सऊदी अरब और आतंकवाद- सलमान का ‘अरमाने अमन’!
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सऊदी अरब और आतंकवाद- सलमान का ‘अरमाने अमन’!

Written byArchiveArchive
Dec 11, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 11 Dec 2017 11:11:11

कट्टर वहाबीवाद को पोसते आ रहे सऊदी अरब के शहजादे बिन सलमान ने अब आतंकवाद की कमर तोड़ने का बीड़ा उठाने की बात की है। पर रक्षा विशेषज्ञ सशंकित हैं क्योंकि सऊदी  पैसे पर पनपे अवैध मदरसों ने ही तो यह जहर फैलाया है

सतीश पेडणेकर

सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले दिनों दुनिया से आतंकवाद खत्म होने तक आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का ऐलान किया। उन्होंने कहा, ‘‘आज हम एक मजबूत संदेश दे रहे हैं कि हम आतंकवाद के खिलाफ साथ मिलकर युद्ध करेंगे।’’ शहजादे ने इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ गठबंधन में शामिल 40 मुस्लिम देशों के अधिकारियों की बैठक के दौरान यह बात कही।
हालांकि यह बयान आज के माहौल में सकारात्मक दिखता है, मगर जो लोग सऊदी अरब की मंशा को जानते हैं, उन्हें यह बयान सुनकर अचंभा हुआ होगा। क्योंकि सऊदी अरब को दुनियाभर में फैले इस्लामी आतंक का एक तरह से पोषक माना जाता है। अल कायदा  का संस्थापक ओसामा बिन लादेन, तालिबान का मुखिया मुल्ला उमर, बोको हरम का नेता शेकाऊ, आईएसआईएस सरगना अल बगदादी आदि दुनिया के शीर्ष आतंकवादियों में एक बात समान है कि इनके संगठन वहाबी हैं। लिहाजा वहाबी इस्लाम आज की दुनिया में इस्लामी कट्टरवाद का प्रतिनिधि चेहरा है। वहाबी आतंकवाद की धारा फूटती है सऊदी अरब से। उसके पैट्रो डॉलर ही दुनियाभर में वहाबी विचारधारा को फैलाने का काम करते हैं।
पिछले कुछ दशकों में वहाबी आंदोलन सारी दुनिया में फैल गया है और उसके साथ फैला है वहाबी आतंकवाद। यही वहाबी इस्लाम सऊदी राजवंश के पीछे की ताकत है। प्रसिद्ध लेखक और अमेरिकी विदेश नीति के मुखर आलोचक नोआम चोमस्की ने सऊदी अरब द्वारा आतंकवादी गुटों की सहायता का उल्लेख करते हुए कहा है कि वहाबी विचारधारा चरमपंथ का मूल स्रोत है। उनके कथनानुसार सऊदी अरब न केवल आतंकवादियों की सहायता करता है, बल्कि कट्टरवाद फैला रहे मदरसों और मौलवियों को पैसा देकर विश्व भर में इस विचारधारा को बल देता आया है और इसी विचारधारा के कारण सऊदी अरब चरमपंथ का केन्द्र बना है।
चोमस्की बात में दम है। 1960 के दशक से सऊदी अरब ने वहाबी इस्लाम के प्रसार के लिए भारतीय उपमहाद्वीप सहित शेष विश्व के सैकड़ों मदरसों और मस्जिदों को 100 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक मदद भेजी है। शीर्ष अमेरिकी सीनेटर क्रिस मर्फी की मानें तो पाकिस्तान में 24,000 मदरसों को सीधे सऊदी अरब से आर्थिक सहायता पहुंचती है। भारत में भी कट्टर मुस्लिम गुट इसी वहाबी इस्लाम के शिकंजे में जकड़े हुए हंै। सुरक्षा एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2011-13 में 25,000 वहाबी प्रसारक भारत पहुंचे थे और उन्होंने वहाबी सोच के प्रचार के लिए लगभग 1,700 करोड़ रुपये खर्च किए थे।
धीरे-धीरे अमेरिकी मीडिया में भी अब सऊदी अरब की तीखी आलोचना होने लगी है। अमेरिकी पत्रकार फरीद जकारिया ने लिखा, ‘‘सऊदियों ने इस्लाम की दुनिया में राक्षस पैदा कर दिया है। अब राजनीतिक नेता भी सऊदी को खलनायक मानने लगे हैं।’’ अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के नजरिये में पूरब-पश्चिम जैसा अंतर था। लेकिन दोनों सऊदी अरब के मुद्दे पर एकमत थे। हिलेरी क्लिंटन का आरोप था कि सऊदी अरब ने दुनिया भर में कट्टरपंथी मदरसे और मस्जिदें बनाने में मदद की है। वहीं डोनाल्ड ट्रंप उसे आतंकवाद की वित्तीय मदद करने वाला सबसे बड़ा देश करार दे चुके हैं। यह बात अलग है कि राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने सबसे पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की की, क्योंकि अमेरिका सऊदी अरब का सबसे बड़ा संरक्षक है। आतंकवाद  का पोषक माना