुंचे व अपने शुभचिंतकों को एकत्रित किया। जुलाई 1794 में पद्मनाभन के पास विजयराम के करीब 5,000 सैनिकों का सामना कंपनी की सेना से हुआ। युद्ध में विजयराम व उनके सैनिक मारे गए। उनके पुत्र नारायण राजे अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। अंतत: अंग्रेजों के साथ संधि के बाद उन्होंने सालाना छह लाख रुपये कर पर उनका संरक्षण स्वीकार कर लिया।

मार्तंड वर्मा

डच पराजय का अनकहा इतिहास

डच भारत में सबसे पहले आने वाले यूरोपीय थे। कालीकट (वर्तमान केरल) नीदरलैंड (डच) आक्रांताओं के निशाने पर आया। बाद में उनका पाला मार्तंड वर्मा से पड़ा। मार्तंड वर्मा ने आखिरी लड़ाई के लिए मानसून का वक़्त चुना ताकि डच सेना फंस जाए और उन्हें श्रीलंका या कोच्चि से कोई मदद न मिले। उन्होंने नायर जलसेना का नेतृत्व किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया। डच सेना पर जबरदस्त हमला किया और उसके हथियार गोदाम को उड़ा दिया। कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई, 1741 को मार्तंड वर्मा की जीत हुई। युद्ध में 11,000 डच सैनिक बंदी बनाये गए और हजारों मारे गये। डच कमांडर दी लेननोय और उप कमांडर डोनादी सहित डच जलसेना की 24 टुकड़ियों के कप्तानों को बंदी बना लिया और मार्तंड वर्मा के सामने पेश किया। उन्हें राजाज्ञा से उदयगिरि किले में बंदी बनाकर रखा गया। किसी यूरोपीय शक्ति पर किसी एशियाई देश की यह पहली विजय थी।

आंचलिक मोर्चे

दक्षिण का सिपाही आंदोलन

1801 में कर्नाटक पर ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे के तत्काल बाद चंद्रगिरि व चित्तूर के किलेदारों ने सिर उठाया, जिन्हें दबाना अंग्रेजों के लिए असंभव था। 1803 में चित्तूर में अंग्रेजों की बड़ी सेना क्रांतिकारियों से भिड़ी, पर उसे सफलता नहीं मिली। 1805 में किलेदारों की सेना ने पेड्डानाइडी किले पर कब्जा कर लिया। कंपनी की सेना में बड़ी संख्या में हिंदुस्तानी सैनिक थे, जिनके साथ भेदभाव होता था। उनका वेतन कम था और युद्ध में मारे जाने पर उनके परिवारों को भी कुछ नहीं मिलता था। उनकी जगह ऊंचे ओहदों पर गोरों को रखा जाने लगा। देसी सैनिकों की वर्दी, केश कर्तन आदि भी अंग्रेज अधिकारी तय करने लगे। परेड के दौरान कोई सैनिक तिलक नहीं लगा सकता था। इससे उन्हें लगा कि अंग्रेज उनका धर्म बिगाड़ कर उन्हें ईसाई बना रहे हैं। इस कारण वेल्लोर, मैसूर के नंदी दुर्ग व पल्लमकोटा और हैदराबाद सहित कई जगहों पर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।

दीवान जगबंधु

ईस्ट इंडिया कंपनी को दी मात

1751 में ओडिशा पर कब्जे के बाद मराठों ने स्थानीय राजाओं के सैनिकों को पुलिस का काम दिया और उन्हें
सेवाओं के बदले जमीन दीं, जिस पर कर नहीं लगता था। लेकिन कटक पर कब्जे के बाद कंपनी ने इन सिपाहियों की नौकरियां खत्म कर उनकी जमीनें कलकत्ता के अपने वफादार जमींदारों को बेच दीं। इससे 1816 तक 6,000 से अधिक सिपाहियों के परिवार सड़क पर आ गए। अंग्रेजों ने 1805 में खुर्दा के राजा मुकुंद देव से जागीर छीन कर भारी कर थोपा तो उनके दीवान जगबंधु ने असंतुष्ट सिपाहियों और जागीरदारों को एकत्र किया। उन्होंने मार्च 1817 में बानपुर के थाने व सरकारी ठिकानों पर हमला कर कंपनी के सौ से अधिक सैनिकों को मार कर बड़ा खजाना लूटा। खुर्दा व पुरी में कंपनी की सेना को हराया। पर पुरी में बड़े फौजी दस्ते और तोपों की भीषण गोलाबारी से क्रांतिकारियों को हटना पड़ा। जगबंधु के लगातार हमलों से परेशान होकर 1821 में कंपनी ने बकाया कर वसूली व जागीरों की बिक्री बंद कर दी।

