प्रज्ञा पुरस्कार से सम्मानितडॉ. बजरंगलाल गुप्त
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प्रज्ञा पुरस्कार से सम्मानितडॉ. बजरंगलाल गुप्त

Written byArchiveArchive
Dec 11, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 11 Dec 2017 12:46:24


अहिंसा यात्रा के प्रणेता, जैन आचार्य श्री महाश्रवण के पावन सान्निध्य में गत दिनों कोलकाता में जैन विश्व भारती द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र के संघचालक व सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. बजरंगलाल गुप्त को प्रज्ञा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर डॉ. गुप्त ने कहा कि जब प्रज्ञा पुरस्कार के लिए मेरे नाम का चयन हुआ तो मुझे आश्चर्य हुआ। क्योंकि मैं अपने आपको इसके योग्य नहीं समझता। आज मैं इस पुरस्कार को श्रद्धेय आचार्यश्री के आशीर्वाद और जैन विश्व भारती के मेरे प्रति स्नेह के रूप में स्वीकार कर रहा हूं।
डॉ. गुप्त ने कहा कि प्रज्ञा सामान्य बुद्धि का नाम नहीं, अपितु विशिष्ट प्रकार की बौद्धिक क्षमता का नाम है। इस पुरस्कार के माध्यम से आचार्यश्री हमें अपनी प्रज्ञा को जागृत करने की प्रेरणा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुरस्कारस्वरूप प्राप्त राशि को जैन विश्व भारती में अध्ययन-अनुसंधान में रत विद्यार्थियों के लिए उपयोग करें, जो साधन के अभाव में कार्य नहीं कर पा रहे हैं। यह राशि उनको समर्पित होगी तो मुझे आनंद होगा। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री की कृपा से ही वास्तविक अर्थशास्त्र की ओर मेरी गति हो पाई है। आज के समय भारत के लोग चार्वाक दर्शन के मत ‘ऋणं कृत्वा घृतम् पीवेत’ यानी ऋण लेकर घी पीने की बात को अंगीकार कर पश्चिमी संस्कृति की ओर भागते हुए ऋण लेकर कुछ और पी रहे हैं, जिसके कारण विकट संकट उत्पन्न हो गया है। हम सभी इसे भलीभांति देख और महसूस भी कर रहे हैं। इस सबके बाद भी उसी रास्ते पर जा रहे हैं, जिधर नहीं जाना चाहिए। उपभोक्तावाद की बढ़ती संस्कृति तथा आर्थिक विषमता के संकट को दूर करने के लिए ही आचार्यश्री अपनी अहिंसा यात्रा के दौरान सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश दे रहे हैं। इसे ही आत्मसात कर इनसान सही अर्थों में इनसान बन सकता है। क्योंकि जब संतसमाज कोई भी संदेश देता है तो उसके पीछे बड़ा ही गूढ़ रहस्य छिपा होता है। वह मन, वचन और कर्म से समाज के हित के बारे में सोचते हैं और वैसा ही संदेश देते हैं। ऐसे में समाज का भी दायित्व बनता है कि वह उनके बताए रास्ते पर चलकर उनकी दी शिक्षा को अपने जीवन में उतारे।
आचार्यश्री महाश्रवण ने अपने  आशीर्वचन में कहा कि जैन दर्शन के अनुसार प्रज्ञा ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय के साथ जुड़ा हुआ तत्व है। प्राणियों के पास अनंत ज्ञान है, लेकिन सामान्य अवस्था में वह प्राय: आवृत्त रहता है। ज्ञानावरणीय कर्म के विलय से ज्ञान पूर्णतया अनावृत हो जाता है तथा प्रज्ञा का जागरण होता है। उन्होंने कहा कि डॉ. बजरंग लाल गुप्त हमारे धर्म संघ से बड़ी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। इन्होंने अपने चिंतन और विचारों से अर्थशास्त्र के क्षेत्र में न केवल विशेष अर्हता प्राप्त की है बल्कि समाज को वास्तविक अर्थशास्त्र के ज्ञान से अवगत कराया है। ऐसे प्रज्ञा संपन्न व्यक्तित्व से समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व को सम्यक् बोध मिलता रहे, ऐसी मंगल कामना है। साथ ही वह भी अपनी आत्मा को अध्यात्म की ओर बढ़ाते रहें।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे अमृतवाणी के अध्यक्ष श्री सुखराज सेठिया ने कहा कि प्रसिद्ध संत श्री तुलसी द्वारा स्थापित संस्था जैन विश्व भारती शिक्षा, शोध, साहित्य, साधना, सेवा, संस्कृति का समन्वय करते हुए तपोवन का रूप ले चुकी है। इस संस्था की गतिविधियां अत्यंत व्यापक हैं। इसके द्वारा उच्च शिक्षा के साथ-साथ अहिंसा, सहिष्णुता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के उच्च आदर्शों को मानव जाति में स्थापित करने की दिशा में सार्थक प्रयास हो रहा है।
जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री रमेश वोहरा ने बताया कि प्रज्ञा पुरस्कार जैन विश्व भारती द्वारा प्रदत्त विशेष पुरस्कार है।  इसके अन्तर्गत पुरस्कृत महानुभाव को स्मृति चिह्न तथा 1 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है।   प्रतिनिधि

