कोरोना काल में चीन ने नकार, दुष्प्रचार और सैन्य हथकंडों के इस्तेमाल के मोर्चों पर तो मुंह की खाई ही, साथ ही वह अपने प्रति रही-सही सद्भावना भी गवां बैठा है। लेकिन संकट यह है कि चीन की नीतियों और रवैये में सुधार की गुंजाइश नहीं के बराबर है।
चीन निस्संदेह दुनिया की फैक्टरी है। लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि चीन दुनिया की वायरस फैक्टरी भी है। पिछले दो-तीन दशकों में बर्ड फ्लू, सार्स और फिर कोविड-19 जैसे जिन विषाणुओं ने दुनिया पर कहर बरपाया है, वे सारे चीनी धरती से ही पैदा हुए हैं। कहना होगा कि चीन की धरती विषाणुओं के मामले में भी बहुत उर्वर है। और हर बार चीन की प्रतिक्रिया वैसी ही रही है जो किसी भी दमनकारी, सर्वसत्तावादी सरकार की होती है यानी मामले को दबाना। हालांकि 2002-03 में सार्स के कहर के बाद चीन ने महामारियों से बचाव, नियंत्रण व आपदा प्रबंधन पर अपार रकम खर्च की है लेकिन तौर-तरीकों में कोई खास बदलाव नहीं दिखा है। पहला प्रयास सूचनाएं छिपाने और लीपापोती का ही रहता है। 2003 में चीनी सेना के एक वरिष्ठ चिकित्सक जियांग यानयोंग के सार्स से निधन के बाद चीन के कई डाक्टरों ने आगाह किया था किे ये महामारी है। लेकिन उनकी बात दबा दी गई। फिर वही कहानी 2019 में दोहराई गई जब मध्य चीन के शहर वुहान में नवंबर-दिसंबर में कोरोना के मामले मिलने शुरू हुए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों के बाद भी स्थानीय अधिकारी इसे छिपाने के प्रयासों में लगे रहे। यहां तक कि दो-तीन हफ्तों तक सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व ने इस पर नियंत्रण की दिशा में कोई गंभीर कदम नहीं उठाए। तब तक ये महामारी दुनिया भर में पांव पसार चुकी थी।
अवांछित आक्रामकता
महामारी जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को तबाह कर रही थी, लाखों लोग मर रहे थे, तब भी चीन का रवैया वही था जो बंदूक के जोर पर सत्ता पर कब्जा करने वाली किसी अनैतिक, अधिनायकवादी सरकार का होता है…नकार, दुष्प्रचार और धमकी के औजारों का इस्तेमाल। पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन पर दबाव डालकर उससे अपने अनुकूल बयान दिलवाए गए। लेकिन स्थिति जैसे-जैसे गंभीर होती गई, दुनिया में चीन के खिलाफ गुस्सा बढ़ता गया। अमेरिका के नेतृत्व में जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया व कनाडा जैसे देशों ने कोरोना की उत्पत्ति और शुरू में इसे छिपाने के प्रयासों की जांच की मांग की। प्रतिष्ठा पर आंच आती देख चीनी सरकार और इसके ‘वुल्फ वैरियर’ राजनयिक छवि सुधारने के लिए झगड़ालू आचरण पर उतर आए। ये राजनयिक सोशल मीडिया से लेकर टीवी व अखबारों के संपादकीय पन्नों तक पूरी मुस्तैदी से चीन के बचाव में जुट गए। हालांकि ट्विटर इनका सबसे प्रिय मंच था।
