आवरण कथा / साहित्य एवं कला-लोकजीवन में रचा-बसा साहित्य
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आवरण कथा / साहित्य एवं कला-लोकजीवन में रचा-बसा साहित्य

Written byArchiveArchive
Oct 28, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 28 Oct 2017 11:56:11

संस्कृत व हरियाणवी भाषा का परस्पर गहरा नाता रहा है। अम्बर, कोट, चारण, चिता, चूड़ा, जग आदि असंख्य संस्कृत शब्द हरियाणवी भाषा का हिस्सा हैं।  प्राकृत-पालि भाषा में भी हरियाणवी भाषा के झंखई से – झींक्खै, तावई से ताव, खिज्जई से खिज्जै, कढ़ई से काढ़ै अनेक शब्द लोक साहित्य की परम्परा का हिस्सा रहे हैं

डॉ. महासिंह पूनिया

हरियाणवी भाषा का वैदिक काल से सीधा संबंध है। वैदिक भाषा के आरणी, आस, खारी, नाड़ी, कार, करसी सहित हजारों शब्द हरियाणवी भाषा में देखने को मिलते हैं। संस्कृत व हरियाणवी भाषा का गहरा नाता रहा है। अम्बर, कोट, चारण, चिता, चूड़ा, जग आदि संस्कृत भाषा के असंख्य शब्द हरियाणवी भाषा का हिस्सा हैं। प्राकृत-पालि भाषा में भी हरियाणवी भाषा के झंखई से झींक्खै, तावई से ताव, खिज्जई से खिज्जै, कढ़ई से काढ़ै जैसे अनेक शब्द लोक साहित्य की परम्परा का हिस्सा रहे हैं। अरबी के साथ-साथ फारसी और तुर्की में भी हरियाणवी भाषा के हजारों शब्द समाहित हैं जैसे हुक्का, लंगर, लार, सूरमा, तबीज, तहमत आदि। अपभ्रंश भाषा का इतिहास भी 500 से 1000 ई. तक आंका जाता है। इसमें भी हरियाणवी भाषा के बहुतेरे शब्द देखने को मिलते हैं। आदिकाल में चन्द्रबरदाई द्वारा लिखे गए ‘पृथ्वीराज रासों’ गं्रथ में हरियाणवी अंश देखने को मिलते हैं। जैसे- ‘भगा हुआ जो मारिया बहिणु म्हारा कन्त’, यह हरियाणवीं नहीं तो क्या है? कबीर जैसे संत ने भी अपनी वाणी में हरियाणवी भाषा के उदाहरण दिए हैं, जो इसकी प्राचीनता के द्योतक हैं। इतना ही नहीं, यह परम्परा आगे बढ़ी और संत आत्मानंद ने- ‘राम तेरा रमया हुआ जर जर म्हं’, में भी हरियाणवी भाषा की परम्परा को आगे बढ़ाया। इसके पश्चात महाकवि सूरदास, जो स्वयं हरियाणवी थे, ने भी अपनी रचनाओं में हरियाणवी लोकभाषा को प्रमुख स्थान प्रदान किया। अनेक सूफी फकीरों तथा रामकाव्य से जुड़े भक्तों ने भी हरियाणवी बोली को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इस भाषा को और अधिक उत्साह एवं बल उस समय मिला, जब दिल्ली में अमीर खुसरो ने 13वीं सदी में हरियाणवी बोली में निस्बतों, मुकरियों, बुझावलों, कड़कों, नुस्खों, सूखनों आदि की रचना कर इसकी प्रामाणिकता का सबूत अपने साहित्य लेखन के माध्यम से दिया। खुसरों का सशक्त उदाहरण- ‘खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाय, आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय’ हरियाणवी ही तो है। जिसे लोगों ने खड़ी बोली कहा, उसका विकास भी हरियाणवी से ही हुआ है। उसके पश्चात संतोख सिंह, हाली, बाबा फरीद आदि कवियों ने हरियाणवी भाषा एवं शब्दों का सदुपयोग करते हुए अपनी रचनाओं को अंजाम तक पहुंचाया। इतना ही नहीं, दक्खिनी हिन्दी में हरियाणवी भाषा के अनेक ऐसे शब्द पाए जाते हैं, जिससे इसकी प्रामाणिकता को और अधिक बल मिलता है।
कहना न होगा, रामायण, महाभारत, गीता सरीखे ग्रंथ भी हरियाणवी भाषा में विद्यमान हैं। इस प्रकार यह परम्परा आगे बढ़ती चली और अंग्रेजों तक जा पहुंची। प्रख्यात भाषाविद् जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इण्डिया’ ग्रंथ में बांगरू, हरियाणवी तथा जाटू के नाम से इस भाषा को कलमबद्ध किया। इतना ही नहीं, रोहतक के तत्कालीन डी.सी. श्री ई. जोसफ ने हरियाणवी भाषा की जाटू ग्लॉसरी बनाई।  