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आवरण कथा/योग विशेषआयुर्वेद एवं योग विज्ञान

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Jun 19, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Jun 2017 14:24:56

 

आयुर्वेद और योग वस्तुत: एक-दूसरे के पूरक हैं और आज यह बात सिद्ध हो चुकी है। यही वजह है कि भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में लोग योग के साथ-साथ आयुर्वेद की ओर आकर्षित हो रहे हैं।  योग जहां शारीरिक-मानसिक संतुलन बनाता है, वहीं आयुर्वेद  शरीर के आयुष्य का वर्धन करता है

अमित त्यागी

भारत में कहा जाता है कि वही होता है जो ईश्वर की इच्छा होती है। भविष्य में होने वाली घटनाओं के लिये नियति ने पहले से ही किरदार तय किये होते हैं। आज से सिर्फ 25 साल पहले यदि किसी से कहा जाता कि पिछले हजारों वर्षों से भारतीय जीवनशैली का आधार रहे योग-विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलेगी तो योग की तो छोड़िए, शायद ऐसा कहने वाले को भी महत्व नहीं मिलता। समय ने करवट ली। परंपरा पुरानी थी, योगाचार्य और भी हुए किन्तु स्वामी रामदेव के रूप में एक योगी-संन्यासी ने भारत के आम जनमानस में इस बात का विश्वास पैदा किया कि सिर्फ योग के द्वारा बड़ी से बड़ी बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। रंग चढ़ा और चढ़ता गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग पर लोगों का विश्वास बढ़ने लगा। इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में योग के संदर्भ में भारत का पक्ष इतनी मजबूती से रखा कि 193 में से 177 देशों ने प्रचंड बहुमत के साथ योग दिवस मनाने की घोषणा कर दी। संयुक्त राष्ट्र की योग दिवस की स्वीकार्यता भारत के गौरवशाली इतिहास के आधार पर भावी विश्व के निर्माण की एक शुरुआती रूपरेखा है।
योग सिर्फ कुछ आसनों एवं प्राणायाम तक सीमित नहीं है। यह एक विस्तृत प्रक्रिया एवं समृद्ध जीवन शैली  है। पर इसके लिए धैर्य की आवश्यकता है। देखा जाए तो योग और आयुर्वेद एक-दूसरे के पूरक हैं। मानव शरीर पंचतत्व से बना है। ये पंचतत्व हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश तथा वायु। शरीर में जो ठोस है वह पृथ्वी तत्व है। जो तरल है वह जल है। ऊष्मा अग्नि है। प्रवाहित होने वाला तत्व वायु है। समस्त छिद्र आकाश हैं। इन सब तत्वों के मध्य सामंजस्य रखने वाला विज्ञान आयुर्वेद है। अगर जीवनशैली संयमित है तो स्वाभाविक रूप से आयुर्वेद शरीर को अपना योगदान देता रहता है। आयुर्वेद के नाम के साथ वेद जुड़ा हुआ है। वेद शब्द आध्यात्मिक जीवनशैली का द्योतक है। आयुष और वेद के संयोजन से बने इस शब्द का अर्थ है—जीवन का विज्ञान। संभवत: यह सबसे प्राचीन चिकित्सा-विज्ञान है, जिसमें आध्यात्मिक कल्याण के द्वारा सिर्फ शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक पक्ष ही नहीं बल्कि नैतिक पक्ष को भी मजबूत करने पर ध्यान दिया जाता है।
एक ओर अन्य चिकित्सा विज्ञान बाह्य स्रोतों से शरीर की जरूरत पूरी करने पर आधारित हैं, वहीं दूसरी ओर योग विज्ञान स्वास्थ्य को जीवनशैली से जोड़कर इसे जीवन का ही एक अभिन्न अंग बना देता है। प्रात:काल ब्रह्म-मुहूर्त में उठते ही योग एवं आयुर्वेद स्वत: अपने प्रभाव में आ जाते हंै। इन्हें तीन भागों में बांटा गया है। पहले भाग में सुबह-सवेरे की जाने वाली योग क्रियाएं हैं। दूसरे भाग में आहार का स्थान है। भोजन में नियमित रूप से प्रयुक्त होने वाले मसाले जैसे हींग, कलौंजी, अदरक, मैथी, अजवाइन, काली मिर्च आदि वे आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां हैं जिनके द्वारा पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है। पाचन के लिए आवश्यक अग्नि संतुलित रहती है। तीसरे भाग में संस्कार एवं शिक्षा का स्थान है। संस्कार के द्वारा मानसिक उन्नति सुनिश्चित होती है, अपराध नियंत्रित होता है। नैतिकता का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तरह से तीन प्रक्रियाओं के द्वारा आयुर्वेद का आध्यात्मिक चक्र पूर्ण होता है।
अन्तरराष्ट्रीय पहचान बनाता ‘योग’
पाश्चात्य परंपरा के वाहक लोग जैसे-जैसे इस जीवनशैली की ओर आकर्षित हो रहे हैं वैसे-वैसे भारत वैश्विक परिदृश्य में बेहतर स्वास्थ्य के लिए योग और आयुर्वेद की उपयोगिता का ध्वजवाहक बन आगे आया है। बहुत से देशों ने योग और आयुर्वेद के समन्वित प्रभाव को वैज्ञानिक आधार पर देखना-परखना शुरू कर दिया है। अमेरिका, यूके, रूस, जर्मनी, हंगरी, दक्षिण अफ्रीका और विश्व के अन्य भागों से लोग भारत में योग और आयुर्वेद के द्वारा उपचार कराने के लिए आते हैं। योग में प्रवीण बहुत से भारतीय शिक्षक विदेशों में अपने ज्ञान का लाभ वहां के नागरिकों को दे रहे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में अग्रणी माने जाने वाले अमेरिका में योग और आयुर्वेद का चलन बढ़ रहा है। वहां योग और आयुर्वेद सिखाने के लिए कई विद्यालय खुल गए हैं। कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, कैनेटिकट और मैसाचुसेट्स में आयुर्वेद को बाकायदा एक पाठ्यक्रम की भांति  पढ़ाया जा रहा है। कुछ जगहों पर इसके लिए अलग से कॉलेज भी खुल गए हैं। अमेरिका में योग एवं आयुर्वेद के बढ़ते चलन का इतना जिक्र इसलिए क्योंकि हम में से कुछ भारतीय उस कार्यक्रम से ज्यादा प्रभावित होते हैं जो अमेरिका में आयोजित होता है।  अमेरिका की चिकित्सा प्रणाली हमें कुछ ज्यादा ही प्रभावित करती है। एक ओर हमारे बड़े-बड़े नेता अमेरिका में इलाज कराने जाते रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ, अमेरिकी लोगों में रासायनिक दवाओं के स्थान पर आयुर्वेदिक दवाओं और जड़ी-बूटियों के प्रति रुझान बढ़ा है।
