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होम सम्पादकीय

जैविक हथियार और भाड़े के सैनिक

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 23, 2021, 08:01 pm IST
in सम्पादकीय, दिल्ली

दुनिया के ज्यादातर लोग इस बात पर एकमत हैं कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन की वुहान प्रयोगशाला से ही हुई है। तथ्यों-तर्कोें में गहराई तक जाने वाले ज्यादातर लोग पूरी स्पष्टता और दस्तावेजों के साथ यह इंगित कर कर रहे हैं कि यह वायरस मानव निर्मित है। इस पर बहस हो सकती है कि कब योजना बनी, किसके लिए बनाया, कब इसे जारी करना था परंतु एक बात तय है कि चीन के सैन्य वैज्ञानिक इसका उपयोग हथियार के तौर पर करने का मन बना चुके थे।
(देखें रिपोर्ट)
जैसे युद्ध में हथियार का उपयोग केवल विनाश के लिए नहीं किया जाता, विनाश से लोगों भयाक्रांत किया जाता है, इस हो-हल्ले के दौरान और बाद में अपने हित साधे जाते हैं। उसी तरह महामारी (मानव जनित) के भी कई आयाम हो सकते हैं। इस दृष्टि से आकलन करने पर पाते हैं कि वास्तव में जितना बड़ा त्रासदी का स्तर है, उतनी ही बड़ी इससे जुड़ी आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं, साजिशें उभर रही हैं।
कोविड काल में अपने सभी पड़ोसियों से चीन का उलझना, उसमें भी अपना तेवर न छोड़ना, ये बताता है कि इस ‘वायरस बम’ से पैदा होने वाली वैश्विक थर्राहट को लेकर ड्रेगन के मन में एक आश्वस्ति भाव था। जब इतने बड़े विनाश का षड्यंत्र रचा जाता है तो बड़ा खाका भी खींचा जाता है। और खाका जो भी हो उसे जमीन पर उतारने वाले हरकारे, मोहरे औजार, उपकरण जरूरी होते हैं। बिसात बड़ी हो तो मोहरे हर कतार में, हर स्तर पर खड़े किए जाते हैं।
कोविड-19 ‘वायरस बम’ के मामले में भी ऐसा ही है। बिसात पूरी दुनिया है। कम्युनिस्ट शासन की हनक और महत्वाकांक्षा इसके केंद्र में है। … और प्यादे? हर जगह!
हमले के साथ राजनय और भू-राजनीति के मैदान पर भी मोर्चा मारने की पूरी तैयारियां हैं।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक खबर मुनादी करती है कि नेपाल भारत से भी बुरी तबाही की ओर जा रहा है। और अब खुद अपनी परेशानी से जूझता भारत नहीं बल्कि चीन उसकी मदद को बढ़ रहा है।
यानी, चीनी विस्तारवाद की परोक्ष झलक देती खबर का सार है- दोस्तों को उलझाओ, अपना दायरा बढ़ाओ।
इसे और स्पष्टता से समझना हो तो गौर करें कि महामारी से बेफिक्र ड्रेगन नेपाल, भूटान और भारत से लगती तिब्बत की सीमाओं पर तेजी से बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है। इस सम्बंध में कम्युनिस्ट सरकार का एक श्वेत पत्र बताता है कि इस पूरे क्षेत्र में चीन पूरी सक्रियता और बड़ी दमदारी से खड़ा होना चाहता है।
एक और बात, कोरोना संक्रमण काल में चीन के राजनय का एक और ही रूप दुनिया ने देखा है। गत वर्ष आॅस्ट्रेलियाई राजदूत से चीन की जो गर्मागर्मी हुई थी, अन्य देशों में चीन के राजनयिक जो तेवर दिखा रहे थे। यह राजनयिकों की शैली नहीं है, इसे नाम दिया गया -वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी- यानी भेड़िए की तरह हिंसक-दबंग। आज चीन अपनी गलत बात पर भी (मामला चाहे उइघुर मुस्लिम उत्पीड़न का हो या दक्षिण चीन सागर में धींगामुश्ती का) झुकने को, दबने को, दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं हैं।
