आसियान - भारत-अमेरिका ने दबाई चीन की नस
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आसियान – भारत-अमेरिका ने दबाई चीन की नस

Written byArchiveArchive
Nov 20, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 20 Nov 2017 12:53:13

थोड़े को बहुत और खत को तार समझना। यह जुमला हम संचार क्रांति से दुनिया के लिए भौतिक दूरी को अप्रासंगिक बना देने के दौर के पहले से सुनते आ रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का संचार और संवाद अब भी उसी दौर के मूल सिद्धांत पर ज्यादा भरोसा करता है- थोड़ा व्यक्त, ज्यादा अव्यक्त। आसियान बैठक के मामले में भी यह बात सोलह आने सही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एशिया के मैराथन दौरे पर निकलते ही अमेरिकी प्रशासन के रुख ने उनके दौरे का एजेंडा तय कर दिया था। इसके दो अहम अवयव थे। एक, अमेरिका के लिए आर्थिक-व्यापारिक संभावनाओं की ठोस तलाश करते हुए इस क्षेत्र के देशों के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना व दूसरा चीन की विस्तारवादी नीतियों की काट। यही दो बातें बड़ी निरंतरता के साथ आसियान बैठक तक अभिव्यक्त होती रहीं। जहां तक भारत की बात है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी खूबसूरती से अमेरिकी प्रतिबद्धताओं को समर्थन देकर क्षेत्रीय स्तर पर आकार लेते एक बड़े समीकरण में भारत की महत्वाकांक्षी भूमिका को व्यक्त कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप के लिए सबसे अहम है व्यापार और अर्थव्यवस्था। करीब ढाई दशक के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने एशिया की करीब एक माह लंबी यात्रा की। कह सकते हैं कि बीते दो-तीन दशकों में वैश्विक व्यापार की धुरी बदल गई है और यह उत्तरी अटलांटिक से खिसककर एशिया में आ टिकी है। आज विश्व व्यापार में एशिया की भागीदारी 30 प्रतिशत से अधिक है और यहां की विकास दर बाकी दुनिया से तीन गुना। विश्व व्यापार में आगे भी एशियाई क्षेत्र की भागीदारी में खासी वृद्धि का अनुमान है।
अमेरिका का एशिया को लेकर इतने आक्रामक तरीके से पेश आने की एक खास वजह 2030 की अनुमान भी है। इसके मुताबिक विश्व व्यापार में अमेरिका की भागीदारी 2004 में 28.5 के मुकाबले घटकर 25.1 प्रतिशत रह जाएगी। वहीं, चीन की भागीदारी 2004 में 4.1 प्रतिशत थी जो 10.6 प्रतिशत हो जाएगी। इस संदर्भ में भारत के लिए उम्मीदों का आसमान सामने है, क्योंकि उसकी भागीदारी 1.6 से बढ़कर 3.7 प्रतिशत होने का अनुमान है। दूसरी बात, इस क्षेत्र में ज्यादातर देशों के साथ अमेरिका का व्यापार संतुलन सही नहीं है और इसमें वह काफी पीछे है। चीन के साथ उसके व्यापारिक असंतोष की मुख्य वजह यही है। इसलिए अमेरिका आक्रामक रणनीति की बदौलत इन अनुमानों से उलट कोई परिणाम लाने की जमीन तैयार करना चाहता है। इसी संदर्भ में अमेरिकी प्रशासन ने ट्रंप की एशिया यात्रा के शुरू में ही न केवल एशिया-प्रशांत को हिंद-प्रशासन कहकर बुलाया, बल्कि विस्तार से इसके क्यों का जबाव भी दिया। तभी अमेरिका     ने इस आसियान बैठक का भी एजेंडा तय कर दिया था।
बहरहाल, दक्षिण चीन सागर को चीन अपने समुद्री क्षेत्र का हिस्सा मानता है और इसमें वह कृत्रिम टापू वगैरह बनाकर अपने दावों को प्रत्यक्ष व्यावहारिक जामा पहना रहा है। इसे देखते हुए वियतनाम, फिलीपीन और ब्रूनेई खासे परेशान हैं। जब डोनाल्ड ट्रंप एशिया-प्रशांत को हिंद-प्रशांत कहते हैं तो वे चीन की इन्हीं कोशिशों को निशाना बनाते हैं। इस क्षेत्र की यात्रा के दौरान उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि दक्षिण चीन सागर में जहाजों का आवागमन बेरोकटोक चलना चाहिए। बता दें कि थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपीन्स, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रूनेई आसियान के सदस्य देश हैं, जबकि भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया