क्रांति-गाथा-43:हुतात्मा यतीन्द्रनाथ की स्मृति में
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क्रांति-गाथा-43:हुतात्मा यतीन्द्रनाथ की स्मृति में

Written byArchiveArchive
Sep 25, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 25 Sep 2017 12:06:50

पाञ्चजन्य ने 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित विशेषांकों की शृंखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत है 22 जनवरी ,1968 के अंक में प्रकाशित किरणचन्द्र दास के आलेख :-

श्रीयतीन्द्रनाथ दास जब आठ वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया था। वे बेहद संवेदनशील थे। अत: उन्हें बतलाया गया कि उनकी मां चिकित्सा के लिए स्वर्ग के अस्पताल भेजी गई हैं। उनके पूछने पर लोग चंद्रमा की ओर संकेत करके कहते थे कि स्वर्ग का अस्पताल वहां है। वह इतने सरल व सीधे थे कि इस बात को वास्तव में सच समझते थे। बचपन से ही हमलोगों को झूठ से ही घृणा करने की शिक्षा जो दी गई थी।

प्रेरणा की बात
वह बड़े हुए और उन्हें माता के संबंध में वास्तविकता का ज्ञान हुआ। उनका छलकता हुआ मातृप्रेम सहसा ही जननी जन्मभूमि के प्रति उमड़ पड़ा। हम उन्हें प्राय: यह कहते सुना करते थे, ‘‘यदि मुझे अपने कर्तव्य का कुछ भी भान हुआ है तो वह अपनी माता के द्वारा।’’ वह बंधनों में पैदा हुए थे। दासता एवं अपकृति की भावनाएं ही बंधन होती हैं। माता की प्रारंभिक शिक्षा ने वे सारे बंधन एक-एक कर ढीले कर दिए जिससे उनका स्वाभाविक विकास संभव हो सका और उनमें स्वतंत्रता की भावना घर कर गई। मानव जीवन की वास्तविकता, सत्य का सोपान और इससे भी बढ़कर दिव्य प्रकाश का द्वार दर्शाया उनकी जननी ने, और अपने जीवन को इस प्रकार संवारने के लिए वह सदैव स्वर्गीया जननी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते थकते न थे। शिशुओं की स्मृति भले ही अल्पकालिक हो, परंतु उनकी संस्मृतियां बड़ी ही वेगशीला होती हैं। सारा अतीत उनके लिए कल की सी घटना होती है। यतीन्द्रदास भूख हड़ताल के विरुद्ध थे। यद्यपि उनके अन्य साथियों ने शहीदे-आजम सरदार भगतसिंह तथा स्वर्गीय हुतात्मा बटुकेश्वर दत्त का भूख हड़ताल में साथ दिया, पर वह कुछ दिन रुके रहे। वह संभवत: ऐसा करने के लिए आंतरिक प्रेरणा की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह जानते थे कि जीवन को भावावेशमय बना लेना सरल है, परंतु आवश्यक है कि मनुष्य जीवन के क्षेत्र में उच्च आदर्शों का पाठ हृदयगम करे। विशुद्ध आत्मा की प्रेरणा यहीं पर मार्गदर्शन करती है। यतीन्द्रदास के लिए जीवन प्रेरणा का पर्याय था। उनके हृदय में जननी जन्मभूमि के प्रति श्रद्धा का जो अपार पारावार लहरा रहा था, वह उनके कंठ से बराबर फूटता रहता था।

भगतसिंह : सूक्ष्म पारखी
फिर जब उन्होंने निश्चय किया तो वह एक दृढ़ निश्चय था। जब उस दिन उन्होंने अदालत में अपना निश्चय सुनाया तो मेरे नेत्र अपने अग्रज के आनन पर जाकर अटक गए। मैंने देखा— उनका उन्नत ललाट एक अनोखी आभा से भासमान था। भगतसिंह बड़े सूक्ष्म पारखी थे। उन्होंने उनके मुख के भावों में स्पष्ट निश्चय के पीछे की हिमालय सरीखी अडिगता देखी। यही अडिगता उनका समस्त चरित्र थी। सरदार ने यह बात उस दिन प्रकट भी की जिस दिन वह यतीन्द्रदास के पास अनशनकारियों तथा जेल पृच्छा समिति के बीच हुए समझौते के अनुसार भूख-हड़ताल स्थगित करने में अपना तथा अपने सहयोगियों का साथ देने के लिए लाए गए ताकि वे उन्हें भी अनशन स्थगित करने के लिए बाध्य करें। यह संभवत: इन दोनों हुतात्माओं का अंतिम मिलन भी था। अदालत में जिस समय उन्होंने भूख-हड़ताल में अन्य अनशनकारियों का साथ देने का अपना निश्चय सुनाया, उस समय उनके बोलने का ढंग भी निराला ही था। उनकी वाणी आकस्मिक थी, उनके शब्दों में एक आस्था, एक अन्तर्वेग एवं एक अनुष्ठा थी। उनका स्वर गतिशील था। शब्दों की ध्वनि अविशंकनीय थी, उनके भावों में कटुता भी थी और विषण्णता भी, उनके नेत्रों में विस्फारण एवं उद्दीप्ति थी और उनके समस्त आनन पर थी एक अवर्णनीय रोष की व्यंजना। 

