सार्क से क्यों न तालिबान के मित्र पाकिस्तान को किया जाए बाहर
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होम भारत

सार्क से क्यों न तालिबान के मित्र पाकिस्तान को किया जाए बाहर

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 24, 2021, 03:12 pm IST
inभारत, विश्व, दिल्ली

आर.के. सिन्हा
 


पाकिस्तान आज के दिन दक्षिण एशियाई देशों के बीच आपसी सहयोग और मैत्री बढ़ाने के सशक्त मंच दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को हर तरह से तबाह करने का प्रयास कर रहा है। उसका रवैया बेहद नकारात्मक रहा है। जिसके चलते सार्क का यह मंच पंगु सा हो चुका है।


 

पाकिस्तान आज के दिन दक्षिण एशियाई देशों के बीच आपसी सहयोग और मैत्री बढ़ाने के सशक्त मंच दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को हर तरह से तबाह करने का प्रयास कर रहा है। उसका रवैया बेहद नकारात्मक रहा है। जिसके चलते सार्क का यह मंच पंगु सा हो चुका है। पाकिस्तान ने हाल ही में मांग उठा दी है कि न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र के 76 वें सालाना सम्मेलन के दौरान ही होने वाले सार्क देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज हो गए तालिबान सरकार के नुमाइंदों को भी शामिल किया जाए। इस मसले पर जब बाकी सार्क देश तैयार नहीं हुए और उन्होंने इस बैठक को ही रद्द कर दिया। उनका मानना था कि पाकिस्तान की मांग को मानने का यह मतलब है कि वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस सरकार को समर्थन दे रहे हैं, जो घोर प्रतिक्रियावादी, आतंकवाद समर्थक और महिला विरोधी है। तालिबान के मन में मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए पाकिस्तान की बेतुकी मांग को कतई नहीं माना जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल, 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क राष्ट्रों के नेताओं को आमंत्रित करके इस कमजोर होते जा रहे संगठन को फिर से जिंदा करने की जोरदार पहल की थी। पर पाकिस्तान इसमें तो लगातार ही अवरोध खड़े करता रहा है। वह इस संगठन में यथा शक्ति मनहूसियत ही फैलाता रहा। सार्क दक्षिण एशियाई  देशों का आर्थिक और राजनीतिक संगठन है। इसकी स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को भारत, पाकिस्तान,बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान द्वारा मिलकर की गई थी। सार्क के अप्रैल, 2007 में हुए 14वें शिखर सम्मेलन में अफ़ग़ानिस्तान को इसका 8वां नया सदस्य बनाया गया। अगर सार्क से जुड़े इतिहास के पन्नों को खंगाले तो पता चलेगा कि 1970 के दशक में बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने दक्षिण एशियाई देशों के एक व्यापार गुट के सृजन का प्रस्ताव किया था। मई 1980  में दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग का विचार फिर रखा गया। अप्रैल 1981 में सातों देश के विदेश सचिव कोलंबो में पहली बार मिले। तब सार्क का अस्तित्व सामने आया।

 अफसोस कि पूरी दुनिया परस्पर आर्थिक सहयोग के महत्व को तो अब अच्छी तरह से समझने लगी है, पर सार्क को तो आगे ही नहीं बढ़ने देता पाकिस्तान। इसी के चलते सार्क देश आपसी व्यापार और आतंकवाद जैसे अहम सवालों पर भी एक राय नहीं बना पाए। पाकिस्तान उन कठमुल्लों को लगातार खाद-पानी देता ही रहता है जो भारत में आतंक फैलाते हैं। उसने मुंबई में भयानक आतंकी हमला करवाया। ये बात सारी दुनिया को पता है। वहां से ही ओसामा बिन लादेन मिलता है। पाकिस्तान तो मानों कि जैसे आतंकवाद की फैक्ट्री बन चुका है। पाकिस्तान में कोई भी देश खेलने तक भी नहीं जाता या जाकर भी वापस लौट आता है। हाल ही में न्यूजीलैंड क्रिकेट टीम ने  पाकिस्तान में जाकर भी खेलने से इंकार कर दिया। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम ने वहां पर जाने से ही इंकार कर दिया। इसी पाकिस्तान में श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर जानलेवा हमला भी होता है। इसके बाद भी पाकिस्तान सार्क का अंग बना ही हुआ है।

