संस्कृति और सौंदर्य से भरा बंगाल
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संस्कृति और सौंदर्य से भरा बंगाल

Written byArchiveArchive
Nov 27, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 27 Nov 2017 12:45:24


कला-संस्कृति के मामले में पश्चिम बंगाल का कोई सानी नहीं  है। यह जंगल, पहाड़, समुद्र, ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर अपने में संजोए हुए है, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती  हैं। यहां की बालूचरी साड़ियां दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं

अजय विद्युत

अगर आपको प्राकृति सौंदर्य व भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों को एक साथ देखना है तो पश्चिम बंगाल आइए। बंगाल में प्रकृति के सभी रूपों, पहाड़, वन, वन्यजीव अभयारण्य, समुद्र तटीय रिसॉर्ट और ऐतिहासिक महत्व की इमारतों, सांस्कृतिक धरोहरों और शिक्षा के केंद्रों को देखा जा सकता हैं। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता देश की संस्कृति और कला का केंद्र है। देश के किसी भी कोने से रेल या हवाई मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है। 
दक्षिणेश्वर काली मंदिर
कोलकाता में हुगली नदी के एक छोर पर बेलूर मठ और दूसरे छोर पर मां काली का सबसे बड़ा मंदिर है, जो दक्षिणेश्वर काली मंदिर नाम से प्रसिद्ध है। रामकृष्ण परमहंस को इसी जगह मां काली के साक्षात् दर्शन हुए थे और बाद में उन्होंने अपने शिष्य स्वामी विवेकानंद को भी मां काली के दर्शन कराए थे। यह भारतीय संस्कृति व अध्यात्म के मुख्य केंद्र के रूप में स्थापित है। मान्यता है कि मां काली यहां निवास करती हैं और उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम कोलकाता पड़ा। यहां रासमणि नामक रानी का शासन था, जो मां काली की भक्त थीं। एक दिन मां काली ने स्वप्न में रानी को दर्शन देकर इस स्थान पर मंदिर बनवाने व उनकी सेवा करने का आदेश दिया। भगवती के आदेश पर रासमणि ने 1847 में मंदिर निर्माण शुरू कराया और 1855 में यह तैयार हुआ। इस मंदिर में 12 गुंबद हैं और चारों तरफ भगवान शिव की 12 प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर से लगा हुआ रामकृष्ण परमहंस का कमरा है, जिसमें उनका पलंग और अन्य स्मृति चिह्न सुरक्षित हैं। मंदिर के बाहर उनकी पत्नी मां शारदा और रानी रासमणि की समाधि है और वह वट वृक्ष है जिसके नीचे रामकृष्ण परमहंस ध्यान किया करते थे। हावड़ा स्टेशन से 7 किलोमीटर दूर कालीघाट स्थित काली मंदिर को 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तारामंडल भी यहीं है। कोलकाता  स्थित बिरला तारामंडल में पूरे साल सैलानियों का तांता लगा रहता है। बौद्ध स्तूप की शक्ल में निर्मित यह इमारत चौरंगी पर विक्टोरिया मेमोरियल के सामने है। बिरला तारामंडल लोगों को ब्रह्मांड की खगोलीय घटनाओं को समझने का सुनहरा मौका देता है। यहां भाषा की समस्या आड़े नहीं आती क्योंकि बंगाली, अंग्रेजी व हिंदी भाषा में सौरमंडल का परिचय दिया जाता है। राजधानी कोलकाता से कल्याणी की दूरी मात्र 48 किमी है। सियालदह से रेल मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है। यहां स्थित हिमसागर सरोवर के बारे में मान्यता है कि इसका जल असाध्य रोगों को दूर कर देता है। यहां एक देवी मंदिर भी है, जहां लोग इस विश्वास के साथ ढेला बांधकर मन्नत मांगते हैं कि माता उनकी मनोकामना पूर्ण करेंगी।
बेलूर मठ
बेलूर मठ जीटी रोड पर स्थित है, जो रामकृष्ण मिशन के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय के रूप में विख्यात है। 9 दिसंबर, 1896 को स्वामी विवेकानंद ने स्वामी प्रयात की चिता की भस्म को यहां प्रतिष्ठित किया था। इस मठ का निर्माण 1899 में हुआ। स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ही इस मठ का संचालन करता है। इसके निर्माण में विभिन्न शैलियों का सम्मिश्रण किया गया है। यह स्वामी विवेकानंद का निवास स्थान था। इस मठ की खासियत यह है कि इसके कोनों पर मंदिर, मस्जिद व चर्च बने हुए हैं। मठ में होने वाली संध्या आरती अलौकिकता का अनुभव कराती है। यहीं पर स्वामी विवेकानंद की समाधि भी है। हावड़ा से यहां तक जाने के लिए टैक्सी और बस सेवा उपलब्ध है।
शांति निकेतन
