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मुंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं

हरियाणा में कांग्रेस नेतृत्व को भूपेंद्र सिंह हुड्डा परिवार के आगे दूसरा नेता नहीं दिखाई देता है। और पुत्र मोह में पड़े हुड्डा हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ते देखना नहीं चाहते।

Written byअजय दीप लाठरअजय दीप लाठर
Jul 10, 2022, 08:30 am IST
in हरियाणा

हरियाणा में कांग्रेस नेतृत्व को भूपेंद्र सिंह हुड्डा परिवार के आगे दूसरा नेता नहीं दिखाई देता है। और पुत्र मोह में पड़े हुड्डा हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ते देखना नहीं चाहते। नतीजा, 2005 से अब तक कई दिग्गज नेता पार्टी छोड़ कर चले गए, जो बचे हैं वे हुड्डा से लड़ने में खर्च हो रहे हैं 

हरियाणा में कांग्रेस भूपेंद्र हुड्डा के भरोसे है। लंबे समय से पार्टी हुड्डा के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। पार्टी में गुटबाजी है और नेताओं में आगे बढ़ने की होड़ है, लेकिन उनकी राह की सबसे बड़ी बाधा हैं हुड्डा। वे अपने बेटे को प्रदेशाध्यक्ष नहीं बनवा सके, लेकिन अपने करीबी उदयभान को यह पद दिलाने में सफल रहे। इससे कुलदीप बिश्नोई नाराज हो गए। किरण चौधरी और कुमारी शैलजा से हुड्डा की पुरानी अदावत जगजाहिर है। इस गुटबाजी और खींचतान का खामियाजा पार्टी के वरिष्ठ नेता अजय माकन को चुकाना पड़ा।

पार्टी नेतृत्व से मिली खुली छूट के बावजूद कांग्रेस को ऊंचाई पर ले जाने के बजाए हुड्डा ने एक बार फिर उसे गर्त में धकेल दिया। एक माह के भीतर दो घटनाक्रम ऐसे घटे, जिनमें कांग्रेस को राज्य में मुंह की खानी पड़ी। पहला, पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद राज्यसभा चुनाव में अजय माकन की हार और दूसरा शहरी निकाय चुनाव में हुड्डा का गढ़ माने जाने वाले रोहतक, झज्जर और सोनीपत जिलों में भाजपा की जीत। ये दो घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी हैं कि पार्टी और प्रदेश में हुड्डा की पकड़ मजबूत नहीं रही।

हुड्डा के नेतृत्व में डूबती गई कांग्रेस
किस्मत के धनी भूपेंद्र सिंह हुड्डा की झोली में कांग्रेस ने 2005 में मुख्यमंत्री पद डाल दिया था। उस समय कांग्रेस ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा गया, उसे दरकिनार कर पार्टी ने तत्कालीन लोकसभा सांसद हुड्डा को मुख्यमंत्री बना दिया। सत्ता में रहते हुए हुड्डा ने पार्टी के गिरते ग्राफ को भांपा और 6 माह पहले अक्तूबर 2009 में विधानसभा चुनाव करवा लिया। हुड्डा के नेतृत्व में पार्टी को 40 सीटें ही मिलीं। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजनलाल और उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) को तोड़कर वे दोबारा मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।

2014 में फिर से हुड्डा के नेतृत्व में पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ा और महज 15 सीटों पर सिमट गई। हालत यह हो गई कि प्रमुख विपक्षी दल बनने के लिए कांग्रेस के पास पर्याप्त विधायक नहीं थे। कांग्रेस को 15 में से 10 सीटें रोहतक, झज्जर और सोनीपत से मिली थीं। चुनाव में हुड्डा के कई करीबी बुरी तरह हार गए, वहीं किरण चौधरी और रणदीप सिंह सुरजेवाला अपने दम पर जीतने में सफल रहे।

2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद हुड्डा परिवार की क्षीण होती लोकप्रियता उजागर हो गई। हुड्डा सोनीपत और उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा रोहतक से अपनी परंपरागत सीट से हार गए। हालांकि कांग्रेस ने लगातार दलित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, जिसका लाभ 2019 के विधानसभा चुनाव में मिला और पार्टी 31 सीटें जीतने में सफल रही। इसके बावजूद हाईकमान ने हुड्डा पर ही भरोसा जताया और उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया।

2014 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार शिकोहपुर, गुड़गांव भूमि सौदे में भ्रष्टाचार में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की संलिप्तता रही। इसे लेकर नेहरू-गांधी परिवार विपक्ष के निशाने पर था। इसका कारण भी भूपेंद्र हुड्डा ही थे। अपने राजनीतिक लाभ और नेहरू-गांधी परिवार की निगाहों में बने रहने के लिए हुड्डा ने रॉबर्ट वाड्रा को झांसे में लिया। राजनीति के जानकार अक्सर कहते भी हैं कि हुड्डा ने ही मोटे मुनाफे का लालच देकर जमीन सौदों में वाड्रा को उतारा। गुड़गांव के खेड़की दौला पुलिस थाने में इस सिलसिले में मामला भी दर्ज किया गया, जिसमें रॉबर्ट वाड्रा के साथ हुड्डा को भी आरोपी बनाया गया।