हरियाणवी पर बांगरू का संरचनात्मक अध्ययन के नाम से डॉ. जगदेव सिंह ने ‘डिस्क्रिप्टिव ग्रॉमर आॅफ बांगरू’ के माध्यम से हरियाणवी लिपि का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर इसकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता को स्पष्ट किया। इतना ही नहीं, डॉ. नानक चन्द ने ‘हरियाणवी भाषा का उद्गम और विकास’ ग्रंथ के माध्यम से भी इस भाषा की प्रामाणिकता को सिद्ध करने का प्रयास किया है। इसके साथ ही शंकरलाल यादव, रघुवीर मथाना व डॉ. बाबू राम ने हरियाणा लोकसाहित्य के इतिहास के माध्यम से हरियाणवी लोक साहित्य का जो इतिहास लिखा है, वह हरियाणवी भाषा की समृद्धता को दिखाता है। १९६५ में ‘सप्तसिंधु’ व ‘जन साहित्य’ पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख हरियाणवी लोक साहित्य की समृद्धता को दिखाते हैं। १९६९ में ‘जर्नल आफ हरियाणा स्टडीज’ में भी हरियाणवी भाषा एवं साहित्य के लेख समाहित हैंं। १९७० में आया साधु राम शारदा का लोकगीत संग्रह भी हरियाणवी लोक साहित्य की परम्परा का अनूठा उदाहरण है। इसके साथ ही रघुवीर मथाना एवं डॉ. बाबू राम द्वारा रचित ‘हरियाणवी साहित्य का इतिहास’ हरियाणवी लोक साहित्य का ऐसा प्रेरणा पुंज है जिसके माध्यम से संपूर्ण हरियाणवी संस्कृति के दर्शन होते हैं।
हरियाणा के लोक नाट्यकारों एवं लोककवियों ने हरियाणवी संगीत व संस्कृति को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सांग हरियाणवी लोक संस्कृति का ऐसा सांस्कृतिक आईना है जिसके माध्यम से संपूर्ण हरियाणवी संस्कृति का पता चलता है। हरियाणा में सांगियों की परम्परा का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। डॉ. दशरथ ओझा स्वांग की उत्पत्ति हरियाणा से मानते हैं। मध्यकाल में सादुला नामक एक लोककवि का हरियाणा में जन्म हुआ। उन्होंने अनेक रचनाएं रचीं, जो हरियाणवी का परिचायक थीं। बारहवीं, तेरहवीं शताब्दी मेंं अब्दुल रहमान नामक कवि ने ‘संदेह रासक’ की रचना की। इस प्रकार लोक नाट्य परम्परा में सर्वप्रथम किशन लाल भाट का नाम आता है। इसी कवि एवं सांगी से हरियाणा की सांग परम्परा की शुरुआत मानी जाती है। माना जाता है कि 1750 के आस-पास हरियाणा में किशन लाल भाट ने इस कला को जन्म दिया। किशन लाल भाट के बाद सांग को संजीवनी देने में बंसी लाल का महत्वपूर्ण योगदान है। कैप्टन आर.सी. टैम्पल ने अपनी पुस्तक ‘द लिजेंड्स आॅफ दी पंजाब’ में इनके सांगों का संपादन किया है। इनके तीन सांग गुरु गुगा, राज नल व राजा गोपीचंद विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इसके बाद बाबा हरिदास उदासी सांग रत्नसेन राजा के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। ताऊ सांगी ने ‘सांग रुक्मिणी विवाह’ के माध्यम से इस परम्परा को आगे बढ़ाया। इसके पश्चात योगेश्वर बालकराम ने पूर भगत, गोपीचंद, शीलान्दे, कुजड़ी व रामायण आदि सांगों की रचना की। इन्हें थानेश्वरी सांग कला के जनक के रूप में भी जाना जाता है। इनकी रचनाओं में दोहा, चौबोला, दौड़ आदि गायन शैलियों का विकास हुआ। अहमद बख्श थानेसरी ने रामायण, जयमल पत्ता, गूगा चौहान, सौरठ, चन्द्र किरण, कृष्ण लीला, नवलदेह आदि सांगों की रचना कर लोक साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके पश्चात पंडित दीपचन्द ने हरियाणवी सांगों में आधुनिकता का समावेश कर एक नई पहचान बनाई। पंडित आशा राम ने अपनी दो रचनाओं ‘सोरठ सांग’ के माध्यम से लोक साहित्य की सेवा की। जमुआ मीर ने १५ वर्ष तक सांग कर ज्यानी चोर, गोपीचन्द, हीर-रांझा, चन्द्र किरण के माध्यम से लोक साहित्य एवं संस्कृति की सेवा की। हरदेवा स्वामी ने अपने जीवन काल में हीर-रांझा, ज्यानी चोर, चन्द्र किरण, सरणदे, गोपीचन्द आदि सांगों की रचना कर लोक संस्कृति के क्षेत्र में नये आयाम स्थापित किए। स्वरूपचन्द का नाम भी सांग के क्षेत्र में विशेष रूप से लिया जाता है। उन्होंने गुरु गंगा राम से मन्त्र लेकर हरीश चन्द्र, सरणदे, राजा रत्न