वैदिक युग से हिन्दूशाही तक अफगानिस्तान में रही हिंदू सभ्यता
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वैदिक युग से हिन्दूशाही तक अफगानिस्तान में रही हिंदू सभ्यता

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Nov 18, 2021, 12:26 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
सिन्धु घाटी सभ्यता के काल में हिन्दू सभ्यता व संस्कृति, हिन्दू देवी-देवताओं के पुरावशेष

सिन्धु घाटी सभ्यता के काल में हिन्दू सभ्यता व संस्कृति, हिन्दू देवी-देवताओं के पुरावशेष

अफगानिस्तान कांस्य युग व सिन्धु घाटी सभ्यता के काल में हिन्दू सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र रहा है। अफगानिस्तान का संदर्भ ऋग्वेद में भी आता है। काबुल, गजनी, कन्धार से मध्य एशिया तक उत्खननों में मिले शिव-पार्वती, महिषासुरमर्दिनी, ब्रह्मा, इन्द्र, नारायण सहित विविध हिन्दू देवी-देवताओं के पुरावशेषों में कुछ को काबुल व गजनी से ताजिकिस्तान तक के संग्रहालयों में देखा जा सकता है।

ब्रास्का विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् प्रो. जॉन फोर्ड श्रोडर के अनुसार अफगानिस्तान में मानव सभ्यता का इतिहास 50,000 वर्ष प्राचीन है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् विलियम लिओनार्ड लेंगर के अनुसार भी अफगानिस्तान- गान्धार में मानव सभ्यता का इतिहास 34,000 वर्ष प्राचीन है। वैदिक काल से 1026 ई. हिन्दूशाही तक वहां हिन्दू व बौद्ध साम्राज्य एवं बीसवीं सदी तक हिन्दू, बौद्ध व सिख परम्पराएं सजीव रही हैं।

हिन्दू सभ्यता का केन्द्र
जोनाथन केनोयर मार्क के अनुसार कांस्य युग व सिन्धु घाटी सभ्यता के काल में अफगानिस्तान हिन्दू सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र रहा है। महाभारतकालीन महाजनपद गान्धार से आगे प्राचीन मेसापोटामिया अर्थात् वर्तमान ईराक व तुर्की तक 1550-551 ईसा पूर्व काल में हिन्दुत्व के प्रसार का इतिहासकार जेम्स मिनाहन ने 2002 में प्रकाशित अपने ‘एनसाइक्लोपीडिया आॅफ स्टेटलेस नेशन्स’ में विस्तार से विवेचन किया है।

ईसा पूर्व 1380 के हित्ती व मित्तानी राजाओं क्रमश: ‘सुप्पिलिआ’ और शत्तिवाज के बीच हुए सन्धि पत्र में वैदिक देवता ‘मित्र’, ‘इन्द्र’ नासत्य-अश्विनी कुमार व अग्नि आदि के साक्षी आदि, गान्धार से आगे मेसापोटामिया तक वैदिक सभ्यता के अनेक प्रमाण विगत 4-5 दशकों में प्रकाश में आते रहे हैं। हाल ही में 2000 ईस्वी में मजार-ए-शरीफ में मिले हिन्दूशाही के राजा वाक्कदेव के दसवीं सदी के शिलालेख में शिव-पार्वती एवं मां दुर्गा के प्रचुर सन्दर्भ हैं। प्राचीन ‘उत्तरापथ’ अर्थात् सिल्क रूट पर यह ‘उप गणस्थान’ कहलाने वाला अफगानिस्तान ईरान व यूरोप तक व्यापार व सांस्कृतिक विनिमय का केन्द्र रहा है।

वैदिक व पौराणिक सन्दर्भ
पूर्वी अफगानिस्तान से पश्चिमी पाकिस्तान तक फैले गान्धार की उत्तम ऊन वाली भेड़ों एवं पराक्रमी व न्यायप्रिय नारियों के ऋग्वेद व अथर्ववेद में भी सन्दर्भ हैं। यह ऋग्वेद काल से ही हिन्दू संस्कृति व वैदिक सभ्यता एवं उसके बाद बौद्ध सभ्यता का केन्द्र रहा है।
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 127वें सूक्त में गान्धार का उल्लेख मिलता है:-