इसके वार्ताकार सहयोगी हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब आसियान बैठक के अंतिम दिन समुद्री परिवहन के लिए एक नियम आधारित सुरक्षा ढांचे की बात कर रहे थे तो उनकी निशाना चीन ही था। चीन जिस तरह दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताते हुए इतिहास की दुहाई देता है, उसकी काट पेश करते हुए मोदी कहते हैं कि भारत और आसियान देशों के बीच समुद्री व्यापार हजारों साल पुराना है। सामान आने-जाने की राह में कोई बाधा नहीं थी। वही व्यवस्था आज भी होनी चाहिए और इस क्षेत्र में बाध्यकारी नियमों पर आधारित एक सुरक्षा ढांचा होना चाहिए। भारत के नजरिए से एक और बात महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। हाल ही में डोकलाम के प्रयोग से भारत ने जान लिया है कि चीन की विस्तारवादी नीतियों से निबटने के लिए कूटनीतिक घेराबंदी के अलावा यदा-कदा डटकर आंखों में आंखें डालकर खड़ा होना भी जरूरी है।
चीन की कूटनीतिक घेराबंदी में अमेरिकी नजरिए का खुलकर साथ देकर भारत ने इस क्षेत्र में मजबूत होते नए समीकरण का साफ संकेत दे दिया है। इस समीकरण का प्रत्यक्ष प्रमाण रहा 'मुक्त और खुले' हिंद-महासागर क्षेत्र की वाजिब अपेक्षाओं के साथ अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की बैठक। यह बैठक अघोषित तौर पर चीन की विस्तारवादी नीतियों और संवेदनशीलता की उसकी अपनी डफली से निकलते बेसुरे राग को बंद करने की संयुक्त कोशिशों पर ही आधारित थी और इसका तुरंत असर हुआ। चीन की ओर से आनन-फानन में बयान आया कि उसे उम्मीद है कि चार देशों की यह बैठक किसी एक देश के खिलाफ नहीं है। यानी तीर निशाने पर लगा था।
दूसरा मसला है आतंकवाद। भला हो चीन के गले से लटके उसके दोस्त पाकिस्तान का कि उसने चीन के लिए एक और कमजोर नस पैदा कर दी। दुनियाभर में आतंकवाद को फैलाने वाली जमीन के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका सिद्ध हो चुकी है।
पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में कभी ऐसी गिरावट नहीं आई जब अमेरिका की ओर से सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान को वैश्विक आतंकवाद के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार बताते हुए कार्रवाई की चेतावनी दी गई हो। ऐसे में अपने ही बनाए आतंकवाद के जाल में फंसे पाकिस्तान को उससे बाहर निकालने की कोशिशों में जुटा चीन दोस्ती का धर्म निभा रहा है। इसी कारण उसने तमाम आतंकवादी घटनाओं में शामिल मौलाना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों को सफल नहीं होने दिया। लेकिन भारत को पता है कि चीन जिस जाल से पाकिस्तान को निकालने की कोशिशों में जुटा है, अगर उसने और कुछ दूर जाकर दोस्त की मदद करने की कोशिश की तो वह खुद भी उसमें उलझकर रह जाएगा। आज के समय में आतंकवाद के समर्थक देशों के प्रति दुनिया का नजरिया बदल चुका है और भारत की लगातार कोशिशों के कारण अच्छे और बुरे आतंकवादी की अवधारणा ध्वस्त हो चुकी है जिसकी ओट में पाकिस्तान में राजनीतिक हितों के लिए आतंकवाद के सरकारी इस्तेमाल का खेल चल रहा था। इसलिए जब प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद मुक्त क्षेत्र के लिए मिल-जुलकर ईमानदार कोशिश करने की बात की, उड़ता हुआ तीर अपने आप चीन को जा लगा।
इस तरह कह सकते हैं कि भारत ने आसियान शिखर सम्मेलन को एक बड़े अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और चीन पर कूटनीतिक दबाव बनाते हुए यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि दक्षिण चीन सागर में चीन बेरोकटोक अपनी मर्जी नहीं चला सकता। भारत के लिए अच्छी बात यह है कि वह और अमेरिका इस मामले में एक ही सीधी रेखा पर खड़े हैं और दोनों देश अपने रिश्तों को एक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था का साधन मानते हैं।     

– आराधना शरण 

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