विकास-सुशासन के पथ पर राष्ट्रीय चेतना के सतत प्रवाह का जनादेश
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विकास-सुशासन के पथ पर राष्ट्रीय चेतना के सतत प्रवाह का जनादेश

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 13, 2022, 01:04 am IST
inभारत, दिल्ली
उत्तरप्रदेश में चुनाव से ठीक पूर्व तमाम छोटे-छोटे दलों एवं चेहरों को सामने रखकर जातीय अस्मिता को उभारने का जैसा प्रयास एवं प्रचार किया जा रहा था, उसे बहुसंख्यक समाज के हर वर्ग और जाति ने अपनी सूझ-बूझ से विफल एवं निरस्त कर दिया। परिणाम बताते हैं कि उनके लिए जातीय अस्मिता से अधिक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता रही।

प्रणय कुमार

पांच राज्यों के चुनाव-परिणामों के पश्चात चार में भाजपा और एक में आम आदमी पार्टी की सरकार बननी सुनिश्चित है। पंजाब को छोड़कर शेष किसी राज्य में सरकार विरोधी कोई लहर दिखाई नहीं दी। बल्कि उत्तरप्रदेश में तो 1985 के बाद पहली बार कोई मुख्यमंत्री वहां दुबारा शपथ लेने जा रहा है। उत्तराखंड में भी हर चुनाव के बाद सरकार बदलने का चलन था। भाजपा की यह जीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि तमाम समाचार-पत्रों, चैनलों एवं सोशल मीडिया से लेकर अभिव्यक्ति के अन्य अनेक मंचों व माध्यमों से भाजपा के विरुद्ध व्यापक जनाक्रोश होने का लगातार दावा किया जा रहा था। कभी कृषि कानून, कभी नागरिकता संशोधन बिल तो कभी पिछड़ों-दलितों-अल्पसंख्यकों की कथित उपेक्षा के नाम पर भारतीय जनता पार्टी को निरंतर कठघरे में खड़ा किया जा रहा था। जबकि चुनाव-परिणामों से बिलकुल स्पष्ट है कि इस बार जनता ने जाति-क्षेत्र-मज़हब जैसी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को तो पूरी तरह निरस्त किया ही है, इसके साथ-साथ किसान-आंदोलन एवं सीएए प्रतिरोध के नाम पर हुई हिंसक एवं अराजकतावादी राजनीति को भी सिरे से ख़ारिज किया है। 

जातीय अस्मिता से अधिक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता रही

उत्तरप्रदेश में चुनाव से ठीक पूर्व तमाम छोटे-छोटे दलों एवं चेहरों को सामने रखकर जातीय अस्मिता को उभारने का जैसा प्रयास एवं प्रचार किया जा रहा था, उसे बहुसंख्यक समाज के हर वर्ग और जाति ने अपनी सूझ-बूझ से विफल एवं निरस्त कर दिया। परिणाम बताते हैं कि उनके लिए जातीय अस्मिता से अधिक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता रही। ये चुनाव-परिणाम छोटी-छोटी अस्मिताओं के स्थान पर बड़ी एवं विराट अस्मिता या व्यापक पहचान से बहुसंख्यक समाज के लगभग सभी वर्गों एवं जातियों के गहरे जुड़े होने के ठोस एवं जीवंत प्रमाण हैं। नतीज़ों से साफ है कि स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी, ओमप्रकाश राजभर से लेकर जयंत चौधरी जैसे तमाम नेताओं और जातीय क्षत्रपों के दावों और बयानों को जनता ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया। इनमें से स्वामी प्रसाद मौर्या और धर्म सिंह सैनी तो अपनी सीट बचाने में भी विफल रहे। बल्कि विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पड़े भिन्न-भिन्न जातियों एवं वर्गों के मत-प्रतिशत व चुनाव-परिणाम से यह संदेश अवश्य निकलता है कि हर वर्ग एवं जाति की अपनी मौलिक एवं स्वतंत्र सोच होती है, अपनी-अपनी जाति पर गौरव रखते हुए भी हरेक को अपने सामूहिक हित-अहित, शत्रु-मित्र का सम्यक, संतुलित एवं सतत बोध रहता है।

