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स्कूल की फीस बस एक पौधा!

Written byArchiveArchive
Sep 4, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 04 Sep 2017 10:56:11


इसमें संदेह नहीं कि छोटे-छोटे प्रयास ही समाज में बदलाव लाने का काम करते हैं। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले के बरगई गांव में स्थित शिक्षा कुटीर ऐसा ही एक उदाहरण है

 अश्वनी मिश्र
छत्तीसगढ़ स्थित अंबिकापुर जिले के बरगई गांव में ‘शिक्षा कुटीर’ स्कूल वनवासी बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यहां नि:शुल्क पढ़ाई के साथ ही मुफ्त में बच्चों को किताबें और स्कूली वेशभूषा देने का काम किया जाता है। हालांकि अभी यह के.जी. से लेकर कक्षा दो तक है। खास बात यह है कि फीस की एवज में अभिभावकों से पहाड़ पर एक पेड़ लगवाया जाता है जिसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। इस पहल के चलते पहाड़ पर अब तक 200 से ज्यादा पौधे लगाये जा चुके हंै।
शिक्षा कुटीर शुरू होने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। गांव में एक विशाल पहाड़ है जो वर्षों पहले हराभरा था। लेकिन कुछ समय से यहां से पेड़ गायब होते चले गए। हालत यह हुई कि वह पेड़ विहीन हो गया। गांव के लोगों को यह ठीक तो नहीं लग रहा था। इसी गांव के अमित ने, जो पेशे से शिक्षक हैं, अपने साथियों से इस पर चर्चा की और तय किया कि हम सभी मिलकर गांव में एक ऐसा स्कूल खोलेंगे जहां दाखिला लेने वाले बच्चे के अभिभावक से फीस के एवज में पहाड़ पर एक पौधा लगवाया जाएगा। इस पौधे की देखभाल उस व्यक्ति को खुद एक साल तक करनी होगी, जिससे धीरे-धीरे यह पहाड़ फिर से हरा भरा तो होगा ही, हमारे गांव के गरीब बच्चे जो ज्यादा फीस वाले स्कूल में नहीं पढ़ सकते, वह पढ़ सकेंगे। इस दिशा में अमित ने गांव के लोगों से बात की और जो अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य वाले उनके साथी थे, उन्होंने 2015 में ‘शिक्षा कुटीर’ की नींव डाली।
वे बताते हैं, ‘‘हमारी इस पहल का क्षेत्र के लोगों ने हृदय से स्वागत किया और वे अपने बच्चों को खुशी-खुशी स्कूल में भेजते हैं। यहां बच्चों को भारतीय संस्कारों के साथ देश प्रेम घुट्टी भी खेल और गीतों में मिलती है। की भावना सिखाने का काम किया जाता है। हकीकत में देखें तो यहां के वनवासी परिवार बहुत ही गरीब हैं और बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं हैं। किसी तरह खेती करके परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। जागरूकता के अभाव में उनके बच्चे भी पढ़ नहीं पा रहे। इसलिए हमारा प्रयास ऐसे बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना है।’’
अमित कहते हैं,‘‘वनवासी बच्चे पढ़ाई के क्षेत्र में किसी से कमजोर न रहे इस पर हमारा जोर रहता है। क्योंकि मैं चाहता हूं कि इनकी नींव मजबूत हो ताकि आगे जाकर उन्हें कोई समस्या न आए। साथ ही हर अभिभावक का सपना होता है कि उनका बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़े लेकिन विद्यालयों की मोटी फीस की वजह से वह बच्चों को पढ़ा नहीं पाते। पर अब ऐसा नहीं होगा। हमारे प्रयास से पर्यावरण की रक्षा तो होगी इसके अलावा बच्चों का शैक्षिक विकास भी होगा।’’ अमित की मानें तो स्कूल में इस समय 45 बच्चे और तीन अध्यापक हैं। जो अध्यापक यहां पढ़ाते हैं वह पढ़ाने की एवज में कुछ नहीं लेते। चंूकि स्कूल बिना बस्ते के चलता है इसलिए स्कूल के अध्यापकों का बच्चों पर इस बात पर जोर रहता है कि वे खेल-खेल में ज्यादा सीखें।
हकीकत में अमित और उनके साथियों ने जो अनूठा प्रयास शुरू किया है वह न केवल छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहा है  बल्कि पर्यावरण की रक्षा के प्रति भी गांव के लोगों को जागरूक कर रहा है।    

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