अभिमत - निस्वार्थ और समाज के साथ
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अभिमत – निस्वार्थ और समाज के साथ

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Dec 2016 16:32:27

लुटियंस दिल्ली की दो पार्टियों में शामिल होने पर रा. स्व. संघ के साथ मेरी बातचीत घूमकर मुझ तक ही आ गई। पहले बात दूसरी पार्टी की करते हैं। कुछ ही हफ्ते पहले एक परिचित चुपके से मेरे पास आया और जिज्ञासापूर्वक मुझसे उस किताब के बारे में पूछा, जो मैं संघ पर लिख रही थी। मैंने पुष्टि की। अब यह जिज्ञासा और रुचि एक अविश्वास में बदल गई थी, जिसमें गोपनीयता बनाए रखने की महती आवश्यकता का भी सुर था। उस व्यक्ति ने मेरे बहुत नजदीक आ कर पूछा, ''मैं जानता हूं कि आप किताब के बारे में बात नहीं कर सकतीं.़ ़लेकिन आप उन  लोगों से कैसे जुड़ गईं''?  
यह पहली बार नहीं था, जब इस जिज्ञासा और निंदा द्वारा मुझ पर ऐसा हमला  किया गया था। मैं कुछ देशों में रह चुकी हूं, बाइबिल पट्टी (दक्षिणी अमरीका) में, एक मुस्लिम बहुल देश में और एक बौद्ध बहुल देश में। अपनी त्वचा के रंग के नाते मैं एक अल्पसंख्यक रही हूं। लेकिन मैंने स्वयं को इस तरह अलग-थलग किया हुआ था, कि अपने रंग भगवा के कारण उतना चिन्हित कभी महसूस नहीं किया, जितना अपने ही देश में किया। एक उत्सव में मेरे शामिल होने की बात एक समाचार में छपी, और शीर्षक चीखा-'भगवा कलाकार'-यह हैरानी पैदा करने वाला था क्योंकि उस उत्सव में न तो रंगों की डिब्बियों की कोई चर्चा हुई थी और न ही विचारधारा की!
लुटियन्स दिल्ली की दूसरी पार्टी संघ के साथ मेरी बातचीत से पहले हुई थी। मैं स्वयंचिन्हित उदारवादियों के बीच में थी और श्री दीनानाथ बत्रा पर एक हुई एक चर्चा में शामिल थी, जिनसे मैंने हाल ही में एक लेख के लिए बातचीत की थी, और मैं स्वयं को श्री बत्रा पर चर्चा के लिए इस नाते योग्य महसूस कर रही थी कि वहां मौजूद किसी भी अन्य व्यक्ति ने समाचार रिपोटोंर् के माध्यम को छोड़कर उनसे मुलाकात कभी नहीं की थी। मैं पक्ष नहीं ले रही थी, लेकिन मैंने अध्यापन के पेशे के साथ उनके लंबे संबंधों का और उनके कुछ उन बहुत ही व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य विचारों का उल्लेख किया, जिनसे सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता था। अमेरिका में पब्लिक स्कूल प्रणाली से परिचित होने के नाते मैंने सोचा कि उनके विचार (भारत में) निजी स्कूलों के स्तर तक सरकारी स्कूलों को लाकर एक अंतर पैदा करेंगे और बच्चों को दुनिया में अपने उन समकक्षों के साथ प्रतिस्पर्धा में एक ज्यादा ईमानदार अवसर उपलब्ध कराएंगे, जिन्हें बेहतर और अधिक चौकस शिक्षा प्राप्त होती है, जिससे उन्हें एक अनुचित लाभ मिल रहा है।
पार्टी के बीच में ही एक 'लिबरल' ने मुझ पर चिल्लाना शुरू कर दिया। मैं शिष्टाचार के इस अभाव से बहुत हैरान थी, लेकिन इससे भी अधिक इस बात से चकित थी क्योंकि जब मैंने श्री बत्रा से बात की थी, तब इससे कहीं अधिक विरोधात्मक दृष्टिकोण अपनाया था और बदले में मुझे केवल विनम्र और धैर्यपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिली थीं।
इस घटना ने मुझे यह पूछने के लिए बाध्य किया कि वास्तव में उदारवादी कौन था? ये दो परिचय मेरे लिए आंखें खोलने वाले थे, क्योंकि 'उदारवादी' और श्री दीनानाथ बत्रा, दोनों सम्माननीय थे और दो विरोधी शिविरों के जाने माने सदस्य थे और मैं मात्र प्रेक्षक थी।
मेरी पुस्तक (ऐसी पुस्तक जो खत्म होने में बहुत लंबा समय लगा रही है) लेखन की प्रक्रिया में मेरी बातचीत विविध और गहरी रही है। मैंने देशभर की यात्रा की है, केरल, नागपुर, छत्तीसगढ़ और जाने कहां-कहां। मैंने युवा प्रचारकों के साथ बैठकें आयोजित की हैं, जिनके पास कोई सेलफोन नहीं होता था, जो मुझे एक बार फिर से यह याद दिलाता था कि असामान्य स्थानों पर किसी ऐसे व्यक्ति से पहली बार मिलना-खोजना कितना आसान होता है, जब आप स्थान की जानकारी रख सकते हैं या उसका आदान-प्रदान कर सकते हैं। और मैंने बुजुर्ग लोगों को जीवन के भिन्न क्षेत्रों के मित्रों से मिलवाया, जो कुछ समझ नहीं सके कि कैसे कोई व्यक्ति राष्ट्र के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर सकता है, जब बदले में उसे कोई इनाम या सत्ता नहीं दी जा रही है? संघ एकांगी नहीं है, इसके कार्यकर्ताओं में मैंने अभिरुचियों और स्वभावों की विविधता देखी है।
निश्चित रूप से एक अंतर्निहित निस्वार्थता है-देश के प्रति एक समर्पण, जो उन्हें एकजुट करता है और उन्हें कर्म के लिए प्रेरित करता है। धर्म चर्चा शायद ही कभी की गई हो, इस प्रकार की पहचान की राजनीति की चर्चा मैंने बुद्धिजीवियों के बीच अक्सर देखी है, जो जाहिर तौर पर एकजुटता की तलाश केवल विभेदों की चर्चा करके और उन बातों की चर्चा करके हैं, जो हमें विभाजित करती हैं। संघ में सबसे ज्यादा चर्चा जिस चीज की होती है, वह है देश, उसकी चिंता कभी कभी कुछ विपरीत दृष्टिकोण उत्पन्न करती है, जो असामान्य नहीं है। किसी एक ही तरह से सोचने या न सोचने का कोई फरमान नहीं है। अलग सोच और यहां तक कि वैकल्पिक ढंग से सोचने की भी पूर्ण स्वतंत्रता है। लेकिन यह सब सम्मान के साथ किया जाता है, अपने आपको श्रेष्ठ जताने के लिए नहीं, बल्कि स्पष्ट करने के लिए, विशेष कर जब अन्य प्राथमिकताएं ज्यादा बड़ी हों।मानवीय बातचीत, बनावटी चालाकी का अभाव, ये वे चीजें हैं, जो मेरे जैसे किसी व्यक्ति को, जो बड़े-बड़े  व्यक्तियों के इस रास्ते से गुजर चुकी हो, संघ का प्रशंसक बना देती है।          लेखिका टिप्पणीकार हैं

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