बिहार/ रपट -अब और चारा ही क्या!
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बिहार/ रपट -अब और चारा ही क्या!

Written byArchiveArchive
Jan 15, 2018, 12:00 am IST
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दिंनाक: 15 Jan 2018 11:11:10

पशुओं के चारे के नाम पर सरकारी धन का गबन करने वाले लालू अब जेल में कैद हैं। उन्हें दूसरी बार सजा हुई है। पहले पांच साल की सजा हुई थी। उम्मीद है कुछ दिनों बाद  चारा घोटाले के अन्य मामलों का भी निर्णय आ जाएगा

संजीव कुमार, पटना से

राष्टÑीय जनता दल के अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को चारा घोटाले में दूसरी बार सजा हुई है। आने वाले दिनों में उन्हें ऐसी ही सजा और मिल सकती है, क्योंकि अभी भी चार मामले चल रहे हैं। लेकिन उनके कुनबे के लोग और समर्थक उन्हें पूरी बेशर्मी के साथ ‘नायक’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और कह रहे हैं कि यह सब केंद्र सरकार की साजिश से हो रहा है। यह झूठा प्रलाप सिर्फ भ्रष्टाचार के दाग को कम करने के लिए किया जा रहा है। एक तरह से ये लोग अदालत के निर्णय पर भी अंगुली उठा रहे हैं। खैर, जैसी जिसकी सोच। आगे बढ़ने से पहले लालू की राजनीतिक यात्रा को एक नजर देखना जरूरी है। लालू 1977 में जनता लहर पर सवार होकर लोकसभा पहुंचे थे। उन्होंने कांग्रेस विरोध की राजनीति शुरू की और 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनके कारनामों ने ही उन्हें बिहार की राजनीति में हाशिए पर धकेल दिया।

आका से पहले चाकर पहुंचे जेल
लालू के कुछ दरबारियों को जब यह यकीन हो गया कि अब ‘साहब’ जेल जाएंगे ही तो उन्होंने उनकी सेवा के लिए दो लोगों को जेल भेजने की भूमिका बनाई। एक साजिश के तहत रांची के सुमित यादव और लक्ष्मण नामक दो लोगों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई और उन्हें जेल भेज दिया गया। क्या पुलिस के सहयोग के बिना ऐसा हो सकता है? यकीनन नहीं। हालांकि बाद में पुलिस ने इस मामले की जांच कराने की भी बात कही।

