6 दिसम्बर : वह दिवस जब हिन्दू स्वाभिमान ने भरी हुंकार
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6 दिसम्बर : वह दिवस जब हिन्दू स्वाभिमान ने भरी हुंकार

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 6, 2021, 01:57 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर पुनः मन्दिर निर्माण के लिए सन्  1528 से लेकर 2019 तक हिन्दू समाज निरन्तर संघर्ष करता रहा । तब से लेकर निर्णय आने तक 76 लड़ाईयों में पौने चार लाख से अधिक लोग बलिदान हुए। एक पीढ़ी के बाद दूसरी पढ़ी लड़ती रही, लेकिन उस स्थान पर क्षण मात्र के लिए भी हिन्दू समाज ने अपना दावा नहीं छोड़ा। 

 

डॉ. चंद्रप्रकाश सिंह

सन 1528 में आक्रांता बाबर का सेनानायक मीरबाकी ने श्रीराम के जन्म स्थान को ध्वस्त किया। यह राष्ट्र की चेतना पर प्रहार था। विदेशी आक्रान्ता द्वारा हिन्दू समाज के आराध्य ही नहीं अपितु भारत राष्ट्र की अस्मिता के प्रतिमान श्रीराम के जन्म स्थान को ध्वस्त कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को पददलित करने का प्रयास किया गया था। जब राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तो उसका प्राथमिक लक्ष्य ऐसे राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीकों को पुन: प्रतिष्ठित करना होना चाहिए था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि तत्कालीन राजकीय नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वाभिमान का अभाव था, लेकिन एक जीवंत राष्ट्र की चेतना को बहुत दिनों तक नहीं दबाया जा सकता। 6 दिसम्बर, 1992 को इस राष्ट्रीय चेतना का विराट स्वरूप प्रकट हुआ और वह कलंकित ढांचा ध्वस्त हो गया।

6 दिसम्बर,1992 को केवल इसलिए नहीं स्मरण रखा जाएगा कि मन्दिर तोड़कर बनाए गए ढांचे को ढहा दिया गया अपितु इसलिए भी याद रखा जाएगा क्योंकि इस घटना का दूरगामी ऐतिहासिक महत्व है। एक ऐसा राष्ट्र जो विगत 800 वर्ष से निरन्तर आक्रमण पर आक्रमण झेलता रहा। उसके धार्मिक केन्द्रों को ध्वस्त किया गया। सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट करने की कोशिश की गई। राष्ट्र के स्वाभिमान का मान मर्दन करने के लिए आस्था केन्द्रों पर प्रहार हुए। उस राष्ट्र ने छह दिसम्बर 1992 को ऐतिहासिक अंगड़ाई ली। उसके इस पराक्रम से दुनिया की वे शक्तियां आशंकित हो गईं जिन्होंने सभ्यताओं को कुचला था, संस्कृतियों को नष्ट किया था कि कहीं भारत आठ सौ वर्षों का हिसाब करने पर आतुर हो गया तब क्या होगा?

राष्ट्र नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म स्थान पर स्थापित मन्दिर को तोड़ने का कुकृत्य राष्ट्र को अपमानित कर पददलित करने का प्रयास था। आक्रमणकारियों द्वारा देश के कोने-कोने में मन्दिर व अन्य आस्था के केन्द्रों को तोड़ा गया, धर्मच्युत करने के बर्बर प्रयत्न हुए, किन्तु भारत ने साहस के साथ इन सबका सामना किया। इस्लामी शासकों के बर्बर कुकृत्यों के सामने भारत का हिन्दू समाज अपने धर्म, संस्कृति एवं परम्परा के लिए सदैव संघर्षशील रहा। इस्लाम और ईसाइयत के क्रूर एवं बर्बर आक्रमणों के सामने विश्व की अनेक सभ्यताएं ध्वस्त हो गईं। आज उनका कोई नाम लेवा तक नहीं है। न आज यूनान की बौद्धिकता का कोई उत्तराधिकारी है और न ही रोम के विशाल साम्राज्य का। आज मिस्र की महान सभ्यता के अवशेष पीरामिडों में संरक्षित हैं। बेबीलोन और मैसोपोटामिया की सभ्यताएं रेगिस्तानों में धंस गईं। जरथुस्त का पारस हवा के झोके की तरह उड़ गया, परन्तु भारत अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के साथ आज भी चट्टान की तरह खड़ा है।