कोलकाता से करीब 180 किमी दूर वीरभूम का शांति निकेतन देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। इस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय का निर्माण गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने कराया था। यहां विज्ञान के साथ परंपरा और संस्कृति का अद्भुत समन्वय दिखता है। शांति निकेतन अपनी कला, नृत्य, संगीत और उत्सवों के लिए प्रसिद्ध है जिनमें विश्व की बड़ी-बड़ी हस्तियां सम्मिलित होती हैं। पौष उत्सव, माघ उत्सव, बसंत उत्सव और जयदेव मेला और वृक्षारोपण उत्सव यहां के ऐतिहासिक आयोजन हैं। इन उत्सवों में  लोकनृत्य, संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल व कलाकृतियां आकर्षण का केंद्र होती हैं। 
  यहां का विश्व भारती परिसर भव्य एवं विशाल है। वीरभूम जिले के नंदीकेश्वर गांव में एक शक्तिपीठ है-नंदीकेश्वरी। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां सती के कंठ की हड्डी गिरी थी। इसका निर्माण 1310 में हुआ था। इसी तरह, बिष्णुपुर शहर मल्ल राजाओं द्वारा बनाए गए मंदिर विश्व सांस्कृतिक धरोहर में शामिल हैं। उस समय इसका नाम बांकुरा था और यह मल्ल राजाओं की राजधानी था। कोलकाता से करीब 200 किमी दूर बिष्णुपुर टेराकोटा मंदिरों, बालूचरी साड़ियों एवं पीतल की सजावटी वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां हर साल लगने वाला मेला संस्कृति का अद्भुत संगम है। इस मेले में दूर-दूर से कलाकार अपना हुनर दिखाने आते हैं। उनकी कला को बड़ी संख्या में पारखी भी मिलते हैं। साल के आखिरी सप्ताह में पूरा शहर उत्सवी रंगों से सराबोर होता है।
मल्ल राजाओं का शासनकाल करीब एक हजार वर्ष तक रहा। इसलिए इसे ‘मल्लभूमि’ भी कहा जाता था। भारतीय शास्त्रीय संगीत का बिष्णुपुर घराना भी काफी फला-फूला। वैष्णव धर्म के अनुयायी मल्ल राजाओं द्वारा निर्मित टेराकोटा मंदिर आज भी शान से खड़े हैं। ये बंगाल की वास्तुकला की जीती-जागती मिसाल हैं। मल्ल राजा वीर हंबीर और उनके उत्तराधिकारियों-राजा रघुनाथ सिंघा व वीर सिंघा ने बिष्णुपुर को तत्कालीन बंगाल का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। शहर के ज्यादातर मंदिर उसी दौरान बनवाए गए। पिरामिड के रूप में र्इंट से निर्मित रासमंच सबसे पुराना मंदिर है। 16वीं सदी में राजा वीर हंबीरा ने इसका निर्माण कराया था। उस समय रास उत्सव के दौरान पूरे शहर की मूर्तियां इसी मंदिर में लाकर रख दी जाती थीं और लोग दूर-दूर से इनके दर्शन करने के लिए आते थे। इस मंदिर में टेराकोटा की सजावट की गई है जो आज भी पर्यटकों को लुभाती है। इसकी दीवारों पर रामायण, महाभारत एवं पुराणों के श्लोक खुदे हुए हैं। इसी तरह 17वीं सदी में राजा रघुनाथ सिंघा द्वारा निर्मित जोरबंगला मंदिर में भी टेराकोटा की खुदाई की गई है। शहर में इस तरह के इतने मंदिर हैं कि इसे मंदिरों का शहर भी कहा जा सकता है।
इसके अलावा, बिष्णुपुर में टेराकोटा के बर्तन और सजावटी वस्तुएं भी मिलती हैं। यहां की बालूचरी साड़ियां देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर हैं। इन साड़ियों पर महाभारत और रामायण के दृश्यों के अलावा कई अन्य दृश्य कढ़ाई के जरिए उकेरे जाते हैं।
सबसे ऊंचा शहर कुर्सियांग
पश्चिम बंगाल का कुर्सियांग दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा शहर है। दार्जिलिंग से 32 किमी की दूरी पर स्थित कुर्सियांग अपने अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य और जलवायु के लिए प्रसिद्ध है। खास बात यह है कि यहां के मकान फूलों के रंगों से रंगे हुए हैं। दार्जिलिंग और कलिंगपोंग से कंचनजंघा की बर्फ से ढकी चोटियां दिखाई देती हैं। इसके अलावा, सुरम्य चाय बागान और तलहटी में दोआर का सघन वन क्षेत्र प्रकृति के अद्भुत रूप के दर्शन कराता है। राज्य के मध्य स्थित मालदा, मुर्शिदाबाद और नादिया जिलों में बंगाल की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर फैली हुई है। वहीं, पश्चिम के पहाड़ी इलाकों में अयोध्या हिल्स, माथा पहाड़, पंचेट हिल्स, खातरा-मुकुटमणिपुर, सुसुनिया हिल्स, झाड़ग्राम और कांकराझोर जैसे मनोरम स्थल से होकर गुजरने वाली तिस्ता नदी अनुपम छटा बिखेरती है। यहां आराम से रहकर छुट्टियों का लुत्फ उठाया जा सकता है। लगभग 11,879 वर्ग किमी क्षेत्र में स्थित पश्चिम बंगाल का लगभग 13.98 प्रतिशत भाग वनाच्छादित है, जिसे दोआर घाटी भी कहते हैं। राज्य के दक्षिण के समुद्र तट पर हुआ सुंदरवन का डेल्टा क्षेत्र प्रसिद्ध रॉयल बंगाल टाइगर का घर होने के साथ ही विश्व का सबसे बड़ा सदाबहार वन  क्षेत्र है। हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ गंगासागर भी यहीं है।        ल्ल

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