पुस्तक समीक्षा - श्रमिकों के सच्चे दोस्त
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पुस्तक समीक्षा – श्रमिकों के सच्चे दोस्त

Written byArchiveArchive
Oct 24, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 24 Oct 2016 16:08:00

भारतीय मजदूर संघ ने अपने संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी के व्यक्तित्व और कृतित्व को जन-जन तक पहंुचाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए 'दत्तोपंत ठेंगड़ी-जीवन दर्शन' शीर्षक से नौ खण्डों की एक ग्रंथमाला प्रकाशित की जा रही है। इनमें से सात खंड प्रकाशित हो चुके हैं। शेष दो खण्ड प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। दत्तोपंत जी के महत्वपूर्ण अवसरों पर दिए गए उद्बोधनों, सामयिक वक्तव्यों, चर्चाओं, उनके लेखों तथा पुस्तकों और प्रस्तावनाओं के चयनित सारांशों को यथावत् ग्रंथमाला के अभी तक प्रकाशित सात खंडों में समेटने का प्रयास किया गया है। उनके के जीवन के विशिष्ट प्रसंगों, विविध पहलुओं को उनके समकालीन अधिकारियों, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महानुभावों, बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, समाजशास्त्रियों, संगठन और समाज जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों के सामान्य जन के चुने हुए संस्मरणों से दत्तोपंत जी की जीवनयात्रा के विहंगम दर्शन तथा व्यक्तित्व के अनेक पक्ष उजागर होते हैं।
प्रथम खंड में उनके जन्म से लेकर देहावसान तक की प्रमुख घटनाओं का अत्यंत संक्षिप्त विवरण, उनकी शिक्षा, दीक्षा, माता-पिता का परिचय और घर-परिवार तथा आसपास के परिवेश, अन्यान्य सामाजिक संगठनों में कार्य, भारतीय मजदूर संघ का निर्माण, आपातकाल, प्रथम जनता पार्टी सरकार, नई आर्थिक नीति पर विचार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विश्व व्यापार संगठन आदि का विरोध जैसे विषयों को लिया गया है।  इस खंड में सर्वश्री अशोक सिंहल, पी़ परमेश्वरन, वन्दनीया प्रमिला ताई मेढ़े, डॉ़ सुब्रह्मण्यम स्वामी, भिशीकर जी, एस. गुरुमूर्ति और के़ आऱ मल्कानी सदृश्य विशिष्ट जनों के अत्यंत रोचक और प्रेरणास्पद संस्मरणों से दत्तोपंत जी का एक चित्र पाठक के मनो-मस्तिष्क में उभरता जाता है। इस चित्र के माध्यम से दत्तोपंत जी के गहन चिंतन की एक भव्य, दिव्य आकृति स्पष्ट दिखाई देने लगती है। प्रथम खंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रंगाहरि जी की प्रस्तावना से ग्रंथ की महत्ता बढ़ी है, तो सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के सन्देश से ग्रंथरूपी मूर्त्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई है। इस खंड में दत्तोपंत जी के बारे में एटक के अखिल भारतीय महामंत्री कामरेड गुरुदास दासगुप्ता की ये पंक्तियां पढ़ने लायक हैं, ''दत्तोपंत ठेंगड़ी के झण्डे का रंग क्या था, सवाल यह नहीं है। हिन्दुस्थान के श्रमिक वर्ग की एकता के लिए झण्डे का प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है। जो बात सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वह यह है कि दत्तोपंत ठेंगड़ी श्रमिकों के सच्चे दोस्त थे। मुझे यह कहने में रत्तीभर भी संकोच नहीं है कि ठेंगड़ी जी श्रमिक वर्ग के सर्वश्रेष्ठ नेताओं में से एक थे। उन्होंने राजनीति या किसी दल की नहीं, बल्कि श्रमिक वर्ग की सदैव चिन्ता की।''
