दिल्ली-पेशावर से कटक तक विजय पताका -स्वराज का भगवा संकल्प
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दिल्ली-पेशावर से कटक तक विजय पताका -स्वराज का भगवा संकल्प

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 19, 2021, 05:14 pm IST
inदिल्ली

दिनांक 16-अगस्त-2021


विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति के लिए पूरे भारत का एकजुट होना कोई अंग्रेजों के काल की बात नहीं थी। 18वीं सदी में ही स्वराज की पेशवानीत मराठा सेनाओं ने दिल्ली, लाहौर, मुल्तान, अटक व पेशावर से कटक तक अनेक स्थानों पर स्वराज का भगवा ध्वज फहरा दिया था। पानीपत के युद्ध से पहले 1759-60 तक खैबर व अटक से कटक तक 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर शिवाजी के संकल्प के अनुरूप स्वराज का भगवा ध्वज लहराने लगा था


प्रोफेसर भगवती प्रकाश

विदेशी आक्रान्ताओं से मुक्त हिन्दवी स्वराज स्थापना का लक्ष्य तब दूर नहीं रह गया था जब 18वीं सदी के मध्य में स्वराज की पेशवानीत मराठा सेनाओं ने दिल्ली, लाहौर, मुल्तान, अटक व पेशावर से कटक तक अनेक स्थानों पर स्वराज का भगवा ध्वज फहरा दिया था। पानीपत के युद्ध से पहले 1759-60 तक खैबर व अटक से कटक तक 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर शिवाजी के संकल्प के अनुरूप स्वराज का भगवा ध्वज लहराने लगा था (चित्र 1)। यह आज के भारत के 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से थोड़ा ही न्यून था। राजस्थान से बंगाल तक के राजाओं व नवाबों को स्वराज के परिसंघ से सम्बद्ध कर स्वराज के लिए विविध रियासतों से खण्डनी, चतुर्थांश (चौथ), दशमांश (सरदेशमुखी) के रूप में कर राजस्व प्राप्त करने में भी स्वराज के पेशवानीत परिसंघ को सफलता मिल गई थी। स्वराज के इस परिसंघ में नागपुर केन्द्रित भोंसले, बड़ौदा केन्द्र्रित गायकवाड़, इन्दौर केन्द्र्रित होल्कर, धार-देवास के पवार, बुन्देलखण्ड के बुन्देला व ग्वालियर के सिन्धिया प्रारम्भ से ही सहभागी रहे हैं। इस वर्ष 2021 में दिल्ली पर 1771 की तीसरी मराठा विजय के 250 वर्ष पूरे हो रहे हैं,जिसके बाद 1788 से 1803 तक पूरे पन्द्रह वर्ष लाल किले पर भी स्वराज का भगवा ध्वज लहराता रहा था।

दूसरी दिल्ली विजय और पेशावर, लाहौर मुल्तान व अटक पर भगवा ध्वज
दिल्ली पर 1771 की इस तीसरी विजय के 14 वर्ष पूर्व, दिल्ली को अफगानों से मुक्ति दिलाने के लिए 11 अगस्त, 1757 की मराठा सेना की दिल्ली पर दूसरी विजय भी अपूर्व महत्व की है। इसके बाद लाहौर, मुल्तान, सरहिन्द, पेशावर एवं अटक पर स्वराज का भगवा ध्वज लहराने में मराठा सेनाएं सफल हो गयी थीं। दिल्ली पर 1757 के इस दूसरे मराठा आक्रमण का उद्देश्य भी दिल्ली को अफगानी लूट से सुरक्षा देना था। तब जनवरी 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने उत्तरी भारत में लूटपाट के लिए चौथी बार आक्रमण कर मुगल बादशाह आलमगीर को बन्दी बना लिया था। अप्रैल में वापस अफगान लौटते समय उसने बादशाह को मुक्त तो किया पर अफगानी रोहिल्ला नजीब खान को दिल्ली का सर्वाधिकारी बना दिया। पेशवानीत स्वराज-परिसंघ ने रघुनाथ राव एवं मल्हार राव होल्कर को भेज कर 11 अगस्त, 1757 को दिल्ली को अफगानों से मुक्त करा अन्ताजी मानकेश्वर को दिल्ली का सर्वाधिकारी बना दिया। तब रघुनाथ राव एवं मल्हार राव होल्कर सिन्धु पार खैबर के दर्रे से लेकर अटक के किले तक स्वराज का ध्वज फहराने आगे बढ़ गये।

