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मातृ नवमी पर विशेष: दिवंगत मातृशक्तियों के नमन की पुनीत परम्परा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 30, 2021, 12:03 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली

श्राद्ध तर्पण की परम्परा वैदिक संस्कृति की सबसे अनूठी परम्परा है। इस परम्परा में सनातन भारतीय संस्कृति की जिस समग्र जीवनदृष्टि के दिग्दर्शन होते हैं, वह अपने आप में अद्भुत है।    

पूनम नेगी

पितरों के लिए श्रद्धा व शुभ संकल्प के साथ किया जाने वाला पिंडदान व तर्पण "श्राद्ध कर्म" कहलाता है। हमारे वैदिक मनीषियों ने पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक एक पखवारे की विशेष अवधि निर्धारित की है। पितृपक्ष की इस अवधि में मातृ नवमी की विशिष्ट महत्ता है। शास्त्र कहते हैं कि जिस घर में माँ का अनादर किया जाता है, वहां कभी सुख, शांति व समृद्धि नहीं रहती। इसलिए मातृ शक्ति के देहावसान के उपरांत उसके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए पितृ पक्ष के दौरान ‘मातृ नवमी’ की तिथि को दिवंगत माँ, बहन, पत्नी व दादी-नानी के पिण्ड-तर्पण की परम्परा हमारी ऋषि मनीषा द्वारा बनायी गयी है। शास्त्रों में कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधि से किये गये पिण्ड तर्पण से तृप्त होकर मातृ पितर प्रसन्न होकर समूचे परिवार को सुख-सौभाग्य, समृद्धि और कल्याण का आशीष देती हैं। इस दिन श्रीमद्भागवत गीता के 9वें अध्याय के पाठ से मातृ शक्ति प्रसन्न होती हैं और व्यक्ति को मातृ दोष से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए इस परम्परा का अनुपालन हर सनातनधर्मी को करना चाहिए।
       
हमारे ऋषियों ने ‘मातृ नवमी’ की तिथि का निर्धारण दिवंगत मातृ शक्तियों को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए सुनिश्चित किया है। कारण कि “माँ” से ही इस समूची सृष्टि का अस्तित्व है। यदि दुनिया में मातृ शक्ति न होती तो सृष्टि की रचना भी न होती। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित प्रसंग के अनुसार सृष्टि संचालन के आधार त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) भी जब सृष्टि की रचना करने में असमर्थ हो गये तब ब्रह्मा जी ने १०००० वर्ष का कठोर तप कर उसकी ऊर्जा से मातृ शक्ति को अवतरित किया जिनसे सृष्टि की शुरुआत हुई। गीता में भी कहा गया है- ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’’ अर्थात ‘जननी’ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन में माँ की महत्ता कितनी ऊँची थी, उनके जीवन चरित इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। एक ओर श्रीराम विमाता की इच्छा का मान रखने के लिए 14 वर्ष को खुशी-खुशी वन चले गये और वन में पिता का श्राद्ध कर्म करते समय उनसे माँ कैकेयी को क्षमा करने का वरदान मांगा; क्यूंकि कैकेयी उनकी वही स्नेहशील माँ थीं जो उनके बालपन में उनपर सर्वाधिक प्रेम व ममत्व लुटाती थीं, उनका बनाया ‘राजभोग’ बालक राम का सर्वप्रिय व्यंजन था। दूसरी ओर बालकृष्ण की मनमोहक बाललीलाएं तो उनकी पालक यशोदा मैया के जीवन का आधार ही थीं, जिनका गायन कर आज भी भागवत कथावाचक लोकरंजन करते हैं। निःसंदेह ‘माँ’ की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। वे शकुन्तला ही थीं जिन्होंने अपने बच्चे भरत (जिनके नाम पर हमारा देश भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है) के भीतर शेर के दांत गिनने का साहस भरा था। हिन्दू कुलभूषण वीर शिवाजी महाराज के निर्माण में उनकी माता जीजाबाई का योगदान आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। मातृ शक्ति की इस गौरव गरिमा को महिमामंडित करने वाले असंख्य उदाहरण हमारे पूरे इतिहास में भरे पड़े हैं। संतान की पहली गुरु माँ ही होती है। बच्चे को चलना, उठना, बोलना सब उसकी माँ ही सिखाती है। सभी दुख-दर्द सहकर माँ अपनी संतान की भलाई में सदा लगी रहती है। माँ के रहते कोई भी बुरी शक्ति उसकी संतान का अहित नहीं सकती। दुनिया में अगर कहीं स्वर्ग होता है तो सिर्फ माँ के चरणों में। एक माँ ही होती है जो बच्चे कि बड़ी से बड़ी गलती को माफ कर उसे गले से लगा लेती है। इसीलिए भारत की सनातन संस्कृति मातृ शक्तियों को सर्वाधिक मान देती है।

