कृष्णं वंदे जगत गुरुं
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कृष्णं वंदे जगत गुरुं

जन्माष्टमी पर विशेष

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Aug 19, 2022, 12:51 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
श्री राधेकृष्ण

श्री राधेकृष्ण

सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण। गोपालक, योद्धा, संगठक, संरक्षक, राजा, योगी, मनीषी, चिंतक, संन्यासी। शब्दों से भी परे। अजन्मा होकर भी पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। सर्वशक्तिमान होने पर भी बंदीगृह में जन्म लेते हैं और राजपुत्र होने पर ग्वालों के बीच बचपन बिताते हैं। कृष्ण का बाल्यकाल युगों बाद भी घर-घर की शोभा है। वे संपूर्ण हैं, तेजोमय हैं, ब्रह्म हैं, ज्ञान हैं। गीता में उन्होंने ऐसे जीवन सूत्रों को प्रतिपादित किया जो आज भी प्रासंगिक हैं।

संसार को ज्ञान, कर्म और भक्तियोग की दिव्य ज्योति दिखाने वाले महामानव का अवतार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अंधियारी अर्धरात्रि को कारागृह में हुआ था। प्रभु की माया कि अवतार लेते ही पिता वसुदेव को पुत्र की जीवन रक्षा के लिए भयंकर तूफानी रात में मूसलाधार वर्षा से उफनायी यमुना पार कर गोकुल ले जाना पड़ा। जननी अपने नवजात को जरा दुलार भी न सकी। महाप्रभु के नन्हें चरण पखारने को यमुना वसुदेव के शीश पर चढ़ आईं। मूसलाधार वर्षा से शिशु कृष्ण को बचाने के लिए शेषनाग ने छतरी काढ़ दी। श्रीकृष्ण जन्म के इस अद्भुत प्रसंग के माध्यम से वैदिक मनीषा जन्म व मृत्यु के गूढ़ दर्शन को व्याख्यायित करते हुए कहती है कि जिस तरह हर प्रकाश का अवतरण तमस के कोख से होता है। रात्रि के बाद सूर्योदय, भूगर्भ में बीज का अंकुरण; ठीक वैसे ही कारागृह में लीलापुरुष का जन्म जीवन व मृत्यु के बंधन का सूत्र है। जीवन और मरण के बीच संसार रूपी कारागृह में हर मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार फल भोगने होते हैं। जन्म के साथ प्राण का देहरूपी काया में प्रवेश कारागृह प्रवेश ही है जो मृत्युपरांत ही बंधन मुक्त होती है। श्यामल कृष्ण की प्रकाशमयी लीलाएं मानव जीवन को सन्मार्ग दिखाती हैं।

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी एवं बहुरंगी है। हम उन्हें एक महान क्रांतिकारी नायक के रूप में स्मरण करते हैं। अवतरण से लेकर लोक लीला संवरण तक उन्होंने हर कर्म मानवता के उद्धार के लिए किया। यदा-यदा हि धर्मस्य…संभवामि युगे-युगे का उद्घोष करने वाले युग नायक कृष्ण ने असुरत्व के विनाश और देवत्व के संरक्षण के लिए धरती पर अवतार लेकर समग्र क्रांति का बिगुल बजाया और अपने सम्मोहक व्यक्तित्व व अनूठे न्यायप्रिय आचरण से पथभ्रष्ट समाज को सही दिशा दी। श्रीकृष्ण की लीलाएं बताती हैं कि व्यक्ति और समाज आसुरी शक्तियों का हनन तभी कर सकता है, जब कृष्णरूपी आत्म-तत्व चेतन में विराजमान हो।

