एक राष्ट्र के नाते अपने “स्व” को पहचानकर आत्मसात् करना आवश्यक
October 4, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

एक राष्ट्र के नाते अपने “स्व” को पहचानकर आत्मसात् करना आवश्यक

भारत की यह पहचान, भारत का यह “स्व” जो सदियों पुराना है, सर्वविदित है, सुस्पष्ट है उसे ही नकारा गया। इसे नकारने को  लिबरल, intellectual और progressive कहलाने का फ़ैशन चल पड़ा

Written byडाॅ. मनमोहन वैद्यडाॅ. मनमोहन वैद्य
Aug 7, 2022, 07:20 pm IST
inभारत, संघ @100, आजादी का अमृत महोत्सव
डॉ. मनमोहन वैद्य, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

डॉ. मनमोहन वैद्य, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

भारत के सिवा दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां के समाज के मन में “हम कौन हैं? हमारे पुरख़े कौन थे? हमारा इतिहास क्या रहा है?” इसके बारे में कोई सम्भ्रम या भिन्न-भिन्न मत होंगे। पर भारत में, जो दुनिया का सबसे प्राचीन राष्ट्र है और जहां सबसे समृद्ध समाज रहने के बावजूद हमारी इस विषय पर सहमति नहीं है। इसका एकमात्र कारण यही दिखता है कि हम एक समाज और एक राष्ट्र के नाते अपने “स्व” को पहचानना और उसे आत्मसात् करना नहीं चाहते। कुछ उदाहरण देखें।

द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश के उपरांत (1945) ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने नई शुरुआत की थी। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद – 1948 में इजरायल ने भी अपने राष्ट्र को पुनः प्राप्त किया था। भारत ने भी शतकों की ग़ुलामी और शोषण के उपरांत और देश विभाजन के बाद 1947 में  स्वाधीनता प्राप्त की थी। लगभग एकसाथ नए सिरे से शुरुआत करने वाले इन देशों को आज हम देखते हैं तो भारत की तुलना में इन चारों देशों की स्थिति बहुत अच्छी दिखती है। क्या कारण रहा होगा?

एक सामाजिक चिंतक के अनुसार “ जब तक एक समाज के नाते हम कौन हैं यह हम तय नहीं करते, हम  अपनी दिशा और प्राथमिकताएँ तय नहीं कर सकते।” यही अंतर हैं भारत और इन देशों की विकास यात्रा में, जो कि क़रीब एक साथ ही शुरू हुई थी।

अपने “स्वदेशी समाज “ इस ऐतिहासिक निबंध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि “हमें सबसे पहले हम जो है वह बनना पड़ेगा।” यह अद्भुत संयोग ही है कि आज जब हमारा देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने जा रहा है तब एक ऐसा कालखंड  आया है जब एक राष्ट्र के नाते भारत अपने “स्व” के आधार पर अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए प्रयासरत है – परंतु इसका भी विरोध क्यों होता है इसपर विचार होना चाहिए।

डॉ. मनमोहन वैद्य, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

भारत के आधुनिक  इतिहास में हमें दिखता हैं कि भारत की यह पहचान, भारत का यह “स्व” जो सदियों पुराना है, सर्वविदित है, सुस्पष्ट है उसे ही नकारा गया। इसे नकारने को  लिबरल, intellectual और progressive कहलाने का फ़ैशन चल पड़ा। स्पष्ट दिखता है कि भारत ने चूँकि अपनी विकास यात्रा की दिशा अपने “स्व” के आलोक में तय  नहीं की  इसलिए भारत का उसकी क्षमता (potential) के आधार पर जितना विकास अब तक होना चाहिए था वह हम नहीं कर सके। भारत के इस “स्व” के प्रकट होने के कई अवसर आए परंतु दुर्भाग्य से उन्हें लगातार नकारा गया।

