विभाजन का वास्तविक इतिहास
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विभाजन का वास्तविक इतिहास

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 17, 2021, 03:20 pm IST
in दिल्ली

श्रीधर पराडकर
 

त्रासदी के पल: बंटवारे के बाद पााकिस्तान से भारत की तरफ आता एक सिख परिवार

 

स्वातंत्र्य समर के बाद नागरिकों की रक्षार्थ आगे आए स्वयंसेवकों की अमिट गाथा


भारत विभाजन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में जिस प्रकार संघ ने समाज के हित में आगे रहकर काम किया, वह असाधारण था। युद्धकाल हो या प्राकृतिक आपदा, स्वयंसेवक स्वत:स्फूर्त प्रेरणा से राष्टÑकार्य में सबसे आगे रहे हैं। यही कारण है कि देश ही नहीं, विश्वभर में आज संघ के प्रति श्रद्धा है


विभाजन की विभीषिका की चर्चा के दौरान अक्सर कहा जाता है कि 70 वर्ष पुरानी घटनाओं की चर्चा की क्या आवश्यकता है? अब इन गड़े मुर्दों को उखाड़ने का क्या औचित्य है? इससे तो समाज में भूतजीवी बनने की प्रवृत्ति पनपेगी, परंतु देश व समाज-हित की कसौटी पर कसकर निष्कर्ष निकालेंगे तो यही उत्तर मिलेगा कि 70 साल बाद भी इस इतिहास को प्रकाश में लाना हर दृष्टि से उपयोगी है, जरूरी है।

यह चिरप्रेरणा देने वाला इतिहास है। इसे वीर देशभक्त स्वयंसेवकों, माता-बहनों व हमारे सैनिकों ने अपने खून से लिखा है। इतिहास में आज तक हम पद्मिनी के जौहर को ही प्रेरणा के लिए उद्धृत करते आए हैं, पर यह इतिहास असंख्य पद्मिनियों की जौहर ज्वालाओं से आलोकित है। इस इतिहास में से एक-दो नहीं, असंख्य वीर हकीकत व अभिमन्यु झांकते नजर आते हैं। अनेक बाजीप्रभु देशपांडे अवतरित हुए थे। विश्व में कभी भी व कहीं भी उदात्ततम व प्रेरणादायी घटा है, उन सबके नमूने एक साथ देश विभाजन के समय सजीव हो उठे थे। उसके विस्मरण से अपने अतिनिकट भूत में ही उपस्थित किए गए तेजस्वी उदाहरणों से प्रेरणा पाने से समाज वंचित रह जाता है और अपनी भूख मिटाने हेतु सुदूर भूतकाल को ही टटोलता रह जाता है।

छलपूर्वक घोषणा की जाती है कि, ‘दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल…’, पर वास्तविकता अलग ही है। एक ओर संपूर्ण देश में स्वतंत्रता का स्वागत हर्षोल्लास के साथ किया जा रहा था, वहीं पाकिस्तानी कब्जे वाले पंजाब, सिंध व बंगाल के हर शहर में मुहल्ले के मुहल्ले, हर गांव धू-धू कर जल रहे थे। हिन्दुओं के मकान-दुकानों को खुलेआम लूटा जा रहा था। मां-बहनों पर जो गुजरी थी, वह कल्पना से परे है। हर ओर लाशों के ढेर लगे थे। परिणामस्वरूप, अपनी जमीन-जायदाद ही नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों को खोकर शरणार्थियों के काफिले आजाद भारत की ओर रोते-बिलखते आए थे। उसको कैसे भूला जा सकता है और क्यों भूलना चाहिए?

राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक देश पर आए हर संकट के समय कसौटी पर खरे उतरे हैं। चाहे वह संकट प्राकृतिक हो, दैवीय या मानवीकृत। ऐसा ही संकट देश पर उस समय आया था, जब स्वतंत्रता पाने को आतुर तत्कालीन नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार कर लिया था। हालांकि वे देशवासियों से कहते रहे कि वे निश्चिंत रहें, किसी भी हालत में देश का बंटवारा स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनकी बातों पर भरोसा कर जनता आश्वस्त थी। इसी कारण लोगों ने विभाजन से उत्पन्न होने वाली स्थिति की तैयारी नहीं की थी, लेकिन नेता अपनी बातों से मुकर गए और देशवासियों को भीषण संकट में डाल दिया।  
देश का विभाजन स्वीकृत हुआ और नए बने पाकिस्तान में हिन्दुओं के मकान, दुकान, व्यवसाय, खेती-बाड़ी ही नहीं, प्राण तक संकट में पड़ गए। उनकी सहायता करना तो दूर, पुकार तक सुनने वाला कोई नहीं था। ऐसे समय देश, समाज, धर्म को समर्पित संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता के लिए आगे आए। पहली आवश्यकता हिन्दुओं को वहां से सुरक्षित निकालने की थी। दूसरी उनके लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और तीसरी भारत पहुंचने पर उनको बसाने की थी। ये तीनों ही काम स्वयंसेवकों ने बड़े साहस, बहादुरी व सूझबूझ से किए। अपनी, अपने परिवार की चिंता किए बिना वे प्राणपण से मोर्चे पर डटे रहे। हिन्दुओं की रक्षा के लिए उन्हें जो कुछ करना पड़ा, वह उन्होंने किया। एक आलेख में सबका वर्णन करना तो संभव नहीं है, पर बानगी के तौर पर कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।

पंजाब
पश्चिमोत्तर प्रान्त से लुट-पिटकर लाहौर की ओर आ रहे शरणार्थियों की सहायता के लिए सहायता समिति का गठन किया गया था। इस सहायता समिति में कांग्रेस के लोग भी थे और स्वयंसेवक भी। लेकिन पहले ही दिन से दिक्कतें आने लगीं। कांग्रेस के नेता केवल बयानबाजी करते, पीड़ितों की सहायता के लिए प्राप्त सामग्री व वाहनों का निस्संकोच प्रयोग करते। स्वयंसेवक तो अपना काम प्रामाणिकता से कर रहे थे। इस पर भी उनके काम में रोड़े अटकाए जाने लगे। तब स्वयंसेवकों ने ‘पंजाब रिलीफ कमेटी’ का गठन कर अलग से काम प्रारंभ किया। स्वयंसेवकों के अलग होते ही कांग्रेसियों की सहायता समिति निष्प्राण हो गई, क्योंकि नि:स्वार्थ भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्ता उनके पास कम ही थे।

निराधार, निराश्रित पीड़ितों को सब प्रकार की सहायता की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्हें अपने घरों से बिना कुछ सामान व धन लिए भागना पड़ा था। अधिकांश तो बस तीन वस्त्रों में ही भागने को मजबूर हुए थे। रा.स्व. संघ की अपील पर केशधारी व सहजधारी, दोनों ने सहयोग के दरवाजे मुक्त रूप से खोल दिए थे। स्वयंसेवक जहां भी जाते, अपेक्षा से अधिक सहयोग मिलता। यहां तक कि कोई फटे-पुराने कपड़े सहायता में नहीं देता था। लोग नए कपड़े ही देते थे। संघ द्वारा संचालित सहायता शिविर में नए कपड़ों, औषधियों व अन्न की कभी कमी नहीं रही। स्वयंसेवक सहायता मांगने चादर लेकर निकलते और कुछ ही समय में वह रुपयों से भर जाती थी। इसमें संघ के प्रति लोगों का विश्वास ही कारणीभूत था कि उनके द्वारा दिए जा रहे सहयोग का दुरुपयोग नहीं होगा और स्वयंसवेक के हाथ में दिया जा रहा धन सही जगह पहुंचेगा।  

प्रारंभ में समिति का कार्यालय लाहौर के रतन बाग में दीवान कृष्णकिशोर की कोठी में खोला गया। समिति द्वारा दो शिविर लगाए गए थे। एक स्टेशन के सामने और दूसरा अरोड़ा वंश हॉल में। जब काम बढ़ा तो मोंटगुमरी रोड पर डॉ. गोकुलचंद नारंग की कोठी में कार्यालय ले जाया गया। उनकी कोठी में एक विशाल तहखाना था। वह भी छत तक सहायता सामग्री से अट जाता। धीरे-धीरे आवश्यकता के अनुसार समिति का कार्यक्षेत्र बढ़ता गया। निर्वासितों की सेवा के अलावा समिति को कई अन्य दायित्व निभाने पड़ रहे थे। जैसे- दंगों के दौरान संकटग्रस्त क्षेत्रों में फंसी महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को निकालकर शिविरों या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, दंगाग्रस्त मुहल्लों में जाकर फंसे हिन्दुओं को संरक्षण देना तथा हमलावरों को सबक सिखाना, घायलों को अस्पताल ले जाकर उनके उपचार की व्यवस्था करना, मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार करना, आग बुझाने का साधन उपलब्ध कराना, सेना की सहायता से अपहृत महिलाओं को अपहर्ताओं के कब्जे से छुड़ाकर लाना इत्यादि। दिनोंदिन विस्थापितों की संख्या बढ़ती जा रही थी। लोग सब ओर से आने लगे थे। तब रिलीफ कमेटी की शाखाएं प्रान्त के कस्बों और नगरों में भी खोली गर्इं। सभी स्थानों पर जनता का सहयोग लाहौर की भांति ही मिला। हालांकि यहां के लोगों को भी पता था कि शीघ्र ही उन्हें भी विस्थापितहोना है।