जाने वाला देश उसे खत्म करने की बात करे तो शंका होती ही है कि कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं है। सऊदी अरब ने कुछ वर्ष पहले ‘नाटो’ की तर्ज पर मुस्लिम देशों का संगठन बनाया था और ऐलान किया था कि 39 इस्लामिक देश इसके सदस्य होंगे। कहा जा रहा था कि इस गठजोड़ का मकसद आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई छेड़ना है। सऊदी अरब में 24 घंटे के भीतर दो राजकुमारों की हत्या के बाद देश में राजनीतिक संकट और गहरा गया है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब की राजशाही व्यवस्था में परिवर्तन और शाही परिवार के कुछ सदस्यों की गिरफ्तारी देश की 85 वर्ष पुरानी तानाशाही में बुनियादी परिवर्तन की सूचक है। सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने भ्रष्टाचार के आरोप में अनेक मंत्रियों, पूर्व अधिकारियों और युवराजों को उनके पदों से हटा दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया है। इससे देश में गृहयुद्ध की संभावना बढ़ गई है। दरअसल सऊदी अरब पर राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक संकट भी गहरा रहा है।
सऊदी अरब के युवराज सलमान ने हाल ही में सन् 2030 तक के लिए एक आर्थिक योजना की घोषणा की है। सऊदी अरब के पास दुनिया का 22 प्रतिशत कच्चा तेल है और अभी तक उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल के निर्यात पर निर्भर थी। इस देश के पास आय का दूसरा स्रोत नहीं है। वह दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा देश है जिसमें कोई नदी नहीं है। अधिकांश भाग मरुस्थल है और जमीन का पानी समाप्त हो चुका है। ऐसे में किसी प्रकार की खेती संभव नहीं है और खाद्य पदार्थों के लिए उसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। अब चूंकि कच्चे तेल की कीमतों और विश्व में उसके उपयोग में आ रही गिरावट ने सऊदी अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है। ऐसे में उसे अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए आय के अन्य स्रोतों पर काम करना जरूरी था। युवराज ने यही किया। अपने देश को बाहरी निवेशकों के लिए खोला। ऐसा कुछ अरसे पहले तक सोचना भी संभव नहीं था। मगर विदेशी निवेश तभी हो पाएगा जब सऊदी अरब की कट्टरतावादी छवि सुधरे। इसलिए शहजादे मजबूरी में सूरत चमकाने की जुगत में हैं।
विश्व में सऊदी अरबी समाज को एक अति रूढ़िवादी समाज के रूप में देखा जाता है, जहां पर मानवाधिकारों का हनन अति सामान्य बात है। अपनी धूमिल होती छवि को ठीक करने के लिए सऊदी अरब ने नया हथकंडा अपनाया है जिसे ‘महिलाओं की स्वतंत्रता’ बताया जा रहा है। 2015 में पहली बार महिलाओं को स्थानीय निकाय चुनावों में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ। वर्तमान युवराज जवान हैं और नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने सऊदी अरब में सामाजिक सुधारों की कहानी शुरू की है। महिलाओं को वाहन चलाने की अनुमति दी गई है जो अगले वर्ष से लागू होगी। उनके लिए खेल स्टेडियम बनाए गए हैं। एक नारी अधिकार कर्मी के मुताबिक अब महिलाएं गाड़ी तो चलाएंगी, लेकिन नारी विरोधी सभी कानून बदस्तूर लागू रहेंगे। दुष्कर्म की शिकार होने पर भी महिलाओं को ही सजा भुगतनी होती है, क्योंकि इसके लिए चार गवाह पेश करने पड़ते हैं। सऊदी संविधान में ‘दुष्कर्म’ जैसा कोई शब्द नहीं है। व्यभिचार के आरोप में पकड़े जाने पर महिला व पुरुष, दोनों को ही सजा मिलती है। दुष्कर्मी को तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन दुष्कर्म पीड़िता को सजा क्यों? यदि किसी महिला को पर-पुरुष के साथ देख लिया जाए तो उसका मतलब होता है कि महिला व्यभिचारी है। सऊदी महिलाएं अपने खाविंद की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं। इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है। पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कॉलेजों में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना, यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है। लड़कियों के लिए अभिभावक पिता, पति, भाई, चाचा या फिर पुत्र होता है। किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ लड़कियों की बातचीत और किसी तरह का मिलना-जुलना प्रतिबंधित है। 2013 में एक सड़क हादसे में जख्मी एक महिला का आॅपरेशन कर हाथ काटना जरूरी था, लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि उक्त महिला का कोई अभिभावक नहीं था जो अनुमति दे सके। क्योंकि उस हादसे में उसके पति की मौत हो गई थी।