मन्त्र:-
उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथा:।
सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका।। ऋग्वेद 1/126/7।।

भावार्थ: हे राजन्! मैं गान्धारवासिनी इस पृथ्वी का राज्य धारण करने व न्यायपूर्वक रक्षा करने में सक्षम हूं। प्रशंसित रोमों वाली, सब प्रकार के गुणों की धारक उत्तम भेड़ों से युक्त इस क्षेत्र की सम्राज्ञी हूं। मेरे कामों को छोटे में मत आंको।

वायु पुराण, अन्य पुराणों, महाभारत एवं अन्य संस्कृत ग्रन्थों व पाण्डुलिपियों मे और उप गणस्थान के नाम से अफगानिस्तान के प्रचुर सन्दर्भ हैं। महाभारत में गान्धारी एवं गान्धार राजकुमार शकुनि के भी सन्दर्भ हैं। पाकिस्तान स्थित मुल्तान, पुष्कलवती, तक्षशिला व रावलपिण्डी प्राचीन महाजनपद गान्धार में ही थे। मुल्तान में प्रह्लादपुरी का प्राचीन नृसिंह मन्दिर विश्वप्रसिद्ध रहा है, जहां हिरण्यकशिपु की राजधानी थी, वहीं नृसिंह मन्दिर था एवं विभाजन के पूर्व नृसिंह जयन्ती पर मेला लगता था। बाबरी ढांचा ध्वस्त होने पर इस मन्दिर को पाकिस्तान में उपद्रवकारियों ने ध्वस्त कर दिया था। नृसिंह पुराण व भागवत पुराण में भी नृसिंह अवतार के सन्दर्भ हैं।  

हिन्दू पौराणिक व बौद्ध प्रतिमाओं के पुरावशेष
काबुल, गजनी, कन्धार से मध्य एशिया तक उत्खननों में मिले शिव-पार्वती, महिषासुरमर्दिनी, ब्रह्मा, इन्द्र, नारायण सहित विविध हिन्दू देवी-देवताओं के पुरावशेषों में कई काबुल व गजनी से ताजिकिस्तान तक के संग्रहालयों में देखा जा सकता है। पांचवीं से आठवीं सदी के बीच हिन्दूशाही कालीन व बौद्ध पुरावशेष पूरे अफगानिस्तान में फैले हैं।

कनिष्क कालीन तीसरी सदी के सिक्कों (चित्र1) में शिव, शिव-पार्वती के स्वर्ण के सिक्के, नौवीं सदी का शिव का एकमुखलिंग (चित्र 2), पांचवी सदी की संगमरमर की विशाल गणेश प्रतिमा (चित्र 3), बामियान की बौद्ध प्रतिमाएं (चित्र 4), अशोक के शिलालेख, गजनी में प्राप्त दूसरी सदी का मां दुर्गा का शीष, जो काबुल के संग्रहालय में है (चित्र 5) आदि अफगानिस्तान व मध्य एशिया के वैदिक हिन्दू-बौद्ध इतिहास के असंख्य सजीव प्रमाण हैं।

मजार-ए-शरीफ का हिन्दूशाही कालीन शिलालेख
हिन्दूशाही कालीन राजा वेक्कराज के शारदा लिपि में उत्कीर्णित ईस्वी 959 के संस्कृत शिलालेख (चित्र 6) के वर्ष 2000 में मजार-ए-शरीफ से मिलने के बाद अफगानिस्तान की हिन्दूशाही एवं वहां शिव, विष्णु, मां दुर्गा सहित विविध देवी-देवताओं पर नवीन तथ्य सामने आए हैं। इस शिलालेख से पता चलता है कि हिन्दूशाही के राजा ‘कल्लर’ का काल 843 से नहीं, 821 से था।