द्वितीय खंड में मुख्य रूप से भुसावल (1968) और पुणे (1980) में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकर्ता अभ्यास वर्गों में ठेंगड़ी जी द्वारा दिए गए भाषणों को शामिल किया गया है। इस खंड में कुल पांच सोपान हैं। पहले, दूसरे और तीसरे सोपान में ठेंगडी जी के भाषण हैं। चौथे सोपान में कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के महत्वपूर्ण लेख और पांचवें सोपान में संस्मरण हैं।  इस सोपान में एक लेख है भारतीय मजदूर संघ, मंगलोर (कर्नाटक) के पूर्व महामंत्री प्रभाकर घाटे का। वे लिखते हैं, ''मद्रास की एक घटना है। ठेंगड़ी जी कार्यकर्ताओं से घिरे थे, तभी एक कार्यकर्ता उनके पास पहंुचा और कुछ कहा…। ठेंगड़ी जी मेरी ओर मुड़े और कहा कि हमें इस कार्यकर्ता के घर चलना है। … रास्ते में मुझे पता चला कि कुछ दिन पूर्व ही वह कार्यकर्ता एक बेटी का पिता बना है, उसकी इच्छा थी कि ठेंगडी जी उस बच्ची को आशीर्वाद दें और उसके लिए एक नाम भी बताएं। ठेंगड़ी जी उसके घर गए…। बच्ची की मां बच्ची को ठेंगड़ी जी के सामने लेकर आई। उन्होंने अत्यंत स्नेहपूर्वक बच्ची के गालों को थपथपाया.. ठेंगड़ी जी के 'सेल्वी' कहते ही सारा वातावरण प्रसन्नता से चहकने लगा।'' इस प्रसंग से पता चलता है कि ठेंगड़ी जी छोटे से कार्यकर्ता का भी कितना ख्याल रखते थे।
तीसरे खंड में अखिल भारतीय कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग  इंदौर(1984), नागपुर(1992) और लुधियाना(1983) में ठेंगड़ी जी द्वारा दिए गए भाषणों को रखा गया है। इसमें जिज्ञासा, समाधान और विभिन्न विषयों पर ठेंगड़ी जी द्वारा दिए गए प्रश्नोत्तर भी हैं। साथ ही उनका एक वार्तालाप भी है। आत्म विकास पर उनकी ये पंक्तियां बहुत ही प्रेरक हैं,''आत्मविकास का कोई विकल्प नहीं है। यह बात हम भलीभांति समझ लें। लेकिन आत्मविकास करना जितना कठिन है, उससे भी ज्यादा कठिन अपने विकास को कायम रखना है। क्योंकि जैसे मनुष्य आत्मविकास करता है, उसका प्रभाव बढ़ता है, काम बढ़ता है, प्रतिष्ठा बढ़ती है, मान्यता बढ़ती है तो मनुष्य के मन में परिवर्तन होने लगता है। यह परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे होता है। एकदम परिवर्तन हो जाए तो पता चल जाए। पहले प्रतिष्ठा नहीं थी, अब है। पहले पैसा नहीं था, अब है। … परिवर्तित परिस्थिति में अपनी अच्छाई को बनाए रखने में विशेष प्रयास   करना पड़ता है।''
चौथे खंड में भारतीय मजदूर संघ के अखिल भारतीय अधिवेशनों और बैठकों में ठेंगड़ी जी द्वारा दिए गए भाषणों को रखा गया है। इसमें कुछ अन्य महत्वपूर्ण बैठकों के भाषण भी हैं। ठेंगड़ी जी सच कहने में कोई संकोच नहीं करते थे। 16 अप्रैल, 2001 को दिल्ली के रामलीला मैदान में दिया गया उनका भाषण इसका प्रमाण है। उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के लिए कहा था, ''इलेक्शन के थोड़े सप्ताह पूर्व स्वदेशी जागरण मंच की एक चिन्तन बैठक नागपुर में हुई थी। उस बैठक में उन्होंने कहा था कि चूंकि वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन ज्वॉइन करने से हमारा सब तरह से नुकसान होता है…और हमारी संप्रभुता खतरे में आती है, तो वी मस्ट क्विट डब्ल्यू. टी. ओ.। … थोड़े सप्ताह हुए, जैसे ही फाइनेंस मिनिस्टर की ओथ ले ली … सब कुछ भूल गए और जो बोला था उसके ठीक विपरीत व्यवहार करना उन्होंने शुरू किया।…'' (पृष्ठ-152)  
