संस्कृति-माघ की महिमा अपार
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संस्कृति-माघ की महिमा अपार

Written byArchiveArchive
Jan 8, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 08 Jan 2018 14:21:05

सनातन पंचांग के 11वें महीने माघ का नाम मघा नक्षत्र के कारण पड़ा। इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा मघा नक्षत्र में होता है। यह महीना अपने साथ नवजीवन, नव ऊर्जा लेकर आता है। इस माह मनुष्य तो क्या, पूरी सृष्टि में नवचेतना जाग्रत हो जाती है

सर्जना शर्मा

हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के चक्र का  सूक्ष्म अध्ययन  कर हमारी दिनचर्या और खानपान को ऋतुओं के साथ कुछ इस तरह जोड़ा है कि मनुष्य के तन-मन को हर तरह से लाभ मिले। माघ महीने में सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण होती है। सूर्य का यह परिवर्तन मकर संक्रांति कहलाता है। मकर संक्रांति को देवताओं का प्रभात कहा जाता है। महाभारत में उत्तरायण को देवयान कहा गया है। माना जाता है कि सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो देवताओं की रात होती है और जब उत्तरायण होता है तो देवताओं का दिन आरंभ होता है। शुभ कार्य भी इसी दिन से आरंभ होते हैं। देशभर में यह त्योहार अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। सूर्य के उत्तरायण होने से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। यह महीना स्वास्थ्य की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। इस महीने का हर त्योहार तिल और गुड़ से जुड़ा है। शास्त्रों के अनुसार माघ महीने में तिल-गुड़ का दान करने से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके पीछे स्वास्थ्य से जुड़ा गहन रहस्य है। ऋषि-मुनियों ने इसे धर्म से शायद इसलिए जोड़ा कि हम इसी बहाने अपने शरीर का पोषण करेंगे। तिल और गुड़ शरीर को कैल्शियम और आयरन देते हैं। माघ चतुर्थी से लेकर पूर्णिमा तक हर त्योहार तिल, गुड़ और खिचड़ी से जुड़ा है।
ग्रंथों में महिमा का बखान
माघ मास का जितना हमारे जीवन में आयुर्वेदिक महत्व है, उतना ही धार्मिक भी। श्रीरामचरितमानस, पद्मपुराण, मत्स्यपुराण, महाभारत और निर्णय सिंधु आदि ग्रंथों में इस महीने की महिमा का वर्णन है। इस महीने में किए गए स्नान, दान, तप और तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास को अनेक यज्ञों के समान माना गया है।
प्रयाग में संगम में डुबकी लगाने के लिए देशभर से श्रद्धालु एकत्र होते हैं।  ये श्रद्धालु एक महीने तक कल्पवास करते हैं, जिसे आम भाषा में माघ मेला कहा जाता है। संगम के किनारे मेला क्षेत्र में पूरा शहर बस जाता है। माना जाता है कि माघ में 33 करोड़ देवी-देवता तीर्थराज प्रयाग आते हैं। सनातनधर्मी उनका आशीर्वाद लेने यहां एकत्र होते हैं।  कल्पवासी एक महीने तक कठिन नियमों और व्रतों का पालन करते हैं। उनका दिन ब्रह्ममुहूर्त से आरंभ हो जाता है। संगम में स्नान के बाद वे ध्यान, पूजा-पाठ और दान करते हैं। कई कल्पवासी एक समय ही भोजन करते हैं। कहा जाता है कि प्रयागराज में एक महीने का कल्पवास करने से अनेक अश्वमेध यज्ञों के समान फल मिलता है। कल्पवास का अर्थ है काया का शोधन, लेकिन यहां काया शोधन के साथ- साथ मन और आत्मा का शोधन भी किया जाता है। भारत और ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिकों ने 1,000 कल्पवासियों पर शोध किया और पाया कि उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता में सकारात्मक परिवर्तन हुए। शारीरिक क्षमता बढ़ी और रोगों से मुक्ति मिली। कल्पवास पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक रहता है। कहा जाता है कि जो नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए माघ मास में प्रयागराज में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को जाता है। माघ महीने के हर दिन को पर्व माना गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का शकट चतुर्थी व्रत होता है, जिसे तिलकुटा चतुर्थी भी कहते हैं। तिल और गुड़ से तिलकुट बनाया जाता है जिसका गणेश को भोग लगाने के साथ-साथ स्वयं भी सेवन किया जाता है। आयुर्वेद में तो यह भी कहा गया है कि इस महीने में तिल को अपने भोजन का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। रोटी बनाते समय आटे और खिचड़ी में तिल डालें। इससे सालभर का कैल्शियम शरीर में एकत्र हो जाता है।
