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मस्जिदों पर लुटाया, मंदिरों को भुलाया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 26, 2021, 01:12 pm IST
inभारत, पश्चिम बंगाल

बंगाल की सांस्कृतिक विरासत, मठ-मंदिर और पौरााणिक स्थल वर्षों से राज्य की वर्तमान और पिछली सरकारों की घोर उपेक्षा और शर्मनाक उदासीनता का शिकार रहे हैं। इसी का परिणाम है कि प्राचीन विरासत के ये स्थल क्षतिग्रस्त होकर नष्ट होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। ये मंदिर न केवल हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों के प्रसिद्ध मंदिर हैं, वरन् कला की दृष्टि से भी अद्भुत हैं जिन्हें महान शिल्पकारों ने गढ़ा है। इन शिल्पकारों ने कुछ अविस्मरणीय और कालजयी शैलियों में काम करते हुए हिंदू धर्म के आध्यात्मिक देवों के चित्रण में समाहित अद्वितीय कला और धार्मिक पवित्रता के प्रति निष्ठा अभिव्यक्त की है।

चारबंगला मंदिर
मुर्शिदाबाद जिले के बारानगर में स्थित इस मंदिर को 1760 में नटौर के शाही परिवार की रानी भबानी द्वारा प्लासी के युद्ध के तीन साल बाद बनवाया गया था। यह मंदिर संभवत: पूरे बंगाल राज्य में टेराकोटा कला का सबसे अच्छा उदाहरण है। टेराकोटा शैली की मूर्तिकला में मंदिरों, बर्तनों तथा हस्तनिर्मित मूर्तियों को मिट्टी पका कर तैयार किया जाता है। बांकुरा जिले में पैदा हुई मूर्तिकला की यह टेराकोटा शैली सम्पन्न जमींदारों और शाही परिवारों, जैसे नटौर की रानी के संरक्षण में तेजी से पूरे राज्य में फैल गई थी। नटौर की रानी ने इस चारबंगला मंदिर को भगवान शिव के प्रति श्रद्धा के कारण बनवाया था। ज्ञातव्य है कि टेराकोटा शैली में बनी कलाकृतियां दुनिया भर के अनगिनत खरीदारों और संग्राहकों को आकर्षित करती हैं।

इस शैली के मंदिर न केवल अत्यंत सुंदर हैं, बल्कि टेराकोटा शैली में निर्मित एकमात्र ‘चार बंगला’ (मंदिरों का चतुर्भुज) है। लाखों हिंदू भक्त सदियों से यहां पूजा करने आते रहे हैं। यहां बहुत सुंदर तरीके से इसके निर्माण काल के ग्रामीण जीवन और हिंदू पौराणिक कथाओं से जुड़ी घटनाएं चित्रित हैं। रानी भबानी ने भगवान शिव को समर्पित कई सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया था, लेकिन अन्य सभी मंदिरों की तुलना में उत्कृष्ट चारबंगला उन्हें हमेशा सर्वाधिक प्रिय रहा।

भागीरथी नदी उन दिनों इस मंदिर से काफी दूरी पर बहती थी, लेकिन समय के साथ इसकी धारा में परिवर्तन हुआ और अब यह मंदिर से कुछ ही दूरी पर है। इसके कारण मंदिर के इसमें डूब जाने का खतरा पैदा हो गया है। यह नदी पहले ही इस क्षेत्र में कई हेक्टेयर खेतों और गांवों को जलमग्न कर चुकी है और फिर भी मुकुंदबाग पंचायत या जिला प्रशासन या राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों को इस मंदिर को बचाने की कोई चिंता कभी नहीं रही। इस आसन्न संकट से मंदिर को बचाने के लिए स्थानीय निवासियों और भक्तों को अब किसी चमत्कार की ही आस है। इसे राज्य सरकार की उदासीनता नहीं तो क्या कहेेंगे। जो मंदिर पर्यटकों को लुभा सकता था, स्थानीय लोगों के रोजगार के साधन विकसित कर सकता था, वह आज खुद की स्थिति पर विलाप कर रहा है।

एक गौरवमय, अद्वितीय और शानदार सांस्कृतिक और सामाजिक-धार्मिक विरासत विलुप्त होने के कगार पर है। अगर इस मंदिर को नहीं बचाया गया तो इसके साथ ही हजारों भक्तों की धार्मिक भावनाएं और गौरव की अनुभूतियां भी डूब जाएंगी। राज्य प्रशासन की अक्षम्य उदासीनता के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अब यहां के लोगों को ही जागना पड़ेगा।

इस चारबंगला मंदिर के अलावा भी पूरे राज्य में सैकड़ों प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक युग के उपेक्षित पड़े मंदिर हैं। लेकिन कभी भी राज्य सरकार का ध्यान इस ओर नहीं जाता। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि बंगाल किसी जमाने में देश का सबसे समृद्ध राज्य था जिस पर लोकप्रिय, न्यायप्रिय और योग्य शासकों का शासन था। ये सभी खुद भी पवित्र और भक्ति भाव से भरे थे। यही कारण था कि उनके द्वारा मंदिरों का निर्माण और संरक्षण किया गया। इन मंदिरों में से ज्यादातर शिव, विष्णु और देवी चामुंडा को समर्पित थे। इन्हें बंगाल और आसपास के अन्य प्रांतों के कारीगरों की मदद से बनवाया गया था और प्राचीन काल में मंदिर निर्माण की पारंपरिक भारतीय शैली से जोड़ा गया था।

समृद्धि और तेजस्विता का यह महिमापूर्ण काल सातवीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के अंत में मुस्लिम आक्रांताओं के आगमन तक रहा। फिर एक लंबे विराम के बाद इन गतिविधियों में गिरावट का दौर आया। लगभग दो सदियों तक शायद ही किसी नए मंदिर का निर्माण हुआ। इसके बाद पारंपरिक और इस्लामी कला के मिश्रण की नई शैली विकसित हुई और मंदिरों को एक नया संरचनात्मक रूप मिला। यह दौर लगभग 16वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक चला। इसके बाद यूरोप की गॉथिक शैलियों का प्रभाव पड़ा जिसके कारण मंदिरों को एक नई शैली में बनाया जाने लगा।

इस्लामी शासन के दौरान यहां कई मंदिरों पर हमला किया गया और उन्हें नष्ट कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश प्राचीन मंदिर गायब हो चुके हैं। भक्ति और कला की उत्कृष्ट और रमणीय रचनाओं का एक प्रमुख हिस्सा खो चुका है। हमारे राज्य और देश की सांस्कृतिक विरासत की यह क्षति हमेशा अपूरणीय रहेगी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी, राज्य सरकारें राज्य के हिंदू मंदिरों के रखरखाव और संरक्षण की आवश्यकता के प्रति आश्चर्यजनक रूप से उदासीन रही हैं। इसके विपरीत राज्य में सत्तासीन रही पिछली सरकारों ने मस्जिदों के रख-रखाव, उनकी मरम्मत या राज्य में नई मस्जिदों के निर्माण के लिए उदारता पूर्वक अकूूत धन लुटाया। शासन की इस तुष्टीकरण नीति के कारण कभी भव्य रहे बंगाल के मंदिरों की व्यापक और घोर उपेक्षा हुई है।

(लेखिका रवीन्द्र भारती विवि, कोलकाता में प्राध्यापक हैं)

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