पाकिस्तान बनने के पहले लाहौर के डी.ए.वी. शिविर की व्यवस्था पंजाब पीड़ित सहायता समिति ही जन सहयोग से करती थी, परंतु जब पाकिस्तान बन गया और लाहौर से पलायन शुरू हो गया, तब उस शिविर की व्यवस्था भारत सरकार ने संभाली। समिति के बाकी लोग तो वेतनभोगी थे, पर 100 से अधिक स्वयंसेवक नि:स्वार्थ भाव से वहां सेवा कार्य करते थे। आसपास के जिलों की अपहृत महिलाओं तथा वहां फंसे हिंदुओं को शिविर में लाने का दायित्व भी इनका था।

अमृतसर में पंजाब सहायता समिति और और कांग्रेस की समिति का शिविर लगा था। लेकिन आने वाले विस्थापित कांग्रेस से इतने चिढ़े हुए थे कि वे उनके कार्यकर्ताओं की सूरत भी देखना नहीं चाहते थे। उन पर उनका कोई भरोसा नहीं था। जब विस्थापितों से भरी रेलगाड़ी अमृतसर के स्टेशन पर आती तो वहां संघ के स्वयंसेवक काली टोपी में तथा कांग्रेस के कार्यकर्ता सफेद टोपी में उपस्थित रहते थे। परंतु विस्थापित प्राय: एक स्वर में कहते थे कि हमें तो संघ के स्वयंसेवकों ने ही बचाया है। हमें उन पर ही भरोसा है और हम उनके साथ ही जाएंगे। इन सफेद टोपी वालों के कारण ही हमें अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा है।

लाहौर की तरह ही अन्य स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने विस्थापितों के लिए शिविर खोले थे।
डेराबाबा नानक के शिविर में 50,000 लेगों के रहने की व्यवस्था थी, इसी प्रकार माधवपुर में 10,000, सुजानपुर में 3,500, गुरुदासपुर में 4,000, बटाला में 7,000, धर्मवाल में 1,000 की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने की। अबोहर में 65,000 लोगों को 15 दिन तक भोजन तथा 25,000 लोगों को बर्तन दिए गए।

कथनी और करनी एक
संघ के स्वयंसेवकों को निर्देश था कि वे भगदड़ न मचने दें, अपने स्थान पर रहें और समाज में साहस जगाएं। स्वयंसेवकों ने इस बात का पूरा प्रयास किया, लेकिन स्थितियां ऐसी बन रही थीं, जिनमें समाज के अनेक लोग भागकर अमृतसर आदि स्थानों पर जा रहे थे। फिर भी स्वयंसेवकों ने आचरण के अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। उनके पास अपनी धन-दौलत लेकर पूर्वी पंजाब अथवा दिल्ली जाने के पर्याप्त अवसर थे। लेकिन स्वयंसेवकों ने ही नहीं, उनके परिवार वालों ने भी उन अवसरों का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया।

