वैचारिक दृष्टि - भारत में चिंतन का प्रवाह
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वैचारिक दृष्टि – भारत में चिंतन का प्रवाह

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Dec 2016 17:26:59

-राजेन्द्र चड्ढा-

ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 90 वर्ष लंबी साधना के फलस्वरूप आज राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में  इससे प्रेरित अनेक संगठन विशाल रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि इन समस्त संगठनों के सम्मिलित प्रयासों के कारण हिन्दुत्व ने विशालतम कर्म-आंदोलन का रूप धारण कर लिया है। किन्तु बौद्धिक धरातल पर इस कर्म-आंदोलन के सामने अनेक चुनौतियां हैं-
1. उदात्त भारतीय जीवन मूल्यों के आधार पर राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में युगानुकूल पुनर्रचना की दिशा व सूत्रों की खोज करना। 2.विघटनकारी प्रवृत्तियों को जन्म देने वाले प्रसारवादी मजहबों, विदेशी विचारधाराओं एवं सत्तालोलुप वोट राजनीति के वास्तविक चरित्र एवं गतिविधियों का देशवासियों को ज्ञान कराना तथा राष्ट्रीय एकता व सामाजिक समरसता का माहौल तैयार करना। 3. मैकाले और मार्क्स के भारतीय मानस पुत्रों तथा वोट राजनीति के बंदी राजनेताओं द्वारा फैलाये जा रहे दृष्टि-विभ्रम एवं अपप्रचार का प्रभावी उत्तर देना।
इन चुनौतियों का सामना करने की दृष्टि से अनेक राष्ट्रवादी बौद्धिक मंच एवं संस्थाएं पहले से ही देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हैं। केरल स्थित भारतीय विचार केंद्रम, पंजाब से पंचनद, दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान और महाराष्ट्र का रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी इनमें प्रमुख हैं। इक्का-दुक्का संस्थानों से विचार मंथन की जो परंपरा शुरू हुई उसकी संस्था श्रंृखला अब बढ़ते-बढ़ते लगभग तीन दर्जन तक जा पहुंची है।
सबने यह अनुभव किया है कि बौद्धिक धरातल पर इन चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए इन स्वयंस्फूर्त, स्वतंत्र एवं स्वावलंबी संगठनों के प्रयासों में सुसूत्रता एवं समन्वय लाने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से 11-12 जनवरी, 1987 को दिल्ली तथा 11-12 अप्रैल, 1987 को बंगलुरू में राष्ट्रवादी चिंतकों के दो सम्मेलन आयोजित किए गए। उनमें अभिव्यक्त विचारों एवं सुझावों की पृष्ठभूमि में आगे के कदमों पर विचार करने के लिए 29-30 दिसंबर,1987 को कोलकाता में एक छोटी सी प्रतिनिधि बैठक का आयोजन किया गया था। उस बैठक में चर्चा के पश्चात निर्णय हुआ कि विभिन्न राष्ट्रवादी बौद्धिक मंचों एवं संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करने हेतु एक केंद्रीय प्रकोष्ठ का गठन किया जाए, जिसे पहचान की सुविधा के लिए 'प्रज्ञा भारती' कहा जाए। उस बैठक का सर्व सम्मत निष्कर्ष था कि प्रज्ञा भारती किसी संगठन विशेष का नाम न होकर देशव्यापी बौद्धिक आंदोलन का परिचय मात्र रहेगा। यह आंदोलन देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नाम-रूप वाले स्वतंत्र-स्वावलंबी संगठनों के माध्यम से कार्य करेगा। केंद्रीय प्रकोष्ठ के सदस्य इन संगठनों का मार्गदर्शन कर सकेंगे। केंद्रीय प्रकोष्ठ में 9 सदस्य रखे गए। देशभर में राष्ट्रवादी बौद्धिक गतिविधियां प्रारंभ करने की दृष्टि से 80 बौद्धिक केंद्रों का चयन किया गया।  
17 से 23 अप्रैल,1992 तक दिल्ली में एक 7 दिवसीय चिंतन सत्र का आयोजन किया गया जिसमें राष्ट्रीय पुनर्रचना की दृष्टि से जीवन-दर्शन, समाज व्यवस्था, अर्थ रचना, शिक्षा पद्धति, राजनीतिक प्रणाली विज्ञान, टेक्नोलॉजी व स्वास्थ्य आदि विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार मंथन हुआ। इस विचार मंथन में प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं, विशेषज्ञों ने भाग लिया। उस समय यह अनुभव आया कि राष्ट्रीय पुनर्रचना के सूत्रों की खोज के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इस प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिकों, प्रशासकों, आध्यात्मिक विचारकों का सहभाग भी उतना ही आवश्यक है। इसके बाद भोपाल में एक बैठक हुई जिसमें डॉ. मुरली मनोहर जोशी के चिंतन सत्र के समय हुई चर्चा के आलोक में जीवन दर्शन विषय को लेख रूप देने का दायित्व सौंपा गया।  अभी 16-17 जुलाई, 1994 को महाराष्ट्र के जलगांव शहर में प्रज्ञा भारती आंदोलन से जुड़े बौद्धिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यहां डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 'आधुनिक विज्ञान और भारतीय जीवन दर्शन' विषय पर अपना निबंध प्रस्तुत किया।
