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देश, धर्म और समाज की सेवा के कई मार्ग हैं। नई पीढ़ी को साहित्य के माध्यम से जागरूक करना भी ऐसा ही पुनीत कार्य है। पुस्तक 'भारत जिनके मन बसा' में लेखक विजय कुमार ने ऐसे ही 104 साहित्यकारों का जीवन-परिचय संकलित किया है, जिन्होंने अपनी लेखनी से मां भारती की सेवा की। उनके लेखन की विधा चाहे जो भी रही हो, पर आजीवन उनके हृदय में भारत ही बसा रहा। ये ऐसे लेखक थे, जिनकी कलम न तो कभी रुकी और न ही बिकी। परिचय को कालक्रम के अनुसार परोसा गया है। खास बात यह कि इनमें कुछ ऐसी शख्सियतें हैं, जिनके विषय में लोग नहीं जानते या बहुत कम जानते हैं। इनमें गोंडवाना (अब जबलपुर) के राजा शंकरशाह, उनके पुत्र रघुनाथ शाह, इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, कहानीकार चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' आदि शामिल हैं।
पहला अध्याय 1824 में बंगाल के जैसोर जिले (अब बांग्लादेश में) में जन्मे मधुसूदन दत्त को समर्पित है, जो बाद में ईसाई बन गए थे और अपना नाम माइकल मधुसूदन दत्त रख लिया था। उन्होंने भारतीय काव्य में पहली बार मुक्तछंद का प्रयोग किया। उन्होंने गीतिकाव्य, त्रिपदी, चतुष्पदी और पंच-चरण कविताओं जैसे कई प्रयोग किए, जिसके कारण उन्हें कविता का क्रांतिकारी कहा जाता है। इसके अलावा, उन्होंने परिवर्णी काव्य, सम्बोधि गीत, पत्रकाव्य, चित्रात्मक काव्य आदि की नई शैली भी गढ़ी। दत्त ने संस्कृत, बांग्ला, तमिल, तेलुगु आदि भारतीय भाषाओं में प्रचुर काव्य साहित्य रचा। इनके बाद तुलसीदास रचित रामचरित मानस का पहली बार अंग्रेजी अनुवाद करने वाले एफ.एस. ग्राउस का परिचय है, जो प्रशासनिक अधिकारी थे। अंग्रेज होने के बावजूद उन्होंने भारत को कभी विदेशी शासक की दृष्टि से नहीं देखा। ब्रज की संस्कृति पर उनके द्वारा लिखित 'मथुरा-अ डिस्ट्रक्टि मेमॉयर' को एक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। एक समय जब बंगाल एशियाटिक सोसायटी के एक वरिष्ठ सदस्य अदालतों में उर्दू और फारसी मिश्रित भाषा का जोरदार पक्ष ले रहे थे, तब ग्राउस ने शुद्ध हिंदी का समर्थन किया था। यह अलग बात है कि अंग्रेजों की कुटिलता के कारण उनका प्रयास सफल नहीं हुआ।
इसी तरह, पूरे उत्तर भारत में गाई जाने वाली आरती 'ओम जय जगदीश हरे…' के रचयिता पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी, वन्दे मातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी, हिंदी साहित्य के जरिये नवजागरण का शंखनाद करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र और विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की जीवन गाथा को संकलित किया गया है। 18वां अध्याय प्रयोगधर्मी शिक्षक गिजूभाई नाम से प्रसिद्ध गिरिजाशंकर भगवानजी वधेका को समर्पित है, जो वकालत छोड़कर अध्यापन के क्षेत्र में आए थे। वे बच्चों को लालच देने और उनकी पिटाई करने को बड़ा अपराध मानते थे। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रयोगों तथा अनुभवों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए 'दक्षिणामूर्ति' नामक पत्रिका भी निकाली। इनके अलावा, भोजपुरी को विश्व रंगमंच पर स्थापित करने वाले नाटककार भिखारी ठाकुर, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, गुजराती उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और उडि़या साहित्य को नया आयाम देने वाले लक्ष्मीकांत महापात्र के योगदान को कोई कैसे भूल सकता है।
उत्तर भारत के अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में की जाने वाली प्रार्थना – ''हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए…'' के रचयिता हैं रामनरेश त्रिपाठी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी के प्रचार-प्रसार और समाज सेवा में लगा दिया। एक समय उनकी यह रचना इतनी लोकप्रिय थी कि रा.स्व. संघ की स्थापना के बाद शाखा में होने वाली प्रार्थना में भी इसके अंश लिए गए थे। उनके द्वारा रचित ग्राम्य लोकगीत संग्रह 'कविता कौमुदी' आठ खण्डों में प्रकाशित हुआ। (दुर्भाग्य से अब यह संकलन अप्राप्य है) इसी तरह, दिल्ली के आसपास प्रचलित उर्दू मिश्रित हिंदी में रामायण और उसके नाट्यरूपांतर को कथावाचक पंडित राधेश्याम ने घर-घर पहुंचाया। खासतौर से गैर-हिंदीभाषी क्षेत्रों में उन्होंने हिंदी का प्रचार-प्रसार भी किया।
हिंदी के दधीचि कहे जाने वाले पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने तो देवनागरी लिपि की हत्या होने से बचाई। इसी तरह, हिंदी साहित्य के नामचीन लेखक राहुल सांकृत्यायन, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, हिंदी समय सारिणी के निर्माता मुकुंददास 'प्रभाकर', सुभद्रा कुमारी चौहान, के.आर. नारायण, हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले बाबूराव विष्णु पराडकर और कई पुस्तकों के अलावा हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश की रचना करने वाले फादर कामिल बुल्के का परिचय भी संकलित किया गया है। साथ ही, बाद के अध्यायों में 20वीं सदी की शुरुआत से लेकर इसके उत्तरार्द्ध तक जन्मे साहित्यकारों का भी जीवन परिचय दिया गया है।
लेखक का कहना है कि पठनीयता बनाए रखने के लिए पुस्तक में साहित्यकारों के विवरण को जान-बूझकर छोटा रखा गया है, ताकि इसे अल्प समय में पढ़ा जा सके और पाठकों के मन में उनके विषय में और अधिक जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो। अपनी भूमिका में लेखक यह सुझाव भी देते हैं कि किसी भी इलाके के लिए सार्वजनिक योजनाओं का नामकरण करते समय वहां के स्थानीय साहित्यकार, पत्रकार और समाजसेवी के नामों पर विचार किया जाए। उनका तर्क है कि अपनी लेखनी से विदेशी और विधर्मी साजिशों तथा सामाजिक कुरीतियों से लड़ने वाले लेखकों का महत्व स्वाधीनता सेनानियों से कम नहीं है। -नागार्जुन
पुस्तक : भारत जिनके मन बसा
(देशप्रेमी लेखकों की जीवन गाथा)
लेखक : विजय कुमार
पृष्ठ : 216
मूल्य : 150 रु.
प्रकाशक : विश्व संवाद केंद्र
नारायण मुनि भवन, 16ए, राजपुर मार्ग, देहरादून-248001