हम जानते हैं कि 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध हुए जन आंदोलन का उदघोष “वन्देमातरम्” गीत बना था। “वन्देमातरम्” ने हज़ारों युवकों को, क्रांतिकारियों को स्वाधीनता के आंदोलन में कूदने की, देश पर मर मिटने की प्रेरणा दी। “वन्देमातरम्” भारत के “स्व” का सहज प्रस्फुटन था। कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशनों में इस का गौरवपूर्ण गान होता था। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक इसे स्वरबद्ध कर कांग्रेस के अधिवेशनों में गाते थे। हिंदू- मुसलमान सभी इससे समान रूप से प्रेरणा पाते थे। फिर अचानक 1921 से यह केवल हिंदुओं का गीत और साम्प्रदायिक(communal) कैसे हो गया? इसके पीछे की मानसिकता को समझना आवश्यक है। 1905 से 15 वर्षों तक जो देशभक्ति का स्वाभाविक प्रस्फुटन था वह अचानक साम्प्रदायिक कहकर कैसे और क्यों नकारा गया, यह समझना आवश्यक है।

एक और उदाहरण देखें। स्वतंत्र भारत के ध्वज का सर्वप्रथम नमूना विवेकानंद शिष्या भगिनी निवेदिता ने 1905 में बनाया। दधीचि ऋषि के तपस्वी देहत्याग से बना वज्र चिह्न अंकित ध्वज उन्होंने बनाया। पर आगे वे लिखती हैं, “unfortunately we had a Chinese war flag as model in front of us, so we made it black on red. But it doesn’t appeal to Indians. So, next one will be yellow on saffron.” 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में भगवे कपड़े पर पीला वज्रचिह्न ऐसा ध्वज प्रदर्शित हुआ था।

इसके पश्चात विविध ध्वजों के विभिन्न नमूने प्रस्तावित हुए। 1921 में भारत के सभी समुदायों का प्रातिनिधिक चरखांकित – तिरंगा ध्वज बनाया गया। 1929 में मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में एक सिख प्रतिनिधि मण्डल महात्मा गांधी जी से मिला और उन्होंने अलग-अलग समुदायों के प्रातिनिधिक ध्वज की कल्पना का विरोध किया और सभी के बीच रही एकता को दर्शानेवाला राष्ट्रीय (National) ध्वज बनाने पर ज़ोर दिया और कहा  यदि अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व का ही विचार करना है तो सिख समुदाय का पीला रंग ध्वज में जोड़ा जाए।  इस पर समग्र विचार कर सुझाव देने के लिए  कांग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति का गठन किया। इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मास्टर तारासिंह, पट्टाभि सीतारामैय्या(संयोजक), काका कालेलकर और  डॉक्टर हार्डीकर थे। ध्वज समिति ने राज्य कांग्रेस समिति और सामान्य व्यक्तियों से प्रचलित राष्ट्रीय ध्वज के लिए आपत्ति और सुझाव माँगे।

सब की बातें सुनकर ध्वज समिति का सर्वसम्मत निर्णय रहा कि “भारत का ध्वज विशिष्ट(distinct), कलात्मक(artistic) और  non-communal हो।यह सर्वानुमति से तय किया गया कि वह एक ही रंग का हो। और यदि कोई एक रंग जो सबसे विशिष्ट है, जो सभी भारतवासियों को समान रूप से स्वीकार्य है और जो भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के साथ दीर्घकाल से जुड़ा है वह भगवा या केसरी रंग है। इसलिए आयताकृति भगवे कपड़े पर नीले रंग में चरखा यह भारत का ध्वज होगा यह निर्णय ध्वज समिति ने सर्वानुमति से लिया। यह निर्णय क्यों नहीं स्वीकार हुआ? वह कौन सी मानसिकता थी जिसने भारत का यह स्वाभाविक और सुविचारित “स्व” नकारा? यह तथ्य भी विचार करने योग्य है।

1947 में स्वाधीनता के पश्चात संविधान द्वारा समृद्धि, शांति और पराक्रम को दर्शाता धर्मचक्रांकित तिरंगा हमारा राष्ट्रध्वज स्वीकारा गया। यह हमारा राष्ट्रध्वज है। उसका सम्मान तथा संरक्षण करना और अपने कर्तृत्व से उसका गौरव बढ़ाना हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है। यह निर्विवाद सत्य है।