सिन्धु पार स्वराज का ध्वज: 11 अगस्त, 1757 की दिल्ली विजय के बाद दिल्ली से आगे बढ़कर सर्वप्रथम मार्च 1758 में स्वराज की सेनाओं ने सरहिन्द के किले पर भगवा ध्वज फहरा दिया था। यही वह किला था जहां सरहिन्द के नवाब ने गुरु गोविन्द सिंह के 7 व 5 वर्ष की साहेबजादों जोरावर सिंह व फतेह सिंह को इस्लाम कबूल करने से मना करने पर जीवित दीवार में चिनवा दिया था। इसके तत्काल बाद, 20अप्रैल, 1758 को मल्हार राव होल्कर व रघुनाथ राव ने लाहौर पर भी विजय पा कर किले पर स्वराज का भगवा ध्वज फहरा दिया था। अप्रैल 20, 1758 को लाहौर विजय पर, वहां के नागरिकों ने रघुनाथ राव को वहां शालीमार बाग में ऊंचे मंच पर आसीन कर उनका भव्य नागरिक अभिनन्दन किया। यह अभिनन्दन कई प्रकार से अभूतपूर्व था। इसके बाद विद्युत गति से आगे बढ़कर तुकोजी होल्कर ने अटक एवं पेशावर को जीत खैबर के दर्रे तक सिन्धु के इसी तट की ओर स्वराज का भगवा ध्वज लहरा दिया था। यही वह समय था जब दक्षिण एशिया का आधे से अधिक भाग पेशवानीत स्वराज के भगवा ध्वज के अधीन आ गया था।

पेशावर विजय और अब्दाली का उसके गृह क्षेत्र में दमन: पूना से पेशावर 5,625 किलोमीटर दूर है, वहां सिन्धु पार पेशावर पर विजय प्राचीन वृहत्तर भारत में पुन: हिन्दवी स्वराज की स्थापना से भिन्न कोई उद्देश्य नहीं था। अब्दाली द्वारा पांच बार पंजाब सहित दिल्ली में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया था। उसे 1757 में दिल्ली पर अपनी सत्ता स्थापित करने और रुहेलखण्ड व अवध के नवाबों से दुरभिसन्धि पूर्वक एक इस्लामी ध्रुव विकसित करने में भी सफलता मिल गयी थी। इसी इस्लामी ध्रुव के अधीन सिन्ध, पंजाब, दिल्ली सहित अवध तक जिहाद की तैयारी के साथ अब्दाली ने 1761 का पानीपत का युद्ध लड़ा था। दूसरी ओर स्वराज की रक्षार्थ ही 1757 में स्वराज के पेशवानीत सैन्य बल ने उत्तर भारत से अब्दाली को खदेड़ कर लाहौर, सरहिन्द, मुल्तान, अटक, पेशावर एवं खैबर के दर्रे तक सिन्धु पार भगवा ध्वज फहराया था।