कोरोना वायरस की उत्पत्ति व शुरुआती दिनों में चीनी सरकार द्वारा इसे छिपाने के प्रयासों पर किसी भी टिप्पणी का प्रत्युत्तर धमकी भरे बचकाने बयानों व दुष्प्रचार से देने के प्रयास किए गए। चीनी विेदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने एक तनाव बढ़ाने वाले बयान में कहा कि कोरोना वायरस को अमेरिकी सेना तस्करी के जरिए चीन लाई। यूरोप से लेकर लातीन अमेरिका तक चीनी राजनयिक मेजबान देशों की सरकारों से लेकर वहां की मीडिया, बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से उलझते रहे और उनकी भाषा कूटनयिक मानदंडों के हिसाब से बेहद आपत्तिजनक थी। इस अवांछित आक्रामकता का परिणाम यह कि अप्रैल 2020 में एक समय ऐसा भी आया जब सिर्फ एक हफ्ते में कम से कम सात चीनी राजनयिकों को तलब किया गया जिनमें फ्रांस, कजाखस्तान, नाइजीरिया, केन्या, उगांडा, घाना और अफ्रीकी यूनियन के चीनी राजनयिक शामिल थे। इससे पहले मीडिया, सरकारी अफसरों व अकादमिक जगत द्वारा कोरोना से निपटने में चीनी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने पर स्वीडन, ब्रिटेन, जापान, सिंगापुर और पेरू में चीनी राजनयिकों के विवादित बयान अखबारों की सुर्खियां बन चुके थे।
ऐसा नहीं है कि चीनी राजनयिकों की बयानबाजियों से उनके घनिष्ठ समझे जाने वाले देश भी अछूते रह गए हों। चीन के बेहद करीबी वेनेजुएला के कुछ जनप्रतिनिधियों ने जब कोरोना को ‘चीनी कोरोना वायरस’ कहने की गुस्ताखी की तो चीनी दूतावास ने एक बयान में कहा कि ये नेता ‘राजनीतिक वायरस’ के शिकार हैं। दूतावास ने कहा, ‘चूंकि आप इससे बीमार हैं तो तुरंत अपना उपचार कराएं। पहला कदम ये हो सकता है आप मास्क पहनें और मुंह बंद रखें।’उधर कोरोना से बहुत कम मौतें होने के चीन के आधिकारिक आंकड़ों पर संशय व्यक्त करते हुए ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसे ट्विटर पर ‘कड़वा मजाक’ कहा तो चीनी राजदूत चांग हुआ के तीखे विरोध के बाद उन्हें तुरंत अपना ट्वीट हटाना पड़ा।
दुष्प्रचार
यह तो नकार रहा। अब दुष्प्रचार की बात करें तो मुद्दे की गंभीरता स्पष्ट होती है। कोरोना के शुरुआती दिनों में चीन को यूरोपीय देशों से खासी मदद मिली लेकिन उन्होंने इसका तमाशा नहीं बनाया। लेकिन जब चीन ने इटली व स्पेन जैसे देशों को राहत पहुंचाने के प्रयासों का आक्रामक तरीके से प्रचार शुरू किया तो कई यूरोपीय देशों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। वह भी तब जब चीन द्वारा भेजी गई ज्यादातर सामग्रियों की गुणवत्ता दोयम दर्जे की पाई गई। नीदरलैंड ने चीन द्वारा भेजे गए मास्क की एक खेप को घटिया दर्जे की बता कर इसके उपयोग से मना कर दिया। इस पर भी चीन का रवैया बेहद शमनाक रहा। उसके अधिकारियों ने कटाक्ष किए कि अगर हमारे मास्क ‘जहरीले’ हैं तो न लगाएं। यह परोक्ष धमकी थी कि सवाल उठाने पर मास्क की आपूर्ति रोकी सकती है। साथ ही चीनी सरकार और उनके विभिन्न दूतावासों, विशेष रूप से यूरोप में स्थित उसके दूतावासों ने नियमित रूप से फर्जी खबरें फैलानी शुरू कर दी।
इन सभी खबरों का उद्देश्य यूरोपीय जनता को यह दिखाना था कि चीन ने तो कोरोना पर बहुत जल्द काबू पा लिया लेकिन पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों की सरकारें इससे निपटने में विफल रही हैं और चीन यूरोप की पूरी मदद कर रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने फर्जी वीडियो शेयर किया जिसमें दिखाया गया था कि कोरोना के खिलाफ युद्ध में चीन का धन्यवाद व्यक्त करने के लिए रोम के लोग अपनी बालकनी में खड़े होकर चीनी राष्ट्रगान गा रहे हैं।
