रामकथा का मूलाधार हैं जगजननी सीता
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रामकथा का मूलाधार हैं जगजननी सीता

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Feb 24, 2022, 02:25 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
जगजननी मां सीता पूरी रामकथा का मूलाधार हैं। उनका समूचा व्यक्तित्व संयम, साधना, संतुलन, धैर्य, त्याग और आत्माराधना की प्राण ऊर्जा से उद्भासित है। माता सीता का विलक्षण व्यक्तित्व यूं प्रतीत होता है कि मानो पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो।

 

 पूनम नेगी 

भारत की जिन महान नारियों की यशोगाथा हमारी देवभूमि में सदियों से गाई जाती है, उनमें जगजननी मां सीता का पावन नाम सर्वोपरि है। रामचरितमानस के वंदना प्रसंग में मां सीता का परिचय प्रस्तुत करते हुए गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं- उछ्वव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम् सर्व श्रेयस्करीं सीतां नतोहं रामवल्लभाम्। यानी जो सारे संसार की उत्पत्ति, पालन-पोषण और संहार करने वाली हैं। क्लेश हरने वाली हैं, संपूर्ण मंगल को करने वाली हैं। राम जी की प्रिय ऐसी सीता को हम प्रणाम करते हैं। यही वजह है कि रामानुरागियों के विभिन्न संप्रदायों में मां सीता के प्रति अपूर्व अनुराग परिलक्षित होता है। 

जगजननी मां सीता पूरी रामकथा का मूलाधार हैं। उनका समूचा व्यक्तित्व संयम, साधना, संतुलन, धैर्य, त्याग और आत्माराधना की प्राण ऊर्जा से उद्भासित है। माता सीता का विलक्षण व्यक्तित्व यूं प्रतीत होता है कि मानो पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो। उनके आदर्श समय के साथ प्रकट होते रहे, उद्देश्य गतिशील होते रहे, सिद्धांत आचरण बनते थे और संकल्प साध्य तक पहुंचते रहे। उनके चिंतन, संभाषण, आचरण, पतिव्रत धर्म, मातृत्व, सेवाभाव आदि सद्गुणों की प्रकाश किरणें भारत की सनातन संस्कृति को सदियों से अनुप्राणित करती आ रही हैं। उनका बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक और चुंबकीय है, आंतरिक व्यक्तित्व उससे हजार गुणा निर्मल और पवित्र है।

माता सीता की जीवनयात्रा एक आदर्श नारी, पतिव्रता पत्नी, संस्कार संपन्न मातृत्व एवं अनूठे प्रेम व बलिदान की महागाथा है। जब श्रीराम को वनवास हुआ तो पति के मना करने के बावजूद सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ उनकी सहभागिनी बनकर यह तय करके वन के कंटकाकीर्ण मार्ग भरे मार्ग पर निकल पड़ीं। जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। उन्होंने अग्निपरीक्षा देकर अपनी पवित्रता प्रमाणित की क्योंकि वे लोकनिंदा का कारण नहीं बनना चाहती थीं और उन्हें अपने सत की शक्ति पर पूरा भरोसा था। ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने अपने पुत्रों लव-कुश को संसाधन विहीन माहौल में अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा और संस्कार दिए कि श्रीराम की चतुरंगिनी सेना भी उनके आगे टिक न सकी।

मां सीता के सतत संघर्षमय जीवन में आज की आधुनिक नारी के लिए भी  उत्तम और संतुलित जीवन के अनमोल सूत्र समाये हैं। उनकी सत्यनिष्ठा, चरित्र निष्ठा, सिद्धांत निष्ठा और अध्यात्म निष्ठा अद्भुत एवं प्रेरक है। वे त्याग, तपस्या, तितिक्षा, तेजस्विता, बौद्धिकता, चैतन्यता, प्रतिभा, पवित्रता एवं पुरुषार्थ की पर्याय हैं। उनका संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी जीवन कर्तव्यपरायण और श्रमजीवी बनने के लिए प्रेरित करता है। वे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा देती हैं। स्वामी विवेकानन्द के इन शब्दों में सीता माता की महत्ता स्वत: प्रमाणित हो जाती है कि भारतीय पुरा साहित्य में दूसरा राम भले ही मिल जाए पर दूसरी सीता नहीं। स्वामीजी कहते थे, "मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस जाति ने सीता जैसी आदर्श स्त्री को उत्पन्न किया; उस जाति में स्त्री जाति के लिए इतना अधिक सम्मान और श्रद्धा है जिसकी तुलना संसार में किसी से भी नहीं हो सकती।

मां सीता का सर्जन भारत की पवित्र मिट्टी से हुआ, इसलिए वे भूमिसुता भी कहलाती हैं। रामकथा के त्रेतायुगीन पौराणिक कथानक के मुताबिक सूखे की विकराल स्थिति के समाधान के लिए मिथिला के राजा विदेहराज जनक को खेत में हल चलाते समय मिट्टी के मटके से एक सुंदर कन्या मिली थी। निःसंतान राजा ने उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। मैथिल भाषा में जोती हुई भूमि तथा हल के नोक को ‘सीत’ कहा जाता है, इसलिए उस बालिका का नाम सीता रखा गया। चूंकि मां सीता फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को धरती से प्रकट हुई थीं, इसलिए सनातनधर्मियों द्वारा यह पावन तिथि प्रतिवर्ष सीता अष्टमी के रूप में श्रद्धाभाव से मनायी जाती है। 

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