स्वराज हेतु अंग्रेजों से मुगल नहीं मराठों ने किया संघर्ष
अंग्रजों का देशभर में मुख्य संघर्ष स्वराज के परिसंघ की पेशवानीत मराठा सेनाओं से ही हुआ। तीनों प्रमुख आंग्ल-मराठा युद्ध एवं दिल्ली, गुजरात व मालवा सहित अनेक स्थानों पर ईस्ट इंण्डिया कम्पनी के अधिकांश प्रत्यक्ष युद्ध मराठा सेनाओं से ही हुए हैं। बक्सर के 1764 के युद्ध में काशी नरेश बलवन्त, सिंह, बंगाल के नवाब मीर कासिम व अवध के नवाब शुजाउद्दौल्ला के साथ मिल कर शाह आलम की सेना द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े युद्ध के बाद, मुगलिया सेना की एक भी गोली या तोप कहीं अंग्रेजों पर चलाने की घटना नहीं है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी से स्वराज के रक्षार्थ दिल्ली (पटपड़गंज), अड़ास (आणन्द, गुजरात), असाय (जालना, महाराष्ट्र) व लसखरी (अलवर, राजस्थान) आदि स्थानों पर भीषण रक्तरंजित लड़ाइयों में पेशवानीत स्वराज परिसंघ की ओर से लड़ते हुए पेशवा सहित दौलत राव सिन्धिया, यशवन्त राव होल्कर आदि के कई हजार सैनिकों ने रक्त बहाया था। अंग्रेजों से दिल्ली की रक्षार्थ स्वराज की मराठा सेना के 3000 सैनिकों के साथ दौलतराव सिन्धिया ने पटपड़गंज में जनरल गेराड लेक से लोहा लेते हुए प्राणों की आहुति दी थी। तब मुगलिया तोप या बन्दूक की एक भी गोली चलना तो दूर, बादशाह शाह आलम ने जनरल गेराड का रेड कार्पेट पर स्वागत कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पेंशन लेना स्वीकार कर लिया था।

दिल्ली पर तीसरी मराठा विजय व अफगानी रोहिल्लाओं का दमन :
महाद जी सिन्धिया के नेतृत्व में स्वराज के परिसंघ की मराठा सेनाओं की 1771 के दिल्ली विजय की इस वर्ष 2021 में सार्द्ध-द्विशती अर्थात् 250 वर्ष पूर्ति हो रही है। पानीपत के 1761 के युद्ध के बाद स्वराज परिसंघ की यह प्रबल वापसी थी। स्वराज के परिसंघ की मराठा सेनाओं की यह तीसरी दिल्ली विजय थी। इस दिल्ली विजय के तत्काल बाद 1772 में महाद जी सिन्धिया द्वारा आगे बढ़कर रोहिलखण्ड के नवाब को पानीपत के युद्ध में अपना वचन भंग कर विदेशी अफगान आक्रान्ता अब्दाली का साथ देने के बदले दण्डित करने की ढाई सदी पूरी होने का भी वर्ष है। महाद जी के लिए ये सर्वाधिक प्रसन्नता के पल थे। नवाब 1757 की सन्धि के अनुसार स्वराज की मराठा सेनाओं का साथ देने को वचनबद्ध था। विदेशी आक्रान्ता अब्दाली के मुस्लिम होने मात्र के कारण नजीब खान ने स्वराज पेशवानीत परिसंघ से अनुबन्ध तोड़ उस आक्रान्ता का साथ दिया था।

पानीपत की हार – आन्तरिक असहयोग
दिल्ली पर 1757 की मराठा विजय के समय ही रूहीलखण्ड के नवाब नजीब खान को स्वराज परिसंघ के मराठा सेनापति रघुनाथ राव ने बन्दी बना लिया था। तब नजीब खान 5 लाख रुपये दण्ड एवं यह वचन देकर छूटा था कि वह रूहीलखण्ड से कभी दिल्ली की ओर रुख नहीं करेगा, मराठा सेनाओं का कभी विरोध नहीं करेगा, मराठा सेना या मराठा किलों पर आक्रमण नहीं करेगा और स्वराज के ध्वजवाही पेशवानीत परिसंघ का साथ देगा। पानीपत के 1761 के युद्ध में उसने अब्दाली के मुस्लिम होने पर इस वचन को तोड़ दिया। पानीपत के युद्ध में अब्दाली का साथ देने के लिए मराठा सेनाओं पर पीछे से आक्रमण करने व उनकी खाद्य सामग्री, ऊनी वस्त्र व शस्त्रास्त्र आपूर्ति को नजीब खान व कुछ अन्य स्थानीय शासकों के द्वारा काट देने से ही स्वराज के सैन्यबल की पराजय हुई थी।