आत्मा की अनश्वरता की परिचायक है श्राद्ध परम्परा
श्राद्ध तर्पण की परम्परा वैदिक संस्कृति की सबसे अनूठी परम्परा है। इस परम्परा में सनातन भारतीय संस्कृति की जिस समग्र जीवनदृष्टि के दिग्दर्शन होते हैं, वह अपने आप में अद्भुत है। "श्रीमद्भगवत गीता" में भगवान श्रीकृष्ण जिस तरह युद्ध विमुख विषादग्रस्त अर्जुन को आत्मा की अनश्वरता का बोध कराकर उसे कर्मपथ पर प्रेरित करते हैं, उसका मकसद भारतीय संस्कृति की इसी चिरन्तन जीवन दृष्टि को पुष्ट करना है। कई अविश्वासी लोग तर्क देते हैं कि जो मर गया उनके लिए यह कर्मकांड कोरा अंधविश्वास है; पर यह उनकी सोच संकीर्ण है। आत्मा के अनश्वर एवं शाश्वत अस्तित्व की सुस्पष्ट धारण के अनुरूप भारतीय दर्शन में जीवन की परिभाषा अति व्यापक है। हिन्दू दर्शन में देह-त्याग के बाद भी जीवात्मा के अस्तित्व की बात स्वीकारी गयी है। इसी मान्यता के आधार पर वैदिक ऋषियों ने पितृ पूजन की परम्परा का बीजारोपण किया था। दरअसल मानवीय चेतना को उसके पूर्ण विकास तक ले जाना ही हमारी ऋषि संस्कृति का एकमात्र उद्देश्य रहा है।  इस कारण उन्होंने यह तथ्य को प्रतिपादित किया था कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में कई तत्व ऐसे हैं जो हमें अपनी स्थूल आंखों से दिखायी नहीं देते फिर भी उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इस बात को अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है।

  ऋषिवाणी कहती है, "श्रद्धया किरयेत यस्मात श्राद्धं तेन प्रकीर्तितम्" अर्थात श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म ही श्राद्ध है। श्राद्ध का अर्थ है- श्रद्धापूर्ण व्यवहार व तर्पण का अर्थ है तृप्त करना। इस प्रकार श्राद्ध-तर्पण का अभिप्राय है दिवंगत पितरों को तृप्त करने की श्रद्धापूर्ण प्रक्रिया। महाभारत के अनुसार श्राद्ध परम्परा के शुभारम्भ का श्रेय महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि को जाता है। ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पितरों की आत्माएं मृत्यु लोक में आती हैं व अपने पुत्र-पौत्र व अन्य परिवारी जनों द्वारा किये गये पिण्ड-तर्पण से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इस कर्मकांड के पीछे यह भाव-प्रेरणा निहित है कि हम अपने महान पूर्वजों के आदर्शों एवं श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण कर वैसा ही उत्कृष्ट आचरण करने वाले बनें। मार्कडेय, विष्णु व गरुण पुराण आदि ग्रंथों में श्राद्ध कर्म की महिमा का बखान विस्तार से किया गया है। महाभारत में ऋषि जाबाल कहते हैं कि जो लोग आश्विन मास के पितृपक्ष में अपने मृत पितरों का श्राद्ध नहीं करते, वे अभागे होते हैं, उन्हें उनके कर्मों का उचित फल नहीं मिलता। अत: प्रत्येक भावनाशील मनुष्य को अपने पितरों की संतुष्टि एवं स्वयं के कल्याण के लिए श्राद्ध तर्पण जरूर करना चाहिए।

     शास्त्रों में कहा गया है कि जिस तरह सीधे खड़े होने के लिए हमारी रीढ़ की हड्डी का मजूबत होना जरूरी होता है; ठीक उसी तरह हम सभी लोग अपने पूर्वजों के अंश हैं, उन्हीं से हमारी पहचान बनी हुई है। इसलिए हमें इस विशेष अवधि में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करना चाहिए। इन दिनों पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रीमदभागवद्गीता या भागवत पुराण का पाठ उत्तम फलदायी माना गया है। धर्मशास्त्र यह भी कहते हैं कि यदि इस अवसर पर पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो पूर्वज प्रसन्न होकर कृपा बनाये रखते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति अपने पितरों को तिल मिश्रित जल से तर्पण कर और गाय को हरा चारा खिलाकर अपने पितरों को श्रद्धा अर्पित कर सकता है।
   
