तानाशाही से बचने को चीनी कर रहे पलायन, पिछले दस साल में सात लाख से ज्यादा जा बसे विदेश में
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तानाशाही से बचने को चीनी कर रहे पलायन, पिछले दस साल में सात लाख से ज्यादा जा बसे विदेश में

एनजीओ 'सेफगार्ड डिफेंडर्स' की रिपोर्ट बताती है कि उइगर मुसलमानों ही नहीं, चीन अपने राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों, मानवाधिकारों की बात करने वालों का जीना मुहाल कर देता है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jul 6, 2022, 02:00 pm IST
in विश्व
चीन में कम्युनिस्ट राज से त्रस्त हैं आम चीनी (प्रतीकात्मक ​चित्र)

चीन में कम्युनिस्ट राज से त्रस्त हैं आम चीनी (प्रतीकात्मक ​चित्र)

कम्युनिस्ट शासित चीन में चीजें भले ही संभली हुई दिखती या दिखाई जाती हों, लेकिन सच यह है कि वहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तानाशाही से लोग त्रस्त हैं। इस बात की पुष्टि वहां से आए आंकड़े खुद कर रहे हैं। हालांकि दुनिया में चीन ने अपने दुष्प्रचार से भले अपनी ‘विकसित’ तस्वीर दिखाई हो, लेकिन असल में तो ​गुजरे 10 साल में वहां से 7 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि कम्युनिस्ट सत्ता के शिखर पर बैठे शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन को भले ही सामरिक दृष्टि से बहुत मजबूत किया है। लेकिन इस कालखंड में सरकारी दमन का जो चक्र चला है उससे लाखों लोग खुद को दमन का शिकार महसूस कर रहे हैं।

चीन के तानाशाह राष्ट्रपति शी जिनपिंग

चीनी शासकों की नजर इस मुद्दे पर बहुत पहले से है। इसीलिए विदेशों से उसने अपने बहुत से नागरिकों को ‘डीपोर्ट’ भी कराया है। हालांकि लोग चीन लौटकर नहीं आना चाहते, लेकिन उन्हें जबरन ‘डीपोर्ट’ होना पड़ रहा है।

राष्ट्रपति जिनपिंग के तानाशाही राज से खुद को बचाने के लिए लोग विदेशों में शरण मांगने को मजबूर हैं और आंकड़ों की बात करें तो इधर 10 साल में 7 लाख 30 हजार से ज्यादा चीनी अमेरिका सहित अन्य देशों में बस चुके हैं। देखने में यह भी आया है कि चीन छोड़कर जाने वालों में सबसे ज्यादा लोग अमेरिका गए हैं। अमेरिका के बाद ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, यूूके और दक्षिण कोरिया का नंबर आता है।

इस विषय पर ‘हांगकांग पोस्ट’ की रिपोर्ट काफी रोशनी डालती है। इस समाचार पत्र के अनुसार, गत दस वर्ष में यानी 2012 से 2022 में अभी तक करीब साढ़े सात लाख लोग विदेशों में शरण मांग चुके हैं। लेकिन सभी की अपील स्वीकारी नहीं गई है, क्योंकि उसमें से कुल एक लाख 70 हजार लोगों को ही शरण के लिए स्वीकृति मिली है।

पता चला है कि अमेरिका ने सबसे ज्यादा 88,722 अर्जियां स्वीकारी हैं। शोध करने वाली एक एनजीओ है ‘सेफगार्ड डिफेंडर्स’। इसके अनुसंधानकर्ता जिंग जी चेन इस मामले पर कहते हैं कि प्राप्त डाटा बताता है कि पिछले दिनों चीन में लागू जीरो कोविड नीति और कड़े लॉकडाउन के बहाने सरकार ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। लोग कैसे भी शंघाई आदि शहरों से निकलकर दूसरे देश जा बसने को उतावले थे।

