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अकल्पित ज्ञानयुक्त वैदिक शब्दावली

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2021, 02:22 pm IST
in धर्म-संस्कृति

भारत ने 4,000 वर्ष पूर्व ताम्र पट्टिका युक्त ऐसी आसवन भट्ठियां विकसित की थीं, जिनसे बिना आॅक्सीकरण किए धातु रूप में शुद्ध जस्ता प्राप्त हो जाता था। इसके लिए शब्दावली भी बनाई थी, जैसे जस्ते को ‘यशद’ नाम दिया गया
भारत में रसायन उद्योग 4,000 साल पहले उन्नत था। उसी को दर्शाता है यह प्रतीकात्मक चित्र
वेदों व प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में हमारी संस्कृति और अध्यात्म के अतिरिक्त सामाजिक विज्ञान, मानविकी, भाषा विज्ञान, भौतिक विज्ञान, शरीर विज्ञान, जहाजरानी, धातु रसायन सहित उत्पादन प्रौद्योगिकी के अगणित सन्दर्भ हैं। इनकी शब्दावली को निरुक्त एवं निर्वचन अर्थात् व्युत्पत्तिपरक (एट्मोलॉजी आधारित) अर्थ से समझना होगा। विगत अंक में हृदय शब्द के निर्वचन ‘हरतेर्ददातेरयतेर्यमम्’ में हृदय के चार प्रमुख कार्य सन्दर्भित थे कि हृदय रक्त को लेता है (हरते), देता है (ददाते), घुमाता है (रयते) और धड़कनों का नियमन करता है (यमम्)।

‘वन’ शब्द का आधुनिक मौसम विज्ञानपरक निर्वचन: निरुक्तानुसार वर्षा में सहायक होने से इन्हें वन कहा जाता है। ‘वन्यते याचते वृष्टि प्रदानाय इति वना:’ अर्थात् ‘वर्षा प्रदान करने की जो मांग करता है, उसकी संज्ञा वन है’- निरुक्त यास्क द्वारा 4,000 वर्ष पूर्व किए निर्वचन/शब्द रचना के अनुरूप 2012 में सेंटर फॉर इंटरनेशनल रिसर्च के ‘रियो+20’ मौसम संबंधी सम्मेलन में डेविड एलिसन आदि कई वैज्ञानिकों ने कहा कि महासागरों के बाद वर्षा का दूसरा प्रमुख कारण वन हैं, जो वाष्पोत्सर्जन द्वारा वर्षा के लिए आवश्यक 40
प्रतिशत तक आर्द्रता
प्रदान करते हैं। निरुक्त या निर्वचन के अनुसार शब्दार्थ
यास्क के मुनि निरुक्त या निर्वचन के अनुसार शब्दार्थ या शब्दों की उत्पत्ति के कुछ उदाहरण निम्नानुसार हैं:
मंत्र शब्द का निर्वचन:- मननात् त्रायते इति मंत्र: अर्थात् मनन करने वाले की रक्षा करे, वही मंत्र है।

शंकर अर्थात् ‘शं तनोतु इति शकर:।’ इसका अर्थ है- संकटों से रक्षा करे या संकट हरे वह शंकर है।