भाजपा की सर्वसमावेशी नीति का परिणाम

विशेष रूप से उत्तरप्रदेश के जनादेश से तो और स्पष्ट  है कि किसी वर्ग या जाति-विशेष को निजी संपत्ति मानने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए और किसी गठबंधन को छोड़ने या जुड़ने  से पूर्व संबंधित दलों और नेताओं को अपने-अपने आधार मतदाता-वर्ग से सलाह-संपर्क एवं विचार-विमर्श अवश्य करना चाहिए। एक ओर जहां उत्तरप्रदेश में मायावती के परंपरागत वोट-बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली, वहीं दूसरी ओर पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को जनजाति चेहरा बता-जताकर प्रचारित-प्रसारित करने का कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिला। स्पष्ट है कि आम जनता या जाति-विशेष के लिए भी नेताओं के चेहरों-नारों-वादों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण किसी दल की नीति और नीयत रही। ज़मीन पर किया गया ठोस काम रहा, दुःख-सुख में साझेदारी रही। भाजपा की सर्वसमावेशी नीति और सर्वस्पर्शी विकास का ही परिणाम है कि उसे जाटव वर्ग के 34 और अनुसूचित जाति के 45 प्रतिशत से भी अधिक मत प्राप्त हुए।

बीजेपी की नीति एवं कार्यशैली पर जनता की मुहर

गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड एवं उत्तरप्रदेश में भाजपा को मिली आशातीत बढ़त एवं ऐतिहासिक जीत से यही सिद्ध होता है कि जनता ने विकास एवं सुशासन की उसकी नीति एवं कार्यशैली पर जीत की मुहर लगाई। लोक-कल्याणकारी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने एवं सीधे लाभार्थियों तक सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों को पहुंचाने का उसे अत्यधिक लाभ मिला है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मठता एवं सक्रियता, उनका निष्कलंक एवं पारदर्शी व्यक्तित्व, क़ानून-व्यवस्था से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करने वाले सख़्त एवं कठोर प्रशासक की उनकी स्वच्छ छवि, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिखाई गई उनकी तत्परता एवं संवेदनशीलता, कोविड के संकटकालीन दौर में स्वयं संक्रमित होने के बावजूद हर जिला-केंद्रों पर नियमित प्रवास एवं निरीक्षण,  दूसरे राज्यों में फंसे विद्यार्थियों एवं प्रवासी मजदूरों को सकुशल एवं सुरक्षित घर पहुंचाने के लिए दिखाई गई उनकी सक्रियता, तीनों लहर एवं लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा किए गए कार्य एवं लिए गए त्वरित व कल्याणकारी निर्णय, रिकॉर्ड वैक्सीनेशन, तुष्टिकरण के स्थान पर सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के नारे को यथार्थ के धरातल पर साकार करने हेतु किए गए गंभीर प्रयास एवं ईमानदार पहल, नाम-क़द, प्रभाव-पहुंच आदि को नजरअंदाज कर अपराधियों एवं बाहुबलियों पर नकेल कसने का साहस एवं संकल्प, परिवारवादी एवं जातिवादी राजनीति की उपेक्षा तथा राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर परंपरागत शैली की राजनीति से इतर बिलकुल स्पष्ट एवं दुर्लभ मुखरता व निर्द्वंद्वता आदि कारक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, परिणामदायी एवं निर्णायक सिद्ध हुए।

पुरुषों की तुलना में महिलाओं की निर्णायक भागीदारी 

शुभ संकेत है कि इन चुनावों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की निर्णायक भागीदारी रही। उत्तरप्रदेश में जहां पुरुषों का मत प्रतिशत 59.6 रहा, वहीं महिलाओं का 62.2,  75 में से 43 जिलों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया और जहां-जहां महिलाओं ने अधिक मतदान किया, वहां-वहां भाजपा को अधिक सीटें मिलीं। उन्होंने घर-परिवार या पति की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर अपनी  सुरक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार जैसे मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इन मुद्दों पर बेहतर काम करने वाले दल व नेता के प्रति अपना विश्वास जताया। उजाला, उज्ज्वला, जन-धन, आवास, मुफ़्त राशन जैसी योजनाओं को महिलाओं ने ख़ूब सराहा। मंदिरों और तीर्थस्थलों के चहुंमुखी विकास तथा सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम करने का भी भाजपा को विशेष लाभ मिला। क्षद्म पंथनिरपेक्षता एवं तथाकथित प्रगतिशीलता के नाम पर की जाने वाली पक्षपातपूर्ण एवं कथित 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' वाली बहु प्रचारित, चहुंओर प्रचलित बनावटी राजनीति के प्रति भी इस बार बहुसंख्यक समाज विशेष सतर्क, सचेत एवं सावधान दिखा। पृथक पहचान, जातीय अस्मिता एवं कथित पंथनिरपेक्षता की आड़ में फलने-फूलने वाले अपराध एवं भ्र्ष्टाचार को भी वह भली-भांति देखता-समझता आया है। इनके मिश्रण से तैयार 'रसायन' को 'गंगा-जल' से भी अधिक पवित्र बताकर भुनाने-रिझाने के चिर-परिचित व्यापार को भी वह ख़ूब समझता है। 

