| दिंनाक: 10 Oct 2016 14:12:10 |
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पाकिस्तानी कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में भारत की सटीक सर्जिकल स्ट्राइक ने आखिरकार दक्षिण एशियाई देशों को आश्वस्त किया है कि वे सब मिलकर पाकिस्तान द्वारा पोसे जा रहे आतंकवाद से खुद को बचा सकते हैं। ज्यादातर देशों ने भारतीय कार्रवाई का समर्थन किया और भारत के साथ खड़े होकर इस्लामाबाद में होने वाले सार्क सम्मेलन को स्थगित करवा दिया। इस तरह पाकिस्तान आतंकवाद पर अलग-थलग पड़ गया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में से ज्यादातर उस आतंकवाद के शिकार रहे हैं जिसके सूत्र पाकिस्तान से जुड़ते हैं। इसलिए वे इस संदर्भ में दक्षिण एशियाई देशों की प्रतिक्रिया को समझ सकते हैं। लेकिन भारतीय कार्रवाई पर उनकी प्रतिक्रियाएं दृढ़ समर्थन से लेकर सतही बयानों तक दिखाई दीं, जिसमें भारत और पाकिस्तान से बातचीत के जरिए संबंध बेहतर बनाने की हिदायत वाले बयान भी थे। पश्चिमी देशों में पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने के अभियान जोर पकड़ते जा रहे हैं। भले ही उन पर कोई ठोस कार्रवाई जैसी न दिखाई दे, लेकिन कम से कम पाकिस्तान तो थोड़ा दबने पर मजबूर हुआ ही है और लोगों की निगाह में पहचाना जा रहा है।
इस मामले में रूस की प्रतिक्रिया दिलचस्प और गौर करने लायक रही है। रूस ने भारतीय कार्रवाई का पूरी तरह समर्थन किया और इस आशय का भारत में रूस के राजदूत कदाकेन ने वक्तव्य भी जारी किया है। हालांकि उरी हमले के ठीक बाद रूस ने मैत्री-2016 के तहत पाकिस्तान सेना के साथ अपना पूर्व नियोजित सैन्य अभ्यास जारी रखा। हालांकि भावनाओं का ध्यान रखते हुए वे उसे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर से दूर ले गए। रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद दोस्त रहा है, दोनों के बीच गहरे सुरक्षा संबंधों ने भारतीय प्रतिरक्षा बलों और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का विस्तार किया है। कहीं हमने उनकी संवेदनाओं को तो आहत नहीं किया है, या हमारे द्विपक्षीय वादों के क्रियान्वयन में देरी तो नहीं हुई है? हमें रूस के साथ चर्चा करके इसकी फिर से समीक्षा करनी चाहिए।
चीन पाकिस्तान का हर तरह से दोस्त है, इसने उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों में सहायता दी है और हाल में बलूचिस्तान में पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान होते हुए सड़कों का संजाल और बंदरगाह बनाने के लिए 46 अरब डॉलर देने का वादा किया है।
पाकिस्तान को देश के विभिन्न हिस्सों में उन जगहों पर कड़ा स्थानीय प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है जिन्हें उसने बलपूर्वक दबाया हुआ है। चीन की मदद को इसीलिए पाकिस्तानी सेना की मदद के तौर पर देखा जा रहा है जिसके बदले इन अशंात सूबों में चीनी कामगारों को पूरी सुरक्षा देने का वादा किया गया है। चीन पाकिस्तान स्थित उइगर इस्लामी गुटों के आतंक को झेल रहा है जिसे उसने पाकिस्तान पर गुपचुप दबाव और स्थानीय इस्लामी समुदाय को चंद लाभ देकर संभालने का फैसला किया है।
बहरहाल, चीन दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में आतंकवाद के प्रति तीखी नफरत को अनदेखा नहीं कर सकता। भारत को चीन को अलग-थलग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जैसा कि वह पाकिस्तान के साथ कर रहा है। भारत को बी. आई. एम. एस. टी. ई. सी., आसियान और उत्तर पूर्वी एशिया के साथ मजबूत रिश्ते बनाने की कोशिशें जारी रखनी चाहिए जिससे चीन पर साझा दबाव पड़े और वह आतंकवाद, नदियों के बहाव और दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय कायदों का अनुपालन करे।
इस सबसे बढ़कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की वैश्विक शांति के प्रति अहम जिम्मेदारी बनती है। इसलिए उनके पास अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर पाकिस्तानी की ओर से लगातार दी जा रहीं परमाणु युद्ध की गैर जिम्मेदाराना धमकियों के खिलाफ कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हमें उनके और दूसरे मित्रवत देशों के साथ अपनी द्विपक्षीय बातचीत में इस बारे में याद दिलाते रहना चाहिए।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं)
-शशंाक