‘वन’ शब्द का आधुनिक मौसम विज्ञानपरक निर्वचन: निरुक्तानुसार वर्षा में सहायक होने से इन्हें वन कहा जाता है। ‘वन्यते याचते वृष्टि प्रदानाय इति वना:’ अर्थात् ‘वर्षा प्रदान करने की जो मांग करता है, उसकी संज्ञा वन है’- निरुक्त यास्क द्वारा 4,000 वर्ष पूर्व किए निर्वचन/शब्द रचना के अनुरूप 2012 में सेंटर फॉर इंटरनेशनल रिसर्च के ‘रियो+20’ मौसम संबंधी सम्मेलन में डेविड एलिसन आदि कई वैज्ञानिकों ने कहा कि महासागरों के बाद वर्षा का दूसरा प्रमुख कारण वन हैं, जो वाष्पोत्सर्जन द्वारा वर्षा के लिए आवश्यक 40 प्रतिशत तक आर्द्रता प्रदान करते हैं।
यशद शब्द के निर्वचन में जस्ते या जिंक की उत्पादन प्रौद्योगिकी का धातु रसायन: जस्ते का उत्पादन अत्यन्त जटिल था। केवल भारतीय विद्वान ही इस बारे में जानते थे। उन्होंने जस्ते का नामकरण ‘यशद’ भी इसकी धातु रसायन आधारित उत्पादन अभियांत्रिकी के अनुरूप किया: ‘ताम्र: यश प्रदायते इति यशद:।’ अर्थात ताम्र यानी तांबे को यश प्रदान करने के कारण यह ‘यशद’ कहलाता है।

जस्ता 8,200 सेंटीग्रेड पर पिघलता है और 9,100 सेंटीग्रेड पर उबलने तथा जिंक आॅक्साइड में बदल जाने से उसे धातु रूप में प्राप्त करना कठिन था। भारत ने 4,000 वर्ष पूर्व ताम्र पट्टिका युक्त ऐसी आसवन भट्ठियां (डिस्टिलेशन फर्नेन्स) विकसित की थीं, जिनसे बिना आॅक्सीकरण किए धातु रूप में शुद्ध जस्ता प्राप्त हो जाता था। ताम्र पट्टिका के आॅक्सीकरण रोधक के रूप में प्रयोग किए जाने से ताम्र को यह यश मिलता था कि ताम्र के कारण यशद प्राप्ति सम्भव है। यशद खनिज को ताम्र और कार्बन के साथ मिलाकर पीतल व कांस्य का उत्पादन कर उसमें से यशद का पृथक्करण किए जाने से भी ताम्र को यश प्राप्ति होने के कारण इसे यशद कहा जाता है। इनका रूपान्तरण कर भारत ने 2,000 वर्ष पूर्व ताम्र पट्टिका रहित क्ले रिटार्ट विकसित कर लिए (देखें चित्र 1 में मिट्टी की मूस, जिसमें जस्ते का बिना आॅक्सीकरण के आसवन हो जाने से चित्र 2 की आसवन भट्ठी में यशद धातु प्राप्त हो जाती थी) ताम्र या तांबे की पट्टिका बिना आॅक्सीकरण के जस्ते के आसवन (डिस्टिलेशन) से जस्ता प्राप्त होने से 4,000 वर्ष पूर्व ‘यशद’ शब्द की रचना या निर्वचन इस जटिल प्रौद्योगिकी के सूत्र रूप में किया गया था।

निर्वचन रहित व्याख्याएं अनर्थकारी
प्राचीन ग्रंथों के शब्द निर्वचन को समझे बिना उनकी व्याख्या अनर्थकारी हो जाती है। ऋग्वेद के मंत्रों-1/101/1, 1/130/8, 2/20/7, 4/16/13, 6/47/21 और 7/5/3 में ‘कृष्ण’ शब्द का अर्थ, वेद विरोधी, असुर व मूलनिवासी करना भेदमूलक है। ऋग्वेद (1/101/1) में कृष्णगर्भा का निरुक्तानुसार अर्थ मेघ की काली घटा है। सायण ने ऋग्वेद (7/17/14) में कृष्ण का अर्थ काला बादल ही किया है। ऋग्वेद (1/130/8) में त्वच कृष्णामरन्ध्यत: का अर्थ काले मेघ छाने पर अंधकार होने से है। ऋग्वेद 2/20/7 में ‘अतरू कृष्णयोनी’ का अर्थ दासीपुत्र न होकर मेघ की काली घटाएं हैं। ऋग्वेद (4/16/13) में कृष्णवर्णा: मेघ: योनीरासा ता: कृष्णयोन्य दास्य: कृष्ण का अर्थ काला मेघ है। ऋग्वेद 6/47/21 का 16वीं सदी में महीधर ने भी कृष्ण का अर्थ व्यक्ति के लिए नहीं कर ‘काली अंधेरी रात्रि’ किया है।

