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अन्तरराष्टÑीय वृद्ध दिवस (1 अक्तूबर) पर विशेष :सेवारत सिपाही

Written byArchiveArchive
Sep 25, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 25 Sep 2017 10:56:22

यह कोई साधारण बात नहीं है कि 80-90 साल के वयोवृद्ध उसी तरह काम में जुटे हुए हैं, जैसे वे 60 साल यानी सेवानिवृत्ति के पहले लगे थे। देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। प्रस्तुत हैइन सेवारत सिपाहियों की जीवट भरी कहानियां

पूनम नेगी
यदि कोई व्यक्ति सेवानिवृत्ति के बाद भी स्वस्थ है और परिवार एवं समाज को किसी भी रूप में अपना योगदान दे रहा है, तो उसका बुढ़ापा अभिशाप नहीं, बल्कि मिसाल बन जाता है। चिकित्सा विज्ञान अब इतनी तरक्की कर चुका है कि यदि लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सजग रहें, खुद को क्रियाशील और सक्रिय बनाए रखें तो उम्र का कोई भी पड़ाव महज एक आंकड़ा बन कर रह जाता है। बुढ़ापे को बोझ मानना पूरी तरह गलत है। दरअसल, वृद्धावस्था जीवन का वह स्वर्णकाल होती है जब व्यक्ति के पास नई पीढ़ियों को देने के लिए व्यावहारिक ज्ञान एवं अनुभवों का अनमोल खजाना होता है। उम्र के इस पड़ाव से मानव जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। हमारे समाज में ऐसी शख्सियतों के कई उदाहरण मौजूद हैं जो अपने जीवन के 60-70 वसंत पार कर चुकने बावजूद अपनी सक्रियता के कारण युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
यातायात करती हैं नियंत्रित  
79 साल की प्रभा नेने मिसाल हैं उन लोगों के लिए जो बुढ़ापे को अभिशाप समझ लेते हैं। वे विद्यालयों के शुरू होने और छूटते समय यातायात को नियंत्रित करती हैं। इसके अलावा दिन में शहर के तीन अन्य भीड़भाड़ वाले स्थलों पर भी यातायात को सुचारु करने में अपनी सहयोग देती हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरी तरह सक्रिय प्रभा ताई ने पुणे की खराब यातायात प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए साल 2000 में ट्रैफिक पुलिस के सहयोग से ‘स्कूल गेट वालंटियर’ नाम से एक संगठन बनाया था और बीते 16 साल से वे इस काम में पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई हैं। उनका कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा, वे यह काम करती रहेंगी।
प्रभा ताई ने शादी नहीं की, क्योंकि वे उस सोच में यकीन नहीं रखती थीं कि लड़की है तो किसी के भी गले बांध दो। उनके समय में शादी का वैसा ही रिवाज था पर उन्हें इस तरह की शादियों पर यकीन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने पिता से साफ कह दिया था कि उन्हें उस तरह की बिना पसंद की शादी नहीं करनी, अगर कोई पसंद आएगा तो बता दूंगी और उन्होंने मेरी इच्छा का मान रखा।
प्रभा कहती हैं, ‘वह जमाना कुछ और था। कुछ लोग मिले भी जो अच्छे लगे पर न मैंने शादी की बात पर पहल की, न दूसरी तरफ से खुला प्रस्ताव आया। बस यूं ही वह उम्र गुजर गई। मगर, मुझे इसका कोई मलाल नहीं है। कई अच्छे दोस्त हैं, जिन्होंने अकेलेपन की कमी कभी खलने नहीं दी।’’
प्रभा नेने को गाड़ी चलाना बहुत पसंद है। उन्होंने कई रैलियों में हिस्सा लिया है और कई पुरस्कार जीते हैं। बकौल प्रभा उनकी पहली रैली एक स्कूटर पर थी। 1970 में उन्होंने नागपुर से मुंबई की एक रैली में हिस्सा लेकर अपने वेस्पा स्कूटर से लगभग 900 किलोमीटर का सफर तय किया था। तब वे उस रैली में पूरे देश से अकेली महिला प्रतिभागी थीं। उसके बाद से ड्राइविंग उनका जुनून बन गई। अपने स्कूटर से तसगांव, सांगली और बीजापुर की यात्रा करने वाली प्रभा ताई अपनी 1934 वाली अस्टिन से मुंबई और हैदराबाद की यात्रा कर चुकी हैं। वे कहती हैं कि नैंने यह तय किया है कि जब मैं ट्रैफिक कंट्रोल की नौकरी से सेवानिवृत्त होऊंगी तो अपनी ड्राइव करके विदर्भ जाऊंगी।  
