हौसलों को देते पंख
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हौसलों को देते पंख

Written byArchiveArchive
Jul 17, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 17 Jul 2017 11:56:11

अगर बनारस क्षेत्र के परंपरागत उद्योगों और उससे जुड़े लोगों का कायाकल्प हो रहा है तो डॉ. रजनीकांत की इसमें अनूठी भूमिका है। मूलत: मिर्जापुर के रहने वाले डॉ. रजनीकांत ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी करके गंगा एक्शन प्लान में रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्य किया। इसी दौरान वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी से प्रेरित हुए और समाज सेवा में उतर गए। ह्यूमन वेलफेयर एसोसियेशन नाम से एक स्वयंसेवी संगठन चलाने वाले डॉ. रजनीकांत ने बनारस के परंपरागत उद्योगों के उत्थान और उत्पादों के जीआई पंजीकरण कराने में अहम भूमिका निभाई है। वे मानते हैं कि पंजीकरण होने से पुरखों की थाती संभाले लाखों-लाख हस्तशिल्पियों को नवजीवन मिला है। परंपरागत उद्योग से दूर होती नई पीढ़ी को इसने रोजगार की नई सीढ़ी दी है।
वे कहते हैं,‘‘काशी और उसके आस-पास का क्षेत्र धार्मिक रूप से तो समृद्ध रहा ही है, व्यवसाय का भी बहुत बड़ा केन्द्र रहा है। मुगल काल और फिर अंग्रेजी शासन में लंदन के रास्ते यहां के सामान को पूरे विश्व में भेजा जाता था जिसमें वस्त्र बहुत बड़े पैमाने पर गए। लोग मैनचेस्टर की बात करते हैं लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया में बनारस से बड़ा वस्त्र उद्योग कहीं और रहा ही नहीं।
ईसाइयों के सबसे बड़े मत गुरु पोप के वस्त्र काशी से ही बनकर जाते हैं। दलाई लामा के वस्त्र भी काशी में बनते हैं। भूटान, सिंगापुर, जापान, मलेशिया और कोरिया को यहां से ब्रोकेड के वस्त्र बनकर के जाते हैं, जिनको वहां के राजा-रानी उत्सवों के समय इस्तेमाल करते हैं। हॉलीवुड में बनारस के ब्रोकेड का बहुत जुनून था। आज भी जब पुराने दृष्टांत दिखाने होते हैं तो काशी के वस्त्रों का प्रयोग किया जाता है। बाद में यह चलन बॉलीवुड में भी आया।
आज भी भारत सरकार की सूची में बनारस के 24 हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम उत्पाद शामिल हैं। द्वारिकाधीश के पूरे वस्त्र, श्रीनाथ जी के वस्त्र यहीं बनाए जाते रहे हैं। काशी  प्राचीनकाल से ही ऐसे कार्यों के लिए मशहूर रही है।’’ वे बताते हैं,‘‘जब हम ये कहते हैं कि हमारी इतनी भरी-पूरी संस्कृति, विरासत थी तो कुछ समय पहले इनकी खराब स्थिति क्यों आई? मुझे यह कहने में बिलकुल संकोच नहीं हैं कि जिस तरह से हैंडलूम और इस असंगठित क्षेत्र को समर्थन और बढ़ावा मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। उस समय की सरकारों  की नीतियां सही नहीं थीं। और जो नीतियां  बनी उसमें बड़े उत्पादनकर्ताओं को  फायदा मिला। तो जो मुनाफे का हिस्सा है वह बुनकर और शिल्पकार तक पहुंचा    ही नहीं।’’
 उन्होंने आगे कहा, ‘‘देखिए, जब हम बार-बार कृषि प्रधान देश बोलते हैं तो यह भूल जाते हैं कि इस कृषि प्रधान देश में उसी कृषि से जुड़ा एक तबका बुनकर और शिल्पी भी है जो समय पर खेती भी करता है बाकी समय में साड़ी बुनता है, कालीन और दरी बनाता है। लेकिन पिछले 60 साल में इस क्षेत्र को अलग-अलग करके देखा गया। उसका परिणाम यह हुआ कि बीच में विरासत पर ही संकट मडराने लगा।’’ वे कहते हैं कि यहां के उत्पादों को किसी ब्रांड के नाम की जरूरत नहीं है। अगर जरूरत है तो बाजार की। बस यही काम प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। उन्होंने इस समृद्ध विरासत के उत्थान के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसके परिणाम आज यहां देखें जा सकते हैं।

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