बिहार में चारा घोटाले के पैसे ने 80 के दशक में ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। 1985 में चारा घोटाले की भनक लगनी शुरू हुई। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक टी़ एऩ चतुर्वेदी ने महसूस किया कि बिहार सरकार मासिक आय-व्यय का ब्योरा देने में देरी कर रही है। हालांकि तब बात आई-गई हो गई। 1990 के बाद सबके ध्यान में आने लगा कि कुछ गड़बड़ है। 1992 में राज्य सरकार के सतर्कता विभाग में पदस्थापित पुलिस इंस्पेक्टर विधु भूषण द्विवेदी ने एक रपट में चारा घोटाले का जिक्र करते हुए कहा था, ‘‘इसमें मुख्यमंत्री और राज्य के कई वरिष्ठ पदाधिकारी संलिप्त हैं, लेकिन सरकार ने उनके इस कार्य के लिए उन्हें निलंबित कर दिया था।’’ बाद में झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर उनकी सेवा फिर से बहाल की गई।
बाद में यह मामला वित्त विभाग के तत्कालीन मुख्य सचिव विजय शंकर दूबे के संज्ञान से उद्घाटित हुआ और अपने मुकाम तक पहुंचा। जुलाई, 1995 में बिहार सरकार के पास कर्मचारियों को वेतन देने लायक पैसा नहीं था। उसी वर्ष सितंबर-अक्तूबर में उनके संज्ञान में आया कि पशुपालन विभाग का खर्च बजटीय प्रावधान से पांच गुना ज्यादा है। जब उन्होंने तहकीकात शुरू की तो 19 जनवरी, 1996 को पाया कि इस विभाग को बजट से अधिक राशि दी गई है। उन्होंने तत्काल सभी जिलाधिकारियों को एक वाक्य का संदेश फैक्स किया कि कृपया पशुपालन विभाग द्वारा पिछले तीन वित्तीय वर्ष में किए गए खर्च का ब्योरा भेजें और यहीं से चारा घोटाले का जिन्न निकलना शुरू हुआ। 20 जनवरी को उन्होंने अपने विभाग के अतिरिक्त सचिव को रांची भेजा और उनसे गत तीन वर्ष का हिसाब लाने को कहा। अतिरिक्त सचिव ने 21 जनवरी को उन्हें रपट देते हुए कहा कि न सिर्फ बजटीय प्रावधान से ज्यादा खर्च हुआ है, बल्कि सारे बिल और वाउचर भी नकली हैं। उन्होंने 27 जनवरी को चाईबासा के तत्कालीन जिलाधिकारी अमित खरे को कोषागार पर छापा मारने को कहा और चारा घोटाला पूरे देश के सामने आया। यह घोटाला 950 करोड़ रु. का था।
पशुओं के चारे की खरीद और आपूर्ति के नाम पर अरबों रु. का वारा-न्यारा हुआ। ऐसी कंपनियों ने चारे की आपूर्ति की जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थीं। घोटाले की गूंज जब बढ़ने लगी तो मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने वित्तीय अनियमितता देखने के लिए एक समिति गठित कर दी। ऐसी आशंका जताई जाने लगी कि बिहार पुलिस बिहार सरकार के प्रति जवाबदेह है और जिस मामले में मुख्यमंत्री स्वयं अभियुक्त हों, उसमें बिहार पुलिस की निष्पक्षता शायद संभव नहीं है। अंतत: मार्च, 1996 में पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले को सीबीआई के सुपुर्द कर दिया। सीबीआई के क्षेत्रीय निदेशक यू़ एऩ विश्वास के नेतृत्व में एक टीम ने सघन जांच की और पाया कि इस घोटाले में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी शामिल हैं। उस वक्त सीबीआई के निदेशक जोगिंदर सिंह थे। उन्होंने एक जगह जिक्र किया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने चारा घोटाले में आरोपी के प्रति उनसे नरमी बरतने के लिए कहा था, परंतु जब श्री  सिंह ने उनसे लिखित आदेश मांगा तो वह नहीं मिला।
राज्यपाल ने 17 जून, 1997 को लालू प्रसाद पर मुकदमा चलाने की अनुमति दी। सीबीआई ने पांच अभियुक्तों को हिरासत में ले लिया, जिनमें चार आईएएस- महेश प्रसाद (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव), के़ अरुमुगम (श्रम सचिव), बेक जुलियस (पशुपालन विभाग के सचिव) तथा पूर्व वित्त सचिव फूलचंद सिंह एवं पशुपालन विभाग के पूर्व निदेशक रामराज राम शामिल थे। सीबीआई ने 21 जून को लालू प्रसाद के ठिकाने पर छापेमारी की और 23 जून की अपनी चार्जशीट में लालू समेत 55 अन्य को मुख्य अभियुक्त माना। अभियुक्तों पर 63 मामले दर्ज किए गए, जिनमें आईपीसी की धारा 420, 120बी और 13बी शामिल है।
30 जुलाई, 1997 को लालू इस मामले में पहली बार जेल गए। वे 134 दिन की सजा काटकर 11 दिसंबर, 1997 को रिहा हुए। वे उस समय से अभी तक इस मामले में सात बार जेल जा चुके हैं। 28 अक्तूबर, 1998 को 73 दिन के लिए, 5 अक्तूबर, 1999 को 35 दिन के लिए, 28 नवंबर, 1999 को 1 दिन के लिए, 26 नवंबर, 2001 को 59 दिन के लिए, 30 दिसंबर, 2013 को 78 दिन के लिए और 23 दिसंबर, 2017 से लिखे जाने तक जेल में हैं।
विडंबना तो यह कि यह बात मिथक बन गई है कि लालू जब-जब जेल गए हैं और ज्यादा ताकतवर होकर सामने आए हैं। पर आंकड़े बताते हैं कि वे जेल जाने के बाद कमजोर हुए हैं। 1990-91 में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। 1991 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस लहर के बावजूद 31 सीटें जीती थीं। 1995 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कुल मतों का 34़ 5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए, जो राजद (उस समय जनता दल) के लिए एक कीर्तिमान है। उनकी पार्टी ने 264 सीटों में से 167 सीट पर जीत हासिल की थी। पर बाद में लालू की स्थिति कमजोर होती चली गई। 2000 के विधानसभा चुनाव में उन्हें 124 सीटें हासिल हुर्इं। उन्हें सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का सहारा लेना पड़ा। 2002 में लालू जेल से छूटकर आए थे लेकिन 2005 के विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। 2010 में भी उन्हें भाजपा और जदयू के हाथों हार मिली। 2013 में नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़कर लालू के सहारे सरकार चलाने का निर्णय लिया। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने नीतीश और लालू की जोड़ी टिक नहीं सकी। हालांकि 2015 के विधानसभा चुनाव में यह जोड़ी सफल रही। लेकिन लालू की भ्रष्टाचारी छवि से नीतीश परेशान होते रहे और अंत में उन्होंने भाजपा के साथ ही जाना अच्छा समझा।
इस बार विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह की अदालत ने 21 साल पुराने देवघर कोषागार से अवैध निकासी के मामले (64 ए/96) में लालू सहित 16 अभियुक्तों को सजा सुनाई। न्यायाधीश ने लालू को दोषी मानते हुए साढ़े तीन वर्ष की सजा और 5,00,000 रु. का जुर्माना लगाया है। लालू को मिली सजा से उनकी पार्टी राजद की छवि एक बार फिर से दांव पर है। पार्टी की छवि को बचाने के लिए ही उनके दोनों बेटे और अन्य नेता झूठ पर झूठ बोल रहे हैं। लेकिन उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई कि जो लालू कांग्रेस विरोध की राजनीति करके नेता बने, उन्हें अब कांग्रेस के हाथ का सहारा लेना पड़ रहा है? भ्रष्टाचार के कारण कांगे्रस डूबी और अब राजद भी डूबने की राह पर है। इसका खामियाजा तो उसे भुगतना ही पड़ेगा। 

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