इस प्रक्रिया को सतत बनाए रखने के लिए प्रज्ञा प्रवाह प्रतिवर्ष अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित करता है। प्रज्ञा प्रवाह का अपने आप में विशिष्ट अनुभव है कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के उदद्ेश्य से किया जाने वाला कोई भी सार्थक और व्यावहारिक बौद्धिक प्रयास मात्र बुद्धि विलास नहीं हो सकता तथा इसके लिए यह आवश्यक है कि अपनी रीति से राष्ट्रनिर्माण के कार्य में लगी पांचों धाराओं (देखें बॉक्स) के बीच परस्पर विचार विनिमय हो। ये धाराएं हैं- विद्वज्जन, आधार स्तर के कार्यकर्ता, राजनीति में सक्रिय लोग, अधिकारी वर्ग एवं आध्यात्मिक चिंतक। प्रज्ञा प्रभाव ने इस दिशा में एक प्रयोग के रूप में दिल्ली में एक सात दिवसीय सामूहिक चर्चा आयोजित की। इस चर्चा में इन विभिन्न धाराओं के चुने हुए विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चा का लक्ष्य था अपने प्राचीन तथा समय की कसौटी पर खरे उतरे जीवन-दर्शन के आधार तथा साथ ही आधुनिक विज्ञान और प्रविधि के अनुरूप हमारे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक पुनर्निर्माण के संबंध में समस्याओं का आकलन करना तथा मार्ग निर्देश स्थिर करना।
1- चिंतन बैठक(दिल्ली)-19-20 अप्रैल, 2013 को दिल्ली में सम्पन्न चिंतन बैठक में चर्चा में आया कि भारत के विचार तो श्रेष्ठ हैं लेकिन हमें उनका अध्ययन करना पड़ेगा। उनको वर्तमान संदर्भों में व्याख्यायित करना पड़ेगा। श्रृंखला में नए विचार को भारतीय अधिष्ठान के आधार पर विकसित करना पड़ेगा। केवल पुराना अच्छा है यह कहने से काम नहीं चलता। ये तीनों कार्य भारत की नई पीढ़ी को करने चाहिए। ये महर्षि अरविंद के शब्द हैं। श्री अरविंद के शब्दों को ध्यान रखते हुए कुछ वर्षों के अंतराल में अपने विचार परिवार के वरिष्ठ चिंतकों की बैठक प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित की जाती रही है। इनमें हमारा मूलभूत चिंतन, अब तक के कार्य की समीक्षा, वर्तमान चुनौतियां और भविष्य का मार्ग इत्यादि विषयों पर चिंतन होता है।
देश के बौद्धिक जगत में कार्यरत 15 स्थानों की 32 संस्थाएं प्रज्ञा प्रवाह से संबद्ध हैं। इनके द्वारा शोध-अनुसंधान, शिक्षा-विकास-संस्कार-सेवा से जुड़े कार्य तथा मूलभूत चिंतन, विभिन्न विषयों का अध्ययन तथा उन पर आधारित साहित्य का प्रकाशन इत्यादि कार्य संपन्न होते हैंं। इनके द्वारा व्याख्यान, सेमिनार, प्रशिक्षण इत्यादि कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। एकात्म दर्शन से संबंधित कार्यक्रम किए गए।16-18 अगस्त, 2014 को नागपुर में अ.भा. अभ्यास वर्ग आयोजित किया गया। अब तक कई स्थानों पर प्रांतीय अभ्यास वर्ग संपन्न हुए हैं। इनमें प्रमुख हैं, गुजरात, चित्तौड़, दक्षिण बंग, उत्कल, मध्य भारत, विदर्भ, केरल, छत्तीसगढ़।्र विभिन्न विद्वानों की सहभागिता के साथ अनेक राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन किया जा चुका है। जैसे एर्णाकुलम (4-5 अप्रैल, 2015, विषय-एकात्म दर्शन-ए विजन फॉर बेेटर टुमारो), पटना  (11-12 अप्रैल, 2015, विषय-शासन-व्यवस्था), वाराणसी (2-3 मई,  2015, विषय- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) और जयपुर (जुलाई/अगस्त, 2015, विषय-अर्थायाम)।
इसी कड़ी में 12 से 14 नवंबर तक कर्मशीलों का तीन दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन लोकमंथन विधान सभा परिसर, भोपाल में आयोजित हुआ। आयोजन की विशेषता यह थी कि इसमें राष्ट्र निर्माण में कला, संस्कृति, मीडिया, इतिहास और साहित्य की भूमिका पर विमर्श किया गया। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति लोकमंथन का केंद्रीय विषय रहा। विद्वानों ने अपनी चर्चा में इस बात पर बल दिया कि समता, संवेदनात्मक प्रगति, सामाजिक न्याय, सौहार्द और सद्भाव की आकांक्षा राष्ट्रीयता के मूलमंत्र हैं।          लेखक प्रज्ञा भारती के राष्ट्रीय सह संयोजक हैं

सतत बौद्धिक अवदान में जुटीं 5धाराएं

विद्वज्जन-विषयों को खंगालने वाली विचारक शक्ति
आधार स्तर के कार्यकर्ता- बौद्धिक चर्चाओं को जमीनी स्तर पर उतारने वाला सजग, संपर्कशील तंत्र
राजनीति में सक्रिय लोग- विमर्श के वृहद सामाजिक-राजनीतिक प्रतिफलों को भांपने में सक्षम नेत्ृत्वकारी शक्ति
अधिकारी वर्ग-समाज और सत्ता, दोनों और सूचना-संवाद और बौद्धिक प्रभाव रखने वाले तंत्र के लोग
 आध्यात्मिक चिंतक- वृहद सामाजिक स्वीकार्यता। विचार की दार्शनिक व्याख्या में  सक्षम सर्व सम्माननीय शक्ति

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