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अजीत ओझा 45 वर्ष मैत्रिश शिप मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड
प्रेरणा
आम आदमी की परेशानी
उददेश्य
रोजगार पैदा करना
जीवन का अहम मोड़
मर्चेन्ट नेवी में जाना
ज्ञान और धन के प्रति दृष्टि
धन तो महत्वपूर्ण है, पर ज्ञान सर्वोपरि है
-संजीव कुमार
एक खाते-पीते परिवार में पले-बढ़े अजीत ओझा के सामने एक समय ऐसा आया जब उन्हें घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। उनके परिवार के कुछ लोग रेलवे में थे। उन्होंने उन्हें सलाह दी कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए रेलवे में चपरासी की नौकरी कर लो। यह बात उन्हें बहुत कष्ट देती थी। लेकिन उन्होंने अपने परिजनों की बात नहीं मानी। इसके लिए उन्हें न जाने कितनी तरह की बातें सुनने को मिलीं। लेकिन वे ज्ञान को जीवन में आगे बढ़ने की सीढ़ी बनाने की जिद लेकर मैदान में डट गए। इसी का परिणाम है कि ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले ओझा आज दो दर्जन से अधिक कंपनियों के मालिक हैं। वे सालाना सैकड़ों करोड़ रु. का कारोबार करते हैं। उनकी कंपनियां जहाजरानी, ज्ञान व विशेषज्ञता आधारित जैसे क्षेत्रों से जुड़ी हैं।
ओझा सीवान (बिहार) के रहने वाले हैं। 1986 में मैट्रिक करने के बाद उन्हें मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के लिए नागपुर भेजा गया। वहां उन्हें महसूस हुआ कि इससे अपना पेट तो भर सकता है, लेकिन देश-समाज की भलाई और बेरोजगारों की कोई मदद नहीं हो सकती। यह सोचकर 1988 में वे सीवान वापस आ गए। इसके बाद उन्होंने इंटरमीडिएट और स्नातक किया। हांगकांग की एक कंपनी से मरचेंट नेवी की पढ़ाई की। खास बात यह रही कि 36 महीने की पढ़ाई उन्होंने 14 महीने में ही कर ली। इसके बाद मर्चेंट नेवी में नौकरी लग उनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुई। उन्होंने छह साल तक नौकरी की। इसके बाद अपने दो मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने एडीएस शीपिंग कंपनी की नींव रखी। दुर्भाग्यवश दोनों मित्र अब इस दुनिया में नहीं रहे। एक सड़क दुर्घटना में दोनों का निधन हो गया। मित्रों के जाने से ओझा को थोड़ी निराशा हुई, लेकिन जल्दी ही वे इससे उबर गए। इसके बाद वे एक बार फिर से अपने उद्देश्य की पूर्ति में लग गए।
1999 में उन्होंने जहाजरानी की कंसलटेंसी सर्विस शुरू की तो 2000 में अपने पुत्र मैत्रिश के नाम पर 'मैत्रिश शिप मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड' नामक कंपनी की नींव डाली। आज दुनिया के कई देशों में इसकी शाखाएं काम कर रही हैं। हाल ही में उन्हें एशिया के श्रेष्ठ व्यवसायी का पुरस्कार मिला है। ओझा ने अपने व्यवसाय में ज्यादा लोगों को रोजगार देने की बात हमेशा ध्यान में रखी और अपने व्यवसाय से प्राप्त होने वाले लाभ का उपयोग भी ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया। उन्होंने 'कन्यादान समागम' के माध्यम से सामूहिक विवाह को प्रोत्साहित किया। उनकी देखरेख में अब तक 102 जोड़ों का सामूहिक विवाह हो चुका है। ल्ल