पांचवें खंड में ठेंगडी जी द्वारा संसद में दिए गए कुछ चयनित भाषणों के अंश, विदेश यात्रा के दौरान महत्वपूर्ण लोगों से हुई बातचीत, पश्चिमीकरण के बिना आधुनिकीकरण, लेख और संस्मरण हैं।  ठेंगडी जी दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। पहली बार 3 अप्रैल, 1964 से 2 अप्रैल, 1970 तक और दूसरी बार 3 अप्रैल, 1970 से 2 अप्रैल, 1976 तक।  इस दौरान उन्होंने अनेक मुद्दों पर राज्यसभा में भाषण दिए और अनेक बहसों में भाग लिया। वित्त विधेयक, रेल बजट, औद्योगिक विवाद (संशोधन) विधेयक, 1963 : यूनियनों को मान्यता, कृषि सहकारी संस्थाओं के सशक्तिकरण के लिए संसदीय समिति का गठन जैसे विषयों पर उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के विचार रखे। 28 जुलाई, 1967 को राज्यसभा में 'पाकिस्तान को अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति' विषय पर उन्होंने कहा, '' मैडम! जब भी विदेश मंत्रालय से जुड़ी किसी घटना पर हम चर्चा करते हैं तो दुर्भाग्यवश हमारी सूचना का आधार हमारे अपने स्रोत नहीं, अपितु कोई दूसरे होते हैं। हमारे जो राजनयिक विदेशों में तैनात हैं, वे  आखिर करते क्या हैं। उन्हें उन घटनाओं के बारे में क्या सचेत नहीं रहना चाहिए जो भारत के हितों के विरुद्ध घटती हैं और क्या इन्हें इन घटनाओं के बारे में भारत सरकार को सूचित नहीं करना चाहिए। हर बार हमें अपने नहीं, बाहर के स्रोतों से सूचना मिलती है। एक उदाहरण देखें कि क्या अमेरिका वेस्ट जर्मनी को अमेरिका निर्मित हथियारों को पाकिस्तान को देने से रोक सकता है। अमेरिका ऐसा क्यों करेगा क्योंकि अमेरिका स्वयं जर्मनी द्वारा अमेरिका की बकाया देनदारियों के एवज में उसे हथियार खरीदने की सलाह दे रहा है। अमेरिका के पास क्या कोई ऐसा अधिकार है कि वह जर्मनी को इन हथियारों को पाकिस्तान को देने से रोक सके। यह मैं मंत्री महोदय से जानना चाहूंगा।'' (पृष्ठ 23-24)
छठे खंड में दत्तोपंत जी की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं, प्रस्तावनाओं, प्रस्तुतियों और आलेखों को जगह दी गई है। सातवें खंड को चार भागों (सोपान) में बांटा गया है। पहले भाग में उनका परिचय दिया गया है, जबकि दूसरे और तीसरे खंड में उद्बोधन और लेख हैं। चौथे खंड में दत्तोपंत जी से जुड़े कुछ संस्मरण हैं।
ग्रंथमाला के लेखन-संपादन का कार्य भारतीय मजदूर संघ के ही वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री अमरनाथ डोगरा ने किया है। वे प्रथम खंड की भूमिका में लिखते हैं, ''यह ग्रंथमाला न तो दत्तोपंत जी की जीवनी है और न ही इतिहास लेखन की अपेक्षित मर्यादाओं के अन्तर्गत लिखा गया इतिहास है। दत्तोपंत ठेंगड़ी समग्र भी यह नहीं है और न ही साहित्य मानकों के अनुरूप कोई साहित्यिक रचना है। यह दत्तोपंत जी द्वारा आर्थिक क्षेत्र में किए गए महान कार्य का संकलन और वृत्त है।''
दत्तोपंत जी के विचार मृतप्राय: प्राणों में संजीवनी का संचार करने और सुप्तावस्था से जगाने वाले हैं। भारतीय मजदूर संघ ने उनके बिखरे हुए विचारों को संकलित करके ग्रंथमाला के रूप में प्रकाशित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। ग्रंथ वास्तव में पठनीय व संग्रहणीय है।
-अरुण कुमार सिंह

पुस्तक का नाम : 'दत्तोपंत ठेंगड़ी-जीवन दर्शन' (9 खंड)
लेखन एवं संपादन : अमर नाथ डोगरा
प्रकाशक : भारतीय मजदूर संघ
प्राप्ति स्थान : सुरुचि प्रकाशन
केशव कुंज, झण्डेवालान, नई दिल्ली – 110055
दूरभा: 011-23514672, 23634561
पृष्ठ संख्या : 325 से 350
मूल्य : 200 रुपए प्रत्येक खंड (सजिल्द) 

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