 

आंचलिक मोर्चे

आक्रोशित भीलों का गुस्सा फूटा

भील उत्तर भारत में विंध्याचल से लेकर मध्य भारत और दक्षिण में सह्याद्रि अंचल तक फैले हुए थे। शोषण से आक्रोशित भीलों ने 1817 में खानदेश में क्रांति शुरू की। 1818 में तीसरे मराठा युद्ध में हार के बाद जब खानदेश पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ तो भीलों का गुस्सा उन पर फूट पड़ा। अंग्रेजों ने इनका दमन करने के साथ उन्हें पुलिस में भर्ती करने का लालच दिया। कुछ हद तक वे सफल भी रहे, पर अधिकांश भील नहीं माने। 1819 में उनका आंदोलन तेज हुआ, जो बढ़ता गया। इस दौरान जो भील पकड़ा जाता, उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाता। इस तरह अनगिनत भील क्रांतिकारी बलिदान हुए। उनकी क्रांति 1831 तक चली, जिसमें अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से गुस्साए आम लोगों ने भी उनका साथ दिया। बाद के वर्षों में टंट्या भील (टंट्या मामा) 1878-1889 के बीच सक्रिय वनवासी जननायक हुए। उन्हें भारतीय ‘रॉबिन हुड’ भी कहा जाता है।

सावरकर बंधु

सृजनशील स्वतंत्रता सेनानी

सावरकर बंधु तीन भाई थे- गणेश दामोदर सावरकर, विनायक दामोदर सावरकर और नारायण दामोदर सावरकर। ये ‘अभिनव भारत’ संगठन चलाते थे, जिसकी स्थापना बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर ने की थी। अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले विनायक दामोदर सावरकर ‘वीर सावरकर’ के नाम से विख्यात थे। वे न केवल एक क्रांतिकारी, बल्कि भाषाविद्, कवि, दृढ़, राजनेता, समर्पित समाज सुधारक, दार्शनिक, द्रष्टा, कवि, इतिहासकार और ओजस्वी वक्ता भी थे। वीर सावरकर पहले कवि थे, जिसने कलम-कागज के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं। उन्होंने दस हजार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षों स्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वह किसी न किसी तरह देशवासियों तक नहीं पहुच गई। उन्होंने ही सबसे पहले 1857 के संघर्ष को स्वतंत्रता का युद्ध कहा और इस पर प्रामाणिक पुस्तक भी लिखी। 

चाफेकर बंधु

अपमान का बदला

चाफेकर बन्धु के रूप में ‘दामोदर हरि चाफेकर’, ‘बालकृष्ण चाफेकर’ और ‘वासुदेव चाफेकर’ भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध विभूति हैं। तीनों भाई बाल गंगाधर तिलक से बहुत प्रभावित थे। बालकृष्ण तथा दामोदर चाफेकर ने जून 1897 में महारानी विक्टोरिया के ‘हीरक जयन्ती’ समारोह के अवसर पर दो ब्रिटिश अधिकारियों चार्ल्स रैंड और ले. एम्हर्स्ट की हत्या कर दी थी। रैंड को गोली मारने के बाद दामोदर को पुणे की यरवदा जेल भेजा गया। रैंड ने पुणे के कई परिवारों को अपमानित किया था। जेल में दामोदर की मुलाकात तिलक से हुई। तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने गणेश शंकर द्रविड़ की हत्या की थी, जिसने दामोदर और बालकृष्ण को गिरफ्तार कराया था। दामोदर को 18 अप्रैल, 1899, बालकृष्ण को 12 मई, 1899, जबकि वासुदेव हरि चाफेकर को 8 मई, 1899 को फांसी दी गई। तीनों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और सदा के लिए अमर हो गये।