बड़े नेताओं को निपटाया
हुड्डा ने प्रदेश में किसी भी नेता को आगे नहीं बढ़ने दिया। वे साढ़े 9 साल मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने कई बड़े नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया। उन्हें या तो अपमानित किया गया या उनकी बातों को अनसुना किया। इस कारण कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेता और कार्यकर्ता पार्टी छोड़ गए। दरअसल, हुड्डा नहीं चाहते कि पार्टी का कोई दूसरा नेता भविष्य में उनके समकक्ष पहुंचे। इनमें राव इंद्रजीत सिंह, चौधरी बीरेंद्र सिंह, डॉ. अशोक तंवर, कुमारी शैलजा, किरण चौधरी, कैप्टन अजय सिंह यादव, चौधरी धर्मबीर सिंह, रमेश कौशिक, अवतार सिंह भड़ाना, जितेंद्र सिंह मलिक सरीखे रसूखदार नेता शामिल है।

इन्होंने 2005 में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनके अलावा भी कई नेता थे, अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए धीरे-धीरे पार्टी से किनारा करते चले गए। जो बच गए, वे अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो हुड्डा ने कांग्रेस के तमाम गैर जाट नेताओं को दरकिनार कर दिया। साथ ही, उन जाट नेताओं की भी अनदेखी की, जिनके परिवार का राजनीतिक कद कहीं न कहीं हुड्डा परिवार से बड़ा साबित हो सकता था।

सवाल उठता है कि क्या भूपेंद्र सिंह हुड्डा पार्टी नेतृत्व के लिए मजबूरी बन गए हैं? हुड्डा से वरिष्ठ कुमारी शैलजा (शैलजा 1992 में केंद्र में मंत्री रहीं) को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर कम अनुभवी उदयभान को कुर्सी पर बैठाना, रोहतक जैसी परंपरागत सीट से लोकसभा चुनाव हारने वाले दीपेंद्र को तमाम वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी कर राज्यसभा भेजना, सुरजेवाला को राज्यसभा में सुरक्षित पहुंचाने के लिए राजस्थान भेजना कहीं न कहीं इस ओर इशारा करते हैं कि वजह जो भी हो, हुड्डा शीर्ष नेतृत्व के लिए मजबूरी से कम नहीं हैं।

हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे फूलचंद मुलाना की गिनती हुड्डा के करीबियों में होती थी। इसका लाभ उठाते हुए हुड्डा ने सरकार के साथ संगठन पर भी अपनी पकड़ मजबूत की। आज अगर कांग्रेस के पास प्रदेश स्तर का कोई गैर जाट, गुर्जर और ओबीसी नेता नहीं है तो इसका कारण हुड्डा ही हैं।

नया मोहरा उदयभान
हुड्डा ने 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। हुड्डा समर्थकों ने तो दिल्ली में तंवर पर हमला भी किया, जिसमें दिल्ली पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज की थी। तंवर के जाने के बाद कुमारी शैलजा प्रदेश अध्यक्ष बनीं। वह भी दलित समुदाय से थीं। तंवर की मेहनत का लाभ पार्टी को विधानसभा चुनाव में मिला और कांग्रेस की सीट 15 से बढ़कर 31 हो गई। इससे पार्टी में शैलजा का कद बढ़ा, जो हुड्डा को हजम नहीं हो रहा था। लिहाजा, उन्होंने शैलजा की राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए।

तंवर की तरह सैलजा को भी हुड्डा ने पार्टी में नियुक्तियां नहीं करने दी। राज्यसभा में शैलजा को दोबारा जाने नहीं दिया और लॉबिइंग कर अपने बेटे दीपेंद्र को राज्यसभा भिजवा दिया। यही नहीं, वे शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटाने में भी सफल भी रहे। वे आखिरी समय तक अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को प्रदेश की कमान दिलाने के लिए प्रयास करते रहे। लेकिन जब विरोधियों ने ऐसा नहीं होने दिया तो मजबूरी में पार्टी नेतृत्व को उदयभान का नाम आगे करना पड़ा। तंवर और शैलजा की तरह उदयभान भी दलित समुदाय से हैं।