 भारत तो सार्क को मजबूत बनाने को लेकर शुरू से ही गंभीर रहा है। उसका मत है कि सार्क फिर से एक्टिव हो। इसके सदस्य देश आपसी सहयोग करें। भारत ने वैश्विक महामारी कोरोना से लड़ने में भी सार्क देशों को हर संभव सहयोग का वादा किया था और सहय़ोग किया भी। कहते ही हैं कि कष्ट और संकट में पड़ोसियों को एक-दूसरे के साथ खड़ा हो ही जाना चाहिए। संकट की स्थिति में पुराने गिले-शिकवे भी भुला ही देने चाहिए। भारत भय का पर्याय बन चुके “कोरोना वायरस”  का मुकाबला करने में सार्क देशों के साथ रहा। कोरोना को हराने के लिए भारत जिस तरह से लड़ा, उसे सार्क देशों के समेत सारी दुनिया ने भी देखा। पाकिस्तान के अवाम ने तो देखा पर उसके नेता मोदी जी या भारत की फूटे मुंह भी तारीफ करने से बचते रहे। ये ही वजह हैं कि पाकिस्तान की खराब मानसिकता के कारण ही सार्क आन्दोलन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

देखिए अब सार्क देशों को पाकिस्तान को अपने मंच से बाहर निकालने के बारे में गंभीरता पूर्वक विचार करना ही होगा। उन्हें देखना होगा कि मंच का मात्र एक सदस्य देश किस तरह से मंच के ही बाकी सभी साथी देशों को नुकसान पहुंचता रहा है। पाकिस्तान सिर्फ भारत का ही शत्रु नहीं है। वह तो बांग्लादेश के भी पीछे ही पड़ा रहता है। ध्यान दें कि बांग्लादेश कभी उसका ही अंग था। यानी बांग्लादेश-पाकिस्तान कभी एक थे। पाकिस्तान की लगातार कोशिश रहती है कि बांग्लादेश को हर संभव हानि पहुंचाई जाए। यह तब है, जब बांग्लादेश भी एक इस्लामिक देश ही है। बांग्लादेश ने 1971 के नरसंहार के गुनाहगार और जमात-ए-इस्लामी के नेता कासिम अली को कुछ साल पहले फांसी पर लटकाया। इस पर पाकिस्तान ने घोर आपत्ति जताई। बांग्लादेश ने भी दो टूक शब्दों में सुना दिया कि वह पाकिस्तान की ओर से उसके आन्तरिक मसलों में हस्तक्षेप कदापि सहन नहीं करेगा।

मतलब जो कभी एक मुल्क थे, अब एक-दूसरे से दूर-दूर ही रहते हैं। इसकी वजह भी पाकिस्तान है। अगर सार्क देश पाकिस्तान को बाहर का रास्ता दिखा भी देते हैं तो इससे उनका मंच मजबूत ही होगा। वे तब एक दूसरे का आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में खुलकर पर्याप्त सहयोग कर सकेंगे। आतंकवाद से लड़ सकेंगे। पाकिस्तान से इतर सार्क देशों को तो यह याद रखना होगा कि वे इस घटिया मुल्क के रहते तो कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकेंगे। पाकिस्तान के बिना ही सार्क देश अपने लुंज-पुंज आर्थिक सहयोग को भी गति दे सकेंगे। सार्क देशों में आर्थिक सहयोग की दयनीय स्थिति का एक उदाहरण पेश है। भारत के टाटा ग्रुप ने साल 2007 में बांग्लादेश में तीन अरब डॉलर की निवेश योजना बनाई थी। टाटा वहां पर अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करना चाहता था। पर वहां इसका तगड़ा विरोध शुरू गया। टाटा के बांग्लादेश में निवेश की योजना का यह कहकर विरोध किया गया कि वह देश के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी साबित होगा। यह सोच सही नहीं है। कोरोना महामारी के दौर में सब देशों, खासतौर पर पड़ोसियों को, मिलकर काम करना होगा। सार्क देशों के पास यह अनुपम अवसर आया है कि वे सार्क आंदोलन को गति देते हुए विकास के रास्ते पर चलें।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

 
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