आंचलिक मोर्चे

असम में वनवासी क्रांति

असम के जयंतिया पहाड़ी क्षेत्र में सितांग वनवासियों पर अंग्रेजों ने गृह कर थोप दिया था, जबकि वे खुद को स्वतंत्र मानते थे। समुदाय के विरोध के बाद अंग्रेजों ने उन पर दूसरे कर भी थोप दिए। जनवरी 1862 में इस समुदाय ने मुख्य थाने पर हमला कर उसे जला दिया और ब्रिटिश सेना को घेर लिया। उनके शिविर उखाड़ दिए। उनके आंदोलन को कुचलने के लिए अंगे्रजों ने बड़ी सेना भेजी, पर सफलता नहीं मिली। इसके बाद सरकार ने गृह कर तो नहीं हटाया, पर समुदाय को दूसरी कई सुविधाएं देनी पड़ीं। उधर, असम के नौगांव क्षेत्र के फूलागुड़ी वनवासियों को अफीम की खेती मुनाफा देखकर अंग्रेजों ने इसे हथियाना चाहा। किसानों को अफीम की खेती करने से रोका, उन्हें डराया-धमकाया और केवल अंग्रेजों के लिए खेती करने को कहा। इसके खिलाफ फूलागुड़ी किसान संगठित हुए। अंग्रेजों ने पुलिस और सेना भेजकर निहत्थे किसानों के आंदोलन को कुचल दिया। 1890 के के आसपास असम घाटी में भूमि राजस्व बहुत बढ़ा दिया गया। इसके विरोध में कामरूप, पाथरूघाट आदि के किसानों ने भी आंदोलन किया, लेकिन अंग्रेजों ने इसे भी दबा दिया।

आंचलिक मोर्चे

अन्याय के विरुद्ध 19 साल संघर्ष

मद्रास प्रेसीडेंसी में गोदावरी के पहाड़ी अंचल रम्पा के राजा ने अपनी रियासत सरदारों (मुट्टादार) में बांट रखी थी, जो क्षेत्र का लगान वसूलते थे। 1835 में राजा की मृत्यु के बाद उसकी बेटी ने मनसब की जिम्मेदारी संभाली। राजा का एक जारज पुत्र भी था, जिसने सारे अधिकार प्राप्त कर लिए। रम्पा के मुट्टेदारों ने इसका विरोध किया। वे चारों तरफ से पिस रहे थे। अदालती चक्कर में उनकी जमीन-जायदाद भी हथियाई जा रही थी। इससे उनका गुस्सा भड़का और मार्च 1879 को चौड़ावरम में पुलिस छावनियों पर सशस्त्र हमला कर उन्हें घेर लिया। सेना आई, पर लेकिन वे सीधे मुकाबला न कर छापामार युद्ध लड़ते रहे। अंत में क्रांतिकारियों के नेता जंगम सम्बया को पकड़ लिए गए, पर क्रांति जारी रही। 1879 के अंत तक अधिकांश क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए। फरवरी 1880 में मुख्य नेता चंद्रैय्या के बलिदान के बाद क्रांति मंद पड़ गई। इस तरह रम्पा क्रांति 1861 से 1880 तक चली।