उन्होंने बाल लीलाएं करके गांव वालों को बहुत-सी व्याधियों से बचाया, उन्हें कर्मयोगी बनाया और अनुचित व निरर्थक परंपराओं से मुक्त कराया। सामाजिक, आध्यात्मिक व राजनीतिक किसी भी दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि कृष्ण जैसा समाज उद्धारक दूसरा कोई हुआ ही नहीं। श्रीकृष्ण जन्म का घटनाक्रम बड़ा विचित्र था। जन्म से ही जिसकी हत्या की बिसात बिछायी गयी हो, जिसे जन्म से ही अपने माता-पिता से अलग कर दिया हो, जिसने अपना संपूर्ण जीवन तलवार की धार पर जिया हो, वो भी विराट व्यक्तित्व का धनी हो सकता है। कृष्ण का जीवन सिखाता है कि कैसे विषमताओं के बीच महान बना जा सकता है। गाय को “माता” का दर्जा उन्होंने दिया। उनको “गोपाल” सम्बोधन अत्यन्त प्रिय था। एक भाई हल संभाले और दूसरा भाई गोपालन करे, भारत की भौतिक उन्नति का यह मूलमंत्र आज भी सार्थक व प्रासंगिक बना हुआ है। भारतीय दर्शन में गाय को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया है। अब तो वैज्ञानिक प्रयोगों से भी साबित हो चुका है कि गोमूत्र, गोमय व पंचगव्य से अनेकानेक उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कर बेरोजगारी की समस्या भी काफी हद तक दूर की जा सकती है। गोघृत की आहुतियों से पर्यावरण शुद्धि अब वैज्ञानिक प्रयोगों से भी साबित हो चुकी है।

महाभारत मूल रूप से राष्ट्रनायक श्रीकृष्ण के जीवन की यशोगाथा है। जीवन के धुरविरोधी पक्षों को एक साथ सफलतापूर्वक अधिकार से जीना इस महानायक की अनोखी विशिष्टता है। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े और भयंकर युद्ध को सार्थक दिशा दी। उनका गीता ज्ञान सार्वकालिक है। अर्जुन को गीता का उपदेश देकर वे न सिर्फ ‘’कर्मण्येवाधिकारस्ते’’ की अनूठी व्याख्या करते हैं वरन अपना विराट रूप दिखाकर उनका मोहभंग भी करते हैं। महाभारत युद्ध में पांडवों की जीत का श्रेय श्रीकृष्ण की कूटनीति को ही जाता है। कर्म की निरंतरता उनको अवतारी सिद्ध करती है। महाभारत में कई स्थानों पर उल्लेख है- “यतो धर्म: ततो कृष्ण:, यतो कृष्ण: ततो जय:” यानी जहां कृष्ण हैं वहां धर्म है और जहां धर्म है वहीं विजय है। द्रोण, कर्ण व दुर्योधन वध के प्रसंगों में कई लोगों को कृष्ण की सलाह संभवतः अन्यायपूर्ण लग सकती है परन्तु कृष्ण ने स्थापित किया कि धर्म सदा देश-काल-परिस्थिति के सापेक्ष होता है। पाप पुण्य की महीन रेखा के वे पूर्ण ज्ञाता थे। दुष्टों के किसी भी प्रकार दमन को वे धर्मानुमोदित मानते थे। धर्म के साथ नीति का चोली दामन का साथ है, कहां-कहां धर्म को प्रधानता देनी है और कहां-कहां नीति को, यह उन्होंने खूब स्पष्ट किया। श्रीकृष्ण ने आजीवन धर्माचरण किया। महाभारतकार लिखते हैं कि उत्तरा के पुत्र को जीवित करने के लिए कृष्ण पूरे विश्वास के साथ कहते हैं, “यदि मैंने आजीवन सत्य और धर्म का अवलंबन लिया हो तो यह मृत बालक तत्क्षण जीवित हो जाए और बालक सचमुच जीवित हो जाता है।