चीन छोड़कर जाने के लिए चीनियों को सबसे पहले अमेरिका ही दिखता रहा है। इसलिए शरण मांगने के सबसे ज्यादा अनुरोध अमेरिका से किए जाते हैं। लोग इस कोशिश में रहते हैं कि कैसे भी अमेरिका की नागरिकता हासिल हो जाए, बस। चेन कहते हैं कि चीन से अमेरिका जा बसने की तमन्ना पाले लोग तरह—तरह के रास्ते अपनाते की जुगत करते हैं, कुछ विदेश में शिक्षा के लिए जाने की बात करते हैं तो कुछ निवेश वीसा पर, और कुछ तो नागरिकता कार्ड लेकर देश छोड़ने को तैयार बैठे रहते हैं।

लेकिन क्या चीन की कड़ी सत्ता इस विषय में कुछ नहीं कर रही? ऐसा नहीं है, चीनी शासकों की नजर इस मुद्दे पर बहुत पहले से है। इसीलिए विदेशों से उसने अपने बहुत से नागरिकों को ‘डीपोर्ट’ भी कराया है। हालांकि लोग चीन लौटकर नहीं आना चाहते, लेकिन उन्हें जबरन ‘डीपोर्ट’ होना पड़ रहा है। इस मामले में चीन की सरकारी एजेंसियां निगरानी कार्यक्रम के अंतर्गत देश छोड़कर जाने वालों पर नजर रखती हैं और उन्हें न जाने को लेकर प्रताड़ित करती हैं।

रूशन अब्बास: अमेरिका में रहकर चीन के दमन के विरुद्ध एक सशक्त आवाज उठा रहीं उइगर

उइगर एक्टिविस्ट रूशन अब्बास की पीड़ा को कौन नहीं जानता। वे वर्षों से अमेरिका में रहकर चीन में प्रताड़ित किए जा रहे उइगरों के मानवाधिकारों और चीन की ज्यादतियों के विरुद्ध संघर्षरत हैं।

ठीक ऐसा ही मामला सिंक्यांग में दमन झेल रहे हजारों उइगरों के साथ हुआ है। कई ​परिवार अपने परिजनों को चीनी प्रताड़ना से बचाने के लिए किसी तरह विदेश भेजते रहे हैं। तुर्किए यानी तुर्की में जा बसे हजारों उइगरों को चीन ने कुछ समय पहले ​’डीपोर्ट’ कराया था। ऐसे उइगरों का पता लगाकर चीन उन्हें वापस लौटने को मजबूर करके उन्हें देश छोड़कर जाने का कथित दंड देता है। ऐसे कई उइगर अमेरिका में हैं और वहां रहकर उइगरों की मुक्ति के अभियान चला रहे हैं। उइगर एक्टिविस्ट रूशन अब्बास की पीड़ा को कौन नहीं जानता। वे वर्षों से अमेरिका में रहकर चीन में प्रताड़ित किए जा रहे उइगरों के मानवाधिकारों और चीन की ज्यादतियों के विरुद्ध संघर्षरत हैं।

अपने इस प्रयास में चीन अनेक बार कानूनी कायदों को भी ताक पर रखता रहा है। वह संबंधित देश पर अपना राजनीतिक दबदबा दिखाता है। एनजीओ ‘सेफगार्ड डिफेंडर्स’ की पिछले साल की रिपोर्ट बताती है कि उइगर मुसलमानों ही नहीं अपने राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों, मानवाधिकारों की बात करने वालों पर चीन अपने सूत्रों से बराबर नजर रखता है और मौका आने पर उनका जीना मुहाल कर देता है। हांगकांग में हजारों लोकतंत्र समर्थक युवा कार्यकर्ता विदेश में शरण यूं ही नहीं लिए बैठे हैं। वहां राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के नाम पर किस तरह चीन का दमनकारी डंडा चला है, यह कोई छुपा तथ्य नहीं है।

Topics: asylumChinavisaAmericaxijinpingexodusdictatorship
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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