ऋग्वेद 7/5/3 में अस्किनी पद का अर्थ काले रंग की आदिम जाति न होकर निघंटु 1/7 के अनुसार अंधेरी रात मेघ रात्रि है। ऋग्वेद 5/29/10 के अनास शब्द का अर्थ चपटी नाक वाले आदिवासी न होकर नासते शब्द करोति धातुपाठ के अनुसार शब्द रहित अर्थात बिना गरजने वाले मेघ से है। वैदिक शब्दों शम्बर, चुमुरि, धुनि, प्रिप्रू, वर्चिन, इलिविश आदि को आदिवासियों का मुखिया, शूद्र आदि बताना भ्रामक है।

निरुक्त 7/23 के अनुसार ऋग्वेद (1/59/6) में शम्बर का अर्थ मेघ या बादल (अभिनच्छम्बर मेघम) है। ऋग्वेद (6/18/8) के चुमुरि शब्द का ‘चमु अदने’ धातु से अर्थ है वह मेघ जो जल नहीं बरसाता। ऋग्वेद (7/99/5) में ‘वर्च दीप्तो’ धातु से बने वर्चिन का अर्थ है- मेघ जिसमें विद्युत चमकती है। ऋग्वेद के (1/33/12) इलिविश शब्द कुरान और बाइबिल का शैतान या इब्लीस न होकर निरुक्त 6/19 के अनुसार ‘‘इलाबिल शय:’’ अर्थात ‘भूगर्भ का जल’ है।

ऋग्वेद (6/20/7) में पिप्रू शब्द ‘पृृ पालनपूरणयो:’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ऐसा मेघ (बादल) जो वर्षा द्वारा प्रजा का पालन करता है। ऋग्वेद (6/20/13) मे धुनि शब्दार्थ निरुक्तानुसार 10/32 आदिवासी न होकर ‘धुनिमन्तरिक्षे मेघम’ अर्थात् धुनोति इति धुनि: अर्थात् ऐसा मेघ (बादल) जो कांपता और गर्जना करता है।

साधारण क्रियाओं में गूढ़ विज्ञान
प्राणायाम का अर्थ श्वास प्रश्वासयोर्गति विच्छेद: अर्थात् दीर्घ श्वसन या सांस लेने-छोड़ने में दीर्घ अंतराल है। घट्यर्द्धपरि अकालपलित रक्षैव च आयुर्बलं प्रदायते के अनुसार आधी घटी अर्थात 12 मिनट दीर्घ श्वसन असमय वृद्धावस्था से बचाता और आयु व बल में वृद्धि करता है। ‘तनाव जनित वृद्धावस्था’ पर 2009 की नोबेल पुरस्कार विजेता एलिजाबेथ ब्लेकबर्न ने इस सूत्र के आधार पर एक प्रयोग किया।

व्यक्ति के क्रोमोजोम पर लंबे टेलोमिअर्स होने पर असमय वृद्धावस्था नहीं आती और छोटे होने पर तनाव से असमय वृद्धावस्था के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। उन्होंने व्यक्तियों के एक समूह के टेलोमिअर्स नाप कर उन्हें दो समूहों में बांट दिया। एक समूह को 90 दिन तक 12 मिनट दीर्घ श्वसन और दूसरे समूह से 12 मिनट एरोबिक व्यायाम कराया। 90 दिन बाद दीर्घ श्वसनकर्ताओं के टेलोमरेज में 43 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई।

इस प्रकार हमारे प्राचीन वाङ्मय के शब्दों को निरुक्त या निर्वचन से समझ कर सम्यक अनुसंधान आवश्यक है।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

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