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होम भारत

भूमि-सुपोषण एवं संरक्षण अभियान-मां की रक्षा के लिए उतरे पुत्र

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 16, 2021, 02:53 pm IST
inभारत

भारत में शायद पहली बार 33 संगठनों के सहयोग से धरती को बचाने के लिए एक अभियान शुरू किया जा रहा है। इसका नाम है- ‘भूमि सुपोषण एवं संरक्षण हेतु राष्ट्रीय जन अभियान।’ इसका शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी 13 अप्रैल से होगा। साढ़े तीन महीने बाद आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा यानी 24 जुलाई को इस जन अभियान का पहला चरण पूर्ण होगा।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है भारतीय कृषि चिंतन, भूमि-सुपोषण एवं संरक्षण, इन संकल्पनाओं को कृषि क्षेत्र में पुन: स्थापित करना। इस अभियान के अंतर्गत मुख्य रूप से जन जागरण एवं भारतीय कृषि चिंतन एवं भूमि-सुपोषण को बढ़ावा देने संबंधित कार्यक्रम होंगे। अभियान का प्रारंभ भूमि-पूजन से होगा। भूमि-पूजन पूरे भारत के गांव-गांव में किया जाएगा। लोगों को बताया जाएगा कि अपनी भूमि का सुपोषण करना, यह मात्र किसानों का नहीं, बल्कि हम सभी भारतीयों का सामूहिक उत्तरदायित्व है। अभियान के प्रथम चरण में भूमि-सुपोषण को प्रत्यक्ष साकार करने वाले कृषकों को सम्मानित किया जाएगा, भूमि-सुपोषण की विविध पद्धतियों के प्रयोग आयोजित होंगे। जो किसान इस दिशा में बढ़ना चाहेंगे उन्हें प्रोत्साहित किया जाएगा। नगरीय क्षेत्रों में जैविक-अजैविक अपशिष्ट को अलग रखना एवं कॉलोनी के जैविक अपशिष्ट से कंपोस्ट बनाना आदि गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त संगोष्ठी, कार्यशाला, कृषक प्रशिक्षण, प्रदर्शनी आदि गतिविधियों का भी आयोजन होगा।
अभियान के अंतर्गत लोगों से मिट्टी का क्षरण रोकने, मिट्टी के संवर्धन के उपाय अपनाने, रासायनिक खाद एवं रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग न करने, सिंचाई में पानी का अपव्यय न करने एवं मेड़ पर पेड़ लगाने का संकल्प कराया जाएगा। इसके साथ ही लोगों से यह भी कहा जाएगा कि प्लास्टिक, थर्मोकोल इत्यादि का न्यूनतम उपयोग करें और जब प्रयोग कर लिया तो उनका निबटारा सुयोग्य पद्धति से करें। लोगों से कागज एवं कागज से बनीं अन्य वस्तुओं के सीमित प्रयोग करने का निवेदन किया जाएगा, क्योंकि कागज बनाने के लिए पेड़ काटे जाते हैं, जो प्रकृति के लिए नुकसानदायक है। अभियान के पहले चरण में प्रशिक्षण, प्रत्यक्ष अनुभव लेने के लिए यशस्वी किसानों से प्रत्यक्ष भेंटवार्ता, जिला के कृषि विज्ञान केंद्र के साथ भूमि-सुपोषण मार्गदर्शन इत्यादि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। नगरों में निवास करने वाले भाई-बहन भी इस अभियान में शामिल होने के लिए अपेक्षित हैं। शहरों में जागरूकता के कार्यक्रम चलेंगे, ताकि शहरों द्वारा भूमि के नुकसान के कारणों को कम किया जा सके। यथासंभव शहरों के लोग अपने मूल गांव में भी जन अभियान के कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस अभियान के मार्गदर्शक मंडल और संचालन समिति में ऐसे किसान शामिल हैं, जो भारतीय कृषि चिंतन एवं भूमि-सुपोषण संकल्पना को प्रत्यक्ष धरातल पर क्रियान्वित कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि हमने बहुत कम मात्रा में भूमि से निकाले पोषण तत्वों का पुन: भरण किया है। वर्तमान में हमारे देश की 96.40 लाख हेक्टेयर भूमि अल्प उपजाऊ है। यह हमारे कुल भौगोलिक क्षेत्र का 30 प्रतिशत है। भारत के अनेक किसानों के अनुभव कहते हैं कि कृषि लागत मूल्य निरंतर बढ़ रहा है, भूमि की उपजाऊ क्षमता घट रही है, आॅर्गेनिक कार्बन की मात्रा भी निरंतर घट रही है। इस कारण उत्पादन भी घट रहा है। भूमि की जल धारण क्षमता और जल स्तर अधिकांश स्थानों पर घट रहा है। कुपोषित-भूमि के कारण मानव भी विभिन्न रोगों का शिकार हो रहा है। आधुनिक कृषि के कारण भूमि-सुपोषण संकल्पना की हमने अनदेखी की है। अभी उचित समय है कि हम भारतीय कृषि चिंतन एवं उसमें उपस्थित भूमि-सुपोषण संकल्पना को पुन: स्थापित करें। भूमि-सुपोषण एवं संरक्षण हेतु राष्ट्र स्तरीय जन अभियान इसी दिशा में उठाया गया प्रथम चरण है। भारतीय कृषि चिंतन में भूमि को धरती माता संबोधित किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इसके उदाहरण सहजता से पाए जाते हैं। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में कहा गया है, ‘‘माता भूमि: पुत्रोअहं पृथिव्या:।’’ भावार्थ है कि भूमि हमारी माता है एवं हम उसके पुत्र। इसलिए एक पुत्र के नाते भूमि की देखरेख और उसकी सुरक्षा करना हर मनुष्य का कर्तव्य है। यह जन अभियान गत चार वर्ष से किए जा रहे व्यापक परामर्श का परिणाम है। किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के साथ परामर्शी बैठकें, कृषक अनुभव लेखन कार्यशालाएं, कृषकों के हित में एवं कृषि क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं से परामर्श, 2018 में भूमि सुपोषण राष्ट्रीय संगोष्ठी इत्यादि से यह जन अभियान संकल्पित हुआ है।
—पाञ्चजन्य ब्यूरो