इसी तरह स्वाधीनता के पश्चात भारत की शिक्षा में जो मूलभूत सुधार अपेक्षित था वह भी नहीं किया गया। 1948 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बने शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में “शिक्षा के अभारतीय चरित्र”   (The Un-Indian Character of Education) के बारे में वे स्पष्ट कहते है कि-

“One of the serious complaints against the system of education which has prevailed in this country for over a century is that it neglected India’s past, that it did not provide the Indian students with a knowledge of their own culture. It has produced in some cases the feeling that we are without roots, in others, what is worse, that our roots bind us to a world very different from that which surrounds us.”

“The chief source of spiritual nourishment for any people must be its own past perpetually rediscovered and renewed. A society without a knowledge of the past which has made it would be lacking in depth and dignity.”

“It was assumed that education should not stop with the development of intellectual powers but must provide the student, for the regulation of his personal and social life, a code of behavior based on fundamental principles of ethics and religion. Where conscious purpose is lacking, personal integrity and consistent behavior are not possible.”

इससे सिद्ध होता है कि आध्यात्मिकता यही भारतीय चिंतन का आधार है। उसी के प्रकाश में शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। परंतु कांग्रेस के शासन काल में, उन्हीं के द्वारा नियुक्त शिक्षा आयोगों की अनुशंसाओं (recommendations) को लागू नहीं किया गया। शिक्षा आयोग का गठन करने वाले कांग्रेस के ही नेता थे। फिर भी उस आयोग की अनुशंसा को लागू करने से रोकने वाले कौन लोग थे, कौनसी मानसिकता थी? आज भी उस दिशा में जब प्रयास होते हैं तो उसे शिक्षा का भगवाकरण के नाम पर विरोध किया जाता है। इसके पीछे की मानसिकता क्या है – इसका विश्लेषण होना आवश्यक है।

भारत की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है यह निर्विवाद तथ्य है और संस्कृत ही है जो सभी भारतीय भाषा-भाषियों को सरलता से समझ में आती है। जैसे, मलेशिया में तमिल भाषी भारतीय बड़ी संख्या में हैं। वहाँ के हिंदू  स्वयंसेवक संघ के प्रचारक श्री रामचन्द्रन तमिल भाषी है। संघ शिक्षा वर्ग के दोनों वर्षों का उनका प्रशिक्षण तमिलनाडु प्रांत में हुआ। तृतीय वर्ष के लिए(25 दिन) वे नागपुर गए। वहाँ सभी बौद्धिक हिंदी में ही होते थे जो उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आते थे। बाद में जब तमिल भाषी शिक्षार्थियों के लिए तमिल में उनका अनुवाद होता था तभी वे उसे समझते थे। उन्होंने मुझे बताया कि 25 में से केवल एक ही  बौद्धिक उद्बोधन  वे सीधा(बिना अनुवाद के) समझ सके क्यों कि वह संस्कृत में हुआ था। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं से नज़दीक है इसका यह ज्वलंत  प्रमाण है। भारत रत्न डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर समेत तत्कालीन अनेक नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि भारत में सभी को संस्कृत की शिक्षा दी जाए। भारत के ज्ञान का सारा खजाना संस्कृत में है और सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से नज़दीक है, संस्कृत से ही निकली है। भारतीय एकात्मकता के बोध के लिए भी यह उपयुक्त है। परंतु किस मानसिकता के कारण इस महती सुझाव को नहीं स्वीकारा गया?

दुनिया के सभी शिक्षाविद मानते हैं कि बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। नए विषय समझने के लिए और बालक के मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा मातृभाषा में होना आवश्यक है। अच्छी अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए सभी विषय अंग्रेज़ी में सीखना आवश्यक नहीं है। दुनिया के केवल 9% लोग ही अपनी मातृभाषा से अलग अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत ऐसे कुछ देशों में आता हैं। सभी विषयों की शिक्षा अंग्रेज़ी में देने के नाम पर अपने यहाँ अंग्रेज़ी का वर्चस्व इतना बढ़ा दिया गया कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वालों के मन में एक हीनता का भाव निर्माण होता दिखता है। यह भारत के “स्व” भाव के विपरीत है। महात्मा गांधी जी समेत अनेक चिंतकों द्वारा मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा पर बल देने के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि इस बात की अनदेखी की गयी?

