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करारी चोट से  हैरान पाकिस्तान

Written byArchiveArchive
Nov 15, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 15 Nov 2016 10:46:41

 

 

 16 Oct. 2016

आवरण कथा 'दहले धौंसबाज' से स्पष्ट होता है कि अमेरिका की गुप्तचर एजेंसी सीआईए द्वारा 2005 में की गई भविष्यवाणी- पाकिस्तान कई टुकड़ों में बंट जाएगा, अब सत्य साबित होने जा रही है। सिंध, बलूचिस्तान जैसे प्रदेश गुलामी की जंजीर को तोड़कर स्वतंत्र होने को मचल रहे हैं। यहां के लोगों द्वारा पाकिस्तानी  सेना और सरकार द्वारा किया जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। तो वहीं अमेरिका में पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों के खिलाफ जनमत तैयार हो रहा है। सांसदों ने सरकार से मांग की है कि वह विदेश नीति का पुनर्मूल्यांकन करे और पाकिस्तान को देने वाली आर्थिक सहायता पर रोक लगाए। क्योंकि अमेरिका जो भी रकम पाक को सहायता रूप में देता है। पाक उसका उपयोग आतंकवाद को फलने-फूलने में खर्र्च करता रहा है।

—कृष्ण वोहरा, सिरसा (हरियाणा)

 

ङ्म उरी में सैन्य ठिकाने पर हमला करके पाकिस्तान ने विश्व में अपनी विश्वसनीयता समाप्त कर ली है। भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने में भी देर नहीं लगाई। अब विश्व जनमत धीरे-धीरे पाक के विरुद्ध हो रहा है। सन् 1971 में दो भागों में बंट जाने के बाद पाकिस्तान आज फिर उस मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहां उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई पड़ रहा है। पाकिस्तान के पास अभी भी समय है कि वह आतंक का रास्ता छोड़कर, शांति और विकास के मार्ग पर चलकर देश की तरक्की करे।

—आनंद मोहन, यमुना नगर (हरियाणा)

 

ङ्म कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। यहां आवाम के द्वारा चुनी हुई पसंदीदा सरकार कार्यरत है। केवल चुनिंदा जिलों में पाक-प्रेरित अलगाववादी संगठन ही हैं जो आतंकी घटनाओं को अंजाम दिलाने में जुटे हैं। झूठ ही सही पाकिस्तान ने भी इस बात को मान लिया है कि वह आतंकवाद से पीडि़त है। दूसरों के लिए कांटे बिछाने वाला पाकिस्तान आज खुद उससे घायल हो रहा है। बहरहाल, आतकंवाद पर बहुत बात हो चुकी, अब बात नहीं सीधे आघात देने की बारी है। सीधी कार्रवाई के जरिए पीओके में चल रहे आतंकी अड्डों को नेस्तानाबूत कर देने की जरूरत है। पाक के कब्जे वाला कश्मीर हमारा है ओर इसे आजाद कराकर ही सभी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

            —जमालपुरकर गंगाधर, हैदराबाद (तेलंगाना)

 

ङ्म पाकिस्तान कलाकार फवाद खान ने पाकिस्तान पहुंचते ही, नेशन फस्ट कहा जबकि हमारे बॉलीवुड के कलाकार देश के पक्ष में बोलने से कतराते नजर आते हैं। महेश भट्ट ने तो मुंबई में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर जूता फेंकने वाले का स्टेज पर स्वागत किया था। वहीं जब पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा अनुपम खेर का निर्धारित कार्यक्रम निरस्त कर

दिया गया था, तब ये लोग न जाने कहां चले गए थे।

—बी. एल. सचदेवा, (नई दिल्ली)

 

ङ्म साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। इस तथ्य को सभी ने स्वीकार किया है। लेकिन जब राष्ट्र और उसके स्वाभिमान का प्रश्न सामने आता है तो हमारी प्राथमिकता राष्ट्र है।  हमारे कुछ फिल्मी कलाकारों ने जिस तरह पाकिस्तान के कलाकारों का पक्ष लिया है वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि शर्मनाक भी है। पाकिस्तान हमारे देश में अराजकता पैदा करे और हमारे ही लोग उसकी शान में कसीदे पढ़े? देश के मौजूदा हालात को देखते हुए यहां के कलाकारों को इन बातों को समझना चाहिए साथ ही जनभावनाओं का ख्याल रखना चाहिए। क्योंकि देश के लोगों ने ही उन्हें हीरो बनाया है और यही लोग जीरो बनाने में देर नहीं लगाते।

—राजेन्द्र कुमार गर्ग, रांची (झारखंड)

 