भारत न कभी झुका और न ही डिगा, सदैव संघर्ष करता रहा। राज्य पराजित हुए लेकिन संस्कृति कभी पराजित नहीं हुई। आक्रमणकारियों ने मानसिक भय उत्पन्न करने के लिए बाह्य प्रतीकों, आस्था केंद्रों एवं पूजा स्थलों को तोड़ा, लेकिन भारत का समाज अपने आस्था केन्द्रों को एक क्षण के लिए भी नहीं भूला। मन्दिर तोड़े गए फिर वहीं नए मन्दिर खड़े कर दिए गए। अयोध्या, मथुरा हो या काशी सभी स्थानों पर हिन्दू समाज सदैव संघर्षशील रहा। वह इन स्थानों को एक क्षण के लिए भी नहीं भूला।

भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर पुनः मन्दिर निर्माण के लिए सन्  1528 से लेकर 2019 तक हिन्दू समाज निरन्तर संघर्ष करता रहा । तब से लेकर निर्णय आने तक 76 लड़ाईयों में पौने चार लाख से अधिक लोग बलिदान हुए। एक पीढ़ी के बाद दूसरी पढ़ी लड़ती रही, लेकिन उस स्थान पर क्षण मात्र के लिए भी हिन्दू समाज ने अपना दावा नहीं छोड़ा। यह मात्र मन्दिर-ढांचे का विवाद नहीं था। यह राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न था। मजहबी इबादतगाह के रूप में इस्लाम के लिए उस स्थान का कोई महत्व नहीं था और न ही मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग है, लेकिन भारत व हिन्दू समाज के लिए श्रीराम के जन्म स्थान का क्या महत्व है, यह भारतीय संस्कृति को जानने वाला कोई सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारत की राष्ट्रीय चेतना के संवाहक हैं। श्रीराम का चरित्र राष्ट्र के चरित्र का दर्पण है। श्रीराम के बिना भारत राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत के 130 करोड़ लोग यदि उस राष्ट्र के विराट का प्रतिनिधित्व करते हैं तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम इस राष्ट्र की उस चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं जो विराट को जागृत करती है। इसलिए राम हैं तो राष्ट्र है और राष्ट्र है तो राम हैं। भारत के लिए राम और राष्ट्र एक दूसरे के परस्पर पूरक हैं। अब आप यह समझ सकते हैं कि सन् 1528 में आक्रांता द्वारा श्रीराम के जन्म स्थान को ध्वस्त करने का क्यों प्रयत्न किया गया। दरअसल, यह राष्ट्र की चेतना पर प्रहार था। इस कलंक का परिमार्जन करना भारत की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति थी, क्योंकि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए विदेशी आक्रांता  द्वारा किए गए अपमान को ढोना राष्ट्र की स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह है।

श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन वास्तविक अर्थों में एक राष्ट्रीय आंदोलन था, जिसमें भाषा, क्षेत्र, जाति आदि की सभी अड़चनों को तोड़कर समग्र भारत राष्ट्र खड़ा हो गया था। किसी भी राष्ट्र के लिए ऐसे अद्भुत क्षण बहुत ही कम आते हैं, जब समाज अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपने आदर्श के लिए इस प्रकार खड़ा हुआ हो। यह भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिवस है। इसे शौर्य दिवस, एकात्मता दिवस, राष्ट्रीय पुनर्जागरण दिवस या सांस्कृतिक स्वतंत्रता दिवस कुछ भी कहा जा सकता है, लेकिन यह भारत के इतिहास में एक गौरव का दिवस है।

(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के निदेशक हैं।)

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