ज्ञान बांटते उदय राज
साक्षरता की सूची में सबसे निचले पायदान पर खड़े उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के 68 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक उदयराज मिश्र ने अपने जीवन को गांव के बच्चों को शिक्षित करने को समर्पित कर दिया है। गौरतलब है कि 2002 में नदी की धारा में जब गांव का प्राथमिक विद्यालय भवन नष्ट हो गया तो क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा मिलती रहे, इस हेतु उन्होंने अपने ही घर में विद्यालय खुलवा दिया। बीते 12 वर्ष से प्राथमिक विद्यालय अमवा उन्हीं के ही घर में चल रहा है।
 वर्ष 1964 में मोक्षद्वार उच्च माध्यमिक विद्यालय, कुरसहा से अपने शिक्षक जीवन का सफर शुरू करने वाले श्री मिश्र 1967 में प्रशिक्षण लेने के बाद परिषदीय विद्यालय में सेवारत हो गए। तब से शिक्षक, प्रधान शिक्षक के साथ वे जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में बतौर शिक्षक प्रशिक्षण प्रभारी भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर उन्हें राज्य सरकार की ओर से पुरस्कृत किया जा चुका है। यहां बताते चलें कि वर्ष 2009 में उच्च प्राथमिक विद्यालय मुजेहना से प्रधान शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे जिले से अशिक्षा का कलंक मिटाने के लिए साक्षर भारत मिशन के तहत चलाए जा रहे साक्षरता कार्यक्रम से जुड़ कर काम कर रहे हैं। इसके तहत वे संकुलवार अशिक्षित महिलाओं और व्यक्तियों को चिह्नित कर उन्हें अक्षर ज्ञान कराने में जुटे हैं।
बदल रहे गरीब बच्चों की तकदीर
इस स्कूल का न कोई भवन है और न यह किसी पक्की जमीन पर चल रहा है। कागजों में भले ही इस स्कूल का नाम न हो, बावजूद इसके, इस स्कूल में 460 बच्चे पढ़ाई करते हैं। ये वे बच्चे हैं जो कूड़ा बीनने का काम करते हैं या फिर गरीब तबके से आते हैं। गुड़गांव के सेक्टर 52 में खुले आकाश के नीचे चलने वाले इस स्कूल को सेवानिवृत्त इंजीनियर जेडी खुराना और उनकी पत्नी कमलेश खुराना चला रहे हैं। पिछले 12 साल से खुले आकाश तले चलने वाले उनके इस ‘नयी किरण यूनिवर्सल स्कूल’ में प्री नर्सरी से लेकर 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई कराई जाती है और बच्चों को कम्प्यूटर के बारे में जानकारी नर्सरी कक्षा से ही दी जाती है। खास बात यह है कि इस स्कूल में दाखिला साल भर में कभी भी लिया जा सकता है।
जेडी खुराना के मुताबिक सेवानिवृत्त होने के बाद वे जब सुबह सैर को निकलते थे तो कूड़ा बीनने वाले बच्चों को देखकर उन्हें दु:ख होता था। तब उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उन बच्चों को शिक्षित करने की योजना बनाई और अपने गैराज से चार बच्चों के साथ इस काम की शुरुआत की। दो महीनों के अंदर बच्चों की संख्या बढ़कर 64 हो गई। एक ओर गरीब बच्चे उनके यहां पढ़ने के लिये आ रहे थे तो वहीं दूसरी ओर उनके घर के आसपास रहने वाले दूसरे लोगों को गरीब बच्चों का इस तरह कॉलोनी में आना पसंद नहीं आ रहा था। तब पड़ोसियों के विरोध के कारण जेडी खुराना ने अपने घर से 500 गज की दूरी पर एक बिल्डर की मदद से 4-5 कमरों में स्कूल चलाना शुरू किया और स्कूल को नाम दिया ‘नई किरण यूनिवर्सल स्कूल’। उस स्कूल को शुरू हुए अभी दो-तीन साल ही हुए थे कि स्थानीय लोगों की शिकायत पर प्रशासन ने उस स्कूल की इमारत को गिरा दिया।