आंचलिक मोर्चे

उत्तर-पूर्वी राज्यों का योगदान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को खड़ा करने में पूर्वी तथा पूर्वोत्तर राज्यों के वनवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। समुदाय द्वारा चलाई गई सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई ने गुलाम भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया। स्वतंत्रता के लिए भारत का संघर्ष एक जन संघर्ष था जिसमें पूर्वोत्तर के जन सामान्य की भागीदारी भी अहम थी। मनिराम देवान जिन्हें 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध साजिश रचने के आरोप में फांसी दे दी गई थी। ऐसे ही थे किआंग नंगबाह, जिन्हें 30 दिसंबर, 1862 को पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले स्थित गॉलवे शहर में इवामुसियांग में सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश सरकार ने फांसी दी। रानी मां गाईदिन्ल्यु का योगदान भला कौन भूल सकता है। उन्होंने ना केवल अग्रेजों के विरुद्ध बल्कि ईसाई मिशनरियों के हर प्रपंच को ध्वस्त किया। उन्होंने नागा प्रदेश में जनजातीय समाज को संगठित करके उसे एक स्वर प्रदान किया। रानी मां को नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई के रूप में जाना जाता है।

स्वदेशी विज्ञान संस्था : एक बार एक रोगी डॉ. महेन्द्र लाल सरकार के उपचार से ठीक नहीं हो पाया और होमियोपैथी की दवाओं से ठीक हो गया। डॉ. सरकार के अहंकार को इससे बड़ा धक्का लगा। लेकिन वे जिज्ञासु थे, इसलिए उन्होंने होमियोपैथी के बारे में अध्ययन शुरू किया। उनके ध्यान में आया कि अंग्रेज जो बता रहे हैं कि होमियोपैथी तर्क के आधार पर विकसित विज्ञान नहीं है, लेकिन यह तो तर्क के आधार पर बना विज्ञान है। एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है। तब उन्होंने ब्रिटिश मेडिसिन एसोसिएशन की एक सभा में होमियोपैथी की अभ्यासपूर्ण प्रस्तुति की। इसके बाद अंग्रेजों को इतना गुस्सा आया कि डॉ. सरकार को ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन से बहिष्कृत कर दिया गया। उनके साथ जो व्यवहार हुआ, उससे उन्हें यह सीख मिली कि अंग्रेज हमें विज्ञान का अच्छी प्रकार से ज्ञान नहीं होने देंगे।

वे कुछ बातें अपने हाथ में ही रखेंगे। तब डॉ. सरकार ने एक संकल्प किया कि ‘मैं भारत में भारतीय लोगों के द्वारा निर्मित भारतीय लोगों को विज्ञान में आगे बढ़ाने वाली विज्ञान संस्था का निर्माण करूंगा’। 1868 में उन्होंने इस प्रकार का संकल्प लिया। 1876 में यह संस्था प्रारंभ हुई जो अपने देश की पहली राष्ट्रीय विज्ञान संस्था है, नाम है ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ साइंस’। यह संस्था कोलकाता में स्थापित हुई। भारत की विज्ञान क्षेत्र की पहली पीढ़ी जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय, आशुतोष मुखर्जी आदि ये सारे विज्ञान क्षेत्र के अग्रणी लोग इसी संस्था से विज्ञान पढ़कर निकले।

जगदीश चंद्र बसु 1884 में इंग्लैंड से भौतिक विज्ञान की उच्च शिक्षा लेकर भारत लौटे थे। उस समय यहां विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ाना ही एकमात्र काम होता था। लेकिन अंग्रेजों ने उनका भौतिक विज्ञान के अध्यापक का आवेदन स्वीकृत नहीं किया कहा गया, भारत के लोगों में तर्कपूर्ण विचार की क्षमता नहीं है। बसु इस अन्याय के विरोध में खड़े हुए। उन्होंने भौतिक विज्ञान पढ़ाना शुरू किया। उनका यह सत्याग्रह 3 साल तक चला। उन्होंने 3 साल बिना वेतन भौतिक विज्ञान पढ़ाया।