बहुत दीर्घकाल तक भारत सम्पन्न था, विश्व व्यापार में भारत का सहभाग सर्वाधिक था। हम अनाज नहीं बेचते थे। चमड़ा, धातु, लकड़ी, पत्थर की बनी वस्तुएँ, कपड़ा, मसाले, हीरे  आदि के व्यापार के लिए भारतीय दुनिया भर में जाते रहे हैं। इसलिए भारत कृषिप्रधान देश था ऐसा कहने के स्थान पर भारत उद्योग प्रधान देश था यह कहना अधिक उचित होगा। ये सारे उद्योग घर-परिवार  में होते थे और ये परिवार ग्रामीण भारत में रहते थे। भारत के ग्राम समृद्ध होते थे। लेकिन यूरोप के प्रभाव के कारण भारत ने स्वाधीनता के पश्चात् शहर केंद्रित विकास की दिशा पकड़ ली। शहरों में भीड़, स्पर्धा, अपराध और आपसी सम्बन्धों का बिखराव बढ़ता गया और ग्राम उपेक्षित, पिछड़े, सुविधा विहीन होने लगे। शहर में बसना प्रतिष्ठा का और ग्रामीण भाग में बसना पिछड़ेपन का लक्षण माना गया। यांत्रिक युग के कारण अधिकाधिक लाभ कमाने के मोह के मकड़जाल में मनुष्य फँसता चला गया।

भारतीय जीवन की विशेषता यह रही है कि भारत ने भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास दोनों को समान महत्व दिया है, किसी एक को नहीं। ईशावास्य उपनिषद में एक श्लोक में स्पष्ट कहा है कि जो केवल भौतिक समृद्धि के पीछे दौड़ता है वह गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उसी श्लोक में आगे कहा है कि जो केवल आध्यात्मिक साधना में रत रहता है वह और गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उपनिषद आगे कहता है कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति दोनों को साथ साथ साधना ही जीवन है। इन दोनों को एकसाथ साधने का योग्य परिवेष ग्रामीण जीवन में है। ग्राम में आय कम है पर व्यय भी कम है। इसलिए अच्छा जीवन जीने तथा कमाने के लिए बहुत दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है। कमाने के साथ साथ आध्यात्मिक साधना के लिए पर्याप्त समय और योग्य परिवेष, वातावरण ग्रामीण जीवन में हैं। इसलिए स्वाधीन भारत की विकास यात्रा की दिशा ग्रामीण विकास की हो यह महात्मा गांधी भी चाहते थे। उनका “हिंद स्वराज” मुख्यतः इसी पर केंद्रित है। संविधान को स्वीकार करते समय भी – 19 से 22 नवंबर 1948 की चर्चा में संविधान सभा ने यही अपेक्षा व्यक्त की थी कि जल्द ही हम ग्राम स्वराज के पथ पर अग्रसर होंगे।। परंतु पश्चिम के समाजवाद और पूंजीवाद के द्वंद्व में फसकर हम अपना समावेशी और पर्यावरण पूरक विकास का रास्ता भूल गए। ग्रामीण भारत में शहरों की सभी सुविधाएँ दिए जाने का आग्रह पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम का भी था। समृद्ध, सुखी, निरामय और आध्यात्मिक साधना में रत ऐसा जीवन जीना यही जीवन है यह भारत का विशिष्ट विचार रहा है और भारत की पहचान भी। यही भारत के “स्व” की अभिव्यक्ति है। यह दिशा हम ने क्यों नहीं ली?