‘व्यवसाय नहीं है सामाजिक सेवा’
विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में लगे कार्यकर्ता परहित के कार्यों से बेहतर समाज बनाने की ओर अग्रसर हैं। ये कार्यकर्ता बड़ी तन्यमयता के साथ समाज में लोगों की जरूरतों को पूरा करते हुए प्रेम का संदेश देते है। इसलिए मेरी दृष्टि में सामाजिक कार्य सेवा है, व्यवसाय नहीं। उक्त उद्बोधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैया जी जोशी ने दिया। वे गत दिनों कर्नाटक के हुबली में राष्ट्रीय सेवा भारती द्वारा आयोजित प्रांत स्तरीय सेवा संगम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि सेवा-भावी संगठनों के कार्यकर्ता सुदूर क्षेत्रों में लोगों के जनजीवन को सुधारते हुए  सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं। कार्यक्रम में विशेषरूप से उपस्थित पुदुचेरी की उपराज्यपाल डॉ. किरण बेदी ने कहा कि सरकार द्वारा जनहितकारी नीतियां आम जनमानस तक सही ढंग से पहुंचें, इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं को लगकर सरकार और जनता के बीच की खार्इं को पाटना होगा। इस अवसर पर सेवासंगम में 150 से सेवाभावी संगठनों के 4,000 से अधिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
 प्रतिनिधि

‘सेवा गाथा’ मोबाइल एप
श्री भैया जी जोशी ने संगम के दूसरे दिन ‘सेवागाथा’ मोबाइल एप का श्री गणेश किया। इस एप के माध्यम से रा.स्व.संघ की सेवा से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती रहेंगी।

‘अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने लगी हैं महिलाएं’
‘‘जब रक्षक ही भक्षक हो जाए तो आत्म सम्मान की रक्षा के लिए महिलाओं को शस्त्र उठाने ही होंगे।’’ उक्त बात सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने कही। वे संविधान दिवस पर शिमला में अधिवक्ता परिषद् द्वारा आयोजित संगोष्ठी को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास बहुत गरिमापूर्ण रहा है। इसे भारत के लोगों को किसी फिल्म को देखकर तय नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के बारे में जोधाबाई या पद्मावती जैसी फिल्में देखकर इसकी गरिमा को नहीं समझा जा सकता। भारत में वीरांगनाओं की लंबी फेहरिस्त रही है, जिन्होंने भारत के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उन्होंने संविधान में महिलाओं की स्थिति के बारे में कहा कि जब संविधान का निर्माण हुआ तब भारत में सदियों पुरानी दकियानूसी परम्पराएं विद्यमान थीं, जिसको मानकर महिलाओं को अधिकार प्रदान करने में मुश्किलें रही हैं। मुगलों के आने के बाद भारत में महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया और उनके अधिकारों का हनन हुआ। तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं के जरिए महिलाओं पर अत्याचार हुआ। लेकिन अब महिलाएं जागरूक हुई हैं और वे बहुपत्नी और हलाला जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज बुलंद कर रही हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री संजय करोल ने कहा कि आज भारत की रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री एक महिला है। महिलाओं के लिए इससे और अच्छे दिन क्या हो सकते हैं।   ल्ल  (विसंकें, शिमला)