स्वराज के रक्षार्थ पानीपत का तीसरा युद्ध
यहां यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि पानीपत से पुणे 2000 किलोमीटर दूर था। बीच में दिल्ली, मथुरा व राजस्थान की रियासतों का सुदृढ़ व दुर्भेद्य रक्षा कवच था। पुणे में मराठा राजधानी व उनके द्वारा शासित क्षेत्र तो अब्दाली के 1761 के आक्रमण से पूर्णत: सुरक्षित था। यह स्वराज का महान लक्ष्य था जो उनके लिए जनवरी के प्रतिकूल मौसम में अब्दाली को सदा के लिए समाप्त कर अफगानिस्तान तक स्वराज की पुनर्प्रतिष्ठा का अवसर था। पेशावर, मुल्तान व अटक तक एक बार स्वराज का यह भगवा ध्वज रघुनाथ राव और मल्हार राव फहरा चुके थे। इसी अवधि में ईरान के अब्दाली पर आक्रमण जारी थे और पेशवा सदाशिव भाऊ का निश्चय अब्दाली को पूरी तरह से समाप्त करना था। इसीलिए पेशवा सदाशिवराव ने अब्दाली की सेना को चारों ओर से घेर लिया था। 14 जनवरी को दोपहर तक अब्दाली की सेना भागने लगी थी और भागने का मार्ग भी नहीं बचा था। लेकिन, नजीब खान सहित स्वराज परिसंघ से वचनबद्ध होने पर भी कुछ रियासतों ने पेशवा की सेना की खाद्य व ऊनी वस्त्रादि की आपूर्त्ति कई दिनों से काट रखी थी और वे सभी अब्दाली के पक्ष में खड़े हो गए। 14 जनवरी की सर्दी में खाद्य सामग्री एवं ऊनी वस्त्रों के अभाव में और कई अपनों का साथ न मिल पाने से दोपहर बाद पासा पलट गया जो अब्दाली के विरुद्ध स्वराज के परिसंघ की विफलता का कारण बना।

अटक का किला
पानीपत में हार के बाद लाल किले पर फहराया स्वराज का भगवा ध्वज
पानीपत के युद्ध में एक लाख का सैन्य बल खो देने और पेशवा सदाशिव भाऊ की 30 वर्ष में मृत्यु के बाद भी 16 वर्षीय पेशवा माधव राव ने अत्यन्त सूझ-बूझ, धैर्य व कुशलतापूर्वक स्वराज के सैन्य बल को पुन: संगठित कर सर्वप्रथम दक्षिण में ‘सिरा’ व ‘मधुगिरी’ के युद्ध में हैदर अली का दमन किया। वहीं 1771 में महादजी सिन्धिया के नेतृत्व में पुन: दिल्ली विजय कर उसे वापस अफगानों से मुक्त कराया। दिल्ली पर इसी तीसरी मराठा विजय का यह सार्द्ध-द्विशती वर्ष है। दुर्भाग्यवश, सत्ताईस वर्ष की अल्प आयु में ही पेशवा माधव राव की मृत्यु हो गई। लेकिन, इसके बाद भी स्वराज की सेनाओं की बढ़त बनी रही। इसके परिणामस्वरूप1788-1803 के बीच 15 वर्षों तक लाल किले पर स्वराज का भगवा ध्वज निर्बाध लहराता रहा था। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-05),जो वस्तुत: द्वितीय ‘‘आंग्ल-स्वराज सैन्य बल युद्ध’’ ही था, में मुगलिया सत्ता सहित कई भारतीय शासकों के अंगे्रजों को सहयोग देने से ही अंग्रेज विजयी हो पाये थे। अन्यथा देश पर स्वराज को विस्थापित कर अंग्रेजों की सत्ता स्थापित होना सम्भव नहीं था। पेशवा माधव राव की 27 वर्ष की आयु में असमय मृत्यु पर ब्रिटिश इतिहासकार ग्राण्ट डफ व अन्य इतिहासकारों ने लिखा है कि पानीपत की हार से मराठा साम्राज्य को हुई कहीं बड़ी क्षति पेशवा माधव राव की क्षति थी।

