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हृदय के विद्युत स्पंदनों के वैदिक संदर्भ

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 29, 2021, 09:31 am IST
inधर्म-संस्कृति

आज चिकित्सा विज्ञान हृदय रोग में जिस पेसमेकर का प्रयोग करता है, उसके बारे में हमारे मनीषियों ने हजारों साल पहले यजुर्वेद में लिख दिया था। यह हमारे उन्नत प्राचीन ज्ञान का प्रमाण है
हृदय रोग में एरिथिमिया से जब हृदय की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं, तब बैटरी चालित पेसमेकर लगाकर उसका नियमन किया जाता है

आज के तनावपूर्ण जीवन में हृदय रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एरिथिमिया से हृदय की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं हृदय के अग्रभाग में विद्युत पूर्ति के लिए पेसमेकर लगाना पड़ता है। सर्कुलेशन जर्नल के अनुसार, प्रति 1,000 लोगों में 272 हृदय रोगी एरिथिमिया के होते हैं।

आज के समय में लगने वाले कृत्रिम पेसमेकर की 25-35 ग्राम की छोटी बैटरी को पसलियों के अंदर लगाकर वक्षस्थल के अंदर ही तार से एक इलेक्ट्रॉड हृदय के बाहरी आवरण या झिल्ली यानी पेरिकार्डियम में प्रवेश करा दिया जाता है। इस बैटरी से हृदय के अग्रभाग में इतना विद्युत आवेश दिया जाता है कि हृदय की धड़कन 70 प्रति मिनट हो जाती है। 20वीं सदी में हृदय में कृत्रिम पेसमेकर से विद्युत आवेश की पूर्ति के अनुसंधान से हजारों वर्ष, कम से कम 5,000 वर्ष पूर्व, यजुर्वेद में हृदय के अग्रभाग में विद्युत के महत्व का स्पष्ट विवेचन है। सामान्यत: हृदय के प्राकृतिक पेसमेकर की जैव विद्युत से हृदय के स्पंदनों का नियमन होता है। उन स्पंदनों में कमी पर बैटरी द्वारा कृत्रिम पेसमेकर से हृदय को अतिरिक्त विद्युत आवेश दिया जाता है। यजुर्वेद में हृदय के अग्रभाग में विद्युत का वैसा ही संदर्भ हमारे उन्नत प्राचीन ज्ञान का प्रमाण है।

यजुर्वेद का मंत्र
अग्नि हृदयेनाषनिं हृदयाग्रेणं पशुपति कृत्स्वहदयेन भुवं युक्ना।
शुर्व मतंस्राभ्यामीषानं मन्युनां महोदेवमन्त:
पर्शव्येनोग्रंद्ेवं वंनिश्ठुनां वसिश्ठहनु: शिड्गीनि कोष्याभ्यांम्॥॥ (यजुर्वेद 39-8)

अर्थात ‘‘मैं हृदय में अग्नि एवं हृदय के अग्रभाग में विद्युत को धारण करूं और पसलियों के अंदर ऊर्जा के आवेश की वृद्धि के स्रोत को धारित करता हूं।’’ वैदिक सस्ंकृत में अषनि का अर्थ विद्युत होता है। सभी वैदिक निघंटु ग्रंथों में एक मत से अषनि का अर्थ या पर्यायवाची विद्युत है। निघंटु (पर्यायवाची कोश) ग्रंथों में वैदिक शब्दावली के पर्यायवाची शब्दों का वैसा ही संग्रह है, जैसा अंगे्रजी के पर्यायवाची शब्द-संग्रह ‘थिसॉरस’ में है।

सातवलेकर जी की 100 वर्ष पुरानी व्याख्या का भावार्थ है- मनुष्य हृदय में अग्नि एवं हृदय के अग्रभाग में अषनि अर्थात् विद्युत को धारण करे। (कृत्स्नहदयेन पशुपतिम्) हृदय के समस्त अवयवों अर्थात् सभी भागों में इंद्रियों के पोषक प्राण को धारण करे, कलेजे से सर्वत्र विद्यमान आकाश तत्व एवं गुर्दों से जल को धारण करे। मन्यु से सब पर शासनकर्ता ऐश्वर्यवान ईषान को धारण करे और पसलियों में त्रिनेत्रधारी परमेश्वर को धारण करे। (स्थानाभाव के कारण मंत्रार्थ यथावत न देकर संक्षिप्त भावार्थ दिया गया है।)