यूरोप में फ्रांस विशेष रूप से निशाने पर रहा। वर्ष 2020 के प्रारंभ से ही पेरिस स्थित चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया मंचों पर उन सभी पोस्टों को लाइक करना शुरू दिया जिसमें फ्रांस की मुख्य धारा की मीडिया पर नस्लवादी दुष्प्रचार में लिप्त होने के आरोप लगाए जाते थे। चीनी दूतावास ने 12 अप्रैल, 2020 को आरोप लगाए कि फ्रांस के कुछ सांसदों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक पर नस्ली टिप्पणी की है। दूतावास की कुछ पोस्टों में कहा गया कि यूरोपीय नेताओं ने कोरोना के खतरे को हल्के में लिया क्योंकि उन्हें लगता कि यह वायरस सिर्फ एशियाई लोगों को ही निशाना बनाएगा। चीनी दूतावास ने कोरोना पर चीन के सरकारी दावों पर सवाल उठाने पर फ्रांस के पत्रकारों को ‘झूठा’ और ‘चेतना विहीन’ करार दिया। लेकिन हद तो तब हो गई जब चीनी दूतावास ने एक आलेख में चीन की प्रशंसा और फ्रांस की निंदा करते हुए लिखा कि फ्रांस कोरोना के खिलाफ युद्ध में विफल हो रहा है और इस देश के परिचर्या गृहों (नर्सिंग होम) के कर्मचारी सामूहिक रूप से अपना काम छोड़कर भाग रहे हैं तथा सेवानिवृत्त पेंशनधारियों को भूख एवं बीमारी से मरने के लिए छोड़ रहे हैं जबकि चीन में लाकडाउन के सख्ती से पालन की वजह से वायरस पराजित हो गया। इस आलेख के लेखक का नाम नहीं बताया गया लेकिन कहा गया कि वे चीनी दूतावास में कार्यरत हैं। इस आलेख पर आपत्ति जताने के लिए फ्रांस के विदेश मंत्री ने जब चीनी राजदूत लू शाये को तलब किया तो उन्होंने विवाद भड़काते हुए पेश होने से इनकार कर दिया। लू ने कहा, वे बाद में जाएंगे और अपनी शिकायतें रखेंगे। हालांकि बाद में वे पेश हुए और दूतावास ने सुर बदलते हुए कहा कि जिन परिचर्या गृहों की बात कही गई थी, वे ताइवान के थे और आलेख में फ्रांसीसी सांसदों पर नस्ली टिप्पणी के आरोप नहीं थे।
सैन्य व आर्थिक धमकी
कोरोना काल के दौरान चीन की विदेश नीति का तीसरा घटक सैन्य व आर्थिक धमकी है। विशेष रूप से 2020 के पूर्वार्ध में जब सारा विश्व बुरी तरह से इस महामारी और लाकडाउन की चपेट में था तो दूसरी तरफ चीन की धमकाऊ कूटनीति चरम पर थी। चीन को लगा कि कोरोना की वजह से दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवथाएं पंगु हो चुकी हैं। चूंकि सभी का ध्यान इस महामारी से निपटने पर केंद्रित है, ऐसे में उसके लिए यह एशिया में अपने भूसामरिक उद्देश्यों को पूरा करने का स्वर्णिम अवसर है। फरवरी 2020 में चीनी लड़ाकू विमानों ने लगातार ताइवानी वायुक्षेत्र का अतिक्रमण किया और जवाब में ताइवान को अपने विमान भेजने पड़े। मार्च में चीन की एक मछली पकड़ने वाली नौका ने पूर्वी चीन सागर में एक जापानी युद्धपोत को टक्कर मारी। अप्रैल में चीन ने दक्षिणी चीन सागर में अपने अवैध कब्जों को वैधता प्रदान करने के उद्देश्य से पारासेल व स्प्राटली द्वीपसमूहों मे नए प्रशासनिक जिलों के गठन की घोषणा की। इसी महीने दक्षिणी चीन सागर में ही चीनी कोस्टगार्ड ने वियतनाम की मछली पकड़ने वाली एक नौका को समुद्र में डुबा दिया। आखिर में इस उम्मीद में कि भारत अभी अपनी पूरी ऊर्जा कोरोना से निपटने के प्रयास में लगा रहा है और वह त्वरित प्रतिक्रिया दे पाने में असमर्थ रहेगा, चीन की सेनाएं लद्दाख में घुस आईं।