ङ्म   अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद सबसे बड़ा आतंकी हमला आरलैंडो में हुआ। सुरक्षा में आदर्श राष्ट्र अमेरिका भी सियासत के लाभ में उन्मादी तदबीरों के भुनाने का शिकार हुआ। इसी तरह से हमारे देश में भी आतंक व कट्टरता के स्वार्थी लाभ के चलते सियासत होती है। हमारे देश में विदेशी एवं देशी चंदों पर पलने वाले तमाम फाउंडेशन देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त नजर आते हैं। लेकिन इसका एक ही हल है कि जब तक किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा स्वार्थी सियासत से मुक्त नहीं होगी, उन्माद की तदबीरों के गहन ताने-बाने को नष्ट करना आसान नहीं होगा। इंसानियत की स्थापना में बदलाव के तमाम उपक्रम जरा सी चूक में वरदान से अभिशाप बन जाते हैं। आरलैंडो हमला इसी बात का गवाह है।

—हरिओम जोशी, भिंड (म.प्र.)

 

ङ्म हिंदुस्थान जहां एक ओर पड़ोसी दुश्मनों से घिरा हुआ है, इसके साथ ही घर में बैठे दुश्मन जो देश के अंदर रहते हैं, देश का ही खाते हैं और यहां तक कि देशभक्ति का चोला ओढ़कर पाक परस्त लोगों का समर्थन करके देश के लोगों को गुमराह करते हैं। समाज को चाहिए कि वह ऐसे लोगों को पहचाने क्योंकि यह देश के लिए बहुत ही घातक हैं। देश को कई दशकों बाद एक अच्छा नेतृत्व मिला जो

साहसी तो है ही राष्ट्र के प्रति पूरी निष्ठा रखता है। सर्जिकल स्ट्राइक करके  प्रधानमंत्री  श्री नरेन्द्र मोदी ने देश को एक संदेश भी दिया कि  अब भारत और सहन करने वाला नहीं है। गलत कदम का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

—गोकुल चन्द गोयल, सवाई माधेपुर (राज.)

 

ङ्म जब से देश में राजग की सरकार आई है तब से देश हर मोर्चे पर प्रगति के राह पर है। चाहे वह विदेश नीति की बात हो या फिर भ्रष्टाचार की, हर जगह पर एक शुभ संकेत मिला है। विश्व में भारत की जय-जयकार हो रही है और हर देश भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए तैयार है। बस देश में भ्रष्टाचार, दंगे, झगड़ा-फसाद सब खत्म हो जाएं तो हम जिस रामराज की कामना करते हैं, वह आने की उम्मीद जाग जाएगी।

—एस.पी.गुप्त, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

 

एक देश – एक कानून

देश में अरसे से समान नागरिक संहिता का निर्माण किए जाने की मांग उठती रही है। लेकिन इसे जानबूझकर अनदेखा किया जाता रहा है। रपट  'तीन तलाक, नाजायज सोच (23 अक्तूबर)' से स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता एक सेक्युलर कानून होता है जो सभी मंत-पंथों पर समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में अलग मत-पंथों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ न होना ही समान नागरिक संहिता की मूल भावना है। तमाम देशों में ऐसे कानून लागू भी हैं। इसलिए भारत में भी जल्द ही इस कानून को लागू किया जाना चाहिए। ताकि सभी के लिए समान कानून की व्यवस्था हो सके।

—राममोहन चंद्रवंशी, हरदा (म.प्र.)

 

भगवा संकल्प

तिरंगा राष्ट्रीय एकता का प्रतिनिधित्व करता है जबकि भगवा सांस्कृतिक मूल्यों (सामाजिक समरसता) को प्रस्तुत करता है। अमूर्तरूप में देश का सांस्कृतिक संकल्प भगवाध्वज द्वारा ही अभिव्यक्त होता है। भगवा संकल्प का तात्पर्य ही है – समता भाव एवं मातृ भाव। भगवा वस्त्र वही धारण कर सकता है जो 'सोऽहम्' की भावना को अंगीकार कर चुका है। आत्मवत् सर्वभूतेषु य: पश्यंति स: पश्यति। स्पष्ट है कि भगवा मातृत्वभाव एवं समत्व दृष्टि का परिचायक है।

—राजू स्वामी, सतना (म.प्र.)

