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श्री सौभाग्य का मंगलपर्व

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Oct 24, 2021, 08:59 am IST
in भारत
करवाचौथ पर विशेष

करवाचौथ पर विशेष

यहां की मातृ शक्ति के सामने पुरुषत्व ने अनेक बार घुटने टेके और उनकी स्तुति की। भारतीय नारी की इसी गौरव गरिमा को महिमामंडित करने वाला एक हिन्दू धर्म का एक सनातन पर्व है- करवाचौथ।

महर्षि दयानन्द का कहना था,  ‘'हिन्दू धर्म भारत की स्त्रियों के कारण ही जीवित है। यदि यहां की नारियां शील और पतिव्रत पालन में अग्रणी न रही होतीं तो आर्य जाति का गौरव कभी का विलुप्त हो गया होता। आर्यावर्त की स्त्रियां चरित्रवान थीं, इसलिये यहां के पुरुषों के जीवन भी बड़े उदात्त और चरित्र निष्ठा से ओत-प्रोत रहे।" भारतीय नारियों के पतिव्रत धर्म की शक्ति और उनके जाज्वल्यमान चरित्र से भारत का पूरा इतिहास भरा पड़ा है। प्राचीनकाल के अनेक प्रसंग इस बात की गवाही देते हैं कि भारतीय नारियों की अलौकिक शील-निष्ठा के समक्ष बड़े-बड़े देवता भी नतमस्तक हो गये थे। सती अनुसुइया के आंगन में ब्रह्मा, विष्णु, महेश बालक बनकर खेले, सावित्री यम से लड़ीं, शाण्डिली ने सूर्य देव का रथ रोक दिया, सुकन्या की पतिनिष्ठा से संतुष्ट होकर अश्विनीकुमारों ने धरती पर आकर च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था को यौवन में बदल दिया। महासती सीता भगवान राम के साथ वर्षों तक वन-वन घूमीं और अग्निपरीक्षा भी दी, नेत्रहीन पति के लिए महासती गान्धारी ने आजीवन आंखों में पट्टी बांधकर रखी। यहां की मातृ शक्ति के सामने पुरुषत्व ने अनेक बार घुटने टेके और उनकी स्तुति की। भारतीय नारी की इसी गौरव गरिमा को महिमामंडित करने वाला एक हिन्दू धर्म का एक सनातन पर्व है- करवाचौथ। निर्जल उपवास की तप ऊर्जा को अंतस में संचित कर नख-शिख सोलह श्रृंगार से अलंकृत हिंदू धर्म की सुहागिन स्त्रियों द्वारा चंद्रमा को अर्ध्य देकर पति के स्वस्थ व दीर्घजीवन की मंगलकामना; सुखमय दाम्पत्य की कामना की ऐसी सुंदर परम्परा किसी भी अन्य देश व धर्म-संस्कृति में नहीं मिलती।

पवित्रता की डोर से बंधा ईश्वरीय बंधन
हिन्दू धर्म में पति-पत्नी का संबंध सात जन्मों का माना जाता है। 'विवाह' यानी विश्वास, प्रेम, सृजन और पवित्रता की डोर से बंधा एक ईश्वरीय बंधन। सुखद अपनेपन और सुरक्षा का अहसास दिलाते इस बंधन में बंधे पति-पत्नी परस्पर प्रेम व विश्वास से एक नए सृजन की सृष्टि और जीवनरथ को साथ मिलकर संचालित करते हैं। इस बंधन की पवित्रता देवतुल्य मानी जाती है और करवाचौथ जैसे पर्व इस जन्म-जन्मांतर के संबंध को प्रगाढ़ और प्राणवान बनाते हैं। हर्ष का विषय है कि तेजी से अत्याधुनिक होते जा रहे हमारे समाज पर बाजार की चकाचौंध चाहे जितनी हावी हो जाये, लेकिन हिंदू सुहागिनों में अपनी आस्था की अपनी इस अनमोल परम्परा के प्रति आकर्षण जरा भी कम नहीं दिखता।

व्रत में चंद्रमा का है ये महत्व
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष पक्ष की चतुर्थी को चंद्रोदय तिथि में मनाया जाने वाला करवाचौथ हिंदू सुहागिनों का सर्वाधिक प्रिय पर्व है, जिसका इंतजार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व बिहार की सुहागिन स्त्रियां पूरे साल बेसब्री से करती हैं। इस दिन स्त्रियां अपने सौभाग्य के लिए गौरी का व्रत कर मिट्टी के करवे से चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। पूरे दिन निराहार रहकर पूजन के पश्चात पतिदेव के हाथ से पानी का घूंट पीकर व्रत खोलती हैं। बताते चलें कि चंद्रमा को अर्घ्य देना सिर्फ इस पर्व की परंपरा नहीं है, इसके पीछे एक पुख्ता ज्योतिषीय विज्ञान भी है। चंद्रमा को जीवन के लिए संजीवनी और चंद्रमा को औषधियों का स्वामी माना गया है। चंद्रमा चराचर जगत और विशेषकर मानवीय संवेदनाओं, जीवनचर्या को मंगलमय बनाए रखने में सर्वाधिक योग कारक है। करवा चौथ पर महिलाओं द्वारा चांद की पूजा के पीछे यही उद्देश्य है कि चांद की तरह ही उनके पति का जीवन भी सदा चमकता रहे।