 जानना दिलचस्प हो कि देव संस्कृति की इस महान परम्परा से प्रभावित होकर मुगल बादशाह शाहजहां अपने अंतिम यातना भरे दिनों में अपने पुत्र सम्राट औरंगजेब के क्रूर व्यवहार से दुखी होकर उसके नाम लिखे एक पत्र में यह मर्मभेदी वाक्य लिखे थे- "बेटे!तू कैसा मुसलमान है जो अपने जीवित पिता को पानी तक  के लिए तरसा रहा है। सौ-सौ बार प्रशंसनीय हैं वे हिन्दू जो अपने मृत पिता को भी जल देते हैं।" इस घटना का उल्लेख आकिल खां के ग्रंथ "वाकेआत आलमगीरी" में मिलता है। इसी तरह एक अंग्रेज विद्वान द्वारा लिखित पुस्तक "आर्यों की महानता" में भी सनातन हिन्दू धर्म की श्राद्ध-तर्पण परम्परा के बारे में लिखा है, ‘’हिन्दुओं में अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा और स्मरण भाव से निभायी जाने वाली श्राद्ध-तर्पण की प्रथा प्रशंसनीय ही नहीं वरन अनुकरण करने योग्य है। मेरा मत है कि इस प्रकार की प्रथा-परम्परा प्रत्येक धर्म के अनुयायियों द्वारा की जानी चाहिए।"  

 देश के सुप्रसिद्ध श्राद्ध तीर्थ

  यूं तो पूरे देश में पितरों का श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए गया (बिहार), प्रयाग (उत्तर प्रदेश), पिण्डारक तीर्थ (गुजरात), लक्ष्मणबाण (कर्नाटक), सिद्धनाथ (मध्य प्रदेश), लोहार्गल (राजस्थान), मेघंकर (महाराष्ट्र) व ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ, उत्तराखण्ड) जैसे अनेक तीर्थ प्रसिद्ध हैं। मगर इन श्राद्ध तीर्थों में "गया" की विशिष्ट महत्ता है। मान्यता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से पूर्वजों को अक्षय तृप्ति होती है। इस तीर्थ का वर्णन रामायण में भी मिलता है। गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी, लेकिन उनमें से अब केवल 48 ही शेष बची हैं।
 
इसी तरह श्राद्ध तीर्थों में बदरीनाथ के "ब्रह्मकपाल" की अत्यधिक महत्ता है। देवभूमि के बद्रीनाथ धाम के "ब्रह्मकपाल" मोक्ष धाम कहा जाता है। इस धाम के बारे में कहावत है कि 'जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी' यानि जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है, उसे पुनः माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता है। स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में ब्रह्म कपाल तीर्थ की महिमा का वर्णन करते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अपनी धर्मपत्नी देवी अरुन्धती से कहते हैं कि यहां किया गया श्राद्ध तर्पण गया जी से आठ गुना अधिक फलदायी होता है। यहां पर पिण्डदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है और वे मोक्ष के अधिकारी हो जाते हैं। पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा को भी यहां आकर मुक्ति मिल जाती है। यहां पिंडदान करने के बाद फिर कहीं भी पिंडदान की आवश्यकता नहीं होती। सनत्कुमार संहिता में उल्लेख मिलता है कि हिमालय पर स्वर्गारोहिणी के रास्ते अलकनंदा के किनारे बद्रीनाथ धाम के पास सिद्धक्षेत्र ब्रह्मकपाल वह तीर्थ है जहां पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव जी को भी आना पड़ा था। यही नहीं, जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर विजय प्राप्त की थी, तब उन पर गौत्र हत्या का पाप लगा था। तब गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने भी यहां महाभारत में मारे गए लोगों और पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया था। कहा जाता है कि ब्रह्मकपाल में श्राद्ध करने से जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्त होकर प्रसन्न मन से अपनी संतति पर सुख, समृद्धि, आयु, वंशवृद्धि, धन-धान्य, स्वर्ग, राजयोग व अन्य भौतिक अनुदानों की वर्षा करते हैं। मत्स्य पुराण में भी कहा गया है कि ‘‘पितृतीर्थ ब्रह्मकपालम् सर्वतीर्थवर सुभम्। यत्रास्ते देव देवेशः स्वमेव पितामह’’।। अर्थात ब्रह्मकपाल सभी श्राद्ध तीर्थों में सर्वोपरि है। गया जी (बिहार) में पितर शांति मिलती है किंतु ब्रह्मकपाल में मोक्ष मिलता है, पितरों का उद्धार होता है। 

 
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