पंजाब के बाजीप्रभु
17 अगस्त,1947 को सीमा निर्धारण आयोग ने घोषणा कर दी कि झंग पाकिस्तान में जाएगा। आसपास से आए मुसलमानों ने झंग शहर पर हमला बोल दिया। शाहजीवना कस्बे के सैयद हुसैन और उसका भाई आबिद हुसैन मुस्लिम लीग के प्रभावी नेता थे। उन्होंने ही मुसलमानों को हमले के लिए उकसाया था। झंग में संघ की अच्छी शाखा थी। किशनचंद नारंग और बालकृष्ण नारंग ध्येयनिष्ठ कार्यकर्ता थे। उनका घर नूरशाह गेट के बाहर था। हमला उसी ओर से हुआ था। दोनों भाइयों ने विचार किया कि हमलावरों को कुछ देर यहीं नहीं रोका गया तो शहर में सैकड़ों हिन्दुओं की नृशंसतापूर्ण हत्या हो जाएगी। आगे जाने के लिये उनके घर के सामने से ही संकरा रास्ता था। दोनों भाई तलवारें लेकर रास्ते पर डट गए। संघर्ष शुरू हो गया। हमलावरों को ऐसे प्रतिरोध की कल्पना नहीं थी। हमलावरों ने उनके घर में आग लगा दी, महिलाओं पर अत्याचार शुरू किए, लेकिन दोनों भाई मोर्चे पर चट्टान की तरह डटे रहे। कुछ देर बाद बालकृष्ण का एक हाथ शत्रु की तलवार से कट गया। फिर भी वह लड़ता रहा। दोनों भाइयों ने अंतिम सांस तक शत्रुओं को शहर में घुसने नहीं दिया। वे अपने परिवार को बचाने की कोशिश कर सकते थे, पर अपने शहर के लिए उन्होंने बलिदान देना उचित समझा। उनके कारण सैकड़ों हिन्दू सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके थे।

जन विश्वास
मजहबी गुंडे केशधारियों के जानी दुश्मन बन गए थे। जब उन्हें यह लगने लगा कि मुल्तान में उनका रहना असंभव हो गया है, तब अनेक धर्म प्रेमी केशधारी बंधु संघ कार्यालय में आए। उन्होंने संघ अधिकारियों से कहा कि अब हम यहां नहीं रह सकते, हम जाने को विवश हैं। हम अपने इस पवित्र ग्रंथ की रक्षा भी नहीं कर सकते, क्योंकि यहां न तो हम सुरक्षित हैं और न गुरुद्वारे। इसलिए आप इस धरोहर को संभालें। हमें विश्वास है कि आप संघ कार्यकर्ता हर हालत में इसकी पावनता की सुरक्षा करेंगे।

गुरुदासपुर को बचाया
यह लगभग तय हो गया था कि गुरुदासपुर जिला पाकिस्तान में जाएगा। हालांकि गुरुदासपुर हिन्दू बहुल जिला था। यदि गुरुदासपुर पाकिस्तान में चला जाता तो भारत और कश्मीर को जोड़ने वाला कोई मार्ग बचता ही नहीं और भारत का कश्मीर से सीधा संपर्क ही समाप्त हो जाता। 15 अगस्त तक गुरुदासपुर में भारत और पाकिस्तान के झंडे लहरा रहे थे। मुसलमान पूरी तरह तैयार थे, हिन्दू हताश थे, लेकिन स्वयंसेवक हताश नहीं थे। उन दिनों राशनकार्ड पर परिवार की संख्या के साथ-साथ यह भी अंकित होता था कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान। इसका लाभ उठा कर स्वयंसेवकों ने योजना बनाई और राशन इंस्पेक्टर बन कर गांव-गांव जाकर लोगों के राशन कार्ड जांचे और आवश्यक जानकारी एकत्र कर सीमा निर्धारण आयोग को देकर उसे अपना निर्णय बदलने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार एकत्र आंकड़ों के आधार पर ही हिन्दू बहुल गुरुदासपुर जिला पाकिस्तान जाने से ही नहीं बचा, अपितु जिले के हिन्दुओं का कत्लेआम नहीं हो सका।    

जम्मू-कश्मीर
विभाजन के समय तक जम्मू-कश्मीर में संघ कार्य विस्तार पा चुका था। तभी स्वयंसेवक जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की जान बचाने में सफल हुए थे। हुआ यह कि 18 अक्तूबर से 6 दिन के प्रवास पर महाराजा सीमावर्ती गांवों में प्रवास करने वाले थे। जम्मू के पुलिस अधीक्षक और चीफ आॅफ स्टाफ आस्तीन के सांप थे। दोनों लीगी जेहनियत के थे। दोनों ने प्रवास की सूचना शत्रुओं को देकर महाराजा के अपहरण का षड्यंत्र रचा था। 21 अक्तूबर को भिम्बर में उनके अपहरण की योजना थी। स्वयंसेवकों ने दो दिन पहले इसकी सूचना महाराजा को देकर सतर्क कर दिया। महाराज ने आखिरी समय पर प्रवास में परिवर्तन किया और उनके अपहरण की योजना विफल हो गई।