चीन की यह भूल थी और भारत की प्रतिक्रिया उसके लिए अप्रत्याशित थी। भारत ने देखते ही देखते ही देखते चीनी सीमा पर सैनिकों और युद्धक साजोसामान का जखीरा तैनात कर दिया और चीन के लिए एक इंच आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। भारत ने इसी बीच दक्षिणी पैंगोंग झील की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने के हैरतअंगेज कारनामे को अंजाम दिया और कैलाश रेंज में चीन पर रणनीतिक बढ़त बना ली। आखिर में चीन को वार्ता की मेज पर आना पड़ा। आए थे डोकलाम का हिसाब करने लेकिन चीनी राष्ट्रपति को अपने जन्मदिन पर गलवान में मारे गए चीनी सैनिकों के शवों का उपहार मिला।
चाइनीज ड्रीम की हड़बड़ी
सवाल अवश्य उठता है कि चीन ने ऐसी गलतियां कीं कैसे? जब यूरोप के ज्यादातर देश पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व पुराने सुरक्षा गठबंधनों की अवहेलना से परेशान थे तो ऐसे समय में चीन के लिए विश्व में एक अच्छी छवि बनाने का स्वर्णिम अवसर था। लेकिन चीन ने इस अवसर को गवांया ही नहीं बल्कि अपने लिए नए दुश्मन भी बनाए। इसकी वजह शायद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग हैं जो ‘चाइनीज ड्रीम’ को पूरा करने के लिए कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी में हैं। सत्ता पर उनका पूरा एकाधिकार है और वे चीन के नए माओ हैं। इसी के साथ माओ काल की बहुत सी चीजें भी लौट आई हैं। अब देंग श्याओ पिंग के समय से चली आ रही सामूहिक नेतृत्व की नीति पलट दी गई है तथा साथ ही देंग के फेमस कथन; ‘ताकत को छिपा कर रखो और समय का इंतजार करो’ वाली नीति भी कूड़ेदान में फेंक दी गई है। अब जिनपिंग के विचार ही चीन की राष्ट्रीय नीति हैं और वे आश्वस्त हैं कि चीन का समय आ गया है। कैसे? इसका उत्तर अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एच. आर. मैकमास्टर के अब काफी प्रसिद्ध हो चुके लेख ‘हाऊ चाइना सीज द वर्ल्ड’ से मिलता है। मैकमास्टर का आखिरी चीन दौरा नवंबर, 2017 में था। और वे लिखते हैं कि चीनी प्रधानमंत्री ली क्विंग से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने व्यापार और आर्थिक संबंधों में चीन की कथित धोखाधड़ी और कुटिल नीतियों के मुद्दे पर बात करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि हमारा आर्थिक, औद्योगिक और प्रौद्योगिकी आधार बहुत मजबूत हो चुका है। चीन को अब अमेरिका की कोई जरूरत नहीं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका का योगदान अब यही हो सकता है कि वह हमें कृषि उत्पाद, कच्चा माल और पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति करता रहे ताकि हमारे कारखाने दुनिया के लिए अत्याधुनिक औद्योगिक और उपभोक्ता माल बनाते रहें। लेकिन तथ्य यह है कि ली क्विंग के तमाम दावों के बावजूद चीन अमेरिकी ताकत का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। इतिहास खंगालें तो अमेरिका की जीडीपी 1895 में ही ब्रिटेन से ज्यादा हो चुकी थी। लेकिन अमेरिका वैश्विक नेता 1945 में जाकर बना। अमेरिका उस समय ‘अपनी ताकत छिपा कर रखो और समय का इंजार करो’ की रणनीति पर चल रहा था। इस लिहाज से चीन को अभी 50 साल लगेंगे अमेरिका के बराबर पहुंचने में।