स्वराज के लिए डेढ़ सदी के सुनियोजित प्रयास
शून्य से शिखर के मार्ग पर : शिवाजी के जन्म के समय दक्षिण का पठार, बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा के सुल्तानों व मुगलिया सल्तनत के अधीन था। कहीं एक इंच भूमि भी स्थानीय शासकों के अधीन नहीं थी। पन्द्रह वर्ष की आयु में 1645 में चाकण के किले पर आदिलशाही की सम्प्रभुता में ही नियन्त्रण स्थापित कर 1674 तक छत्रपति के रूप में राज्यारोहण एक अहम उपलब्धि थी। इस अवसर पर एक सम्मानजनक क्षेत्रफल हिन्दवी स्वराज के अधीन आ गया था। शिवाजी राजे के 1680 में स्वर्गारोहण के समय महाराष्ट्र, कर्नाटक व तमिलनाडु राज्यों के एक बड़े क्षेत्र (चित्र क्रमांक-2) पर स्वराज का भगवा ध्वज लहराने लगा था।

सम्भाजी महाराज का पराक्रम : शिवाजी महाराज के बाद उनके सुयोग्य उत्तराधिकारी सम्भाजी महाराज ने मुगलों, जंजीरा के सिद्दियों, गोआ में पुर्तगालियों के क्षेत्रों में भी बड़ी सैन्य सफलताएं पाई थीं। मध्य प्रदेश में मुगलों के सशक्त केन्द्र बुरहानपुर (जनवरी 31 से फरवरी 2, 1681) की विजय भी सम्भाजी की मुगलों के विरुद्ध महत्वपूर्ण विजय थी।

पेशवाओं का पराक्रम व कूटनीति : स्वराज विस्तार में श्रीमन्त पेशवा विश्वनाथ द्वारा1707 में औरंगजेब की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली पर भारी दबाव बनाकर 1718में की गई मुगल-मराठा सन्धि के माध्यम से मुगलों की दक्षिणी रियासतों से कर संग्रहण के सर्वाधिकार प्राप्त कर मुगलों की दक्षिण की रियासतों में अपना सैन्यबल प्रतिष्ठापित कर लेना उनका पराक्रम व कूटनीतिक सूझबूझ थी। उनके बाद श्रीमन्त पेशवा बालाजी बाजीराव ने तो अत्यन्त द्रुत गति से शाखरखेड़ा व पालखेड़ के युद्धों में 1728 में निजाम का दमन कर दक्षिण को स्वराज के लिए निष्कण्टक बना लिया। उसके तत्काल बाद बाजीराव ने खण्डेश, बुरहानपुर, मालवा, गुजरात व बुन्देलखण्ड तक स्वराज विस्तार कर लिया। इन विजय अभियानों के बाद अक्टूबर 9, 1735 को छत्रपति शाहूजी महाराज से अनुमति लेकर पेशवा बाजीराव ने राजस्थान के राजाओं को स्वराज के परिसंघ में सम्मिलित कर उनसे खण्डनी, चौथ व सरदेशमुखी के रूप में स्वराज कोश के लिए कूटनीतिक समझौते किए।

पेशवा बाजीराव की स्वराज के लिए विनम्र प्रतिबद्धता : पेशवानीत स्वराज के परिसंघ के संकल्प की विनम्रतापूर्ण प्रतिबद्धता एवं पवित्रता जनवरी 1736 में मेवाड़ की घेराबन्दी के बाद भी मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय के प्रति दिखलाई विनम्रता और श्रीमन्त पेशवा बाजीराव के उनसे हुए संवाद के अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। पेशवा बाजीराव तब मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह के पार्श्व अर्थात् बगल के सिंहासन पर नहीं बैठकर, उनके सम्मुख यह कहकर फर्श पर बैठ गये कि आठवीं सदी से जो मेवाड़ अरबों, अफगानों, मुगलों आदि विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध स्वराज का सतत ध्वजवाही राज्य रहा है, स्वराज रक्षा में रत और हिन्दुआ सूरज महाराणा-मेवाड़ के बराबर के आसन पर मुझे बैठने का अधिकार नहीं है। बस आज मैं स्वराज-परिसंघ के लिए कर प्राप्ति के ध्येय से कोई समझौता नहीं कर सकता। पेशवा ने आगे कहा कि स्वराज की रक्षा व स्वराज के परिसंघ की स्थिरता की आज भी वैसी ही आवश्यकता है जैसी प्रात:स्मरणीय बप्पा रावल, महाराणा खुम्माण, वीरवर हम्मीर, कुम्भा सांगा, प्रताप व महाराणा राजसिंह के समय थी। 4 अप्रैल, 1669 को हिन्दू मन्दिरों व गुरुकुलों को तोड़ने व हिन्दुओं पर जजिया के औरंगजेब के फरमानों का सशस्त्र विरोध शिवाजी राजे व महाराणा राजसिंह ने ही किया।