स्वदेशी समाज में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि “welfare state यह पश्चिम की कल्पना है, भारतीय नहीं। परम्परा से भारतीय समाज राज्यशक्ति पर कभी अवलम्बित नहीं था। वह समाज जो अपनी आवश्यकताओं के लिए राज्य पर कम से कम अवलम्बित है वह स्वदेशी समाज है।” परम्परा से केवल न्याय, विदेश सम्बंध और सुरक्षा ये विषय ही राज्य के अधीन होते थे। बाक़ी सभी विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, अर्थोत्पादन, संगीत, कला, मंदिर, कथा, मेले आदि सभी समाज के अधीन रहते थे”।

विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कहा कि “जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं, उस समाज में, ऐसे एकत्रित पारिश्रमिक की पूँजी के आधार पर समाज सम्पन्न- समृद्ध बनता है और समाज सम्पन्न- समृद्ध बना तो समाज का हर एक व्यक्ति सम्पन्न- समृद्ध बनता है। परंतु जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न दे कर अपने ही पास रखते हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो सम्पन्न- समृद्ध बनते हैं पर समाज दरिद्र रहता है”।

समाज को अपनेपन के भाव से देना, यह समाज का ही है, उसे लौटाना माने जीवन सार्थक होना ऐसा माना गया है। इसीलिए विवेकानंद केंद्र की प्रार्थना में कहा गया है –

जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोSधिकम् |

इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् ||

(अर्थ-जीवन में हम जितना स्वीकार करते हैं उससे अधिक लौटा सकें यह हमारी प्रार्थना हे भगवन! आप पूर्ण करो।)

समाज से हमें बहुत मिलता है उसे वापस लौटाना इसे ही धर्म कहा है। religion या उपासना इससे अलग है। उपासना धर्म के लिए होती है। धर्म का अर्थ है, प्रत्यक्ष आचरण करना, समाज को लौटाना। समाज को देना यह charity है और समाज को लौटाना यह धर्म है।भगिनी निवेदिता के अनुसार सामाजिक पूँजी को समृद्ध करना यही धर्म है। और धर्म भेदभाव नहीं करता है, वह सभी को जोड़े रखता है, सहायता करता है, साथ बाँधे रखता है। यही स्वदेशी समाज का आधार है।

स्वाधीनता के समय भारत के निर्माताओं के मन में यह “धर्म” भाव स्पष्ट रहा होगा। इसीलिए भारत की लोकसभा में “धर्मचक्र प्रवर्तनाय’ लिखा है। राज्य सभा में ”सत्यं वद धर्मं चर ”, उच्चतम न्यायालय का बोधवाक्य “यतो धर्मस्ततो जयः” और भारत के राष्ट्रध्वज पर जो चक्र अंकित है वह “धर्मचक्र” है। चक्र घूमने के लिए ही होता है। समाज को लौटाने का प्रत्येक छोटा सा प्रयास धर्मकार्य है और ऐसे छोटे छोटे प्रयासों से धर्मचक्र चलता है, गतिमान होता है, प्रवर्तमान रहता है।

लोकसभा, राज्यसत्ता, उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रध्वज जैसे प्रमुख स्थानों पर जिस “धर्म” का स्पष्ट महत्वपूर्ण उल्लेख है उस “धर्म” की कहीं कोई चर्चा नहीं है। बल्कि धर्म की बात करना साम्प्रदायिक (कम्यूनल) माना जाने लगा है। और जिस secularism को चर्चा करने के पश्चात भारतीय संविधान में स्थान नहीं देने का सर्वानुमति से निर्णय लिया गया फिर भी उसे चुपके से किसी भी प्रकार की चर्चा – बहस किए बिना  संविधान के preamble में ( जो कि अपरिवर्तनीय है ऐसा संविधान ही कहता है) ज़बरदस्ती से समाविष्ट किया गया।  उस secularism जैसे अभारतीय शब्द के अर्थ को परिभाषित किए बिना ही उसका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।