जिनपिंग लेकिन हड़बड़ी में हैं। उनकी धमकाऊ विदेश नीति (कोएर्सिव डिप्लोमेसी) के जरिए एशिया में अपनी चौधराहट कायम करने के प्रयासों के नतीजे उल्टे ही हुए हैं। एशिया से अमेरिका को बाहर करने की कोशिश, जापानी जल क्षेत्र एवं भारतीय भू-क्षेत्र में लगातार घुसपैठ व आस्ट्रेलिया के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ने का परिणाम है कि ये चारों देश एक साथ आ चुके हैं और चारों देशों का गठबंधन ‘क्वाड’ मूर्त रूप ले चुका है। जब 2007 में क्वाड के गठन की बात चली थी तो चीन ने कहा था कि यह कभी बन नहीं सकता और रूई के फाहे की तरह हवा में उड़ जाएगा। लेकिन चीनी आक्रामकता की वजह से यह अब बन चुका है और रूई का फाहा नहीं है। इन चारों देशों की अर्थव्यवस्था 2018 के आंकड़ों के हिसाब से 29.6 ट्रिलियन डॉलर की है जो चीन की 13.6 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था से दोगुनी से भी ज्यादा है। चारों देशों का सालाना रक्षा बजट 877 बिलियन डॉलर है जो चीन के रक्षा बजट से लगभग चार गुना है। जाहिर है कि चीन के लिए अब अपनी धमकाऊ विदेश नीति और सलामी स्लाइसिंग (छोटे-छोटे टुकड़ों में कब्जा करना) रणनीति पर अमल पहले की तरह आसान नहीं रहेगा।
चीनी आक्रामकता के खिलाफ यह गोलबंदी सिर्फ रणनीतिक मोर्चे पर ही नहीं है। कोरोना काल में पूरी दुनिया देख चुकी है कि चीन पर निर्भरता के नतीजे क्या हो सकते हैं? इसलिए अब आपूर्ति श्रृंखला में भी बदलाव के प्रयास भी चल रहे हैं। आम तौर पर चीन के प्रति नरम रुख रखने वाले देशों की जनता और सरकारों का रुख भी चीन के खिलाफ सख्त होता जा रहा है। जर्मनी जैसे देश इसके उदाहरण हैं जहां अब चीन पर निर्भरता कम करने की बातें जोर पकड़ रही हैं। वहां भी अब चीन को एक ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है जो येन केन प्रकारेण लोकतांत्रिक समाजों को अस्थिर करने के प्रयास में जुटा है। यूरोप के कुछ सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जिस तरह अपने देश में जनमत को नियंत्रित करने के तरीके अपनाता है, अब वह उन तरीकों को वैश्विक मंच पर आजमा रहा है। इसकी प्रतिक्रिया होनी ही है। कोरोना काल में चीन ने नकार, दुष्प्रचार और सैन्य हथकंडों के इस्तेमाल के मोर्चों पर तो मुंह की खाई ही, साथ ही वह अपने प्रति रही- सही सद्भावना भी गवां बैठा है। लेकिन संकट यह है कि चीन की नीतियों और रवैये में सुधार की गुंजाइश नहीं के बराबर है। गलतियां सुधारने के किसी भी प्रयास को सीधे तौर पर शी जिनपिंग के लिए आघात माना जाएगा जो चीनी जनता को यह विश्वास दिलाने में जुटे हैं कि चीनी साम्राज्य का पुनरुत्थान होने ही वाला है और चीन की ऋणी जनता का दायित्व है कि उन्हें आजीवन चीन का चेयरमैन बनाए रखा जाए।
आदर्श सिंह (लेखक साइंस डिवाइन फाऊंडेशन से जुड़े हैं और रक्षा व वैदेशिक मामलों पर लिखते हैं)