आज हम सभी को मिलकर साझे स्वराज परिसंघ को बल देने का समय है। मेवाड़ के राजस्व के चतुर्थांश (चौथ) की आवश्यकता उसी स्वराज के परिसंघ के लिए आवश्यक है। मेवाड़ द्वारा वह नहीं देने के कारण मुझे सैन्य बल के साथ आना पड़ा है। उस चतुर्थांश व सैन्य व्यय प्राप्ति में कोई छूट नहीं दे सकता हूं। श्रीमन्त पेशवा बाजीराव प्रथम ने सैन्य व्यय लेने में बिना शिथिलता के भी स्वयं को मेवाड़ के 16 माण्डलिकों की श्रेणी में ही बतलाया था और महाराणा के सामने जमीन पर बैठे थे। पेशवा की सेना ने मेवाड़ की घेराबन्दी की हुई थी, उस घेराबन्दी के दबाव में ही मेवाड़ ने स्वराज के कर ‘खण्डनी’ का भुगतान व पेशवा के मेवाड़ तक आने का सैन्य व्यय का भुगतान करना स्वीकार किया था। लेकिन, अपनी इस सैन्य शक्ति को दम्भ से रहित रह कर, पेशवा बाजीराव का मेवाड़ के महाराणा के पार्श्व के सिंहासन पर न बैठकर सामने भूमि पर बैठना, उनका स्वराज-परिसंघ के लिए पवित्र समर्पण, विनम्रता व कूटनीतिक सूझबूझ का अप्रतिम आदर्श था। मेवाड़ से स्वराज शुल्क या अंशदान प्राप्त करने के बाद बाजीराव ने राजस्थान के अन्य राजाओं से स्वराज के परिसंघ का साथ देने की सन्धियां कर लीं।

स्वराज-परिसंघ के दिल्ली की ओर तीन अभियानों की गौरवगाथा : इसके तत्काल बाद नवम्बर 1736 में पेशवा बाजीराव ने दिल्ली पर भीषण आक्रमण कर दिया। सर्वप्रथम 1.5 लाख सैन्य बल लेकर आये, सादात अली खान को पीछे ढकेला, फिर हसन अलीखान के तो आधे सैनिकों का सफाया कर तालकटोरा में अपना पड़ाव डाल दिया। दिसम्बर 1737 में भोपाल पर विजय पाई थी। इसी बीच निजाम पर अंकुश के लिए पेशवा को पुन: दक्षिण के लिए प्रस्थान करना पड़ा। पुन: 1757 व 1771 मे स्वराज के सैन्यबल ने दिल्ली को अपने नियन्त्रण मे लेने में सफलता व 1788-1803 तक 15 वर्ष लाल किले पर स्वराज का भगवा ध्वज लहराये रखने में मिली सफलता स्वराज के परिसंघ की गौरवमयी उपलब्धियां थीं।

यदि 1803-05 तक द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में नवाबों व कुछ राजाओं ने अंग्रेजों का साथ नहीं दिया होता तो देश का इसके बाद का इतिहास भिन्न होता। इस सब के उपरान्त भी स्वराज के परिसंघ की 1771 की तीसरी दिल्ली विजय के इस सार्द्ध-द्विशती वर्ष में आवश्यक है कि हम अटक, पेशावर, मुल्तान, लाहौर, सरहिन्द सहित लाल किले पर स्वराज के भगवा ध्वज की कीर्ति यात्रा का स्मरण करें।