विदेशों, खासकर अमेरिका में योग और आयुर्वेद का प्रभाव किस कदर बढ़ता जा रहा है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कुछ वर्ष पूर्व कैनेटिकट में पहले अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेदिक सम्मेलन का आयोजन हुआ था। खास बात यह थी कि इसमें एलोपैथी के डॉक्टर और सर्जन भी एकत्रित हुए थे। उन्होंने विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। इनमें सबसे अहम तथ्य यह था कि एलोपैथी के डॉक्टर भी आयुर्वेद से प्रभावित थे और इस पर विमर्श करते दिखे कि अमेरिका में लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए आयुर्वेद का इस्तेमाल कैसे किया जाए?
इसके द्वारा एक बेहद सकारात्मक दृष्टिकोण, जो निकट भविष्य में उभरकर सामने आता दिख रहा है, वह यह है कि आयुर्वेद और एलोपैथी को साथ मिलाकर बड़ी बीमारियों के इलाज की रूपरेखा तैयार की जाने लगी है। जैसे-जैसे आयुर्वेद की चीजों को एकत्र कर उसे लोगों के सामने रखा जाएगा, वैसे-वैसे मुख्यधारा की दवाओं के साथ आयुर्वेद को जोड़ने में बहुत मदद मिलेगी।
सात्विक आहार एवं योग विज्ञान
आहार आयुर्वेदिक एवं योग प्रक्रिया का अगला चरण है। सात्विक आहार के द्वारा चित्त के विकारों से बचा जा सकता है। थोड़े भोजन को लंबी आयु का आधार कहा जाता है। प्राणायाम योग की प्रारम्भिक प्रक्रिया है। जैसे ही हमने सात्विक आहार और योग को जीवनशैली से अलग किया, विकार पैदा हुए एवं बीमारियां घर करने लगीं। महंगी स्वास्थ्य सेवाओं ने देश को गरीब बनाना शुरू कर दिया। एक आंकड़े के अनुसार प्रतिवर्ष तीन प्रतिशत आबादी महंगी दवाओं पर खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चली जाती है।
तत्कालीन, योजना आयोग के मुताबिक प्रति 1,000 आबादी पर एक डॉक्टर के विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य को हासिल करने में भारत को अभी और 17 साल लग जाएंगे। निजी कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी है कि वहां से निकले छात्र ज्यादा कमाई के लिए या तो विदेशों का रुख कर लेते हैं या मेट्रो शहरों के पांच सितारा अस्पतालों की ओर आकर्षित होते हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों से निकले डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने से कतराते हैं। तो फिर कैसे स्वस्थ होगा भारत? विकल्प मौजूद है हमारी परंपरागत चिकित्सा प्रणाली में। आयुर्वेद एवं योग चिकित्सा पद्धतियों को स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
अशुद्ध विचार से रोग
भारतीय संस्कृति में शुद्ध विचारों पर बहुत बल दिया गया है। विचारों की शुद्धता के लिए सात्विक आहार एवं नियमित व्यायाम को जीवनशैली का आवश्यक भाग माना गया। हमारे मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक भी अब इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि मनुष्य की चिंतन शैली में असंतुलन से प्राणों की गति प्रभावित होती है। इस असंतुलन का परिणाम संपूर्ण शरीर पर दुष्प्रभाव डालता है। प्रतिकूल मनोदशा में खाया हुआ अन्न शरीर में ठीक से पचता नहीं है जो मानसिक रोग पैदा करता है। भारतीय आयुर्वेद में विचारों की शुद्धता का महत्व बताया गया है।
योग वशिष्ठ 6/1/81/30-37 में इसे समझाया भी गया है-‘‘चित्त में उत्पन्न विकार से ही शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं। शारीरिक क्षोभ की स्थिति में नाड़ियों के परस्पर संबंध
में विकार आ जाते हैं, जो रोग का कारण
बनते हैं।’’
बच्चों में संस्कार एवं अपराध मुक्त समाज
अपराध के निवारण में संस्कार का तत्व सबसे महत्वपूर्ण होता है। अपराध मुक्त सभ्य समाज के लिए दो महत्वपूर्ण आवश्यक बिंदु हैं- बचाव एवं उपचार। बच्चों में अच्छे संस्कार समाज में अपराध का पूर्व-निवारण  कर सकते हैं और न्याय होना और होते दिखना समस्या के उपचार के लिए आवश्यक है। यदि हम बच्चों में बेहतर संस्कार दे पाते हैं तो अपराध में स्वत: कमी आ जाती है। जब तक हमारी शिक्षा पद्धति गुरुकुल एवं संस्कार आधारित रही, अपराधों पर ज्यादा नियंत्रण रहा। बाल अपराध के आंकड़े काफी नियंत्रित रहे। वर्तमान शिक्षा प्रणाली उस दृष्टि से बहुत सुधार मांगती है।
निष्कर्ष   
इस तरह से योग एक समग्र राष्ट्र निर्माण का बीज है। वह सिर्फ हाथ-पैरों को मोड़ने की कसरत नहीं है। इसके पीछे एक पूरा विज्ञान एवं जीवनशैली अंतर्निहित है। अंग्रेजी सभ्यता के प्रति आवश्यक मोह से हमने अपना स्वास्थ्य भी गंवाया, संस्कार भी गंवाएं। अब फिर से योग के माध्यम से इन सबकी प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया है। 