मिट्टी का करवा पंचतत्व का प्रतीक
इस व्रत में मिट्टी के करवे का भी विशेष महत्त्व होता है। दरअसल मिट्टी का यह करवा पंचतत्व का प्रतीक है। मिट्टी को पानी में गला कर इसे बनाया जाता है और उसे बनाकर धूप और हवा से सुखाया जाता है। इस तरह इस करवे के निर्माण में भूमि, जल, आकाश, वायु और अग्नि सृष्टि के पांचों तत्वों का सम्मिश्रण होता है। ज्ञात हो कि भारतीय संस्कृति में जल को ही परब्रह्म माना गया है, क्योंकि जल ही सब जीवों की उत्पत्ति का केंद्र है। इस तरह मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर पति-पत्नी अपने रिश्ते में पंच तत्व और परमात्मा दोनों को साक्षी बनाकर अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने की कामना करते हैं। आयुर्वेद में भी मिट्टी के बर्तन में पानी पीने को फायदेमंद माना गया है। लम्बे समय के उपवास के बाद मिट्टी के पात्र का पानी बेहद तृप्ति देता है।   
 
करवाचौथ पर विवाहित महिलाओं द्वारा प्रमुख रूप से शिव-पार्वती के साथ गणेश और कार्तिकेय के पूजन की पुरातन परम्परा है। इस सुहाग पर्व पर प्रत्येक सुहागिन यह प्रार्थना करती है कि उन्हें भी माता पार्वती जैसा एकनिष्ठ सुहाग का अनुदान वरदान मिले, उनकी संतति गणेश व कार्तिकेय की तरह विवेकी व अप्रतिम साहसी बने। उन्हें माता पार्वती जैसी शक्ति और साधना हासिल हो सके ताकि वे भी अपने पति के प्रत्येक सुख-दुख में उनके कंधे से कंधा मिलाकर अर्धांगिनी का कर्तव्य पूरा कर सकें। चंद्रमा को अर्घ्य देने के पीछे मूल भाव यह है कि उनके वैवाहिक जीवन में चंद्रमा सी शीतलता सदैव बनी रहे। इन्हीं पावन भावों के साथ यह पर्व सदियों से सुहागिन स्त्रियों को ऊर्जान्वित करता आ रहा है।

हिन्दू धर्मग्रंथों में असहाय नहीं हैं स्त्रियां
ज्ञात हो कि हिन्दू धर्मग्रंथों में पौराणिक कथाओं में स्त्रियां निरुपाय अथवा असहाय नहीं, बल्कि सशक्त भूमिका में नजर आती हैं। बात भी सच है कि जिस देश में सावित्री जैसे उदाहरण मौजूद हैं, जिसने अपने पति सत्यवान को अपने सशक्त मनोबल से यमराज से छीन लिया था, वहां की स्त्रियां साहसी हों भी क्यों न? विचार करें तो पाएंगे कि पश्चिमी सभ्यता में निष्ठा रखने वाली महिलाओं के लिए यह पर्व एक श्रेष्ठ मार्गदर्शिका बन सकता है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक करवाचौथ व्रत की परंपरा आदिकाल में देव-दानव युद्ध के दौरान शुरू हुई थी। कथा के मुताबिक उस युद्ध में जब देवताओं की हार होने लगी तो भयभीत देवताओं ने ब्रह्मदेव के पास जाकर उनसे रक्षा की प्रार्थना की। तब ब्रह्मदेव ने कहा यदि उन सबकी पत्नियां निर्जल उपवास कर अपने पतियों के मंगल की कामना करें व चंद्रदेव को जल देकर अपने व्रत का पारण करें तो इस संकट से मुक्ति मिल करती है। ब्रह्मदेव के इस सुझाव को स्वीकार कर सभी देव पत्नियों ने कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यथाविधि निर्जल उपवास किया। ईश्वर से उनकी प्रार्थना स्वीकार की और युद्ध में देवताओं की विजय हुई। तभी से करवाचौथ व्रत की परंपरा शुरू हो गयी। इसी प्रकार द्रौपदी के करवाचौथ व्रत करने की पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार अर्जुन नीलगिरि नामक पर्वत पर तपस्या करने चले गये। उधर पांडवों पर संकट आने शुरू हो गये। तब श्रीकृष्ण के सुझाव पर द्रौपदी ने करवाचौथ का व्रत रखकर परिवार पर आये इस संकट को दूर किया था।

सवाई माधोपुर में है सबसे प्राचीन मंदिर
इन पौराणिक आख्यानों के अतिरिक्त करवाचौथ की से जुड़ी राजपूताने की एक लोककथा भी खासी चर्चित है। कहानी के अनुसार सात भाइयों की एक बहन होती है। वह शादी के बाद पहली बार मायके आती है। उसी दौरान करवाचौथ व्रत पड़ता है। वह भी अपनी भावजों के साथ यह व्रत रखती है लेकिन सूर्यास्त होते ही उससे भूख सहन नहीं होती। अपनी प्यारी बहन को भूख से व्याकुल होता देख उसके भाई दुखी होकर कृत्रिम चंद्रमा का निर्माण कर बहन को अर्घ्य देकर व्रत खोलने को कहते हैं। किंतु बहन के व्रत खोलकर पहला कौर ग्रहण करते ही उसे अपने पति की मृत्यु की सूचना मिलती है। तब उसकी छोटी भाभी उसे फिर से इस व्रत करने को कहती है। व्रत पूर्ण होने पर उसका पति चमत्कारिक रूप से पुनः जीवित हो उठता है। जानना दिलचस्प हो कि करवाचौथ पर पूजी जाने वाली चौथ माता का सबसे पुराना मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर के बरवाड़ा गांव में है, जिसे राजा भीम सिंह चौहान ने बनवाया था।

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