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1857 में क्रांति से ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ाने वाले मेरठ ने खेल उत्पादों के निर्माण में अपनी बादशाहत कायम की है। यहां बनने वाले बल्ले और गेंद का इस्तेमाल दुनियाभर के क्रिकेटर करते हैं
अनुरोध भारद्वाज
रामायण, महाभारत, विदेशी आक्रमण, स्वतंत्रता संग्राम हो या बंटवारे के बाद का कालखंड, इतिहास में मेरठ की अपनी अलग विशेषता रही है। मेरठ यानी हस्तिनापुर महाभारत काल में कौरवों की राजधानी था। मेरठ रावण की ससुराल रहा है। राजा दशरथ का बाण लगने से यहीं श्रवण कुमार की मृत्यु होने की बात रामायण में वर्णित है। मेरठ मौर्य सम्राट अशोक के काल में (273 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व) बौद्ध धर्म का केंद्र रहा। मेरठ ने 1192 में मोहम्मद गौरी, 1398 में तैमूर लंग का आक्रमण झेला। स्वाधीनता आंदोलन में मेरठ का योगदान बेहद अहम रहा। क्रांतिवीरों ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा मेरठ से ही बुलंद किया। ब्रिटिशराज में मेरठ छावनी ही वह स्थान थी, जहां सैनिकों ने खाल-चर्बी से बने कारतूसों के खिलाफ आवाज उठाई। इसके बाद मेरठ से 1857 की क्रांति का आगाज हुआ। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भड़की वह पहली चिनगारी 1947 को आजादी हासिल करने के बाद ही थमी। गाजियाबाद और नोएडा कभी अभिभाजित मेरठ का ही हिस्सा थे। पहले गाजियाबाद बना और बाद में इसी का एक हिस्सा अलग कर नोएडा जनपद बना। आज मेरठ यहां बनने वाले खेलों के सामान की वजह से दुनियाभर में जाना जाता है।
उद्योगों की विकास गाथा
मेरठ में खेल उद्योग की शुरुआत 1917 में शुरू हुई थी और इसकी वजह बने सियालकोट (पाकिस्तान) में सांप्रदायिक दंगे। अविभाजित भारत में सियालकोट ही वह जगह थी, जहां खेलों का छोटा-मोटा सामान तैयार होता था। फसाद की वजह से व्यापारी पलायन कर मेरठ शहर आ गए। खेल के सामान बनाने के लिए चमड़े की जरूरत थी जो मेरठ के पास हापुड़ में भरपूर मात्रा में था। सियालकोट से पहले कुछ कारोबारियों ने ही मेरठ में काम शुरू किया। 1947 में देश विभाजन के बाद सियालकोट में बाकी बचे हिंदू कारोबारी भी मेरठ आ गए। पाकिस्तान में खेल उद्योग का जैसा भी रूप-रंग है, उसकी देन मेरठ में बसे महाजन परिवार की पीढ़ियां हैं, जिन्होंने पहले सियालकोट में इस कारोबार की नींव रखी थी और आजादी के बाद अपनी मेहनत-लगन से मेरठ का डंका पूरी दुनिया में बजाया है। खेलों का सामान बनाने में जालंधर (पंजाब) की पहचान में भी मेरठ का ही योगदान है। आजादी के बाद प्रताप सिंह कैरों पंजाब के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपने राज्य में औद्योगिक विकास के प्रयास शुरू किए। उन दिनों खेल उद्योग को विस्तार दे रहे मेरठ के कुछ कारोबारी परिवार कैरों के प्रयासों से वहां चले गए और इस तरह मेरठ की तरह जालंधर में भी खेल उद्योग की आधारशिला रखी गई। मेरठ के खेल उद्योग का सालाना आय 5,000 करोड़ रु. है।
नामचीन खेल उत्पाद कंपनियां
एसजी, बीडीएम, एसएस, नेल्को एवं स्टेग मेरठ की नामचीन कंपनियां हैं। ये कंपनियां क्रिकेट, फुटबॉल, टेबल टेनिस, हॉकी, बिलियर्ड्स, एथलेटिक्स, धनुष बाण, फिजिकल फिटनेस से जुड़े उत्पाद बनाती हैं। मेरठ में बने बल्ले और गेंद का इस्तेमाल तो दुनिया के हर देश के क्रिकेटर करते हैं।
तकनीक से दी बाधाओं को मात
विभाजन के बाद सियालकोट से कारोबारी परिवार खाली हाथ ही मेरठ आए थे। उस समय हापुड़ के अलावा कहीं भी सामान बनाने के लिए चमड़ा नहीं मिलता था। उस समय हापुड़ आने-जाने के लिए न तो साधन थे और न ही उनके पास पैसे। खेल-खिलाड़ी और खेल के मैदान नहीं होने से खेल सामान की मांग भी नहीं थी। साथ ही, सियालकोट की तरह प्रशिक्षित कारीगर भी नहीं थे। ऊपर से सरकार से भी मदद नहीं मिलती थी। लिहाजा उन्होंने नए लोगों को काम सिखाया और उनके साथ खुद भी दिन-रात काम किया। उस दौर में एक दर्जन गेंदों का आॅर्डर भी बहुत बड़ा माना जाता था। माल तैयार करने में काफी दिन लग जाते थे। जैसे-जैसे तकनीक हाथ आई, कारोबार की दिक्कतें भी दूर होती गर्इं। हाथ का काम डाई आने से आसान हुआ और फिर मशीनों ने काम और आसान बना दिया। प्रेम सागर एंड संस के एमडी अभिमन्यु महाजन पुराने दिन की याद करते हुए बताते हैं कि खेल कारोबारियों को बहुत संघर्ष के बाद सवेरा नसीब हुआ। 1967 में दादा स्व. चुन्नीलाल महाजन सियालकोट से कुछ परिवारों के साथ 1947 में जब मेरठ आए तो पिताजी प्रेमसागर महाजन आठ साल के थे। दादा के साथ पिताजी ने कारोबार स्थापित करने में बहुत पसीना बहाया। पैदल-साइकिल से बरसोंबरस दौड़ लगाई। तब सफलता मिली।