 अब यह स्कूल टेंट के नीचे चलता है। जिसे सुबह लगाया जाता है और रोज शाम को हटा लिया जाता है। यहां पर नर्सरी से कक्षा 10 तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को किताबें, ड्रेस, स्टेशनरी और दिन का खाना मुफ्त में दिया जाता है। यह स्कूल सुबह आठ बजे से दोपहर डेढ़ बजे तक चलता है। बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल में 14 शिक्षक रखे गए हैं, जबकि पांच स्वयंसेवक भी बच्चों की पढ़ाई में मदद करते हैं। इन स्वयंसेवकों में एक सेवानिवृत्त कुलपति, एक कंपनी के पूर्व सीईओ और एक प्रबंधक जैसे प्रतिष्ठित पदों पर रह चुके हैं। इस विद्यालय में 12 महीने दाखिला होता है लेकिन दाखिला उन्हीं बच्चों को लिया जाता है जिनकी उम्र पांच साल से कम होती है। जेडी खुराना बताते हैं कि वे अब तक अपने स्कूल से शिक्षित 200 से भी ज्यादा मेधावी बच्चों का दाखिला निजी विद्यालयों में करा चुके हैं। खास बात है कि इन सभी बच्चों का स्कूल में दाखिला जांच परीक्षा के बाद हुआ है और ये सभी वहां पर नि:शुल्क पढ़ाई करते हैं।  
तैराकी के तरीके सिखातीं सरला
इंदौर के नेहरू पार्क तरण पुष्कर में 37 बरस की सेवा देने के बाद बीते साल 31 मार्च को सेवानिवृत्त हुर्इं गोताखोर सरला सरवटे कहती हैं, ‘‘खिलाड़ी कभी सेवानिवृत्त नहीं होता। यह तो नौकरी की व्यवस्था है, मैं भला पानी से कहां दूर रह सकती हूं? आप शहर में किसी भी स्वीमिंग पूल पर जाएंगे, तब मैं बच्चों को तैराकी और गोताखोरी के गुर सिखाते ही नजर आऊंगी।’’ गौरतलब है कि इंदौर की सांसद और लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन सार्वजनिक रूप से बहुत कम ही किसी की प्रशंसा करती हैं, लेकिन जब तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल इंदौर के चिमनबाग मैदान पर प्रस्तावित साई सेंटर के लिए स्थान देखने आए तो वहां मौजूद ताई ने दूर अकेली खड़ी सरला सरवटे को बुलवाया और फिर उनसे परिचय करवाया कि ये हैं हमारे इंदौर की शान सरला सरवटे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन खेल को समर्पित कर दिया।
सरला सरवटे का तैराकी जीवन अहिल्याश्रम में नौवीं कक्षा से शुरू हुआ था। कोच रमेश व्यास ने उन्हें गोताखोरी के गुर सिखाए। सरला ने तैराकी जीवन का पहला कांस्य पदक मद्रास में आयोजित स्कूल्स नेशनल में तीन मीटर डाइविंग में जीता। तब नौंवी की छात्रा द्वारा मध्य प्रदेश को राष्टÑीय स्तर पर कांस्य दिलाना बड़ी बात थी। पिता की मौत और मां को लकवा मारने के कारण सरला का बचपन घोर आर्थिक संकट में बीता। पेट भरने के लिए उन्होंने लोगों के घर रोटियां तक बनार्इं मगर हिम्मत नहीं हारीं। राष्टÑीय स्तर पर जूनियर और सीनियर में सात स्वर्ण, छह रजत और 10 कांस्य पदक जीतने वाली सरला 4 साल तक राष्टÑीय स्तर पर तीन मीटर और 10 मीटर गोताखोरी में स्वर्ण पदक विजेता रहीं। 1975-76 में श्रीलंका में आयोजित आमंत्रित अंतरराष्टÑीय टूर्नामेंट में सरला ने तीन मीटर और 10 मीटर गोताखोरी में भारत को कांस्य पदक दिलवाया। अप्रैल 1979 में इंदौर नगर निगम में उनकी नौकरी लगी। सरला एक दिलचस्प वाकया बताती हैं, ‘‘1982 में दिल्ली एशियाड के लिए भारतीय गोताखोरी टीम में मेरा चयन हुआ पर घर की समस्या के कारण मैं दो महीने के उस शिविर में नहीं जाना चाहती थी क्योंकि तब मेरी तनख्वाह से ही घर चलता था। जब नगर निगम के आयुक्त पटवर्धन साहब को यह जानकारी मिली तो उन्होंने न केवल मुझे शिविर के लिए छूट दी, वरन मेरा वेतन भी घर पहुंचा दिया।’’ उनकी इस दरियादिली ने मुझे नया हौसला दिया। एशियाड में तीन मीटर और 10 मीटर गोताखोरी में सरला ने छठा स्थान प्राप्त किया था। उसके बाद से उन्होंने बच्चों को गोताखोरी सिखाने की कोचिंग शुरू कर दी। 1975-76 में विक्रम अवॉर्ड से सम्मानित सरला बताती हैं कि उनकी कोचिंग में तकरीबन 5,000 बच्चे तैराकी और गोताखोरी सीख चुके हैं।
शिक्षादान बना जीवन का लक्ष्य