सेन, पद्मावती, हीर-रांझा, गोपीचन्द, महाभारत, उत्तानपाद, ज्यानी चोर, जमाल गबरू जैसे प्रसिद्ध सांगों की रचना की। इनके सांगों में धार्मिक प्रवृति का समावेश देखने को मिलता है। इसके साथ ही पंडित लखमीचंद हरियाणवी लोक साहित्य की कोटि में ऐसे कवि के रूप में विख्यात हुए जिनके माध्यम से हरियाणवी संस्कृति ने नये सोपानों को छुआ। इनकी रचनाओं में नौटंकी, ज्यानी चोर, शाही लकड़हारा, हूर मेनका, रघुबीर सिंह: धर्मकौर, राज भोज: सरणदे, चन्द्रकिरण, हीर-रांझा, चापसिंह, चीर-पर्व, विराट-पर्व, नल-दमयन्ती, पूरणमल, सत्यवान-सावित्री, राजा हरिश्चन्द्र, सेठ ताराचन्द, पद्मावत, भूप पुरंजन, मीराबाई प्रमुख हैं। पंडित दीपचन्द ने अपने सांगों के माध्यम से लोक संस्कृति को अनेक नये आयाम दिए। पंडित मांगेराम ने कृष्ण-जन्म, धुरू भगत, प्रहलाद भगत, पूर्ण भगत, शिवजी का ब्याह, रूप-बसंत, सरवर-नीर, गोपीचंद महाराज, पुरंजन-पुरंजनी आदि धर्मप्रधान, लैला-मजनंू, हीर-रांझा, भरथरी-पिंगला, हूर मेनका, नवरत्न, शकुंतला, हीरामल जमाल, सोरठ, खांडाराव परी आदि शृंगार-प्रधान तथा जैमल-फत्ते, अमरसिंह राठौर, अजीतसिंह, राजबाला, चापसिंह, नर सुलतान, समरसिंह राजपूत, हंसबाला, राजपाल, महकदे-ज्यानी चोर और सहल बाला आदि वीररस से ओत-प्रोत सांगों की रचना की। इसी परम्परा में मोजी राम स्वामी ने राजा हरिश्चन्द्र, भगतपूरणमल, सत्यवती देवी, कमला-विमला, गुलफाम, हनुमान का जन्म, हीर-रांझा आदि सांगों की रचना की। मास्टर नेकीराम ने हीर-रांझा, लीलोचमन, चाप सिंह-सोमवती, भगत पूरणमल, नौटंकी फूल सिंह, सेठ ताराचन्द, शाही लकड़हारा, राजा भोज, रूप बसन्त, राजा रिसालू आदि सांगों का सृजन एवं मंचन किया। धनपत सिंह हरियाणा के ऐसे सांगी हुए हैं जिन्होंने अंब राजा, बणदेवी, हीर-रांझा, हरिश्चन्द्र, पद्मावत, ज्यानी चोर, नल राजा, रूप बसन्त, पद्मावत, गोपीचन्द, सत्यवान सावित्री, चाप सिंह, निहालदे, पटवे की आदि सांगों की रचना कर हरियाणवी सांग परम्परा को प्रदेश की सीमाओं से बाहर तक विकसित किया। मीर अल्लाह बंदा, जो बाद में पाकिस्तान में जाकर बस गए, ने भी हीर-रांझा तथा ओढ़ पुवाड़ा क्यूं हो गया आदि रचनाओं के माध्यम से हरियाणवी संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके अलावा पंडित दयाचन्द, चन्द्र लाल उर्फ चन्द्रबादी, सुल्तान सिंह आदि ने भी अपने सांगों के माध्यम से हरियाणवी संस्कृति की लोक नाट्य परम्पराओं को आगे बढ़ाने का काम किया। वर्तमान में सूरज बेदी, धर्मवीर, मांगे डूम आदि के साथ किशोरी लाल, पूर्ण अमर सिंह, नानक, तेजाराम आदि  ऐसे सांगी हैं जिनके माध्यम से यह परम्परा निरंतर विकास की ओर अग्रसर है।
लोक साहित्य लेखन की कड़ी में हरियाणा के अनेक साहित्यकारों का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोक साहित्य की सेवा कर संस्कृति को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। देवी शंकर प्रभाकर ने हरियाणा सांस्कृतिक अध्ययन, हरियाणा लोककथाएं, हरियाणा लोकनाट्य, हरियाणा की कहावतें, प्राचीन हरियाणा, किसान का बेटा, धरती की बेटी, खड्गपुत्र हरियाणवी उपन्यास, नाटक आदि अनेक गद्यात्मक पुस्तक लिख कर लोक साहित्य की समृद्धि महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. जयनारायण कौशिक ने ‘हरियाणवी कोश’ के साथ-साथ ‘रत्नावली’ एवं प्रियदर्शिका हर्षकालीन नाटकों का हरियाणवी भाषा में अनुवाद प्रस्तुत कर उन्हें आधुनिकता के साथ जोड़ा है। इसके साथ लोक साहित्य के आलोचकों के रूप में डॉ. एमएस रंधावा, डॉ. शंकरलाल यादव, कर्नल चन्द्र सिंह दलाल उर्फ नादान हरियाणवी, आदि अनेक समालोचकों ने हजारों की संख्या में गद्यात्मक साहित्य का लेखन कर हरियाणवी गद्य साहित्य परम्परा को समृद्ध करने का कार्य किया है।
(लेखक यूनिवर्सिटी कॉलेज, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं)