क्रांति की दो धाराएं
क्रांति की दो धाराएं होती हैं- एक अपसरण और दूसरा प्रवाह। इन्हीं पर नाचती हुई आती हैं समस्त ऋतुएं—शीततम शिशिर व उत्फुल्ल बसंत भी। प्रत्येक धारा में प्रत्येक ऋतु के अनुरूप व्यक्ति भी उत्पन्न होते हैं। कुछ जिनके जीवन-पथ पर पुष्प बिखरे मिलते हैं और कुछ जिनके जीवन के प्रत्येक क्षण का स्वागत करती हैं आंधियां, तूफान और कुलिशाघात। यतीन्द्रदास महान क्रांतिकारी नेता स्वर्गीय शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा बनाए तथा संवारे गए थे। भगतसिंह ने समस्त राष्टÑ को क्रांति से संबंधित नवनीनतम विचार तथा विप्लव के ढंगों को नवीन दिशाएं दीं। यतीन्द्रदास ने उस विचार को अपने रक्त से परिपुष्ट किया। दोनों विप्लववादी जानते थे कि क्रूर की क्रूरता का उन्मूलन क्रांति के द्वारा ही संभव है। उपचार भयंकर अवश्य है, परंतु अचूक भी है। शल्य चिकित्सक को कसाई की भांति निर्मम होना पड़ता है। बधिक का रूप धारण करना पड़ता है। क्रांतिकारी को अनेक प्राणों के साथ खेलना पड़ता है। उपचार में विकृत अंग काटकर हटा दिया जाता है, क्योंकि जीवन-रक्षा के लिए यह आवश्यक हो जाता है। क्या तुम दया चाहते हो? उस जहर पर दया चाहते हो जो नष्ट कर देने वाला है? उपचारक को यह सब सुनने का समय नहीं। उसके सामने कर्तव्य है, जिसे उसे निभाना है। वह गहराई तक काट देगा। उस गहराई तक जहां से समस्त मानवता के लिए स्वस्थ पर्यावरण का स्रोत फूटता है। क्रांतियां होती हैं और वह दुनिया के उन भागों में जहां बर्बरता ने मानवता के शरीर को रोगाक्रांत कर रखा है। बर्बरता के विनाश के लिए क्रांति को ऐसे ही लोगों की आवश्यकता पड़ती है जिन्होंने दया और क्षमा को हाथ जोड़ लिए हों। उनका काम उनसे नहीं चलता जिनके हाथ कांप जाएं, वरन ऐसे लोगों से जिनमें असीम दृढ़ता हो। क्रांति युद्ध का पर्याय नहीं, वरन एकरसता लाने का साधन है। इस प्रकार का विचार-विमर्श यतीन्द्रदास,भगतसिंह और उनके साथियों के साथ उन दिनों बराबर चलता रहा, जब उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा के भीषण कांड के बाद महात्मा गांधी ने अचानक ही असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। आंदोलन को सहसा रोकने की बात यतीन्द्रदास की समझ में न आ सकी और इस नए संपर्क ने उन्हें एक क्रांतिकारी बना दिया।

