कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पार्टी में आंतरिक कलह और शीर्ष नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है। पहले वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर ममता बनर्जी को बड़ा झटका दिया था, और अब पार्टी की एक और वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव के इस्तीफे ने टीएमसी के संकट को और भी गहरा कर दिया है।
28 साल पुरानी पार्टी में असंतोष, ममता की कोशिशें बेअसर
लगभग 28 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के भीतर नेताओं का असंतोष अब खुलकर सड़कों पर आ गया है। एक तरफ जहां ममता बनर्जी लगातार इस टूट को रोकने के लिए प्रयास कर रही हैं और दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात कर ‘विपक्ष की एकजुटता’ का संदेश देने की कोशिश में जुटी हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी अपनी ही पार्टी में इस्तीफों और बगावती तेवरों ने आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने के बाद ममता बनर्जी द्वारा बुलाई जाने वाली संगठनात्मक बैठकों में विधायकों की संख्या लगातार घट रही है। खबरों के अनुसार, पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायक इस समय बागी रुख अपना चुके हैं।
आंकड़ों में समझिए: दिल्ली से लेकर कोलकाता तक टीएमसी का गणित बिगड़ा
बगावत का यह सिलसिला सिर्फ राज्य स्तर पर विधायकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली में बैठे सांसदों के बीच भी भारी असंतोष है। नीचे दी गई तालिका से समझिए कि टीएमसी में संगठनात्मक स्तर पर कितनी बड़ी टूट हो चुकी है:
| सदन/निकाय | कुल संख्या | बागी / इस्तीफा देने वाले | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|---|
| राज्यसभा सांसद | 13 | 02 (इस्तीफा) | 11 बचे |
| लोकसभा सांसद | 28 | 20 से अधिक बागी | बहुमत संकट में |
| विधानसभा विधायक | 80 | 58 बागी | सिर्फ 22 साथ |
| KMC पार्षद (Kolkata) | 138 | ताबड़तोड़ इस्तीफे | केवल 4-5 साथ बचे |
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पार्टी में टूट की यह आंच सिर्फ सांसदों और विधायकों तक सीमित नहीं है। कोलकाता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (KMC) में भी पार्टी पूरी तरह बिखर चुकी है। कभी कॉरपोरेशन में तृणमूल कांग्रेस के पास 138 पार्षद हुआ करते थे, लेकिन अब केवल 4 या 5 पार्षद ही पार्टी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
सबसे बड़ा झटका: कोलकाता के वर्तमान मेयर और ममता बनर्जी के सबसे कट्टर व विश्वासपात्र माने जाने वाले नेता फिरहाद हकीम को लेकर भी बड़ी खबर आ रही है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, फिरहाद हकीम भी अब ममता विरोधी खेमे में जा चुके हैं।
चुनावी शिकस्त के बाद पार्टी के समर्पित और पुराने चेहरे— जैसे काकोली घोष, सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव ने पूरी तरह दूरी बना ली है। एक बार सत्ता हाथ से जाने के बाद, 28 साल पुरानी यह क्षेत्रीय पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढहती हुई नजर आ रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले दिन ममता बनर्जी के राजनीतिक अस्तित्व के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

