क्या है भूमि-सुपोषण!

भूमि-सुपोषण देश में हजारों वर्षों से अपनाई जाने वाली खेती की परंपरा है। किसानों की अनेक पीढ़ियों ने भूमि को अपनी माता समान मानकर उसके सुपोषण के प्रति जागरूकता बरती है। भारतीय किसानों ने देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, फसलों के अवशेष से तैयार की गई खाद व अन्य कई देसी तरीकों से अपनी भूमि की उर्वरता, उपजाऊपन को बनाए रखा है। भूमि को कुछ समय खाली रखना, विश्रांति देना, फसल के अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर पोषक तत्वों को पुन: स्थापित करना इत्यादि सुलभ एवं प्रभावी पद्धतियां भूमि-सुपोषण के लिए अपनाई जाती हैं। पारंपरिक भारतीय कृषि चिंतन के अनुसार हमें भूमि का शोषण नहीं, पोषण करना है।

अभियान में शामिल संगठन

अक्षय कृषि परिवार, बंसी गिर गोशाला, भारत सेवाश्रम संघ, भारतीय किसान संघ, ब्रह्मानन्द धाम, दीनदयाल शोध संस्थान, एकल विद्यालय, एकलव्य फाउंडेशन, गंगा सेवा संस्था, गायत्री परिवार, गो आधारित कृषि संगम, गोसेवा गतिविधि, गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र, ग्राम विकास गतिविधि, ग्राम भारती, ईशा फाउंडेशन, इस्कॉन, जीयर ट्रस्ट, श्री सिद्धगिरि मठ, कृषि प्रयोग परिवार, लोक भारती, पर्यावरण संरक्षण गतिविधि, पतंजलि योगपीठ, प्रज्ञा मिशन, रामकृष्ण मिशन, राष्टÑीय सेवा भारती, सहकार भारती, श्री रामचंद्र मिशन, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, विश्व हिंदू परिषद और यूथ फॉर नेशन।

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