विडंबना ही है कि घरेलू मोर्चे पर सुधार की बात करने वाला सऊदी अरब विदेशी मोर्चे पर युद्ध की बात कर रहा है। ईरान और सऊदी अरब लंबे वक़्त से एक-दूसरे के दुश्मन हैं, लेकिन हाल ही में इन दोनों देशों के बीच तनातनी ज्यादा बढ़ने लगी है। सऊदी अरब को डर है कि ईरान मध्य-पूर्व पर हावी होना चाहता है और इसीलिए वह शिया नेतृत्व में बढ़ती भागीदारी और प्रभाव वाले क्षेत्र की शक्ति का विरोध करता है। मध्य-पूर्व का क्षेत्र एक बड़े संकट की तरफ कदम बढ़ाने लगा है। जानकार इस क्षेत्र को आगामी वक्त में एक खतरनाक दौर से गुजरता देख रहे हैं। इस्लामिक स्टेट की समाप्ति के बाद, ये दोनों मुल्क आमने-सामने हैं और यही संकट पूरे मध्यपूर्व क्षेत्र को घेरता दिख रहा है। सऊदी और ईरान के बीच संघर्ष में यमन और लेबनान केंद्र-बिंदु बने हुए है। युवराज सलमान ने देश में ‘उदार इस्लाम’ के पालन का संकल्प जताया है। गत 24 अक्तूूबर को रियाद में एक बड़ा आर्थिक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसका मूल उद्देश्य तेल से होने वाली आय पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना था। सलमान ने ‘विजन 2030’ पेश करते हुए कहा, ‘‘हम उस तरफ लौट रहे हैं, जो हम पहले थे- अर्थात् उदार इस्लाम वाला देश, जो सभी मतों के लिए खुला हो। हम अपनी जिंदगी के आगामी 30 वर्ष विनाशकारी विचारों के साथ गुजारना नहीं चाहते। हम जल्द अतिवाद को खत्म करेंगे।’’
इसी उदारवादी  एजेंडे के तहत, योग को गैर-इस्लामी बताने वाले सऊदी अरब ने इसे अपने देश में खेल का दर्जा दिया है, साथ ही योग सिखाने का फैसला भी किया है। वहां योग को खेल का दर्जा दिलाने का श्रेय 37 वर्षीया महिला योग गुरु नॉउफ मारवाइ को जाता है। वे 2005 से ही सरकार की विभिन्न एजेंसियों से योग को मान्यता देने के लिए जद्दोजहद कर रही थीं। वे खुद 1998 से योग कर रही हैं। मारावी ने 2009 में योग पद्धति और चीनी इलाज पद्धति आधारित चिकित्सा केंद्र की स्थापना की। इससे पहले उन्होंने 2008 में सऊदी अरब योग स्कूल भी खोला। 2009 में वे अंतराष्ट्रीय योग खाड़ी क्षेत्र की निदेशक बनीं। 2012 में वे भारत में योगालिंपिक समिति की उपाध्यक्ष नियुक्त हुर्इं। वे अब तक तीन हजार छात्रों को योग की शिक्षा दे चुकी हैं जबकि 70 से अधिक शिक्षकों को योग सिखाने के लिए प्रमाणपत्र दिये हैं। इसके अलावा गत 17 अक्तूबर को शाही परिवार ने इस्लामी विद्वानों के एक अंतरराष्ट्रीय निकाय का गठन किया है, जो विभिन्न हदीस की समीक्षा कर उनमें से कट्टरवादी और ‘फर्जी बातों’  को हटाएगा इसे भी ‘उदार इस्लाम’ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
समय बदल रहा है। सऊदी अरब को लेकर पश्चिम पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुका है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों और सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल के चलते तेल की मांग भी भविष्य में कम होगी। सऊदी समृद्धि का सूरज धीरे-धीरे डूबने की राह पर है। राजशाही बाहर और भीतरी दबाव झेल रही है। लेकिन क्या वह वैचारिक सुधार का रास्ता अपनाने की हिम्मत कर सकेगी? या उसका दोहरा चरित्र बना रहेगा कि मुंह में उदारवाद और बगल में बहावीवाद का खंजर? तब सुधार तो होंगे मगर दुनिया को दिखाने के लिए, डॉलर लाने के लिए। तब चेहरा तो उदार होगा मगर आत्मा रूढ़िवादी और कट्टरतावादी ही होगी।  

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