(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

पांडेय गणपत राय
छोटानागपुर के बडे नायक

अमर बलिदानी पांडेय गणपत राय का जन्म 1809 में लोहरदगा के भंडरा थाना अंतर्गत भौरा नामक गांव में हुआ था। 10 मई, 1857 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली गोली चली थी। इसके बाद तो इसकी चिनगारी पूरे देश में फैल गई। छोटानागपुर क्षेत्र में क्रांतिकारियों का नेतृत्व पांडेय गणपत राय और बदकागढ़ स्टेट के स्वामी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने किया। 30 जुलाई, 1857 को आठवीं देशी सेना ने हजारीबाग में और 1 अगस्त को डोरंडा छावनी (रांची) में सेना ने क्रांति का बिगुल फूंका। इस कारण 2 अगस्त को पूरा रांची क्रांतिकारियों के अधिकार में आ गया। लाख कोशिश करने के बाद भी अंग्रेज जब ठाकुर विश्वनाथ और पांडेय गणपत राय को पकड़ नहीं पाए तो इनकी सम्पत्ति जब्त कर ली। संपत्ति जब्त होने के बाद भी ये दोंनो डरे नहीं। इसके बाद इन दोनों ने बरवे थाना को लूट लिया। लोहरदगा के सरकारी खजाने को भी लूटने का प्रयास किया, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। इसके कुछ दिन बाद एक गद्दार के कारण गणपत राय अंग्रेजों की पकड़ में आ गए। 21 अप्रैल, 1858 को रांची के कमिश्नर डाल्टन ने इन्हें फांसी की सजा सुनाई और उसी दिन रांची डाक घर के पास कदम के पेड़ पर उन्हें फांसी दे दी गई। छोटानागपुर क्षेत्र में इस अमर बलिदानी का नाम आज भी बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है।
-रितेश कश्यप

रघुनाथ महतो
चुआड़ आंदोलन के नायक
अंग्रेजों के अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले क्रांतिवीर रघुनाथ महतो ने तत्कालीन मानभूम जिले (अब पुरुलिया) में चुआड़ आंदोलन चलाया था। चुआड़ का अर्थ होता है बुरा आदमी और रघुनाथ सच में अंग्रेजों के लिए बहुत बुरे व्यक्ति थे। रघुनाथ महतो ने 1769 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन नीमडीह के मैदान में अंग्रेजों की दमन नीति के विरुद्ध जनसभा बुलाई थी। जनसभा में उन्होंने ‘‘अपना गांव, अपना राज। दूर भगाओ अंग्रेज राज’’ का नारा देते हुए अंगे्रजों को ललकारा था। इसका असर पातकूम, बड़ाभूम, धालभूम, मिदनापुर, गम्हरिया, सिल्ली, सोनाहातु, बुण्डू, तमाड़, रामगढ़ आदि क्षेत्रों पर पड़ा। इसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों से अंग्रेजों को मालगुजारी मिलना बंद हो गया। रघुनाथ महतो का जन्म तत्कालीन जंगल महल वर्तमान सरायकेला-खरसावां जिला के नीमडीह प्रखंड के घुटियाडीह में 21 मार्च, 1738 को एक किसान परिवार में हुआ था। माता करमी देवी और पिता काशीनाथ महतो ने भगवान राम के नाम पर इनका नाम रघुनाथ रखा था। 5 अप्रैल, 1778 को वे अपने साथियों के साथ रांची जिले के सिल्ली प्रखंड के किता-लोट के जंगल से सटे स्थान पर रामगढ़ पुलिस छावनी पर हमला करने की रणनीति बना रहे थे। उसी समय अंग्रेज सिपाहियों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर रघुनाथ महतो सहित दर्जनों देशभक्तों को मौत के घाट उतार दिया। बंगाल और झारखंड के अनेक हिस्सों में रघुनाथ महतो का नाम आज भी प्रसिद्ध है।
-डॉ. राकेश कुमार महतो

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