अस्मिता पर सवाल

आज की राजनीति दलित को दलित एवं महादलित में विभाजित कर राजनीतिक वर्चस्व की साजिश में लीन है। रपट '… सच से सकते में सेकुलर (9 अक्तूबर)' में साफ है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां अभिजात्य

एवं सामंत के रूप में कमजोर एवं दबी कुचली जातियों का शोषण एवं दमन करती रही हैं।

देश में शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जहां पर दलित दमन न होता हो लेकिन जहां भी राष्ट्रवादी शक्ति सत्ता में है, वहां सेकुलरों का अभियान दलितों के पक्ष में कम अपने सत्ता लाभ के लिए ज्यादा है। ये वेमुला, अखलाक, आदि के समर्थन में सत्ता के विरूद्ध

आवाज उठाते हैं, किंतु बिहार, उत्तर प्रदेश मे दलितों के शोषण-दमन पर मौन साध लेते हैं। बिहार में दलितों की हत्या चरम पर है, लेकिन

सेकुलर सरकार के मुखिया एवं अगुआ को ये

कुकृत्य दिखाई ही नहीं पड़ते हैं।

             —अनुज जायसवाल, भागलपुर (बिहार)

शिक्षा का राष्ट्रीकरण

अगर किसी परिवार को कमजोर दीवारों वाला मकान मिलता है तो उसके गिरने पर

सिर्फ उसके  परिवार के लोग हताहत होते हैं लेकिन गलत शिक्षा या इतिहास से पूरी पीढ़ी का नाश होता है। इसलिए किसी भी देश का इतिहास उसका आईना होता है, जिसे देखकर उसका नागरिक भविष्य का निर्णय लेता है। आज हमारे देश की पाठ्यपुस्तकों में अपने वीर महापुरुषों, पूर्वजों और नायकों के वास्तविक इतिहास के बारे में कम और विदेशी, अंग्रेजों और मुगलों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। जिसके कारण आज का विद्यार्थी अपने देश के कई क्रांतिकारियों, वीर पूर्वजों के बारे में कुछ भी नहीं जानता। इसलिए वर्तमान समय में विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे अपने देश के प्रति कुछ करने का जज्बा, क्रांतिकारियों का सम्मान व उनसे प्रेरणा मिल सके।

    —अभिषेक कुमार, गया (बिहार)

पुरस्कृत पत्र

समाज को जाग्रत करता संघ

आज समाज के बीच यह प्रवृत्ति दिखाई दे रही है कि काम करने से पहले व्यक्ति प्रश्न करता है कि ऐसा करने से हमें क्या मिलेगा? रपट 'सेवा संकल्प जैसा नहीं विकल्प' से स्पष्ट होता है कि हर व्यक्ति के मन में सामान्यत: धन मिलने की अपेक्षा ज्यादा रहती है। इससे ही अपनी प्रतिष्ठा, सुख, शांति एवं प्रगति चाहता है। यह सोच के चलते व्यक्ति सिर्फ अपने हित के बारे में विचार करता है। जैसे-जैसे यह सोच आकार लेती है वैसे-वैसे व्यक्ति एवं समाज का पतन होता जाता है।  हमारा अतीत इसका गवाह है। इसी सोच के कारण हम वर्षों अंग्रेजों और मुगलों के गुलाम रहे। जबकि इसके पहले का अतीत हमारा अच्छा रहा। समाज में सुख, शांति का वातावरण था और इसी धरती पर स्वर्ग जैसा आनंद था। लेकिन ऐसा क्या हुआ जो यहां का पूरा वातावरण ही परिवर्तित हो गया। इतिहास बताता है उस समय समाज का स्वाभिमान जाग्रत था। सत्य, त्याग, न्याय, परोपकार, सभ्यता, मर्यादा, सिद्धांत ये उसके जीवन मूल्य थे।  इन पर चलना वह अपना धर्म समझता था। और इन विचारों से जो सोच बनती थी वह समाज को एक सूत्र में बांधने का काम करती थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पीछे प.पू. डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी का यही उद्देश्य था कि समाज में सैकड़ों वर्षों से व्याप्त दासता की प्रवृत्ति को बदले बिना  हम सही मायने में स्वतंत्र नहीं होंगे। अत: हिन्दू समाज का स्वाभिमान जाग्रत कर, उसके ह्दय में भारतीय जीवन मूल्यों को स्थापित कर उसे संगठित करना होगा। संघ ने इस उद्देश्य को बड़े ही व्यवस्थित तरीके से निभाया और उसका परिणाम आज दिखाई दे रहा है।

—नितिन कुमार गौतम, बार्ड-6, चित्रगुप्त नगर, बालाघाट (म.प्र.)

नेता कौन महान?

किसका नाटक श्रेष्ठ है, नेता कौन महान

उधर केजरीवाल हैं, इत मैडम संतान।

इत मैडम संतान, गिरफ्तारी बतलाते

रोक लिया कुछ देर, इसी से हैं चिल्लाते।

कह 'प्रशांत' लेकिन क्यों कर इसको बिसराया

इंदिरा ने था पूरा भारत जेल बनाया॥

-प्रशांत

 

 

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