पार्टी नेतृत्व शैलजा को हटाकर दलित वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहता था। उदयभान मूलत: न तो कांग्रेसी हैं, न उनकी पहचान बड़े कांग्रेस नेता की है और न ही दलित नेता की। पलवल जिले में होडल और हसनपुर विधानसभा क्षेत्र के बाहर उन्हें कोई नहीं जानता। उदयभान की पहचान तो उनके पिता गयालाल की वजह से है। गयालाल भी विधायक रहे हैं और हरियाणा की राजनीति में दलबदल के पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। एक दिन में सबसे ज्यादा बार पार्टी बदलने का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है। उदयभान की पहचान हुड्डा की छत्रछाया में काम करने वाले नेता की है। कांग्रेस में आने से पहले वे लोकदल, जनता पार्टी में रह चुके हैं। वे 1987 में लोकदल, 2000 में निर्दलीय और 2005 व 2014 में कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा पहुंचे।

सुरजेवाला निकले समझदार
राज्यसभा चुनाव में 31 विधायकों वाली कांग्रेस को एक सीट मिलना तय था। लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने जोखिम नहीं उठाया और राजस्थान कूच कर गए और आसानी से राज्यसभा पहुंच गए। वह जानते थे कि हुड्डा ऐसा चक्रव्यूह रच देंगे, जिसे तोड़ना उनके लिए आसान नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस हाईकमान की ओर से भेजे गए अजय माकन उतने समझदार नहीं निकले। लिहाजा, वे चक्रव्यूह में फंस गए। हुड्डा ने माकन और पार्टी हाईकमान को दिखाने के लिए 29 विधायकों को पहले रायपुर पहुंचाया, फिर मतदान के लिए सीधे विधानसभा ले गए।

इधर, कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य कुलदीप बिश्नोई लगातार राहुल गांधी से मिलने का समय मांगते रहे, लेकिन हुड्डा के शुभचिंतक पार्टी के बड़े नेताओं ने यह मुलाकात होने ही नहीं दी। नतीजा, बिश्नोई ने ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर निर्दलीय प्रत्याशी कार्तिकेय शर्मा को वोट दे दिया और अन्य विधायक का वोट रद्द हो गया। जीत की उम्मीद संजोये माकन हार गए। एक वोट जो रद्द हुआ, उसका ठीकरा हुड्डा ने अपनी विरोधी किरण चौधरी के सिर फोड़ना चाहा जो स्वास्थ्य कारणों से रायपुर नहीं गई थीं। लेकिन किरण की ओर से कानूनी कार्रवाई की धमकी के बाद हुड्डा खेमे को अपने पैर खींचने पड़े।

किरण चौधरी और कांग्रेस के सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि जो वोट रद्द हुआ, वह हुड्डा का ही खास माना जाने वाला विधायक ही है। दिलचस्प बात यह है कि यह विधायक बाकायदा रायपुर में पूरे समय मौजूद रहा। लेकिन हुड्डा पिता-पुत्र ने एक बार भी उसका नाम नहीं लिया। इस मुद्दे पर हुड्डा बस यही कहते रहे कि वे जिन 29 विधायकों को लेकर रायपुर गए थे, उन्होंने माकन को वोट दिए।

हुड्डा के गढ़ में सेंध
भूपेंद्र सिंह हुड्डा रोहतक, सोनीपत और झज्जर को अपने प्रभाव क्षेत्र के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन राज्यसभा चुनाव की रार अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि इन इलाकों में हुए शहरी निकाय चुनावों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। रोहतक नगर निगम पर पहले ही भाजपा का मेयर काबिज हैं और अब चुनाव में रोहतक जिले की महम नगर पालिका में भाजपा-जजपा गठबंधन का चेयरमैन चुना गया है। इसी तरह झज्जर जिले की झज्जर नगर पालिका व बहादुरगढ़ नगर परिषद चेयरमैन के पद पर भाजपा ने कब्जा कर लिया है। सोनीपत जिले की गोहाना नगर परिषद, कुंडली और गन्नौर नगर पालिका पर भी भाजपा के ही चेयरमैन चुने गए हैं। यानी यहां भी हुड्डा का दावा खोखला निकला।

सवाल उठता है कि क्या भूपेंद्र सिंह हुड्डा पार्टी नेतृत्व के लिए मजबूरी बन गए हैं? हुड्डा से वरिष्ठ कुमारी शैलजा (शैलजा 1992 में केंद्र में मंत्री रहीं) को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर कम अनुभवी उदयभान को कुर्सी पर बैठाना, रोहतक जैसी परंपरागत सीट से लोकसभा चुनाव हारने वाले दीपेंद्र को तमाम वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी कर राज्यसभा भेजना, सुरजेवाला को राज्यसभा में सुरक्षित पहुंचाने के लिए राजस्थान भेजना कहीं न कहीं इस ओर इशारा करते हैं कि वजह जो भी हो, हुड्डा शीर्ष नेतृत्व के लिए मजबूरी से कम नहीं हैं। इसलिए कांग्रेस जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार कर हुड्डा परिवार तक ही खुद को सीमित रखना चाहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Topics: भूपेंद्र सिंह हुड्डा परिवारडूबती गई कांग्रेसउदयभान
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