कोटली नगर को जिहादियों ने घेर रखा था। कर्नल पठानिया छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ नगर की रक्षा कर रहे थे। सेना के आने की प्रतीक्षा थी। 56 दिन तक स्वयंसेवक व कर्नल पठानिया के सैनिकों ने जिहादियों से नगर की रक्षा की। तब जाकर भारतीय सेना सहायता के लिए पहुंची थी। लेकिन यह सहायता भी हिन्दुओं को कोटली से सुरक्षित निकाल ले जाने के लिए ही भेजी गई थी। इस प्रकार 56 दिनों का संघर्ष सफल होकर भी विफल हो गया और कोटली गुलाम कश्मीर में चला गया।

संघ के स्वयंसेवक हर मोर्चे पर काम करने को तत्पर थे। छाजन में सेना तो पहुंच गई थी, पर उसकी बख्तरबंद गाड़ियों और ट्रकों का छाजन पहुंचना संभव नहीं था। इसके लिए चीफ इंजीनियर दौलतराम ने एक घुमाव बनाने के लिए मजदूरों को लगाया। लेकिन मजदूर धीमी गति से काम कर रहे थे। तब चीफ इंजीनियर संघ प्रमुख अमृतसागर जी से मिले और रास्ता बनवाने में मदद की बात की। तत्काल 60 स्वयंसेवक उनके साथ कर दिए गए। स्वयंसेवक वेतनभोगी मजदूर तो थे नहीं। वे जाते ही जी-जान से काम में जुट गए और तीन घंटे में काम पूरा कर दिया।

दूसरी बार भी ऐसा ही हुआ। उस समय पुंछ में सेना को हवाई जहाज उतारने के लिए हवाई पट्टी की आवश्यकता थी। सेना भी जानती थी कि संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता जरूर करेंगे। बिग्रेडियर प्रीतम सिंह ने संघ प्रमुख अमृतसागर जी से अपनी आवश्यकता बताई। दोनों ने नागरिकों और बाहर से आए विस्थापितों की बैठक बुलाई और हवाई पट्टी निर्माण की आवश्यकता के बारे में बताया। उत्साहपूर्ण प्रतिसाद मिलते ही हजूरीबाग के विशाल बगीचे के स्थान पर हवाई पट्टी बनाने का काम प्रारंभ किया गया। देखते ही देखते पेड़ों को काटकर तथा कुछ मकानों को हटाकर बगीचे को सफाचट मैदान में तब्दील कर दिया गया। इस कार्य में स्वयंसेवकों के साथ नगरवासियों का सहयोग अतुलनीय रहा। 72 घंटे के अनवरत सामूहिक प्रयास से हवाई पट्टी तैयार हो गई और जहाजों का उतरना प्रारंभ हो गया। नित्य 35 जहाज उतरने लगे। इस हवाई पट्टी के निर्माण से भारतीय सेना की भारी कुमुक आ सकी और युद्घ का पासा पलट गया। दुश्मन सिर पर पैर रख कर भाग खड़ा हुआ। पुंछ शहर ही पाकिस्तानियों के हाथों जाते-जाते नहीं बचा, वरन् 40,000 नागरिक भी मौत के मुंह में जाने से बच गए। पंजाब की ही तरह जम्मू-कश्मीर, बंगाल, असम में भी स्वयंसेवकों ने शिविर लगा कर सहायता कार्य किया। जम्मू-कश्मीर में पं़ प्रेमनाथ डोगरा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था। जम्मू-कश्मीर सहायता समिति द्वारा 15 मार्च, 1947 से 10 अक्तूबर, 1947 तक तीन लाख लोगों को किसी न किसी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई गई। सैकड़ों परिवारों को बसाया गया। जम्मू से लेकर कठुआ तक 20 सहायता शिविर चलाए गए थे।