‘सरकार मदद करे तो चीन की क्या बिसात’
मेरठ में औद्योगिक विकास और खेल उत्पाद निर्माता कंपनियों को मिलने वाली चुनौतियों पर आॅल इंडिया स्पोटर््स गुड्स मैन्युफैक्चरर्स फेडरेशन के अध्यक्ष एवं रामा रबर इंडस्ट्री के एमडी पुनीत मोहन शर्मा ने कहा कि चीनी उत्पाद बड़ी चुनौती बन रहे हैं। वे कहते हैं कि हम तकनीक में पीछे हैं, जबकि चीन के उद्योग अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए। हर स्तर पर सरकार से मदद मिले तो मेरठ के उद्योग के आगे चीनी चमक फीकी पड़ जाएगी। मेक इन इंडिया का सपना तभी पूरा हो सकता है, जब मेड इन चाइना की हानि समझकर स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया जाए। सरकार की मदद के बिना यह संभव ही नहीं है।
पुनीत मोहन कहते हैं कि खेल उत्पादों पर जीएसटी शून्य होना चाहिए। सरकार और बैंकों के सहयोग के बिना मेरठ के उद्यमियों ने अपने खेल उत्पादों की चमक पूरी दुनिया में बिखेरी है। अभी तक खेल उत्पादों पर वैट नहीं था तो उद्योग तरक्की कर रहा था। चूंकि खेल से जुड़े उत्पाद बहुत हैं, इसलिए इन्हें एक ही स्लैब में रखा जाना चाहिए। जीएसटी लागू होने से समस्या आएगी।
उन्होंने कहा कि खेल उत्पाद बना रहीं कंपनियों के पास जगह की कमी है। सरकार उद्योग को तकनीक, सहयोग, जमीन और सुरक्षा मुहैया कराए। तकनीक के बिना भारतीय उद्योग चीनी उत्पाद का अधिक समय तक मुकाबला नहीं कर सकेंगे। वे कहते हैं कि खेल उत्पादों की तरह ही शहर में हैंडलूम-पावरलूम उद्योग भी अपनी पहचान बना रहा है। यहां एक हजार से भी अधिक छोटे-बड़े कारखाने हैं, जिससे तीन लाख से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। इसका सालाना कारोबार 15,000 करोड़ रु. से भी अधिक है। श्री शारदा ग्रुप के एमडी एवं भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक विनीत अग्रवाल शारदा बताते हैं कि कानून व्यवस्था की खराब हालत से पहले उद्यमियों के सामने बहुत दिक्कतें आईं। 1986 में सांप्रदायिक दंगों के कारण बड़ी तादाद में फैक्ट्रियों को जला दिया गया। कई फैक्ट्रियों पर ताले पड़ गए। अधिकांश कारोबारी पानीपत चले गए। इसके अलावा, अपराध और खराब कानून व्यवस्था ने भी औद्योगिक विकास को प्रभावित किया है। इसके अलावा, यहां के वस्त्र उद्योग की भी अपनी पहचान है।
देश की सबसे बड़ी सर्राफा मंडी
शहर में आभूषणों का सालाना कारोबार 5,000 करोड़ रु. से अधिक का है। यहां 1970 में सराफा कारोबार शुरू हुआ था, जिससे अभी डेढ़ लाख से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। 80,000 से ज्यादा कारीगर तो बंगाल के हैं। यहां के प्रमुख सर्राफा बाजारों में शहर बाजार, कैंट सदर बाजार, लाल कुर्ती बाजार, आबूलेन बाजार आदि प्रमुख हैं। मेरठ बुलियन ट्रेडर्स एसोसिएशन और सराफा एसोसिएशन ने उपभोक्ताओं के साथ मिलकर राज्य और केंद्र सरकार से मेरठ को ‘ज्वेल सिटी’ घोषित करने के साथ एक्सपोर्ट जोन बनाने, आभूषण निर्माण और प्रशिक्षण केंद्र खोलने की मांग की है।
सबसे पुराना प्रकाशन उद्योग
मेरठ में प्रकाशन उद्योग 200 साल से भी अधिक समय से है। 1806 में मेरठ में सैन्य छावनी बनने के दौरान ही प्रकाशन उद्योग की भी नींव पड़ी थी। शुरुआत में मेरठ उर्दू प्रकाशन के लिए मशहूर था, लेकिन बाद में हिंदी में भी प्रकाशन होने लगा। 1857 के गदर से पहले देश के कई हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनने के पीछे मेरठ से प्रकाशित होने वाली पुस्तकों और पर्चों का बड़ा योगदान था। मौजूदा समय में उपन्यासों की जगह इसने शैक्षिक प्रकाशनों की शक्ल ले ली है, जिसका सालाना कारोबार 500 करोड़ रु. से अधिक है। इसके अलावा, मेरठ में कैंची, वाद्य यंत्र, फार्मास्यूटिकल, धागा, नेल कटर, कृषि यंंत्रों का भी उत्पादन
होता है। (बातचीत पर आधारित)