राहुल गांधी के बाद प्रियंका भी जनता का भरोसा जीतने में विफल

बहुधा राज्य और केंद्र के बीच चलने वाली खींचतान को भी जनता ने ख़ारिज कर डबल इंजन की सरकार में भरोसा जताना उचित एवं श्रेयस्कर समझा। यही कारण रहा कि पांच में से चार राज्यों में न केवल भाजपा पुनः सरकार बना रही है, बल्कि सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद उत्तरप्रदेश में उसके 1.6, गोवा में 1.3 तथा मणिपुर में 3.0 प्रतिशत वोट बढ़ गए। हां, यह सत्य है कि आम आदमी पार्टी की पंजाब की जीत ऐतिहासिक एवं उल्लेखनीय है। परंतु यह भाजपा से अधिक कांग्रेस के लिए चिंतनीय है। कांग्रेस को सोचना होगा कि वह गुटबाज़ी एवं भितरघात से कैसे पार पाए और अपने क्षेत्रीय नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर पार्टी को कैसे एकजुट रखे? राहुल गांधी के बाद अब प्रियंका गांधी भी अपने कार्यकर्त्ताओं का मनोबल बढ़ाने एवं जनता का भरोसा जीतने में विफल रही हैं। अतः कांग्रेस के समक्ष उसके केंद्रीय नेतृत्व को लेकर भी गंभीर संकट उपस्थित हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषक पंजाब जीतते ही आम आदमी पार्टी को भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, कुछ इसे प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे में आई कमी के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं, जो निराधार एवं सरलीकृत निष्कर्ष है। बल्कि तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा न केवल क़ायम है, बल्कि चुनाव-दर-चुनाव और बढ़ा है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश में कुल 32 रैलियां कीं, जिनका प्रभाव लगभग 200 सीटों पर था और उनमें से भाजपा ने 160 सीटें जीतीं यानी उनका स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत रहा। वहीं प्रियंका गांधी 150 सीटों पर सक्रिय रहीं, जिनमें कांग्रेस केवल 2 सीटें जीत पाई और उसका मत-प्रतिशत भी 2017 के 6.3 से घटकर 2.7 प्रतिशत रह गया।

अरविंद केजरीवाल भी कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाए

अरविंद केजरीवाल भी पंजाब को छोड़कर गोवा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाए। आम आदमी पार्टी ने चुनाव पूर्व इन राज्यों में भी जीत के बड़े-बड़े दावे किए थे। पंजाब की जीत में भी 'आप' के केंद्रीय नेतृत्व की तुलना में स्थानीय मुद्दे अधिक प्रभावी एवं निर्णायक रहे। सही मायने में यह आप की जीत की तुलना में कांग्रेस और अकाली दल जैसी पुरानी एवं स्थापित पार्टी की हार अधिक है। प्राइम टाइम राजनीतिक विश्लेषक भले ही इसे मानें या न मानें, पर सच यही है कि भाजपा का विकल्प बनकर उभरने के लिए आम आदमी पार्टी को अभी मीलों का सफ़र तय करना है, आरोप-प्रत्यारोप की अवसरवादी राजनीति का परित्याग करना है तथा मुफ़्त बिजली-पानी जैसे लोकलुभावन मुद्दों से आगे जाकर शासन का गंभीर एवं टिकाऊ स्वरूप (मॉडल) प्रस्तुत करना है। राष्ट्रव्यापी प्रसार के लिए समग्रतावादी सोच एवं सुस्पष्ट नीति के साथ-साथ स्वस्थ नीयत की भी महती आवश्यकता होती है। पंजाब एक सीमावर्त्ती प्रदेश है, समय-समय पर वहां अलगाववादी एवं आतंकवादी तत्त्व भी सिर उठाने की चेष्टा करते रहे हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कसौटी पर खरा उतरे बिना आम आदमी पार्टी या अरविंद केजरीवाल की स्वीकार्यता सीमित एवं संदिग्ध ही रहेगी, भले ही एजेंडा आधारित मीडिया इन्हें गंभीर, मजबूत एवं राष्ट्रव्यापी विकल्प बताकर क्यों न दिन-रात प्रस्तुत-प्रचारित करे।

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