अंग्रेजों ने भारत में शोध कार्य को दबा कर रखा था। जगदीश चंद्र बसु ने विचार किया कि मैं देश में अनुसंधान विज्ञान प्रारंभ करूंगा। संसाधन नहीं थे, परंतु एक संकल्प था। उन्होंने 1894 में प्रयोगशाला स्थापित की। सूक्ष्म तरंगों का निर्माण, उसकी निर्मिति प्रयोग के द्वारा की। जो यूरोप का व्यक्ति नहीं कर सका, जो एक पिछड़ा हुआ, तर्कपूर्ण विचार नहीं कर सका, ऐसा एक भारतीय व्यक्ति कर पाया। 1895 में उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी और सिद्ध कर दिखाया कि ये मैं कर सकता हूं। यह एक लड़ाई ही थी। केवल रास्ते पर उतर कर इंकलाब जिंदाबाद का नारा देते हुए गोली खाना, लाठी खाना और कारावास जाना ही संघर्ष नहीं होता।

रसायन औषधि क्षेत्र में कदम : इसके साथ ही उनके बाद आए प्रफुल्ल चंद्र राय। वे भी इंग्लैंड से रसायन विज्ञान में डॉक्टरेट करके आये। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने स्वदेशी उद्योग प्रारंभ किया। उन्होंने बंगाल फार्मास्यूटिकल नाम से देश का पहला रसायन औषधि निर्माण उद्योग शुरू किया। साथ ही उन्होंने 1902 में ‘द हिस्ट्री आफ हिन्दू केमिस्ट्री’ नामक ग्रंथ लिखा। यह विश्व के लिए एक बहुत बड़ी प्रस्तुति थी। इससे विश्व की आंखें खुल गयीं कि भारत में इतने प्राचीन काल से विज्ञान स्थापित है।

‘नेचर’ नाम की विज्ञान की विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका ने ‘द हिस्ट्री आफ हिन्दू केमिस्ट्री’ के अध्याय पत्रिका में प्रकाशित किये। वे रसायन विज्ञान का उपयोग क्रांतिकारियों के लिए शस्त्र बनाने, बम बनाने इत्यादि का प्रशिक्षण देने के लिए करते थे। आगे चलकर आशुतोष मुखर्जी ने विज्ञान क्षेत्र में विश्व में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। उस समय कोलकाता में ही कार्यरत एक भारतीय वैज्ञानिक थे, चंद्रशेखर वेंकटरमन। वे कोलकाता में ब्रिटिश शासन में नौकरी करते थे लेकिन भौतिकी में रुचि थी। आशुतोष मुखर्जी उन्हें ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ साइंस’ में लाए। इसी संस्था के एक सदस्य, रमन ने भारत का एकमात्र विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।

‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ साइंस’ वह उर्वरा भूमि थी जहां से देशभक्त वैज्ञानिक तैयार हुए। प्रमथनाथ बोस ऐसे ही भूगर्भ विज्ञानी थे। उन्होंने जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया में बहुत अच्छा काम किया लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें इस संस्था का कभी भी प्रमुख नहीं बनाया। इसके विरोध में प्रमथनाथ बोस ने वहां से त्यागपत्र दे दिया। अपने देश में इस्पात उद्योग खड़ा करने वाले जमशेदजी टाटा के नाम से जहां आज जमशेदपुर या टाटानगर है, वह स्थान भी प्रमथनाथ बोस ने ही बताया था।

1907 में वहां देश का पहला इस्पात उद्योग खड़ा किया गया था। इस प्रकार से अपने देश में स्वदेशी ज्ञान, स्वदेशी विज्ञान, स्वदेशी उद्योग आदि को साधन बनाकर अंग्रेजों को चुनौती देना, प्रत्याघात करना, यह सब विज्ञान जगत के लोगों ने किया। 1916 में जब पंडित मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रारंभ किया तब उसके उद्घाटन के निमित्त उन्होंने आचार्य जगदीश चंद्र बसु को आमंत्रित किया। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष के निमित्त अपने देश के स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्मरण करते वक्त इन वैज्ञानिकों का भी स्मरण करना हम सभी का दायित्व है।

(लेखक विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं)

Topics: स्वातंत्र्य समरस्वदेशी विज्ञानआंचलिक मोर्चेअसम में वनवासी क्रांतिFreedom Summer and Indigenous Scienceस्वदेशी विज्ञान संस्थाईस्ट इंडिया कंपनीस्वतंत्रता सेनानी
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