दुुनिया में डोसे का डंका
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दुुनिया में डोसे का डंका

Written byArchiveArchive
Oct 24, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 24 Oct 2016 17:12:24

 

43 वर्ष आई. डी. फ्रेश कंपनी
एक अनूठी शख्सियत के स्वामी हैं मुस्तफा। आर्थिक तंगी ऐसी रही कि उनके अब्बा कॉफी बगान में मजदूरी करते थे, सो ऊंची पढ़ाई सपना ही थी। लेकिन मुस्तफा ने जो किया, वह अद्भुत है

प्रेरणा
गांव के बेेरोजगार युवकों के रोजगार की चिंता
उद्देश्य
कंपनी को 1000 करोड़ के लक्ष्य तक पहंुचाना ताकि 5 हजार को रोजगार दे सकें
जीवन का अहम मोड़
दुबई में सिटी बैंक की नौकरी छोड़कर भारत लौटना
ज्ञान और धन  के प्र्रति दृष्टि पढ़ाई से ही खुलते हैं आगे के रास्ते जिस पर चलकर धन कमाने और समाज को कुछ लौटाने के काबिल बन सकें। 

 

 आलोक गोस्वामी

कल्पना करके ही जेहन में असंभव के संभव होने जैसा महसूस होता है। मुस्तफा ने केरल के एक छोटे से गांव से निकलकर जिस तरह आज देश-दुनिया में मशहूर आई. डी. फ्रेश कंपनी खड़ी की, उसके पीछे की कहानी उनकी अपनी जिंदगी की कहानी से कम अजूबी नहीं है। मुस्तफा पर सरस्वती का ऐसा वरदान रहा कि छठी क्लास में फेल होने के बाद भी हिम्मत और इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने कोझीकोड के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की ऊंची डिग्री ली। आज उनकी कंपनी में तैयार इडली, डोसे के घोल के मुरीद चेन्नै, बंगलूरू, दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद, मंगलूरू से आगे दुबई तक के लाखों परिवारों को उनकी जिंदगी के ज्ञान और समृद्धि के सोपानों के बारे में भले न पता हो, पर वे उनके दक्षिणी भोजन के स्वाद के दीवाने जरूर हैं।
  केरल के वायनाड में एक छोटे से गांव चेन्नालोड में एक गरीब मजदूर पिता और अनपढ़ माता के घर जन्मे और पले-बढ़े मुस्तफा का बचपन अभावों में बीता। उन्हे 4 किमी. चलकर स्कूल जाना पड़ता था। बिजली थी नहीं, सो तेल की कुप्पी में पढ़ना होता था जिसमें उस वक्त मुस्तफा का मन नहीं रमता था। उनका मन सिर्फ गणित में लगता था, लेकिन छठी में फेल होने के बाद तो पढ़ाई से जी ही हटने लगा। पर मुस्तफा को गणित पढ़ाने वाले मैथ्यू सर ने सीधा सवाल किया उससे, पढ़ना है या पिताजी की तरह मजदूरी करनी है। बात सटाक से वहां जाकर लगी जहां उसे लगना चाहिए था। मुस्तफा जुट गए पढ़ाई में और ऐसी मेहनत की कि 10वीं में स्कूल में सबसे अव्वल आए। अब 10वीं के बाद जूनियर कॉलेज जाने के लिए पहली बार वायनाड से बाहर कदम रखना था। लेकिन गरीब पिता के पास पैसे कहां थे जो बाहर भेजते। लेकिन उनके एक दोस्त ने मुस्तफा को धर्मादे के हॉस्टल में मुफ्त खाना खाने की इजाजत दिला दी। हॉस्टल के दूसरे छात्र उसे मुफ्तखोर कहके चिढ़ाते, इससे वह अंदर तक टूट जाता। पर  पढ़ना था सो अपमान का घूंट भी पीना था। पीता रहा। कॉलेज के बाद, इंजीनियरिंग कालेज का 'एंटरेंस' पास किया। कम्प्यूटर साइंस में दाखिला मिला। स्कॉलरशिप के साथ ही छात्र ऋण लेना पड़ा।