अनशन और सविनय अवज्ञा
यतीन्द्रदास सविनय अवज्ञा के सिद्धांत को भलीभांति समझते थे। वह जानते थे कि भूख-हड़ताल सविनय अवज्ञा आंदोलन का ही एक अस्त्र है। क्रांति का मार्ग अपना लेने के बाद भूख-हड़ताल का क्या महत्व रह जाता है, यह बात वह समझ नहीं पा रहे थे। सविनय अवज्ञा में इस बात को मूलत: स्वीकार कर लिया जाता है कि इस आंदोलन में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति में उच्चस्तर का नैतिक बल तथा सहिष्णुता विद्यमान है। परंतु इस बात की आशा करना एक अलौकिता की आशा करना ही तो है। इस समस्या का एक और पहलू भी है। कल्पना इस बात की भी कर ली जाती है कि सविनय अवज्ञा आंदोलन करने वालों से निपटने में अधिकारीवर्ग अपने बनाए कानूनों का उल्लंघन नहीं करेगा, परंतु अनुभव सर्वदा इसके विपरीत हुआ है। शासन नीच से नीच कर्म करने पर उतर आता है और अपने कानूनों को कुचल डालने में जरा भी नहीं हिचकता। आवश्यकतानुसार जनमत की परवाह किए बिना वह उनमें कभी भी मनमाने परिवर्तन कर लेता है। निरंकुश शासन विद्रोह को दबाने के प्रयत्न में नैतिकता के विरुद्ध कोई भी काम करने या निर्दयतापूर्ण उपायों को अपनाने में नहीं हिचकता। इतिहास बताता है जब विलायत में नारी आंदोलनकारियों ने कर चुकाने से इनकार कर दिया तो अंग्रेजों की सी ‘सभ्य सरकार’ ने भी उन्हें घसीटते हुए जेलखाने तक ले जाने में जरा भी संकोच न किया। फिर उस सरकार को, जिसके पास शक्ति, सेना और धन हो परंतु नैतिकता नाम की कोई चीज न हो, अपने अधिकार-मद का प्रदर्शन करने से रोकना सर्वथा असंभव है।
जब श्वास-नलिकाएं फट गर्इं
जेल प्रशासन ने बंदियों के साथ ऐसा ही मनमाना व्यवहार किया, परंतु यतीन्द्रदास को बलपूर्वक दूध पिलाकर उनकी भूख हड़ताल समाप्त करने में वह बुरी तरह असफल रहे। यतीन्द्रदास में विचित्र दैवी शक्ति आ गई थी जिसके कारण उन्होंने बलपूर्वक पिलाए जाने का पूरा प्रतिरोध किया। जेल अधिकारियों को असफलता स्वीकार करनी पड़ी और उन्होंने खिलाने के प्रयत्न बंद कर दिए। उनकी श्वास नली तथा आहार नली दोनों घातक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं, उनकी दीवारें इस प्रकार फट गई थीं कि पानी पिलाने पर वह श्वासनली में चला जाता। यतीन्द्रदास घायल होकर संज्ञाशून्य हो गए, परंतु इंजेक्शनों के द्वारा उन्हें मरने से बचा लिया गया। मैं तथा कलकत्ता के दो अन्य क्रांतिकारी साथी उन दिनों इलाहाबाद में थे। वहां हम लोग अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में एक प्रस्ताव पारित किए जाने की आवश्यकता पर बल देने के लिए गए थे। प्रस्ताव में लाहौर जेल में अनशन कर रहे क्रांतिकारियों की न्यायोचित मांगों का समर्थन किया गया था तथा सरकार के उत्तरदायित्वहीन निर्दय व्यवहार की तीव्र निंदा की गई थी। यह प्रसताव कानपुर के सुप्रसिद्ध नेता स्वर्गीय पं. गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा प्रसतुत किया गया, परंतु अत्याचारी शासकों से न्याय की मांग के सभी प्रयत्न असफल रहे।

मुझ से वचन ले लिया
हम लोगों को श्री यतीन्द्रदास की घातक चोट का पता इलाहाबाद में ही चला और हम तुरंत लाहौर चल दिए। उनके होश में आने पर हम उनसे बोर्स्टल जेल में जाकर मिले। हमारी मुलाकात एक ऐतिहासिक मुलाकात थी। जेल अधिकारियों पर उनकी इस विजय ने उनमें एक विचित्र परिवर्तन ला दिया था। उनके आनन पर विजय गर्व की मुस्कान की एक अनोखी आभा थी। उस दिन हम यह न समझ सके कि उनकी आत्मा के असीम आनंद का कारण क्या था? उन्हें मालूम था कि यदि वह उपचार के लिए सहमत नहीं होते और औषधि नहीं लेते तो गले की यह चोट उनके लिए कुछ ही दिनों में घातक हो जाएगी, फिर भी उन्होंने किसी तरह की चिकित्सा तथा औषधि लेना अस्वीकार कर दिया। सरकार ने मुझे सेवा करने के लिए उनके साथ रहने की आज्ञा दे दी। यद्यपि मैं जेल से बाहर जाने आने के लिए स्वतंत्र था। जब उन्हें इसकी सूचना मिली तो उन्होंने मुझे अपने पास रहने की आज्ञा देने के पूर्व यह वचन ले लिया कि न तो मैं उनसे किसी भी समय भूख-हड़ताल समाप्त करने के लिए हठ करूंगा और न किसी प्रकार का भोजन या औषधि ही दूंगा। यदि वह कभी अचेतन अवस्था में मांग बैठें तो भी। उनका मुझ पर इस विषय में पूर्ण विश्वास भी था, केवल इसलिए नहीं कि मैं उनका भाई था, वरन इसलिए और भी कि मैं स्वयं एक क्रांतिकारी था और हममें से किसी के भी रक्त में विश्वासघात का एक कण भी नहीं था।      (जारी)ल्ल   

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