राजदूतों की गर्मागर्मी के बाद आॅस्ट्रेलिया पर तो चीन ने बहुत सारे प्रतिबंध लगा दिए। किन्तु एशिया में आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत, अमेरिका का चहुँमुखी गठजोड़ (क्वाड) बनने के बाद चीन ने मीडिया के माध्यम से मित्रों में दरार डालने वाली बातें उछालना शुरू किया। कहा गया कि चीनी प्रतिबंधों के बाद आॅस्ट्रेलिया के आयात-निर्यात की कीमत पर अमेरिका अपने हित साध रहा है। यानी उसने अपने मित्र को छोड़ दिया।
ड्रैगन की दादागिरी रुकी तो बढ़ी बौखलाहट
अब बात विशेष रूप से भारत की।
भारत में भी अलग-अलग मौकों पर जो उथल-पुथल दिखाई दी, उसमें चीन पीछे खड़ा दिखाई दिया। जैसे जब भारत में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बात हुई तो चीनी कंपनियां ही नहीं बिलबिलाई, मीडिया में चीनी शह पर पलने वाले तत्वों ने भी बड़ी मजबूती से पक्ष रखने की कोशिश की कि भारत चीन से लद्दाख में उलझेगा, डोकलाम में उलझेगा तो भारत को मुंह की खानी पड़ेगी। गौर कीजिए, दिग्गज चीनी कम्पनी अलीबाबा के यूसी ब्राउजर ने भारत के बहुत से पत्रकारों को प्रशिक्षित किया था। झोली भरभर कर भुगतान हुए। यह प्रशिक्षण केवल तकनीकी भर नहीं था। वे खबरें लिखवाते थे मगर चीनी हित की छंटाई भी जमकर होती थी। आगे चलकर इस खेल की खबर हुई। लद्दाख गतिरोध के बाद तो भारत को कई चीनी कम्पनियों को बैन करना पड़ा, टिकटॉक को बैन करना पड़ा। बड़ी रकम के सरकारी ठेकों में चीन का ताल ठोकना रोका गया। भारत एक नई तकनीकी उड़ान भरने की तैयारी में था और चीन यहां भी सेंधमारी की तैयारी में था, यह भी हमने देखा। 5जी की उड़ान में चीन अब बाहर है।
गौर कीजिए, कभी खुद चीन ने तो कभी उसके वामपंथी प्यादों (जो आजकल कांग्रेस पार्टी के कर्णधारों का दफ्तर भी संभालते हैं और चीनी नेतृत्व से उनकी गुप्त भेंट तक तय कराते हैं) में एक बौखलाहट और राजनीतिक मयार्दाओं को लांघता आक्रोश लगातार दिख रहा है।
हरकारे, मोहरे औजार, उपकरण : #टूलकिट और #इकोसिस्टम
यह गुस्सा उस समय भी देखने में आया, जब भारत ने अपने सबसे बड़े, मूलभूत सुधार करने के लिए कदम बढ़ाया। अपनी आधारभूत समस्याओं को सुलझाने के लिए भारत खड़ा हुआ। ऐसे मौकों पर आंदोलन के नाम पर जो उथल-पुथल हुई, उसमें नि:संदेह उन्हें बाहर से मीडिया द्वारा और एक अघोषित अदृश्य तंत्र द्वारा ताकत मिल रही थी, नागरिकता संशोधन कानून के मामले में, कृषि सुधार कानूनों के मामले में ऐसा हुआ। सीएए आंदोलनकारियों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा प्रतिष्ठत करने की कोशिश की गई जिनका पूरा विमर्श ही झूठा था। किसी को नागरिकता देने वाले कानून को नागरिकता लेने वाला कानून बता दिया गया। राजधानी के लोगों को बंधक बनाकर प्रताड़ित किया गया। यह भी हमने देखा कि किसान आंदोलन में कथित पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने अपनी मूर्खता से वामपंथी टोली और पूरे #इकोसिस्टम की #टूलकिट का खुलासा अपनी ट्वीट में कर दिया। नामी ट्विटर हैंडल ट्वीट के लिए पैसा लेकर साम्यवाद के मुखौटे बने हुए थे। चाहे रिहाना जैसे गवैये हों या मनोरंजन के नाम पर नग्नता को व्यवसाय की तरह अपनाने वाली पोर्न स्टार मिया खलीफा, जिनके लिए नग्नता एक व्यापार है, वे सरोकार का चोला ओढ़कर आगे आए। सरोकार का पूरा नाटक टूलकिट खुलासे से बेपर्दा हुआ । इससे पूरा वामपंथ नंगा हो गया।
टूलकिट से यह भी समझ में आया कि बाजी किसी और की थी और खेल कोई और रहा था। पूंजी का विरोध करने वाले वामपंथियों ने पीआर कम्पनियों के जरिए पैसा लेकर ट्वीट करने वाले ‘कलाकार’ खरीद रखे थे।
अब बात दूसरी टूलकिट और आम आदमी के लबादे की।
दिल्ली के मुख्यमंत्री की सम्बन्धी और राज्य महिला आयोग की मुखिया स्वाति मालीवाल ने अपने नाना को अस्पताल में सुविधा न मिलने की बात सोशल मीडिया पर लिखी और तंत्र को भला-बुरा कहा। इस पर कुछ अन्य हैंडल से भी जस का तस ट्वीट होने लगे। माने, स्वाति के नाना को सबके अपना नाना बताकर ट्वीट कर दिए। मृत्यु का भी प्रहसन बना दिया! प्रकरण ने बता दिया कि कुछ लोग जो आम आदमी बनकर खड़े हैं वास्तव में उन्होंने अपने पीछे आंख मूंद कर उसे दोहराने वाला तंत्र खड़ा किया है। यह तंत्र बिना वास्तविकता परखे औजार बन कर व्यवहृत होने को तैयार है।
तीसरी टूलकिट कांग्रेस की है। जिस समय लोग आॅक्सीजन के एक-एक उठते बिंदु को आशा से और गिरते बिंदु को हताशा, भय और के संत्रास से देख रहे थे, उस समय कांग्रेस अस्पताल के बिस्तर को पार्टी संपर्कों के आधार पर दबाये रखने, रोके रखने, लोग मरें तो मरते रहें का खेल खेल रही थी। वह चाहती थी कि लोग उससे संपर्क करें, उन्हें टैग करें और जब ये सुनिश्चित हो जाए तो मदद की व्यवस्था की जाए। इस वायरस को मोदी स्ट्रेन या इंडियन स्ट्रेन कहने की ताकीद भी लोगों को की जा रही थी। साख को चुके कांग्रेस तंत्र-संगठन को आगे लाने की कोशिश, कुंभ को लांछित करना और ईद का जिक्र न करना। यानी लोगों को बांटना,लड़ाना, ये काम भी कांग्रेस इस महामारी के बीच कर रही थी।
बारी-बारी से ये तीन टूलकिट जब एक्सपोज हुर्इं तो उनके साथ मोहरे और इनका साझा तंत्र ( इकोसिस्टम) भी बेपर्दा हुए। वे हमारी राजनीति में घुस चुके हैं, वे हमारे सामजिक जीवन में आंदोलनों में घुस चुके हैं। ऐसा दिखता है कि वे मुद्दों की लड़ाई लड़ने वाले लोग हैं परंतु सच्चाई ये है कि इनकी हैसियत कठपुतलियों से ज्यादा नहीं है।
खुद को सरोकारों के सिपहसालार दिखाने वाले ये लोग वास्तव में भारत को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतों के प्यादे भर हैं।
यह समय ऐसा है जहां हमें इन मोहरों को पहचानना पड़ेगा, साथ ही अपनी जिम्मेदारी को भी समझना पड़ेगा क्योंकि जब व्यापक साजिश होती है तो उसकी लड़ाई किसी एक व्यक्ति से नहीं होती, पूरे समाज से होती है, पूरे देश से होती है।
खुद एकजुट रहकर इन प्यादों का मुकाबला पूरे समाज को करना है।

हितेश शंकर

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