सातवीं सदी की तुर्कशाही के बौद्ध शासकों के अधीन मुस्लिम आक्रान्ताओं के बढ़ते आक्रमण व पुरुष-स्त्रियों को गुलाम बनाकर ले जाने के संकट के चलते तुर्कशाही के बौद्ध सम्राट ने सत्ता ब्राह्मण मन्त्री ‘कल्लर’ को हस्तान्तरित कर दी। तब 821 से कल्लर से चली हिन्दूशाही में मुस्लिम हिंसा का दौर थमा और 1026 तक वाक्कदेव, कमलवर्मन, भीमदेव, जयपाल, आनन्दपाल, त्रिलोचनपाल व भीमपाल ने अफगान प्रजा की रक्षा की। 28 नवम्बर, 1001 को महमूद गजनवी ने धोखे से राजा जयपाल को पेशावर के युद्ध में बड़ी क्षति पहुंचाई थी। तब से अफगानिस्तान में बलात इस्लामीकरण का दौर चल पड़ा।

इतिहासकार अल उत्बी के अनुसार महमूद ने पेशावर से वैहिन्द तक आक्रमण कर 5 लाख हिन्दू बच्चों, युवकों व लड़कियों को गुलाम बनाया और 1014 में थाणेसर के युद्ध में 2 लाख और गुलाम बनाये। गजनी के सुबुक्तगीन के पुत्र महमूद गजनवी ने 971 से 1030 तक 17 बार भारत पर आक्रमण किया। पेशावर पर 1000 में, 1005 में भाटिया, 1006 में मुल्तान, 1007 में भटिण्डा, 1011 में नगरकोट, 1013 में वैहिन्द पर 1015 में कश्मीर, 1018 में कश्मीर एवं 1021 मे कन्नौज पर आक्रमण किया।

इन लुटेरों ने अपने आक्रमणों में नगरों व गांवों को लूटना, युवकों व लड़कियों को अपहृत कर गुलाम बनाना, इन गुलामों व उनकी सन्तति से सम्प्रदाय की संख्या में पीढ़ी दर पीढ़ी कई गुनी वृद्धि कर उत्तरोत्तर बड़े से बड़े आक्रमण करना, फिर लूटपाट करना व गुलाम बनाकर संख्या बढ़ाते जाने के 7वीं सदी से चले दुष्चक्र से इण्डोनेशिया से अफगानिस्तान तक अरब व अन्य जिहादी आक्रमणों से अधिकाधिक शक्ति अर्जित कर वृहत्तर भारत में 7वीं सदी से एक हजार वर्ष तक आक्रमण एवं बलात मतान्तरण करने में सफलता पाई।

 

इस खबर को भी पढ़ें:-

 हिन्दू, बौद्ध व सिख वर्चस्व का काल
मौर्य साम्राज्य में 303 ईसा पूर्व से 1026 में हिन्दू शाही का अन्त होने तक अफगानिस्तान पर हिन्दू व बौद्ध शासन रहा। महाराजा रणजीत सिंह ने नौशेरा के युद्ध के बाद काबुल नदी तक पुन: हिन्दू-सिख वर्चस्व स्थापित किया था। दोस्त मुहम्मद को परास्त कर सिख साम्राज्य में कई मन्दिरों व गुरुद्वारों का पुनर्निर्माण हुआ। अफगानिस्तान में 1970 तक 2,20,000 हिन्दू, बौद्ध व सिख थे और लोया जिरगा में 2 हिन्दू होते थे। व्यापार व स्थानीय शासन और जनजीवन पर 1950 तक हिन्दुओं का प्रभाव रहा है। नेताजी सुभाष अफगानिस्तान के रास्ते ही जर्मनी जाते समय कई दिन तक भक्तराम के घर रहे थे।

आज चाहे वहां तालिबान का आतंक है। लेकिन, इण्डोनेशिया से अफगानिस्तान तक के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास की स्मृतियों को सम्पूर्ण वृहत्तर भारत में अक्षुण्ण रखना व उन पर सतत अनुसन्धान इस क्षेत्र के सभी मत पंथों के बुद्धिजीवियों का अहम दायित्व है।  
     (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

 

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