झारखंड : मॉब लिंचिंग विधेयक में कई त्रुटियां, राज्यपाल ने किया वापस
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झारखंड : मॉब लिंचिंग विधेयक में कई त्रुटियां, राज्यपाल ने किया वापस

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Mar 18, 2022, 06:58 am IST
in भारत, दिल्ली
यह विधेयक विधानसभा से पारित होने के बाद विपक्ष ने इसे झारखंड के जनजातीय समाज के लिए विरोधी बताते हुए कहा था कि सरकार तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इस विधेयक को लाई है।  

 

झारखंड विधानसभा में पिछले साल शीतकालीन सत्र के समय 21 दिसंबर को भीड़ हिंसा एवं मॉब लिंचिंग निवारण विधायक 2021 पारित किया गया था। इस विधेयक के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताते हुए झारखंड राज्य के राज्यपाल रमेश बैस ने हेमंत सरकार को वापस कर दिया है। 

राज्यपाल के अनुसार विधायक के हिंदी एवं अंग्रेजी संस्करण में भिन्नता है और इसमें सुधार करने को कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि धारा दो के उपखंड (1) के उपखंड 12 में गवाह संरक्षण योजना का जिक्र किया गया है। विधेयक के हिंदी संस्करण में इसका कोई जिक्र ही नहीं है। बता दें कि धारा दो में परिभाषाएं हैं। 

इसके बाद इस विधेयक के उपखंड 1 के उपखंड 6 में भीड़ की परिभाषा पर भी आपत्ति जताई है। कहा गया कि भीड़ की यह परिभाषा सुपरिभाषित कानूनी शब्दावली के अनुरूप नहीं है। दो या दो से अधिक व्यक्तियों के समूह को अशांत भीड़ नहीं कहा जा सकता है। इसी को लेकर राज्यपाल ने राज्य सरकार को भीड़ की परिभाषा पर दोबारा विचार करने को कहा है। 

बता दें कि यह विधेयक विधानसभा से पारित होने के बाद विपक्ष ने इसे झारखंड के जनजातीय समाज के लिए विरोधी बताते हुए कहा था कि सरकार तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इस विधेयक को लाई है। झारखंड के विधानसभा सदन में इस विधेयक पर कुल 19 संशोधन प्रस्ताव लाए गए थे जिसमें सिर्फ एक प्रस्ताव पर ही सदन में सहमति बनी थी। उसके बाद यह प्रस्ताव विधानसभा से पारित कर राज्यपाल के पास भेज दिया गया था। 

इस विधेयक के राज्यपाल के बाद भेजे जाने के बाद झारखंड के कई सामाजिक संगठनों के साथ भाजपा ने भी राज्यपाल से मिलकर इस विधायक की खामियों की जानकारी दी थी। जनजाति सुरक्षा मंच के संदीप उरांव ने भी राज्यपाल से मिलकर इस विधेयक पर रोक लगाने की मांग की थी। इसके लिए इनका एक प्रतिनिधिमंडल भी राज्यपाल से जाकर मिला था। उनका कहना था कि भीड़ हिंसा एवं मॉब लिंचिंग निवारण विधायक 2021 के अधिनियम में परिणत होने के पश्चात केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा निर्मित अधिनियमों में प्राप्त विभिन्न अधिकार एवं संरक्षण से जनजाति समाज वंचित हो जाएंगे। जनजातीय समाज के हितों के संरक्षण के लिए इस विधेयक पर रोक लगनी अति आवश्यक है।

विधेयक में क्या है प्रावधान 

  1. इस विधेयक में कहा गया है कि किसी ऐसी भीड़ द्वारा धार्मिक, रंगभेद, जाति, लिंग, जन्म स्थान या किसी अन्य आधार पर हिंसा करना मॉब लिंचिंग कहलाएगा। 
  2. इस घटना को दो या दो से अधिक लोगों द्वारा किया जाएगा तो वह मॉब लिंचिंग कहा जाएगा। इसमें दोषी पाए जाने वालों के लिए जुर्माना और संपत्ति कुर्की के अलावा 3 वर्ष से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त यह कानून शत्रुता पूर्ण वातावरण बनाने वालों के लिए 3 वर्ष तक कैद और जुर्माना की अनुमति देता है। शत्रुता पूर्ण वातावरण की परिभाषा में पीड़ित पीड़ित के परिवार के सदस्यों गवाह है या गवाह पीड़ित को सहायता प्रदान करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ धमकी या जबरदस्ती करना भी शामिल है
  3. यदि भीड़ हिंसा में पीडि़त की मृत्यु हो जाती है तो वहां दोषी को सश्रम आजीवन कारावास के साथ कम से कम पांच लाख रुपये से लेकर अधिकतम 25 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
  4. हल्का जख्मी होने पर दोषी व्यक्ति को किसी एक अवधि के लिए कारावास जो तीन वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है तथा एक लाख रुपये से तीन लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  5. भीड़ हिंसा में गंभीर रूप से जख्मी होने की स्थिति में आजीवन कारावास या अधिकतम दस वर्षों के लिए कारावास हो सकता है। इसके अलावा कम से कम तीन लाख से अधिकतम पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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