साहित्य विधा में सम्मान
हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा अनेक पुरस्कार देने की घोषणा की गई है जो इस प्रकार हैं-
क्रसं.    पुरस्कार का नाम    पुरस्कार राशि   
1    स्वामी विवेकानन्द स्वर्ण जयंती युवा लेखक सम्मान    50 हजार   
2    पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वर्ण जयंती युवा लेखक सम्मान    50 हजार   
    हिन्दी भाषा के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्कार   
3    अम्बेडकर स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (विधि क्षेत्र)    31 हजार   
4    राधा कृष्णन स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (धर्म एवं दर्शन)    31 हजार   
5    धन्वंतरी स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (आयुर्विज्ञान)    31 हजार   
6    रामानुजन स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (विज्ञान एवं प्राविधि)    31 हजार   
7    कौटिल्य स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (मानविकी)    31 हजार   
8    गुरु जम्भेश्वर स्वर्ण जयंती श्रेष्ठ कृति पुरस्कार (पर्यावरण)    31 हजार

उर्दू के कलमकारों का सम्मान
क्रसं.    नाम    स्थान    पुरस्कार का नाम    राशि
1    डॉ. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी    पानीपत    हरियाणा पुरस्कार    1,50,000   
2    श्री बी़डी. कालिया‘हमदम‘    प्ांचकुला    हाली पुरस्कार    1,21,000   
3    डॉ. एस.पी. शर्मा  ‘तफ्ता‘    कुरुक्षेत्र    कंवर महेन्द्र सिंह बेदी पुरस्कार    25,000   
4    सुश्री जहां नजÞीर नूह,     मेवात    साबिर दत्त पुरस्कार     25,000   
5    श्री रुप नारायण चांदना    करनाल    सैयद मुजÞफ्फर हुसैन बर्नी पुरस्कार    21,000   
6    श्री जहीद उल अहसानी    पानीपत    ख्वाजा अहमद अब्बास पुरस्कार    21,000   
7    डॉ. के.के. रत्तू    चंडीगढ़     गुमानी लाल पुरस्कार     21,000   
8    श्री कÞारी मु.  इसहाकÞ ‘हाफिजÞ‘    अम्बाला    उर्दू पत्रकारिता पुरस्कार    21,000   
9    श्री निले खां    पंचकुला    गजÞल /कव्वाली पुरस्कार    21,000   
10    श्री के.के. तूर    धर्मशाला    हरियाणा के पर हरियाणा से बाहर                       रहने वाले  लेखकों को पुरस्कार     21,000   
11    श्री एस.एल. धवन    प्ांचकुला    नो आमाज उर्दू पुरस्कार     21,000

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