सौम्यता की प्रतिमूर्ति थे स्व. हरि
गत 27 नवंबर को दिल्ली प्रांत, आरोग्य भारती के संयोजक श्री हरि आसुदाणी जी का अकस्मात निधन हो गया। वे 62 वर्ष के थे।  8 फरवरी, 1955 को मथुरा जिले के छाता नामक स्थान पर जन्मे श्री हरिकृष्ण आसुदाणी जी को संघ के संस्कार बचपन से ही मिले थे। वे 1965 में बाल्यावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। श्री हरि जी ने झांसी से ही मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और 1979 में परिवार सहित दिल्ली आ गए। उनके पिता श्री हासानंद आसुदाणी जी दक्षिणी विभाग, दिल्ली प्रांत के लंबे समय तक विभाग संघचालक रहे। माता श्रीमती सती ने भी परिवार को सदैव संघ कार्य के लिए प्रेरित किया। श्री हरिकृष्ण आसुदाणी जी ने तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद तो जैसे अपनी पूरी जीवनचर्या ही संघानुकूल कर ली थी। सौम्यता की प्रतिमूर्ति श्री हरि जी ने दक्षिणी विभाग के सह विभाग कार्यवाह सहित विभिन्न दायित्वों का निर्वाह किया। साथ ही वे कालकाजी स्थित रामकृष्ण विद्या मंदिर के व्यवस्थापक रूप में भी जुड़े रहे। ल्ल  प्रतिनिधि

समाज को समर्पित रहा संपूर्ण जीवन
बीते 4 दिसंबर को नई दिल्ली के आर.के.पुरम् स्थित विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय कार्यालय में श्री मोहन जोशी ने अंतिम श्वास ली। वे 83 वर्ष के थे। श्री जोशी का जन्म 13 दिसंबर, 1934 को ग्राम खैराबाद (जिला कोटा, राजस्थान) में श्री रामगोपाल और श्रीमती रामकन्या बाई के घर में हुआ था। पारिवारिक आय का स्रोत कृषि के साथ पौरोहित्य कर्म था। कक्षा चार तक गांव में तथा कक्षा आठ तक रामगंज मंडी में पढ़कर वे कोटा आ गये। वहां से स्नातक कर वे प्रचारक बने। इसके बाद उन्होंने राजनीति शास्त्र में परास्नातक तथा साहित्य रत्न की उपाधि ली तथा रूसी भाषा का अध्ययन किया।
1957 में प्रचारक के नाते उन्हें सर्वप्रथम झालावाड़ जिले में भेजा गया। फिर 1960 से 1984 तक केन्द्र जयपुर रहा। आपातकाल के बाद जोशी जी को राजस्थान में विहिप का संगठन मंत्री बनाया गया। राममंदिर आंदोलन तीव्र होने पर वे काफी सक्रिय रहे।  साथ ही भारत में जो भी मुसलमान या ईसाई हैं, वे यहीं के मूल निवासी हैं, इस भाव को लेकर उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी के कार्य को संगठित रूप से आगे बढ़ाया। उनके निधन पर विश्व हिन्दू परिषद के अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री श्री चम्पत राय सहित संघ विचार परिवार के
अनेक लोगों ने अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।     प्रतिनिधि

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