ये सब किस मानसिकता की उपज है?  इसका विचार करना होगा। उस अभारतीय मानसिकता से उबरकर शुद्ध भारतीय विचार को प्रतिष्ठित करने से ही अबतक नकारा गया भारत का “स्व” पूर्णार्थ से, अपने पुरुषार्थ से पूर्ण प्रकाशमान होगा तभी भारत अपने स्व-गौरव के साथ मज़बूती से अपना वैश्विक कर्तव्य पूर्ण करने के लिए तत्पर होगा।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह हैं)

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसह सरकार्यवाहnationrecognize and assimilate our selfडॉ. मनमोहन वैद्य
डाॅ. मनमोहन वैद्य
डाॅ. मनमोहन वैद्य
अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, रा.स्व. संघ [Read more]
Share1
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

RSS Akhil Bharatiya Sampark Pramukh Ramlal Speech Aligarh Keshav Seva Dham Northeast Children Panchjanya

“संघ ने पूर्वोत्तर को मुख्यधारा से जोड़ने में निभाई प्रमुख भूमिका”: रामलाल जी

RSS Blood Donation Camp Haridwar Poster Release Yatindra Nagyan Gyanesh Thakral Panchjanya

डेंगू के प्रकोप के बीच हरिद्वार में RSS का बड़ा कदम: 4 अक्टूबर को विशाल रक्तदान शिविर, युवाओं से महादान की अपील!

RSS Centenary Year Gorakhpur Prant Pracharak Ramesh Speech Panchjanya

RSS Centenary Year: संघ की शताब्दी यात्रा सेवा और संस्कार का आधार, गोरखपुर में बोले प्रान्त प्रचारक रमेश

संघ पर लगे आरोपों से लेकर वंदे मातरम तक, श्री वी भागैय्या ने रखी अपनी बात

भारतीय किसान संघ के महिला किसान कार्यकर्ता सम्मेलन में मंच पर पदाधिकारी।

‘हम भारत की नारियां वैभव लायेंगी’: दिल्ली में दिखा महिला किसानों का बुलंद हौसला, भारतीय किसान संघ ने किया सम्मान

सुशासन संवाद मुबंई में बोलते वी भागैय्या जी

सुशासन संवाद मुंबई: विश्वबंधुत्व से विश्वगुरु तक, संघ का वैश्विक दृष्टिकोण और हिन्दुत्व का संदेश

Load More

ताज़ा समाचार

Late. Ashok Singhal Ji

अशोक सिंघल के सपनों को साकार करने का संकल्प

सीबीआई पूर्व डायरेक्टर एम. नागेश्वर राव ने वाराणसी में लॉन्च की सर्वजन सनातन पार्टी, बताए पार्टी के चार मुख्य स्तंभ

‘मुस्लिम को-पायलट ने पहले पढ़ी नमाज…कर दिया हमला’: स्मित मच्छार ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू को बताई उस दिन की घटना

उत्तराखंड चुनाव: सुशासन की रणनीति से भाजपा लगाएगी जीत की हैट्रिक – राम माधव

मिग-21 रिटायरमेंट के बाद गैप भरने के लिए हर साल 36-40 विमान जरूरी: वायुसेना प्रमुख

एनसीईआरटी ने सिलेबस में किया बदलाव। दिल्ली सल्तनत और मुगलों की जगह भारतीय नायकों को दिया स्थान।

NCERT में दिल्ली सल्तनत और मुगलों का इतिहास घटा, भारतीय स्वाभिमान बढ़ा: क्यों तिलमिलाया लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम?

बांग्लादेश: तंगेल के मिर्जापुर में दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच मां दुर्गा समेत सात मूर्तियां तोड़ी गईं

नेतन्याहू ने कैप्टन स्मित मच्छार को हीरो बताया, इजरायल स्वतंत्रता दिवस पर मशाल जलाने का दिया निमंत्रण

कैप्टन स्मित मछार

बड़ा खुलासा: फ्लाईदुबई को-पायलट ने कैप्टन पर क्रैश एक्स से हमला कर विमान गिराने की कोशिश की

आज का श्लोक : आत्म साक्षात्कार करना क्यों है जरूरी?

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies