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कला में संस्कार साधना

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Dec 2016 15:19:25

 

एक समय था जब कला और संस्कृति से जुड़े लोग संघ परिवार के समीप आने से कतराते थे, लेकिन संस्कार भारती के प्रयासों से आज माहौल बदल गया है।  

अमीर चन्द

राष्ट्रवादीकलाकारों ने विपरीत माहौल में भी    अच्छा काम किया 

संस्कार भारती ने अपनी गतिविधियों से देश में विभिन्न कलाधाराओं को झंकृत ही नहीं किया बल्कि इस क्षेत्र में राष्ट्रीय संस्कार की 'अदृश्य सरस्वती' की सुध लेने, उसे सामने लाने का भी काम किया। यही वजह है कि आज अनेक कलाकार संघ विचार सरिता के साथ गहरा जुड़ाव अनुभव करते हैं। अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना पद्मविभूषण डॉ. सोनल मानसिंह कहती हैं, ''आजादी के पूर्व से ही एक समूह विशेष ने न केवल खेमेबाजी की, बल्कि ऐसी रेखा खींची कि 'हम इस पार, तू उस पार।' जबकि भारतीय चिति को यह मान्य नहीं है। शायद इसीलिए संघ का बौद्धिक गिरोहबाजी की बजाय विचार मंथन पर जोर रहा है।''  वे कहती हैं कि ये शक्तियां आजादी के बाद सत्ताधीशों से न केवल चिपक गईं, अपितु भारतीय चिति को किनारे धकेल दिया। वे बताती हैं कि 1993 में स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो भाषण की शती पर विश्व हिंदू परिषद् (विहिप) द्वारा अमेरिका में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति हेतु मुझ सहित पं़ हरिप्रसाद चौरसिया, अनूप जलोटा और अनुराधा पौडवाल आमंत्रित थे, परन्तु एक भी संगतकर्ता को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जाने नहीं दिया। इतना ही नहीं, कला-संस्कृति क्षेत्र को अपनी ठेकेदारी समझने वालों ने अमेरिका आयोजन के पूर्व मावलंकर हॉल, दिल्ली में सभा बुलाई। सभा में कैफी आजमी, शबाना आजमी, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग थे, अध्यक्षता कुलदीप नैयर कर रहे थे। स्वामी अग्निवेश ने हमसे सीधा सवाल दागा कि आप फासिस्टों के आमंत्रण पर कार्यक्रम में शिरकत करने अमेरिका जा रही हैं, क्या आपको हिटलर बुलाएगा तो जाएंगी? मेरा स्पष्ट उत्तर था कि- हाँ! क्योंकि मुझे भारतीय कला-संस्कृति की ताकत पर पूर्ण विश्वास है कि वह हिटलर को प्रभावित करेगी, न कि हिटलर भारतीय कलाओं को। रही बात विहिप के फासिस्ट होने की, तो वह फासिस्ट है या सेकुलर, ये तो आप जानें, आपकी जमात जाने। हमें तो अपनी कला-संस्कृति की प्रस्तुति हेतु बिना बंधन के जहां से भी आमंत्रण आएगा, मैं जाऊंगी।
किन्तु ये न केवल खेमेबाज हैं, अपितु भारत के विश्वासघाती भी हैं। 1962 के युद्ध पर आधारित पंडित श्याम नारायण पाण्डेय की 'हिमालय' कविता कहती है-    
जिस धरती का रस पिये जिये,
उस धरती को बदनाम करे।
बाहर भारत का भक्त बने,
भीतर कैची का काम करे।
विदित हो कि पाण्डेय जी आजमगढ़ में संघ के शीत शिविर में तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी से मिले थे। श्रीगुरुजी के आग्रह पर उन्होंने 'शिवाजी' महाकाव्य लिखा।
पाण्डेय जी राष्ट्रहित में 1962 में तत्कालीन नेहरू सरकार को 'हिमालय' कविता में स्पष्ट कहते हैं  
जो नहीं शत्रु को जान सका,
जो नहीं मित्र पहचान सका।
उससे गिरिराज घृणा करता,
जो बैरी को दहला न सका।
अयोध्या का विवादित ढांचा गिरने के बाद मीडिया ने पं़ भीमसेन जोशी के विचार जानने चाहे तो उन्होंने कहा, ''जो मैं कहूंगा वह आप दिखा नहीं सकते और जो आप चाहते हैं, वह मैं कह नहीं सकता।'' तत्पश्चात् पुणे के ही गायक पं़ जितेंद्र अभिषेकी से पूछा गया कि अयोध्या के विवादित ढांचे के जमीदोंज होने पर आपका क्या कहना है? उन्होंने कहा, ''गिर गया तो मंदिर निर्माण में क्यों देरी?''
यही नहीं, कला-साहित्य के व्यावसायिक कार्यक्रमों और मंचों सहित साहित्य में भी राष्ट्रवादी विचारों की झलक साफ दिखती है जैसे- शेखर सेन की हिंदी गजलें और महापुरुषों के चरित्रों का एकपात्रीय मंचन, दया प्रकाश सिन्हा के नाटक 'कथा एक कंस की', 'इतिहास', 'रक्त-अभिषेक', 'अशोक' आदि।  कोलकाता के कुमारसभा पुस्तकालय और नाट्य संस्था अनामिका के अध्यक्ष विमल लाठ के नाटक 'साकार होता सपना', 'उपनिषद एक अनुभव' आदि। एक बार मैंने विमल जी से पूछा था कि आप लोग  इतनी संस्थाओं में समय, पैसा व श्रम लगाते हैं, इसकी उपलब्धि क्या है? उत्तर था, ''वामपंथियों की नाभि में भी रहकर हमने हिंदी साहित्य और कला में उन्हें चोंच नहीं मारने दी, यह कोई छोटी उपलब्धि है क्या?'' वास्तव में संघ के विचारों की दृढ़ता के बिना यह संभव नहीं है। विक्टर बैनर्जी, विकास भट्टाचार्य और तपन गांगुली इसी धारा के हैं। 

अखिल भारतीय कला साधक संगम की 1992 में जयपुर में हुई गोष्ठी में मुख्य अतिथि 'चाणक्य' धारावाहिक के लेखक, निर्देशक और अभिनेता डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था, '' यह कौन-से विचार का प्रभाव है कि जिनकी एक नहीं, चार-चार मराठी फिल्में राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत हों वे राजदत्त जी मंच के सम्मुख समर्पित भाव से बैठे हैं। '' चाणक्य धारावाहिक को भी संघ विचारों का प्रभाव मानकर प्रसारण में कई अड़चनें पैदा की गईं। यद्यपि अब तो पिंजर, भाग मिल्खा भाग, बजरंगी भाईजान जैसी कई फिल्मों में शाखा और स्वयंसेवक के माध्यम से संघ विचार को दर्शाया गया है।
गीत रामायण के गायक, गोवा मुक्ति संग्राम के सेनानी और सावरकर फिल्म के निर्माता सुधीर फड़के तथा गायिका गायिका अनुराधा पौडवाल ने संघ गीतों को अपना स्वर दिया है।
सुधाकंठ डॉ. भूपेन हजारिका ने  'अपना पूवार्ेत्तर एक उत्सव, 2005 दिल्ली' में भाग लेते हुए कहा था, ''ये लोग आतंकवाद के उन्मूलन के लिए गंभीर हैं, इसलिए मैं आया हूँ।'' प्रख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर और शास्त्रीय गायक पं. जसराज भी संघ संस्थाओं द्वारा पूवार्ेत्तर भारत में किए जाने वाले कायार्ें के प्रशंसक हैं।  
1962 के भारत-चीन युद्ध पर आधारित मां की पुकार प्रदर्शनी लखनऊ  में लगी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी के जन्म दिन (14 नवंबर) पर 14 भारतीय सैनिकों की हत्या करके चीन ने भारतीय सीमा में उनके शव भेज दिए थे। भारतीय सैनिकों के साथ बर्बरता-पूर्ण अपमान के दर्द को प्रख्यात व्यंग्य चित्रकार कांजीलाल ने ऐसा उकेरा कि उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा उस चित्र को प्रतिबंधित करते ही प्रदर्शनी समाचार पत्रों की सुर्खियों में छा गई। इस कारण प्रदर्शनी की अवधि तीन दिन से बढ़ाकर सात दिन करनी पड़ी।
वैसे संघ विचार के प्रभाव का कला और इतिहास के क्षेत्र में प्रस्फुटन तो 1957 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा भीमबैठका की खोज से हुआ, जो आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। इस खोज हेतु सरकार ने वाकणकर जी को 1975 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। वाकणकर जी ने ही 1982 में सरस्वती नदी की खोज की। वे संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री के रूप में 'इंडियाज कंट्रीब्यूशन टू वर्ल्ड थट्स' प्रदर्शनी लेकर अमेरिका गए थे। भारत के 500 कलाकारों की यह प्रदर्शनी अमेरिका के छह विश्वविद्यालयों में प्रदर्शित हुई थी।
उपरोक्त कायार्ें और विचारों का ही प्रभाव रहा कि रामानंद सागर, दादा मुनि अशोक कुमार, नाना पाटेकर, अनुपम खेर, नीतीश भारद्वाज, मुकेश खन्ना, विक्रम गोखले, मधुर भंडारकर, थांग-ता गुरु पद्मश्री गुरुमयुं गौरकिशोर शर्मा (मणिपुर), प्रांजल सैकिया (असम), टोनी कोयू (अरुणाचल), मृदुला सिन्हा, नरेन्द्र कोहली, डॉ. सूर्यकांत बाली, बलवंत भाई जानी, काका हाथरसी, श्रीवत्स गोस्वामी, पं़ किशन महाराज, पं. गुदई महाराज, पद्मविभूषण गिरिजा देवी, अब्दुल हलीम जाफर खां, फिदा हुसैन नरसी, उस्ताद वासिफुद्दीन डागर, सईदुद्दीन डागर, मोतीलाल केमू  और क्षमा कौल (जम्मू), मालिनी अवस्थी, नलिनी-कमलिनी, गौरापंत शिवानी, शास्त्रीय गायक सिंह बंधु, तीजन बाई, श्याम शर्मा, एस़ प्रणाम सिंह, अक्षरधाम मंदिर शिल्प के रेखांकनकर्ता तथा मुंबई पगौड़ा के बुद्ध के 117 चित्रों के निर्माता वासुदेव कामत, दक्षिण भारत में अक्कितम अच्युत्तम नम्बूदरी, एस़ एल़ भैरप्पा, अभिनेता प्रियदर्शन, डॉ. नागराज हवालदार, पद्मा सुब्रह्मण्यम, पं़ बालमुरली कृष्णन, मैसूर मंजूनाथ सहित जैसे कलाकार राष्ट्रीय विचारों के न केवल संपर्क में आए, बल्कि आज संवाहक भी हैं। अब तो कला-साहित्य और सिनेमा जगत के लोग बड़ी संख्या में संघ विचारों को जानने-समझने हेतु उत्सुक हैं।  किन्तु यह माहौल चतुराई से नहीं, आत्मीयता पूर्ण राष्ट्रीय विचारों से बना है।
चतुराई और बुद्धिमत्ता में अंतर होता है। चतुर व्यक्ति परिचय बढ़ाता है और बुद्धिमान दोस्ती करता है। इसीलिए संघ केवल परिचय में नहीं, दोस्ती में विश्वास करता है।
हमें एक कहानी याद आती है, जो कलाबाजों की नीयत को दर्शाती  है। एक चतुर व्यक्ति का परिचय कस्बे के एक संवेदनशील डॉक्टर से था। एक दिन सायंकाल वह डॉक्टर के पास पहुंचा और बोला कि डॉक्टर साहब आप तुरंत मेरे गांव चलें, आप नहीं चलेंगे तो मेरे घर कुछ भी अनहोनी घट सकती है। डॉक्टर ने अपना स्कूटर निकाला और उसे पीछे बैठाकर चल पड़े। घर के दरवाजे पर स्कूटर रुकते ही उस व्यक्ति ने डॉक्टर से फीस पूछी। डॉक्टर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पहले मरीज दिखाने को कहा, लेकिन वह बिना फीस दिए मरीज को दिखाने को तैयार नहीं था। डॉक्टर ने कहा, क्लीनिक पर 20 रु.और बाहर जाने पर 40 रु़ लेता हूं, तुम तो जानते हो। उसने 50 का नोट डॉक्टर के हाथ पर धर दिया।
डॉक्टर को लगा कि गांव में मान्यता है कि बिना पैसे की दवा काम नहीं करती इसलिए उसने पैसे लेकर कहा कि अब तो मरीज दिखाओ? इस पर उसने कहा कि माफ करें, हमारे घर कोई मरीज नहीं है, बल्कि घर आना जरूरी था और आपसे बेहतर इस समय दूसरा कोई साधन नहीं था। कहना न होगा कि सत्ता, सरकारी संस्थानों में उच्च आसनों तक पहुंचने हेतु कला-साहित्य, संस्कृति को इन लोगों ने वाहन ही बनाया। इसीलिए इनकी रचनाओं और कृतियों से एक भी आदर्श पुरुष-महापुरुष नहीं बना, बल्कि ये स्वयं अनुशंसित-प्रशंसित और पुरस्कृत होते रहे। जबकि भारत और भारतीय कला-साहित्य, संस्कृति के आराधकों को संघ विचार का समर्थक, संवाहक कहकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से दूर रखा तथा प्रतिष्ठित सरकारी-गैर सरकारी पुरस्कार और सम्मानों से भी काटा। परन्तु राष्ट्रीय विचारों के प्रभाव के कारण अब स्थिति बदल रही है।  इस कारण अवसरवादियों में भारी बेचैनी और तिलमिलाहट है।
 (लेखक संस्कार भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री हैं) 

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