कृष्ण सर्वसमर्थ थे फिर भी उन्होंने अनेक स्थलों पर लोकहित के लिए अपमान व आक्षेप सहे पर कर्तव्यपरायणता से जरा भी विमुख न हुए। अपने गुरु का ऋण उतारने के लिए यमपाश से अपने गुरु भाई तक छुड़ा लाये; ऐसा साहस सिर्फ उन जैसा अप्रतिम साहसी ही कर सकता था। मथुरा को कंस के अत्याचार से मुक्त करने के बावजूद जब उनके स्वयं के स्वजनों ने कृष्ण और बलराम को मथुरा छोडकर चले जाने को कहा तो उन्होंने सहज ही आज्ञा मान कर मीलों दूर सौराष्ट्र (गुजरात) में समुद्र के मध्य एक अनूठी द्वारिका नगरी बसायी। पुरातात्विक शोधों में मिले द्वारिका के अवशेष श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता को साबित करते हैं।

श्रीकृष्ण ने मानव जाति को नया जीवन-दर्शन दिया। लोगों को जीवन जीने की कला सिखायी। उनकी समूची जीवन-कथा चमत्कारों से भरी है लेकिन वे हमें जितने करीब लगते हैं, उतना और कोई नहीं। ईश्वर होते हुए भी सबसे ज्यादा मानवीय लगते हैं। वे अपनी दैवीय शक्तियों से द्वापर के आसमान पर छा नहीं जाते, बल्कि एक राहत भरे अहसास की तरह पौराणिक घटनाओं की पृष्ठभूमि में बने रहते हैं। श्रीकृष्ण ने जो कुछ भी कहा; उनका हर शब्द आज भी अक्षरशः चरितार्थ हो रहा है। उनकी शिक्षाएं सिर्फ सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए ही नहीं वरन पूरी मानव जाति के लिए अनुकरणीय हैं। सूत्र रूप में कहें तो श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पर्याय है।

श्रीकृष्ण से जुड़े प्रमुख स्थल

  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि- भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के राजा कंस के कारागार में हुआ था। मथुरा स्थित कृष्णजन्मभूमि में उसी स्थान पर एक गुफा में एक चबूतरे पर उस कारागृह की छवि बहुत खूबसूरती से अंकित की गयी है। श्रद्धालु इसी चबूतरे पर शीश नवाकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
  • नंद गाव का नंदराय मंदिर- कंस के भय से वसुदेव जी गोकुल में नंदराय और माता यशोदा के पास नवजात कृष्ण को छोड़ आये थे। जहां उनका बालपन गुजरा था वहां आज यहां भव्य मंदिर सुशोभित है। पास में एक भी सरोवर बना है जिसे पावन सरोवर कहते हैं। माना जाता है कि इसी सरोवर में माता यशोदा बालकृष्ण को स्नान कराया करती थीं।
  • कुरुक्षेत्र का भद्रकाली मंदिर- हरियाण के कुरुक्षेत्र में स्थित शक्तिपीठ भद्रकाली मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां पर श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन हुआ था। कहा जाता है कि यहां आज भी भगवान श्रीकृष्ण के पदचिह्न मौजूद हैं जिनकी पूजा की जाती है।
  • उज्जैन का सांदीपनि आश्रम– मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित सांदीपनि आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने अग्रज बलराम और मित्र सुदामा के साथ शिक्षा प्राप्त की थी। कहते हैं यहीं पर श्रीकृष्ण ने भगवान परशुराम से सुदर्शन चक्र भी प्राप्त किया था। वर्तमान में यहां भव्य मंदिर बना हुआ है।
  • गुजरात का द्वारिकाधीश मंदिर– मथुरा छोड़कर श्रीकृष्ण ने द्वारिका में समुद्र के बीच अपनी नगरी बसायी थी। सागर तट पर बना यहां का भव्य मंदिर द्वारिकाधीश कृष्ण का राजमहल और विष्णु भक्तों के लिए मोक्ष द्वार माना जाता जाता है।
  • कुरुक्षेत्र का ज्योतिसागर तीर्थ– कुरुक्षेत्र में जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, आज वह स्थान वर्तमान में ज्योतिसागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां आज भी पीपल का वह पेड़ मौजूद है, जिसके नीचे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।
Topics: श्री कृष्ण जन्माष्टमीजन्माष्टमी उत्सव
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