कटनी के देवराकला निवासी भरतराम बडगैंया शिक्षक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी 16 साल से निरंतर स्कूल जाते हैं और बिना किसी पारिश्रमिक पढ़ाते हैं। यही नहीं, वे स्कूल के अलावा अपने घर पर भी बच्चों को नि:शुल्क ट्यूशन भी देते हैं। वे कहते हैं, ‘‘किसी को शिक्षित करने से बड़ा पुण्य इस दुनिया में दूसरा कोई नहीं है।’’ हिन्दी साहित्य में परास्नातक करने वाले भरतराम की संस्कृत, इतिहास, अंग्रेजी और राजनीतिशास्त्र में भी अच्छी पकड़ है।
जनसेवा को समर्पित जीवन
हरिद्वार के सेवानिवृत्त शिक्षक सतीश चौहान और जिला महिला अस्पताल की नर्स इंद्रेश बाला का जीवन भी परोपकार में बीत रहा है। सतीश चौहान 2014 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके बावजूद वे राजकीय जूनियर हाई स्कूल, रोशनाबाद के बच्चों को नि:स्वार्थ भाव से पढ़ा रहे हैं। वे प्रतिदिन सात किलोमीटर साइकिल चलाकर स्कूल जाते हैं। यदि कोई बच्चा दो दिन से ज्यादा गैरहाजिर हो जाता है तो सतीश उसके घर जाकर उसके अभिभावकों से उसकी वजह पूछते हैं और बच्चों की बेहतरी के लिए उनके अभिभावकों को जरूरी सलाह देते हैं।   
इंद्रेश बाला भी हरिद्वार के जिला महिला अस्पताल से 30 नवंबर, 2014 को 32 साल की नौकरी के बाद सेवानिवृत्त हुई हैं। इसके एक दिन बाद ही वह फिर अस्पताल पहुंच गर्इं और सीएमएस डॉ. भवानी पाल से कहा कि वह मरीजों की नि:शुल्क तीमारदारी करना चाहती हैं। मूल रूप से देहरादून के बद्रीपुर की निवासी इंद्रेश अपने पेशे को ही अपनी पूजा मानती हैं।
बालिका शिक्षा को समर्पित
चंद्रकला गार्डन 2015 में झाबुआ जिले के कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, थांदला से सेवानिवृत्त हुई हैं। लेकिन बालिका शिक्षा के प्रति वह इतनी गंभीर हैं कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद भी पढ़ाना नहीं छोड़ा, वह भी नि:स्वार्थ। वे 11वीं और 12वीं कक्षा की 177 छात्राओं को विज्ञान पढ़ाती हैं। उनका कहना है कि वनवासी बहुल इस जिले में विज्ञान शिक्षकों की घोर कमी है। बच्चों को कोई परेशानी न हो इसलिए वह दुबारा पढ़ाने लगी हैं।
पेड़ वाले बाबा  
पेड़ों से बेटी जैसा भावनात्मक रिश्ता रखने वाले लखनऊ निवासी चन्द्रभूषण तिवारी उन चन्द लोगों में से एक हैं जो अपने प्रकृति प्रेम के कारण आज एक शख्सियत बन चुके हैं। 1,00000 से अधिक पौधे रोपने वाले चन्द्रभूषण को लोग ‘पेड़ वाले बाबा’ के नाम से पुकारते हैं। यह उनका पेड़ों के प्रति जुनून ही है कि कहीं भी पेड़ कटने की खबर सुनते ही तत्काल उसे बचाने पहुंच जाते हैं। उनका कहना है कि प्रकृति के बिगड़े संतुलन को कायम रखने का सबसे कारगर उपाय है वृहद स्तर पर पौधारोपण। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों का मानवीय विषयों एवं प्रकृति की ओर ध्यान खींचना और वृक्ष को अपनी बेटी मानते हुए हर घर के सामने एक पेड़ लगाकर उस घर से दिली रिश्ता जोड़ना पेड़ वाले बाबा की दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग है।
तिवारी जी बताते हैं कि कुछ साल पहले अखबारों के माध्यम से जब उनके इस काम की गूंज सूबे के पूर्व राज्यपाल  बी.एल. जोशी तक पहुंची तो उन्होंने उन्हें राजभवन बुलवा कर न सिर्फ सम्मानित किया, वरन पुरस्कार स्वरूप 5,000 रुपए भी दिए। तब से उनका यह अभियान दोगुने जोश से शुरू हो गया।   
इन बुजुर्गों से आज की नई पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए। भले ही इन सबकी उम्र 60 पार कर चुकी है, लेकिन इनका उत्साह किसी नौजवान से किसी भी मायने में कम नहीं है। इनके जज्बे के सामने तो कई बार नौजवान भी पस्त हो जाते हैं। ये लोग वास्तव में कर्मयोगी हैं। भगवान इन्हें लंबी आयु दें, ताकि ये लोग समाज की सेवा और कर सकें।     ल्ल

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