पर्वों की वेला
मकर संक्रांति पर्व भारत के हर राज्य में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। इसे पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहू, गुजरात में उत्तरायण, दक्षिण में पोंगल, बिहार, बंगाल, ओडिशा आदि राज्यों में संक्रांति के नाम से मनाया जाता है। इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, घी, कंबल आदि का दान किया जाता है। गुजरात में मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा है। यह महज एक मनोरंजन नहीं, बल्कि मकर संक्रांति को छत पर जाकर खुले में उत्तरायणी सूर्य की धूप लेने का भी एक तरीका है। मार्गशीर्ष और पौष की कड़ाकेदार सर्दी में लोग घरों में दुबके रहते हैं और सूर्यदेव भी कभी आते हैं, कभी नहीं। दिन भी बहुत छोटे होते हैं। उत्तरायण के सूर्य की धूप से शरीर को विटामिन डी मिलता है। माघ महीने की धूप सेंकना सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। विटामिन डी के बिना कैल्शियम शरीर में नहीं घुलता।
माघ अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन मौन रहने का विधान है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है, ‘‘शब्दों में मैं मौन हूं। मौन रहने से विचार शक्ति बढ़ती है।’’ कहा जाता है कि दिनभर में हम कुल मिला कर 350 शब्द ही सार्थक बोलते हैं, बाकी हम उन्हीं को दिनभर दोहराते हैं। माघ महीने की एकादशी को षटतिला एकादशी कहते हैं। इस दिन तिल के जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल मिले जल का पान, तिल मिला भोजन और तिल का दान करना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने ऋतुओं के अनुसार त्योहार बनाए और खानपान, जो हमारे लिए लाभदायक है, उसको धर्म और दान से जोड़ा। तिलों का छह प्रकार से प्रयोग भी उसी का एक हिस्सा है। माघ मास में ही आता है ऋतुराज वसंत पर्व। वसंत को ऋतुराज और रसराज भी कहा जाता है। वसंत पंचमी शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनायी जाती है। यह विद्या, कला, वाणी और  ज्ञान  की देवी सरस्वती  के पूजन का पर्व है। हर शुभ कार्य के लिए यह दिन अति श्रेष्ठ है। वसंत के आगमन का यह पर्व ऋतुराज के स्वागत का पर्व है। पीले वस्त्रों और पीले भोजन से ऋतुराज का स्वागत किया जाता है। पीला रंग जहां शरीर को ऊर्जा देता है, वहीं पीला भोजन शीत ऋतु के दो महीने में शरीर में जमे कफ को बाहर करता है। वसंत पंचमी से होली तक हल्दी का सेवन शरीर से समस्त कफ को बाहर कर देता है। हल्दी वाले चावल, हल्दी की सब्जी, हल्दी के अचार का सेवन इन दिनों करना शरीर के लिए अत्युत्तम    बताया गया है।
नवरात्र का आनंद
सालभर में चार नवरात्र आते हैं, जिनमें से दो मुख्य रूप से मनाए जाते हैं और दो साधकों और सिद्धियों के लिए हैं। माघ महीने के शुक्ल पक्ष यानी मौनी अमावस्या के अगले दिन से गुप्त नवरात्र आरंभ हो जाते हैं। इसी महीने में भीष्म पितामह ने अष्टमी को अपना शरीर छोड़ा था।
यह सूर्य की पूजा और अर्चना का महीना है। सूर्य का उत्तरायण होना प्रकृति में बड़े परिवर्तन का प्रतीक है। इसी के साथ गेहूं पकने लगता है, गन्ना पकने लगता है, नवांकुर आने लगते हैं। माघी पूर्णिमा के दिन बड़ा मेला लगता है। संगम और पवित्र नदियों में स्नान के साथ ही माघ महीना समाप्त हो जाता है।      ल्ल

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