दिल्ली
देश के मध्य दिल्ली में भी षड्यंत्रकारियों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। 10 सितंबर को भारी उत्पात कर दिल्ली कब्जाने की देश विघातकों की योजना थी। पर स्वयंसेवकों ने जान पर खेल कर कुलपति की कोठी से योजना के कागजात अपने कब्जे में लेकर गृह मंत्री को सौंप दिए। उन कागजातों के आधार पर बड़ी सैन्य कार्यवाही के बाद दिल्ली बच सकी। दिल्ली बचाने के इस संघर्ष में 100 साहसी स्वयंसेवक शहीद हुए थे।

दिल्ली से सहायता सामग्री एकत्र कर संघ स्वयंसेवकों ने पंजाब भेजी थी। लेकिन जब विस्थापित दिल्ली आने लगे तब उनके लिए दिल्ली में भी शिविरों की व्यवस्था की गई। बिरला मिल के सामने विशाल मैदान में शिविर स्थापित किया गया। इसमें 25,000 विस्थापित रहते थे।

ताकि सनद रहे
देश विभाजन की घटना हो गई। उसे रोका नहीं जा सका। पर उससे जो संदेश हिन्दू समाज को मिला उसे समाज द्वारा पूर्णत: ग्रहण करना शेष है। विभाजन का पहला संदेश यह है कि ऐसी त्रासदियों से बचना है। वे फिर से न दुहराई जाएं। दूसरे, तब लोग उन्मादी तत्वों से अपनी बहू-बेटियों की रक्षा नहीं कर सके थे। उस लिहाज से सबल होना होगा। तीसरा संदेश यह है कि जिन्हें पाकिस्तान जाना था, वे पाकिस्तान चले गए। जो इस देश को अपना देश मान कर यहीं रह गए, उनका पूर्ण भारतीयकरण नहीं किया गया। विभाजन दु:स्वप्न नहीं, वरन् वास्तविकता था। उससे सबक लेने के लिए सतत स्मरण, चिंतन, मनन जरूरी है।

लेखक अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्टÑीय संगठन मंत्री हैं

गोवा मुक्ति के लिए बलिदान हुए राजाभाऊ

निष्पृहता कर्मयोग के अनुपम उदाहरण स्व. माणिकचंद्र वाजपेयी (मामाजी) द्वारा 2004 में लिखित पुस्तक ‘मध्य भारत की संघ गाथा’ में उल्लेख है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी ने 1948 के प्रतिबंध काल में एक प्रश्न के उत्तर में कहा था- ‘चक्रांकित तिरंगे की रक्षा के लिए स्वयंसेवक अपने प्राणों की बाजी लगा देगा।’
1955 में गोवा मुक्ति आन्दोलन में उज्जैन के राजाभाऊ महाकाल ने गुरुजी के इसे अक्षरश: सिद्ध कर दिखाया। गोवा के स्वतंत्रता के आन्दोलन में भाग लेने के लिए उज्जैन के स्वयंसेवक जत्थे का नेतृत्य प्रसिद्ध पुरातत्वेत्ता हरिभाऊ वाकणकर को करना था, पर राजाभाऊ पहले जाने की जिद पर अड़ गए। अंतत:  जत्था उनके नेतृत्व में गया। 14 अगस्त, 1955 की रात लगभग400 सत्याग्रही गोवा सीमा पर पहुंचे। 15 अगस्त को लालकिले से जैसे ही प्रधानमंत्री का भाषण शुरू हुआ, सत्याग्रही भी आगे बढ़ने लगे। सबसे पहले बसंतराव जी ओक और उनके पीछे चार-चार की संख्या में बलिदानी आगे बढ़ने लगे। पुर्तगालियों की सीमा चौकी पास आने पर उनका जोश और बढ़ गया। ‘तेरा वैभव अमर रहे मां’, ‘हम दिन चार रहें न रहें’, गीत गाते हुए राजाभाऊ भी आगे बढ़ रहे थे। पास पहुंचते ही पुर्तगाली सैनिकों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। पहली गोली ओक जी को लगी, दूसरी पंजाब के हरनाम सिंह के सीने पर। उन्हेंं गिरता देख राजाभाऊ हाथ में तिरंगा लिए शत्रु सीमा में बढ़ते चले गए। अंतत: पुर्तगालियों की गोली बेखौफ बढ़ते राजाभाऊ के सिर में लगी। वे मूर्छित होकर गिरे पर तिरंगा नहीं गिरने दिया। इस प्रकार राजाभाऊ देश पर न्यौछावरहो गए।       -लाजपत आहूजा

 

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