 संस्कारों का योग योग
दिवस मनाने के साथ ही विद्यालय और अभिभावक इन प्रमुख बिन्दुओं को आत्मसात करेंगे तो बच्चों के साथ-साथ देश को भी फायदा होगा। सबसे पहले हमें चाहिए कि हम बालमन को सभी संभावनाओं से पूर्ण मानें। हम स्वयं के अंदर के मैं को त्यागकर इस बात को समझें कि बालमन में कुछ बनने की योग्यता एवं संभावनाएं मौजूद हैं। हर बच्चे में कोई न कोई विशेष गुण है। यदि हम सिर्फ उन्हें विकसित करने के लिए वातावरण उपलब्ध कराएंगे तो निश्चित ही उस बीज से एक फलदायी वृक्ष राष्ट्र को प्राप्त होगा। योग के द्वारा सोच केंद्रित होती है और गुण खिलकर बाहर आता है। एक कुशल माली की तरह ही बालमन की परवरिश करें। बालमन को स्वस्थ वैचारिक पोषण दें। जैसे माली पौधे को समय पर खाद-पानी देता है और अनावश्यक घास, खर-पतवार को समय-समय पर उखाड़ता रहता है, ठीक वैसे ही समय-समय पर अवगुणों को दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए। जब पौधे की डालियां इधर-उधर बिखरती हैं तो उसे सुंदर रूप देने के लिए जिस तरह एक माली काट-छांट करता है उस तरह का काम बाल-साहित्य बालमन के लिए करता है। बच्चों के आहार पर ध्यान दें। हमारे द्वारा स्वयं में किया गया परिवर्तन बालमन पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। बच्चे बड़ों के आचरण से प्रभावित होते हैं। किताबों मे लिखी बातों को तो बच्चे याद कर लेते हैं किन्तु अपने माता-पिता और निकट आत्मीयों के आचरण को वे स्वयं मे ढालने की कोशिश करते हैं। इसलिए बड़े पहले स्वयं योग प्रारम्भ करें। धूम्रपान एवं शराब से परहेज करें। तब ही वे अन्य को भी प्रेरित कर पायेंगे। हमारा आदर्श व्यवहार बच्चों की किताबों मे लिखी नैतिक शिक्षा से बेहतर परिणाम देगा।

असाध्य बीमारियों पर नियंत्रण
बेंगलुरू के स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान में पिछले तीन दशक से योग के माध्यम से मधुमेह, कैंसर और उच्च रक्तचाप आदि दुसाध्य बीमारियों को दूर करने पर शोध किया जा रहा है। यहां आने वाले मरीज शिविर में रहकर बीमारियों पर न केवल नियंत्रण पा रहे हैं, बल्कि उनकी अंग्रेजी दवाइयों के सेवन की मात्रा भी कम हो गई है। संस्थान में 80 के दशक से अस्थमा पर शोध शुरू किया गया था।  वर्ष 2012 की एक रपट के अनुसार 277 मरीजों को यहां दो अलग-अलग समूह में योग सिखाया गया और उसके तीन माह बाद जब दोबारा उनकी जांच की गई तो एक समूह के मरीजों में मधुमेह कम मिला, जबकि दूसरे समूह के मरीजों की दवा कम हो चुकी थी। इससे स्पष्ट है कि योग से न केवल असाध्य रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है, बल्कि दवा भी कम की जा सकती है। इन दवाओं का लंबे समय तक सेवन करने से हमारे शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है। इसे ध्यान में रखते हुए योग बहुत आवश्यक है, क्योंकि पहले चरण में दवा और कुछ वर्षों बाद इंसुलिन की आवश्यकता पड़ने लगती है। इससे भविष्य में लीवर, किडनी और शरीर के दूसरे अंग प्रभावित होने लगते हैं।

नियमित योग से लाभ
’    शरीर में लचीलापन बढ़ता है और हड्डियां भी मजबूत होती हैं।
’    मांसपेशियां मजबूत होती हैं और गठिया, पीठ दर्द जाता है।
’    शरीर को सही अवस्था में रखने में मदद मिलती है।
’    शरीर में रक्त संचार, ऊर्जा और प्राणशक्ति को बढ़ती है।
’    उपापचय को संतुलित बनाए रखने में सहायक है।
’    वजन घटता है और रीढ़ सुदृढ़ होती है।
’    शरीर से विषैले तत्व नष्ट होते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
’    अवसाद दूर होता है और रक्तचाप नियंत्रण में रहता है।
’    दिल को मजबूती प्रदान कर हृदयाघात के खतरे को कम
करता है योग।
’    अधिवृक्क  ग्रंथियों को नियमित कर कॉलेस्ट्रोल के स्तर को गिराता है।
’    ब्लड शुगर, बैड कॉलेस्ट्रोल (एलडीएल) घटाता है और गुड कॉलेस्ट्रोल (एचडीएल) बढ़ाता है योग।
’    ध्यान केंद्रित रखने और याद्दाश्त दुरुस्त रखने में सहायक
होता है योग।
’    शारीरिक संतुलन बढ़ाता है और शारीरिक स्थिति में सुधार लाता है योग।
’    स्नायु तंत्र को दुरुस्त रखता है और अच्छी नींद में भी मददगार है योग।
अंगों के तनाव को दूर कर अंदरूनी शक्ति को बढ़ाता है योग।  
दर्द में आराम प्रदान करने के साथ दवाओं से भी दूर रखता है योग।
    ल्ल

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