1995 में एक मोड़ आया और मुस्तफा को इंजीनियरिंग के बाद बंगलूरू में एक स्टार्टअप कंपनी में काम मिल गया। कुछ दिन बाद मोटोरोला से बुलावा आ गया। बंगलूरू में ही कुछ वक्त काम किया, फिर आयरलैंड भेज दिया गया उन्हें। ज्यादा वक्तनहीं बीता कि  मुस्तफा को भारत और यहां के खाने की याद सताने लगी। लेकिन 3 महीने बाद ही उन्हें सिटी बैंक, दुबई से बुलावा आया। फट से स्वीकार कर लिया उन्होंने। बाद में बेटे ने जब अपनी कमाई के एक लाख रु. नकद घर भेजे तो इतने रुपए देखकर पिता की आंखें भर आईं। धीरे-धीरे बहनों की शादी हुई और सन् 2000 में मुस्तफा की भी शादी हो गई। नया घर खड़ा हुआ गांव में। लोग छोटे से मुस्तफा को इतना बड़ा आदमी बनते देखकर हैरान रह गए       और अपने बच्चों को उसके जैसा बनने को कहने लगे। लंबे वक्त तक दुबई में काम करने के बाद मुस्तफा ने 2003 में भारत लौटने का फैसला किया, तीन वजहों से। एक, माता-पिता के साथ घर पर रहना, आगे बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई करना और तीन, समाज के लिए कुछ करना। गांव के काबिल युवकों के रोजगार की चिंता करना।
मन पलटने लगा। मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़कर अपना काम शुरू करने का बड़ा फैसला लेने से पहले कई सवाल कौंधे दिमाग में। पल्ले बचत पूंजी के नाम पर मात्र 15 लाख रु. ही थे। क्या काम किया जाए, उधेड़बुन शुरू हो गई। इस बीच आइआइएम-बंगलूरू में मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए दाखिला भी ले लिया। चचेरे भाई की सलाह पर डोसा पेस्ट बनाने का विचार आया और बस, 25,000 की लागत से काम शुरू हो गया। मुस्तफा ने चार चचेरे भाइयों के साथ काम शुरू कर दिया। साझेदारी में 50 टका मुनाफा मुस्तफा का और बाकी 50 उन चारों का। इडली का 'आई' और डोसा का 'डी' लेकर कंपनी का नामकरण हो गया-आईडी फे्रश। 20 दुकानों के जरिए अपना डोसा पेस्ट बेचते-बेचते दिन के 100 पैकेट का लक्ष्य पाने मंे 9 महीने लग गए। फिर तो और 6 लाख रु. लगाकर मुस्तफा ने बड़ी जगह और पीसने की ज्यादा मशीनें ले लीं। 2 साल के अंदर दिन में 3,500 किलो पेस्ट बनने लगा। सहयोगी दुकानें 300 से बढ़कर 400 हो गईं। 30 आदमी काम पर रखे गए थे। बढ़ते काम को संभालने के लिए 2008 में मुस्तफा ने 40 लाख रु. और लगाकर औद्योगिक क्षेत्र में बड़ा प्लांट लगा लिया। अब परांठे का पेस्ट भी बनाया जाने लगा था। आईडी फे्रश के ताजे सामान का स्वाद लोगों की जबान पर चढ़ता गया और कामयाबी मुस्तफा के कदम चूमती गई। आज कुल मिलाकर 50,000 किलो से ज्यादा पेस्ट बनाया जाता है देश के कई शहरों और दुबई के प्लांट में। अक्तूबर 2015 में मुस्तफा की कंपनी 100 करोड़ रु. की हो गई थी। अगले 5-6 साल में वे कंपनी को 1000 करोड़ की कंपनी बनाना चाहते हैं, जिसमें करीब 5,000 लोगों को काम मिले। युवा उद्यमियों के लिए उनकी एक ही सलाह है कि अगर कुछ काम शुरू करने का जज्बा है तो फौरन कर डालो।कल का इंतजार मत करो। अपने सामान की गुणवत्ता से कोई समझौता मत करो।     

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