स्वामी दयानंद सरस्वती का 150 वर्ष प्राचीन पदान्वय- हे मनुष्यों! जो वे मरे हुए जीव (हृदयेन) हृदयरूप अवयव से (अग्निम्) अग्नि को (हृदयाग्रेण) हृदय के ऊपरी अग्रभाग से (अशनिम्) बिजली को (कृत्स्नहदयेन) संपूर्ण हृदय के अवयवों से (पशुपतिम्) पशुओं के रक्षक जगत धारणकर्ता सबके जीवन हेतु परमेश्वर को (यक्ना) यकृद्रूप शरीर के अवयवों से (भवम्) सर्वत्र होने वाले ईश्वर को (मतस्नाभ्याम्) हृदय के इधर-उधर के अवयवों से (शर्वम्) विज्ञानयुक्त ईश्वर को (मन्युना) दुष्टाचारी और पाप के प्रति वर्तमान क्रोध से (ईषानम्) सब जगत के स्वामी ईश्वर को (अन्त:पर्शव्येन) भीतरी पसुरियों के अवयवों में हुए विज्ञान से (महादेवम्) महादेव (उग्रम् देवम्) तीक्ष्ण स्वभाव वाले प्रकाशमान ईश्वर को (वनिष्ठुना) आंत विशेष से (वसिष्ठहनु:) अत्यन्त वास के हेतु राजा के तुल्य ठोडी वाले जन को (कोश्याभ्याम्) में दो मांस पिंडों से (शिङगीनि) जानने व प्राप्त होने योग्य वस्तुओं को प्राप्त होते हैं, ऐसा तुम लोग जानो।

मंत्र की सामयिक व्याख्या
हृदय के अग्निमय तेज में कमी से उपजे जीवन संकट की दशा में हृदय के अग्रभाग में अतिरिक्त विद्युत आवेश की आपूर्ति की जाए। इस हेतु पसलियों में विद्युत स्रोत लगाकर हृदय के अग्रभाग में एक या दोनों निलयों (वेण्ट्रिकल्स) को विद्युत आवेश की पूर्ति कर प्राण रुपी हृदय के स्पंदनों कर नियमन करें।

दयानन्द सरस्वती उपरोक्त पदान्वय में ‘अषनि हृदयाग्रेण’ शब्दों से हृदय के अग्रभाग में विद्युत धारण करने का उल्लेख किया है। मंत्र में द्विकोष्ठ लिख कर आवश्यकता पर दोनों निलयों में भी विद्युत स्पंदन दिये जाने का संदर्भ है। इसके लिए कोश्याभ्याम् लिख कर दोनों मांसपिंडों अर्थात् हृदय के दोनों निलयों में विद्युत स्पंदन का भी स्पष्ट उल्लेख है। आजकल कभी-कभी दो कोष्ठ वाले कृत्रिम पेसमेकर भी लगाए जाते हैं। रोग की गंभीरता की दशा में दाहिने आलिंद व दोनों निलयों में भी विद्युत स्पंदन देने पड़ते हैं। उस दृष्टि से मंत्र में भी कृत्स्नाहृदयेन एवं मत्सनाभ्याम शब्दों से ‘सम्पूर्ण हृदयायवों में विद्युत की पूर्ति’ का उल्लेख भी अत्यन्त सटीक व महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। विद्युत पूर्ति के लिए बैटरी को पसलियों के अंदर लगाने के आज के चलन को देखते हुए मंत्र में ‘अन्त: पर्शर्व्यन’ अर्थात् पसलियों के अंदर शब्दों का प्रयोग भी सार्थक लगता है।

वस्तुत: ‘हृदयागे्रण अषनि’ शब्दों से हृदय के अग्रभाग में विद्युत धारण का उल्लेख, कोश्याभ्याम् शब्द से दो मांसपिंडों (दोनों निलयों) में द्विकोष्ठ पेसमेकर लगा कर विद्युत आपूर्ति देने का निर्देश कभी-कभी ‘हृदय के दाहिने आलिंद व दोनों निलयों में विद्युत आपूर्ति देने के आज के चलन के अनुरूप मतस्नाभ्याम व कृत्स्नाहृदयेन शब्दों का उपयोग कर ‘हृदय के सर्वावयवों’ (सभी अंगों में विद्युत पूर्ति) का संकेत और पसलियों के अंदर बैटरी लगाने के चलन के संदर्भ में आन्त:र्पशव्येन अर्थात् ‘पसलियों के अंदर’ शब्दों का उपयोग कुछ लोगों का संयोग मात्र लग सकता है। लेकिन संयोग न हो कर इन शब्दों का उपयोग सप्रयोजन लगता है व सम्भवत: आज जैसे पेसमेकर प्राचीन काल में चलन में रहे भी हो सकते हैं।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

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